कमला कृति

मंगलवार, 31 मई 2016

मयंक अवस्थी की ग़ज़लें


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


वही  अज़ाब  वही  आसरा..


वही  अज़ाब  वही  आसरा  भी  जीने का
वो मेरा दिल ही नहीं ज़ख्म भी है सीने का

मैं बेलिबास  ही शीशे के  घर में रहता हूँ
मुझे भी शौक है  अपनी तरह से जीने का

वो  देख  चाँद की पुरनूर  कहकशाओं  मे
तमाम  रंग  है  खुर्शीद  के  पसीने   का

मैं पुरख़ुलूस हूँ फागुन की दोपहर की  तरह
तेरा  मिजाज़  लगे  पूस  के  महीने  का

समंदरों  के  सफ़र  में सम्हाल कर रखना
किसी  कुयें  से जो पानी मिला है पीने का

'मयंक' आँख में सैलाब उठ न पाये कभी  
कि  एक अश्क मुसाफिर है इस सफीने का
                           

  • अज़ाब=पीड़ा 
  • पुरनूर कहकशाओं = ज्योतिर्मय व्योम गंगाओं 
  • खुर्शीद=सूर्य 
  • पुरखुलूस=अत्मीयता से भरा हुआ


क़ैदे-शबे-हयात बदन में..


क़ैदे-शबे-हयात बदन में गुज़ार के
उड़ जाऊँगा मैं सुबह अज़ीयत उतार के

इक धूप ज़िन्दगी को यूँ सहरा बना गयी
आये न इस उजाड़ में मौसम बहार के

ये बेगुनाह शम्म: जलेगी तमाम रात
उसके लबों से छू गये थे लब शरार के

सीलन को राह मिल गयी दीमक को सैरगाह
अंजाम देख लीजिये घर की दरार के

सजती नहीं है तुमपे ये तहज़ीब मग़रिबी 
इक तो फटे लिबास हैं वो भी उधार के

बादल नहीं हुज़ूर ये आँधी है आग की
आँखो से देखिये ज़रा चश्मा उतार के

जब हथकड़ी को तोड़ के क़ाफ़िर हुआ फ़रार
रोते रहे असीर ख़ुदा को पुकार के

  • क़ैदे-  शबे-  हयात- जीवन रूपी रात्रि की कैद
  • मग़रिबी –पश्चिमी  

 

कभी यकीन की दुनिया में..


कभी यकीन की दुनिया में जो गये सपने
उदासियों के समन्दर में खो गये सपने

बरस रही थी हक़ीकत की धूप घर बाहर
सहम के आँख के आँचल में खो गये सपने

कभी उड़ा के मुझे आसमान तक लाये
कभी शराब में मुझको  डुबो गये सपने

हमीं थे नींद में जो उनको सायबाँ समझा
खुली जो आँख तो दामन भिगो गये सपने

खुली रही जो मेरी आँख मेरे मरने पर
सदा–सदा के लिये आज खो गये सपने
                                                                             

खुलती ही नहीं आँख..


खुलती ही नहीं आँख उजालों के भरम से
शबरंग हुआ जाउँ मैं सूरज के करम से

तरकीब यही है उसे फूलों से ढका जाय 
चेहरे को बचाना भी है पत्थर के सनम से

इक झील सरीखी है गज़ल दश्ते-अदब में 
जो दूर थी, जो दूर रही, दूर है  हम से

आखिर ये खुला वो सभी ताज़िर थे ग़ुहर के 
जिनके भी मरासिम थे मेरे दीदा-ए-नम से

क्योंकर वो किसी मील के पत्थर पे ठहर जाय       
क्यों रिन्द की निस्बत हो तेरे दैरो-हरम से

ये मेरे तख़ल्लुस का असर मुझ पे हुआ है
अब याद नहीं अपना मुझे नाम कसम से

  • करम –कृपा
  • ताज़िर –व्यापारी
  • तख़ल्लुस –उपनाम
  • रिन्द – मयकश
  • निस्बत –सम्बन्ध
  • दैरो-हरम- मन्दिर –मस्ज़िद 

तारों से और बात में..


तारों से और बात में कमतर नहीं हूँ मैं
जुगनू हूँ इसलिये कि फ़लकपर नहीं हूँ मैं

सदमों की बारिशें मुझे कुछ तो घुलायेंगी
पुतला हूँ ख़ाक का कोई पत्थर नहीं हूँ मैं

दरिया-ए-ग़म में बर्फ के तोदे की शक्ल में

मुद्दत से अपने क़द के बराबर नहीं हूँ मैं

उसका ख़याल उसकी  ज़ुबाँ उसके तज़्किरे
उसके क़फ़स से आज भी बाहर नहीं हूँ मैं

मैं तिश्नगी के शहर पे टुकड़ा हूँ अब्र का      
कोई गिला नहीं कि समन्दर नहीं हूँ मैं

टकरा के आइने से मुझे इल्म हो गया             
किर्चों से आइने की, भी बढकर नहीं हूँ मैं

क्यूँ ज़हर ज़िन्दगी ने पिलाया मुझे “मयंक”  
वो भी तो जानती थी कि,शंकर नहीं हूं मैं   

  • तज़्किरे –ज़िक्र
  • तिश्नगी =प्यास
  • अब्र =बादल 
  • दरिया-ए-ग़म=दु:ख के दरिया में
  • बर्फ केतोदे==बर्फ क ढेर (हिमशैल का छोटा रूप )


मयंक अवस्थी



  • जन्म-25 जून, 1964/हरदोई (उत्तर प्रदेश) 
  • साहित्यिक परिचय–ग़ज़ल तथा गीत विधाओं में रचनायें तथा समीक्षायें । 
  • सम्पादन–गज़ल संग्रह 'तस्वीरें पानी पर' (1999), 'लफ़्ज़' पत्रिका के वेब एडिशन का सम्पादन सन 2012 से. 
  • सम्प्रति –भारतीय रिज़र्व बैंक कानपुर में कार्यरत 
  • सम्पर्क–बी -11, भारतीय रिज़र्व बैंक अधिकारी आवास, तिलक नगर, कानपुर-208002 
  • ईमेल-awasthimka@gmail.com 

पुस्तक समीक्षा: सामाजिक असंगतियों को बेनकाब करती कवितायें-डा.राधेश्याम बंधु




                          

                       कविता संग्रह-‘ठहरी बस्ती-ठिठके लोग’/ अवधेश सिंह


‘ठहरी बस्ती-ठिठके लोग’ चर्चित कवि अवधेश सिंह का दूसरा कविता संग्रह है। इसके पहले भी उनका पहला कविता संग्रह ‘छूना बस मन’ प्रकाशित और चर्चित हो चुका है। प्रथम कविता संग्रह की प्रेम कविताओं में जहां रागात्मक अनुभूतियों की पारम्परिक थरथराहट देखने को मिलती है, वहीं दूसरे संग्रह की कविताओं मंजे कवि की वस्तुपूरकता और वस्तुवादी वर्गीय चेतना के प्रमाण भी स्पष्ट रूप से देखने को मिलते हैं और यह कवि की अध्ययनशीलता और सजगता के कारण ही सम्भव हो सका है । ये कवितायें दैनिक अखबार की तरह रोज घटने वाली घटनाओं की मात्रा सूचनायें ही नहीं देतीं बल्कि तत्कालीन चुनौतियों के अनुरूप अपने को तैयार रखने के लिए दिशा निर्देश भी देती हैं । जिन्दगी में, समाज में चाहे जितनी निराशाजनक असंगतियां, अराजकता, खुदगर्जी हो, पिफर भी जिन्दगी और जिन्दगी के सपने कभी मरते नहीं हैं।
      ‘ठहरी बस्ती-ठिठके लोग’ की कवितायें निश्चितरूप से उपभोक्तावादी, यथास्थितिवादी सोच वाले लोगों के लिए भी चुनौतीपूर्ण सवाल प्रस्तुत करती हैं कि यदि बस्ती के लोगों की जिन्दगी में ठहराव और उदासीनता है तो उसके लिए कौन जिम्मेदार है? कविता में थोथी बौद्धिकता की शाब्दिक, भाषिक बाजीगरी करने वाले कवियों से भी यह सवाल है कि क्या उन्होंने इस सामाजिक निष्क्रियता और प्रतिगामिता के बारे भी कभी सोचा कि इसके लिए कौन जिम्मेदार है? इस द्रष्टिकोण से अवधेश सिंह की सामाजिक सरोकारों की जागरूक कवितायें सीधी -सहज भाषा में आम आदमी के दुख-दर्द, गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी को विषय बनाकर उनसे संवाद स्थापित करने का प्रयास करती हुई भी प्रतीत होती हैं साथ ही उनकों इन असंगतियों से जूझना भी सिखाती हैं। हम देखते हैं कि प्रत्यक्षतः ये गद्य कवितायें हैं किन्तु इनकी अन्तरात्मा की आन्तरिक बुनावट पूर्णरूपेण गीतात्मक है।
     इससे स्पष्ट होता है कि हर कवि में विकास की सम्भावनायें होती हैं वशर्तें कि कवि में अपने को युगानुरूप बदलने की प्रबल इच्छा हो और साथ ही उसमें  अध्ययनशीलता की जिज्ञासा भी हो । यहां यह भी बताना जरूरी है कि जब कवि कविता की वस्तुवादी आलोचना से भी परिचित होता है, तो उसे अपनी कविताओं को मानव की बेहतरी की चिन्ता के अनुरूप न्यायपरक बनाना ज्यादा आसान होता है । यही बात मैंने अपनी पुस्तक ‘नवगीत के नये प्रतिमान’ में भी समझाने का प्रयास किया है कि ‘‘साहित्य का वस्तुतत्व यदि क्या, क्यों, और किसके लिए प्रश्नों के जवाब की खोज का परिणाम है तो वह साहित्य को जनप्रिय और यथार्थवादी दोनों बनायेगा और इससे भिन्न हुआ तो वह निरन्तर अमूर्त होता जायेगा। वस्तुतः वस्तुतत्व साहित्य में मनुष्य के मनुष्य होने का प्रमाण है।’’  ;( ‘नवगीत के नये प्रतिमान’ डा. राधेश्याम बंधु पृष्ठ 14 )
    इस दृष्टि  से इस संग्रह की कवितायें काफी  हद तक आश्वस्त करती हैं और विश्वास दिलाती हैं कि कवि सिर्फ कविता ही नहीं लिखता है बल्कि वह कविता की वस्तुवादी आलोचना और वर्गीय चेतना से भी प्रिचित है और उसने उसका निर्वाह करना भी जानता है। इसका प्रमाण है उनकी कविता ‘जिन्दगी फुटपाथ की सेल हो गई ’। आज बाजारबाद समाज पर जिस तरह प्रभावी होता जा रहा है यह हम सबके लिए एक चिन्ता की बात है। इसी का दुष्परिणाम है कि हमारे रिश्ते, नाते, आचार, विचार के मूल्यों में अनवरत गिरावट देखने को मिल रही है। कुछ पंक्तियां दृष्टव्य हैं-  

महंगाई
इतनी बढ़ी 
अझेल हो गयी 
गृहस्थी
समस्याओं की 
रेल हो गयी 
हर घर की
बस एक सी कहानी
आपसी सारी बातें
बेमेल हो गयी [ पृष्ठ 31 से ]

    इसी प्रकार की एक मार्मिक कविता है ‘बीमार मिल का सायरन’ । हम जानते हैं कि पहले मिल, कारखाने जो कामगारों को काम देते थे, मिस्त्री , मजदूरों के चूल्हों को गरम बनाये रखते थे और पीठ पर बस्ता लादे हुए बच्चों को पढ़ने के लिए स्कूल भेजते थे, वे आज अवसरवादी राजनीति के कारण खुद ही बीमार हो गये हैं और उनमें बन्दी के ताले पड़ गये हैं। इससे लाखों कामगार बेकार हो गये हैं । बहुतों के घरों में चूल्हा भी नहीं जल पाता। कविता की कुछ पंक्तियां यहां दृष्टव्य हैं-

मिल की दीवार पर
यह सदियों से जड़ा है
बीमार मिल का सायरन
बना मूक दर्शक चुप पड़ा है

कभी था बस्ती की
गलियों से कामगारों की
भीड़ को मिल के गेट तक 
ले जाने वाला
जाना माना पथ प्रदर्शक
बन गया है मूकदर्शक
अब यह सायरन!
हो दुखी , हो अनमन
हो लाचार 
देखता है खोलियों के
तंग हाल भूखे नंगे
फटे हाल बीमार तन ! [ पृष्ठ 68 से ]

 अब तो उंगलिया और हथेलियाँ
स्याही की कलम से रंगती  नहीं हैं
बेदाग साफ सुथरे हाथ
बाल पेन की
सरसराती सांप सी लिखावट से
आदेश निर्देश प्रस्ताव के जहर बोते है
कागजों  पर
उगाते हैं मौत - बदहवासी -पीड़ाओं
की लहलहाती फसलें
सिर्फ बस सिर्फ एक रोटी के खातिर  [ पृष्ठ 72 से ]

        इस प्रकार हम देखते हैं कि ‘पेट की खातिर’ और ‘रोटी’ के नाम पर कुछ लोगों का समाज में अपराध का धंधा  खूब फल-फूल रहा है और वे सफेद कालर उचा करके सभ्य होने का नाटक भी करते हैं । ऐसे रंगे स्यारों को बेनकाब करके यह कविता शरीफ लोगों की आखे भी खोलती है और उनसे सतर्क रहना भी सिखाती है। इस संग्रह में ऐसी ही व्यंजनापरक कई कवितायें हैं जो सीधी -सहज भाषा में सामाजिक असंगतियों से परिचित कराने में पूरी तरह सक्षम हैं जैसे जिन्दगी सिपर्फ कविता नहीं, बंद तो सब बंद है, आम आदमी, बजट, पर्यावरण उवाच, द्रोपदी का चीरहरण, लक्ष्मण रेखा, मेरे बच्चे, भ्रष्टाचार, छले जाने का भय, रोटी, दलितोत्थान, आदि ।
      ये यथार्थवादी कवितायें सामाजिक सरोकारों को लोक धर्मी  भाषा और शिल्प में अपने सम्बोध्य आम जनता तक सम्प्रेषित करने में पूरी तरह सक्षम हैं और पठनीय भी हैं । किन्तु  वहीं  यह  भी  स्पष्ट  करना बहुत जरूरी है कि आचार्य नन्ददुलारे बाजपेयी के अनुसार कविता सिर्फ अखबार की कतरन नहीं है बल्कि कविता कुछ अलग और आगे की बात भी व्यंजनापरक शैली में करती है । इसलिए किसी भाव को प्रस्तुत करने के लिए उसे एक कलात्मक स्वरूप भी ग्रहण करना पड़ता है, तभी वह दूरगामी जीवन्तता और प्रभाव ग्रहण कर पाती है । इसलिए ‘ठहरी बस्ती-ठिठके लोग’ के लिए अवधेश सिंह को बधाई  देने के साथ मैं यह संकेतित करना भी जरूरी समझता हूं और मुझे पूरा  विश्वास है कि वे अपने आगामी कविता संग्रह की तैयारी में और भी मेहनत करेंगे  तथा हमें उनसे और भी सार्थक तथा सजग कवितायें पढ़ने को मिलेंगी ।

  • समीक्ष्य पुस्तक-ठहरी बस्ती ठिठके लोग/कविता संग्रह-अवधेश सिंह/2014/ ISBN : 978-93-81480/प्रकाशक: विजय बुक्स, सुभाष पार्क नवीन शाहदरा, दिल्ली-110032/पृष्ठ : 86/मूल्य 195/ 
     

डा. राधेश्याम बंधु


सम्पादक,
‘समग्र चेतना’   
पता-बी-3/163, यमुना विहार,            
दिल्ली-110053                  

मंगलवार, 24 मई 2016

सत्य प्रकाश शर्मा की गज़लें


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


एक सफर दिल से..


माज़ी से मुस्तकिबल तक 
एक सफर दिल से दिल तक 

रास्तों में यारी कर ले 
आ जाएगा मंजि़ल तक 

दरिया कितना भूखा है 
खा जाता है साहिल तक 

दिखता है उसका चेहरा 
तनहाई से महफि़ल तक 

रंगीनी है दुनिया की 
बस आँखों की झिलमिल तक 

मुश्किल में आसानी है 
आसानी है मुश्किल तक 


ऐसा भी कुछ कहो कि..


एहसास में हो ‘मीर’, जबाँ में ‘असद’ रहे 
ऐसा भी कुछ कहो कि जहाँ में सनद रहे 

सर ही नहीं उठाना तो डरने की बात क्या 
चेहरा हो चाहे जैसा भी, कैसा भी क़द रहे 

कोई सबब तो हो कि तुम्हें याद रख सकें 
दिल टूटने में कुछ तो तुम्हारी मदद रहे 

इल्ज़ाम हमसे कोई नकारा नहीं गया 
जिस जुर्म में शरीक रहे, नामज़द रहे 

ये जि़न्दगी की जंग लडंूगा मैं शान से 
लेकिन है शर्त साथ ग़मों की रसद रहे 


मुख्तलिफ़ रंग हैं जमाने के..


कुछ दिखाने के, कुछ छुपाने के 
मुख्तलिफ़ रंग हैं जमाने के 

छीन कर हमसे ले गया कोई 
सारे अन्दाज़ मुस्कराने के 

जि़न्दग़ी बस उसे कहा जाए 
जिसमें मौके़ हों गुनगाने के 

क्या सिले देखिए मिले हमको 
इन बुतों को खुदा बनाने के 

दाने-दाने पे उसका है 
लोग मोहताज दाने-दाने के 


चोट खाते रहे..


चोट खाते रहे ज़माने से 
बाज़ आए न मुस्कुराने से 

चार-सू रौशनी महकती है 
एक दिल का दिया जलाने से 

हमसे मिल जाओ फिर कभी आकर 
ज़ख़्म होने लगे पुराने से 

ज़िक्र उनका कोई करे हमसे 
जिनको देखा नहीं ज़माने से 

इश्क करना गुनाह ठहरा तो 
हम गुनहगार हैं ज़माने से 

कह रही हैं ख़तों की तहरीरें 
हम न मिट पाएंगे मिटाने से 

धूप के तज्रबे सुनाते हैं 
बैठकर लोग शामियाने से 

हुस्न की शान में ग़ज़ल कहना 
सीखिये ‘मीर’ के घराने से 

घर-सा लगने लगा है मयख़ाना 
रोज़ आने से, रोज जाने से 


ये तमाशा है, सब...


ये तमाशा है, सब लकीरों का 
मुन्तजि़र है शिकार तीरों का 


गाल अपने बजाओ महफि़ल में 
क्या करोगे मियाँ मँजीरों का 

जुल्म पर, कैद पर, हु़कूमत पर 
कितना एहसान है असीरों का 

कंकरी कोहेनूर कर डालें 
मर्तबा है बड़ा फ़क़ीरों का 

कौडि़यों की जिन्हें तमीज़ नहीं 
भाव तय कर रहे हैं हीरों का 

पुस्तक समीक्षा: संक्रांतिकाल की साक्षी कवितायें-आचार्य भगवत दुबे




कविता को परखने की कोई सर्वमान्य कसौटी तो है नहीं जिस पर कविता को परखा जा सके। कविता के सही मूल्याङ्कन की सबसे बड़ी बाधा यह है कि लोग अपने पूर्वाग्रहों और तैयार पैमानों को लेकर किसी कृति में प्रवेश करते हैं और अपने पूर्वाग्रही झुकाव के अनुरूप अपना निर्णय दे देते हैं। अतः, ऐसे भ्रामक नतीजे हमें कृतिकार की भावना से सामंजस्य स्थापित नहीं करने देते। कविता को कविता की तरह ही पढ़ना अभी अधिकांश पाठकों को नहीं आता है। इसलिए श्री दिनकर सोनवलकर ने कहा था कि 'कविता निश्चय ही किसी कवि के सम्पूर्ण व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति है। किसी व्यक्ति का चेहरा किसी दूसरे व्यक्ति से नहीं मिलता, इसलिए प्रत्येक कवी की कविता से हमें कवी की आत्मा को तलाशने का यथासम्भव यत्न करना चाहिए, तभी हम कृति के साथ न्याय कर सकेंगे।' शायद इसीलिए हिंदी के उद्भट विद्वान डॉ. रामप्रसाद मिश्र जब अपनी पुस्तक किसी को समीक्षार्थ भेंट करते थे तो वे 'समीक्षार्थ' न लिखकर 'न्यायार्थ' लिखा करते थे।
रचनाकार का मस्तिष्क और ह्रदय, अपने आसपास फैले सृष्टि-विस्तार और उसके क्रिया-व्यापारों को अपने सोच एवं दृष्टिकोण से ग्रहण करता है। बाह्य वातावरण का मन पर सुखात्मक अथवा पीड़ात्मक प्रभाव पड़ता है। उससे कभी संवेद नात्मक शिराएँ पुलकित हो उठती हैं अथवा तड़प उठती हैं। स्थूल सृष्टि और मानवीय भाव-जगत तथा उसकी अनुभूति एक नये चेतन संसार की सृष्टि कर उसके साथ संलाप का सेतु निर्मित कर, कल्पना लोक में विचरण करते हुए कभी लयबद्ध निनाद करता है तो कभी शुष्क, नीरस खुरदुरेपन की प्रतीति से तिलमिला उठता है।


गीत-नवगीत संग्रह 'काल है संक्रांति का' के रचनाकार आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' श्रेष्ठ साहित्यिक पत्रिका 'दिव्य नर्मदा' के यशस्वी संपादक रहे हैं जिसमें वे समय के साथ चलते हुए १९९४ से अंतरजाल पर अपने चिट्ठे (ब्लॉग) के रूप में निरन्तर प्रकाशित करते हुए अब तक ४००० से अधिक रचनाएँ प्रकाशित कर चुके हैं। अन्य अंतर्जालीय मंचों (वेब साइटों) पर भी उनकी लगभग इतनी ही रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी हैं। वे देश के विविध प्रांतों में भव्य कार्यक्रम आयोजित कर 'अखिल भारतीय दिव्य नर्मदा अलंकरण' के माध्यम से हिंदी के श्रेष्ठ रचनाकारों के उत्तम कृतित्व को वर्षों तक विविध अलंकरणों से अलंकृत करने, सत्साहित्य प्रकाशित करने तथा पर्यावरण सुधर, आपदा निवारण व् शिक्षा प्रसार के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने का श्रेय प्राप्त अभियान संस्था के संस्थापक-अध्यक्ष हैं। इंजीनियर्स फॉर्म (भारत) के महामंत्री के अभियंता वर्ग को राष्ट्रीय-सामाजिक दायित्वों के प्रति सचेत कर उनकी पीड़ा को समाज के सम्मुख उद्घाटित कर सलिल जी ने सथक संवाद-सेतु बनाया है। वे विश्व हिंदी परिषद जबलपुर के संयोजक भी हैं। अभिव्यक्ति विश्वम दुबई द्वारा आपके प्रथम नवगीत संग्रह 'सड़क पर...' की पाण्डुलिपि को 'नवांकुर अलंकरण २०१६' (१२०००/- नगद) से अलङ्कृत किया गया है। अब तक आपकी चार कृतियाँ कलम के देव (भक्तिगीत), लोकतंत्र का मक़बरा तथा मीत मेरे (काव्य संग्रह) तथा भूकम्प ले साथ जीना सीखें (लोकोपयोगी) प्रकाशित हो चुकी हैं।

सलिल जी छन्द शास्त्र के ज्ञाता हैं। दोहा छन्द, अलंकार, लघुकथा, नवगीत तथा अन्य साहित्यिक विषयों के साथ अभियांत्रिकी-तकनीकी विषयों पर आपने अनेक शोधपूर्ण आलेख लिखे हैं। आपको अनेक सहयोगी संकलनों, स्मारिकाओं तथा पत्रिकाओं के संपादन हेतु साहित्य मंडल श्रीनाथद्वारा ने 'संपादक रत्न' अलंकरण से सम्मानित किया है। हिंदी साहित्य सम्मलेन प्रयाग ने संस्कृत स्त्रोतों के सारगर्भित हिंदी काव्यानुवाद पर 'वाग्विदाम्बर सम्मान' से सलिल जी को सम्मानित किया है। कहने का तात्पर्य यह है कि सलिल जी साहित्य के सुचर्चित हस्ताक्षर हैं। 'काल है संक्रांति का' आपकी पाँचवी प्रकाशित कृति है जिसमें आपने दोहा, सोरठा, मुक्तक, चौकड़िया, हरिगीतिका, आल्हा अदि छन्दों का आश्रय लेकर गीति रचनाओं का सृजन किया है।
भगवन चित्रगुप्त, वाग्देवी माँ सरस्वती तथा पुरखों के स्तवन एवं अपनी बहनों (रक्त संबंधी व् मुँहबोली) के रपति गीतात्मक समर्पण से प्रारम्भ इस कृति में संक्रांतिकाल जनित अराजकताओं से सजग करते हुए चेतावनी व् सावधानियों के सन्देश अन्तर्निहित है। 

'सूरज को ढाँके बादल
सीमा पर सैनिक घायल
नाग-सांप फिर साथ हुए
गुँजा रहे वंशी मादल
लूट-छिप माल दो
जगो, उठो।'


उठो सूरज, जागो सूर्य आता है, उगना नित, आओ भी सूरज, उग रहे या ढल रहे?, छुएँ सूरज, हे साल नये आदि शीर्षक नवगीतों में जागरण का सन्देश मुखर है। 'सूरज बबुआ' नामक बाल-नवगीत में प्रकृति उपादानों से तादात्म्य स्थापित करते हुए गीतकार सलिल जी ने पारिवारिक रिश्तों के अच्छे रूपक बाँधे हैं- 

'सूरज बबुआ!
चल स्कूल।
धरती माँ की मीठी लोरी
सुनकर मस्ती खूब करी।
बहिम उषा को गिर दिया
तो पिता गगन से डाँट पड़ीं।
धूप बुआ ने लपक उठाया
पछुआ लायी
बस्ते फूल।'


गत वर्ष के अनुभवों के आधार पर 'में हिचक' नामक नवगीत में देश की सियासी गतिविधियों को देखते हुए कवी ने आशा-प्रत्याशा, शंका-कुशंका को भी रेखांकित किया है।

'नये साल
मत हिचक
बता दे क्या होगा?
सियासती गुटबाजी
क्या रंग लाएगी?
'देश एक' की नीति
कभी फल पाएगी?
धारा तीन सौ सत्तर
बनी रहेगी क्या?
गयी हटाई
तो क्या
घटनाक्रम होगा?'


पाठक-मन को रिझाते ये गीत-नवगीत देश में व्याप्त गंभीर समस्याओं, बेईमानी, दोगलापन, गरीबी, भुखमरी, शोषण, भ्रष्टाचार, उग्रवाद एवं आतंक जैसी विकराल विद्रूपताओं को बहुत शिद्दत के साथ उजागर करते हुए गम्भीरता की ओर अग्रसर होते हैं।
बुंदेली लोकशैली का पुट देते हुए कवि ने देश में व्याप्त सामाजिक, आर्थिक, विषमताओं एवं अन्याय को व्यंग्यात्मक शैली में उजागर किया है। 

मिलती काय ने ऊँचीबारी
कुर्सी हमखों गुईंया
पैला लेऊँ कमिसन भारी
बेंच खदानें सारी
पाँछू घपले-घोटालों सों
रकम बिदेस भिजा री


समीक्ष्य कृति में 'अच्छे दिन आने वाले' नारे एवं स्वच्छता अभियान को सटीक काव्यात्मक अभिव्यक्ति दी गयी है। 'दरक न पायेन दीवारें नामक नवगीत में सत्ता एवं विपक्ष के साथ-साथ आम नागरिकों को भी अपनी ज़िम्मेदारियों के प्रति सचेष्ट करते हुए कवि ने मनुष्यता को बचाये रखने की आशावादी अपील की है।
कवी आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' ने वर्तमान के युगबोधी यथार्थ को ही उजागर नहीं किया है अपितु अपनी सांस्कृतिक अस्मिता के प्रति सुदृढ़ आस्था का परिचय भी दिया है। अतः, यह विश्वास किया जा सकता है कि कविवर सलिल जी की यह कृति 'काल है संक्रांति का' सारस्वत सराहना प्राप्त करेगी।


  • पुस्तक -काल है संक्रांति का, गीत-नवगीत संग्रह, आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल', प्रथम संस्करण 2016, आकार 22 से.मी. x 13.5 से.मी., आवरण बहुरंगी, पेपरबैक जैकेट सहित, पृष्ठ 128, मूल्य जन संस्करण 200/-, पुस्तकालय संस्करण 300/-, समन्वय प्रकाशन, 204 विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन जबलपुर-482003]

आचार्य भगवत दुबे


पिसनहारी मढ़िया के निकट,
जबलपुर-482003
फ़ोन-9300613975

मंगलवार, 26 अप्रैल 2016

संतोष श्रीवास्तव की कविताएं


विनोद शाही की कलाकृति


जंग जारी है..


डूबती नाव की तरह 
मैं ज़िन्दगी के समँदर में 
ऊबती,डूबती रही 
कभी कोनों को पकड कर 
डूबने से बचती 
कभी बेसहारा सी 
लहरों की मर्ज़ी का 
शिकार हो जाती 
कभी उत्ताल 
तरंग पर सवार हो
विजयी हो 
अपने ही कंधों पर 
बैठ इठलाती 
कभी तेज़ लहर 
पाताल तक 
खींच ले जाती 
मैं हाथ पैर मारकर 
ऊपर आ जाती 
इस जद्दोजहद में 
कितनी ही बार 
खुद को टूटा,बिखरा पाती 
सतह पर शाँत 
बहते रहने के लिये 
मुझे खुद को 
काठ करना पडेगा 
और मुझे काठ होने से 
इंकार है 
मेरी जंग अब भी जारी है


सरहदें


गुलाबी पँख की परवाज़ तारी
आसमाँ पे
लो फिर आये परिंदे 
दूर मुल्कों की हदों के 
फासलों से
रौनकें गुलज़ार हैं 
दरिया के दो बाजू
परिंदे देखते हैं
हवा,पानी,सब्ज़ हों बाजू
बसाते आशियाँ अपना
नहीं बँटते हैं मुल्कों में
नहीं करते हैं तारे 
आसमाँ पे कोई हदबंदी
नहीं घिरती घटाएँ
देखकर सरहद की चौबन्दी
हवाओं को नहीं एहसास
कितना और कहाँ बहना
तो फिर इंसा बँटा है क्यों
मज़हब और मुल्कों में
खिंची हैं सरहदें
हम बँट गये हैं
टुकडों टुकडों में
खुदाया किस तरह
हम मज़हबीं हैं
किस तरह?


बहुत करीब था मयखाना

                                                             
रात के खौफनाक सन्नाटे में
रह रह कर उभर आती
अजनबी चीखें
चौंकाती रहीं रात भर
सुबह के पास
कोई आवाज़ न थी
भोर होते ही ढ्ल गया सूरज
साँस रोके रही
हर एक रहगुज़र
कोई आहट, कोई कदमों के
निशाँ भी न थे बाकी उन पर
न कहकहों की गूँज
न मासूम हँसी के फूल
सब कहाँ दफ्न हुए
थी वहाँ लपटों की तपिश 
एक मजबूर खलिश 
मस्जिद से दूर न था बुतखाना 
बीच में था मयखाना 
जहाँ न तपिश थी न खलिश 
होठों से सटे जाम थे 
मुट्ठी में कायनात 
और पहरे पर सलीबें 
न जाने किसके हिस्से की


दौड़

                                                     
क्यों दौड रही है दुनिया
हर तरफ भागमभाग
किसी को फुरसत नहीं
कि रुककर जवाब दे
मेरे सवाल का
कहाँ किस हद तक
आखिर कोई तो मुकाम होगा
इस दौड का?
ताज्जुब है पृथ्वी नहीं दौडती
अपनी धुरी पर ही रहती है
उसे सौंपे हुए कालखँड में
पूरी निष्ठा से
इंसान का उठा हुआ हर कदम
उतनी ही दूरी नापता है
जितनी तय है
फिर दुनिया क्यों और कहाँ
दौड रही है
अगर पहियों पर सवार
इंसान की चाल आँकनी है
तो पैदल चलते पाँव
किस दुनिया में गिने जाएँगे
समय की गति से कई गुना ज्यादा
तेज़ रफ्तार से दौडते
इस कारवाँ के गुबार से भरी
ज़मीन पर
आँखे मलते मलते भी हवाओं को
अपने जायज़ सवालों से नहीं भर सकी
हवाओं के पास भी
इसका क्या जवाब होगा?
वे तो खुद अपनी शीतलता
खो चुकी हैं
फिज़ाओं में अब
परिन्दों की चहचहाहट नहीं है
भागती दौडती दुनिया का शोर है
इस दौड का कहाँ है अंत?
है भी?
इंसान दौड रहा है
इंसानियत पीछे छूट रही है
तारीख में
पहले दर्ज़ हर्फ से
पहले सफे से
उससे पहले की कहानी
गहरे अँधेरे में डूबी है
लेकिन वहाँ से भी
कदमों की बेसब्र आहट
सुनाई देती है
दौड वहाँ भी पडाव डाले है।
                       

गौतम से राम तक


गौतम ने तुम्हे पुत्रीवत
पाल पोसकर बडा किया
और अपनी अंकशायिनी बनाया
तुम चुप रहीं
मन ही मन जिसे (इन्द्र) प्रेम करती थीं
उसे पाने की लालसा के बावजूद
विरोध न कर सकीं
चुप रहीं
उस दिन इन्द्र को सामने पा
रुक नहीं पाई तुम
खुद को ढह जाने दिया
उसकी बाहों में
यह तुम्हारा अधिकार भी तो था
प्यार करने का अधिकार
पर इसके एवज
गौतम के आरोप,प्रत्यारोप
तिरस्कार,शाप?
तुम्हे नहीं लगा कि वह
गौतम का
तुम पर एकाधिकार की समाप्ति का
घायल अहंकार,कायरता और दुर्बलता थी?
तुम चुप रहीं
मूक पत्थर हो गईं
पत्थर बन तुम सहती रहीं
लाचारी,बेबसी,घुटन
बदन को गीली लकडी सा सुलगाती
अपमान की ज्वाला 
तुम्हारे पाषाण वास में 
तुम्हारी पीडा के हित 
न गौतम आये न इन्द्र 
राम ने तुम्हे पैरों से छुआ 
तुम पिघल गईं 
खामोशी से पदाघात सह गईं 
सोचो अहल्या 
गौतम से राम तक की 
तुम्हारी यात्रा 
पुरुष सत्ता की बिसात पर 
औरत को मोहरा नहीं बनाती?


संतोष श्रीवास्तव


  • जन्म-23 नवम्बर (जबलपुर)
  • शिक्षा-एम.ए(हिन्दी, इतिहास) बी.एड,.पत्रकारिता मेँ बी.ए।
  • प्रकाशित पुस्तके-बहके बसँत तुम,बहते ग्लेशियर,प्रेम सम्बन्धोँ की कहानियाँ आसमानी आँखों का मौसम (कथा सँग्रह) मालवगढ की मालविका.दबे पाँव प्यार,टेम्स की सरगम,हवा मे बँद मुट्ठियाँ,(उपन्यास) मुझे जन्म दो माँ (स्त्री विमर्श) फागुन का मन(ललित निबँध सँग्रह) नही अब और नही तथा बाबुल हम तोरे अँगना की चिडिया  (सँपादित सँग्रह) नीले पानियोँ की शायराना हरारत(यात्रा सँस्मरण)।
  • विभिन्न भाषाओ मेँ रचनाएँ अनूदित,पुस्तको पर एम फिल तथा शाह्जहाँपुर की छात्रा द्वारा पी.एच.डी,रचनाओ पर फिल्माँकन,कई पत्र पत्रिकाओ मेँ स्तम्भ लेखन व सामाजिक,मीडिया,महिला एवँ साहित्यिक सँस्थाओ से सँबध्द, प्रतिवर्ष हेमंत फाउँडेशन की ओर से हेमंत स्मृतिकविता सम्मान एवं विजय वर्मा कथा सम्मान का मुम्बई मे आयोजन,महिला सँस्था विश्व मैत्री मँच की संस्थापक,अध्यक्ष।
  • पुरस्कार-बारह राष्ट्रीय एवं दो अँतरराष्ट्रीय साहित्य एवँ पत्रकारिता पुरस्कार जिनमे महाराष्ट्र के गवर्नर के हाथो राजभवन मेँ लाइफ टाइम अचीव्हमेंट अवार्ड तथा म.प्र. राष्ट्रभाषा प्रचार समिति द्वारा मध्य प्रदेश के गवर्नर के हाथों नारी लेखन पुरस्कार विशेष उल्लेखनीय है। 'मुझे जन्म दो माँ' पुस्तक पर राजस्थान विश्वविद्यालय द्वारा पी एच डी की मानद उपाधि।  महाराष्ट्र राज्य साहित्य अकादमी का राज्यस्तरीय हिन्दी सेवा सम्मान। भारत सरकार अंतरराष्टीय पत्रकार मित्रता सँघ की ओर से 20 देशो की प्रतिनिधि के रूप मेँ यात्रा।
  • सँपर्क-101 केदारनाथ को.हा.सोसाइटी, सैक्टर-7, निकट चारकोप बस डिपो, काँदिवली, पश्चिम मुम्बई-400067
  • फ़ोन-09769023188    
  • ईमेल:  kalamkar.santosh@gmail.com

मंगलवार, 19 अप्रैल 2016

राजेन्द्र तिवारी की ग़ज़लें


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार

             

             शह दी है पियादे ने..


शह दी है पियादे ने कोई बात नहीं है।
बाक़ी है अभी खेल अभी मात नहीं है।

फ़स्लें न उगेंगी न कभी प्यास बुझेगी,
ये ओस की बूँदें है ये बरसात नहीं है।

नन्हा सा दिया देख के घबराये जो सूरज ,
ये क़द की बुलन्दी है करामात नहीं है।

कहते हैं कोई शह्र में अब भी है वफ़ादार,
हालांकि मेरी उससे मुलाक़ात नहीं है।

मज़हब की सलाख़ों में मुझे क़ैद न करना,
इन्सान हूँ मैं कोई मेरी जात नहीं है।      


                                        

             भूल हमसे हो गई या..


चन्द दाने ढूंढ़ने बस्ती से वीराने गये।
हर सुबह घर से परिन्दे जि़न्दगी लाने गये।

साजि़शें नाकाम कर दीं ऐ हवाओं शुक्रिया,
उठ गईं रुख़ से नक़ाबें लोग पहचाने गये।

घायलों से कितनी हमदर्दी थी उनको दोस्तों,
थैलियाँ लेकर नमक की ज़ख़्म सहलाने गये  ।

भूल हमसे हो गई या तुमसे नादानी हुई,
वर्ना कैसे महफि़लों तक अपने अफ़साने गये।

यूँ न जाओ गाँव अपना छोड़कर पछताओगे,
लोग काफ़ी दूर तक हमको ये समझाने गये।


                                                   

             दिखती नहीं है आग..


समझे न उनकी बात इशारों के बावजूद।
डूबे हैं हम तो यार किनारों के बावजूद।

दिखती नहीं है आग शरारों के बावजूद।

काली है कितनी रात सितारों के बावजूद।

गुलशन को जाने किसकी नज़र लग गई है यार,

खिलते नहीं हैं फूल बहारों के बावजूद।

है रहबरों की भीड़ प’ मंजि़ल कोई नहीं,

दर-दर भटक रहे हैं सहारों के बावजूद।

टी.वी. को देख-देख के नस्लें बिगड़ गईं,

तहज़ीब के तमाम इदारों के बावजूद। 

चेहरों पे उनके शिकन भी नहीं दिखी,

इतनी तबाहियों के नज़ारों के बावजूद। 


                                                     

 आदमी में अब ये बीमारी..               


जि़न्दगी में यूँ तो  दुश्वारी बहुत है।
इसलिए जि़न्दा हूँ ख़ुद्दारी बहुत है।

आदमी में अब ये बीमारी बहुत है।
हौसला थोड़ा है हुशियारी बहुत है।

उसकी नासमझी का अंदाज़ा लगाओ,

कह रहा है ख़ुद समझदारी बहुत है।

बस ज़रा सा साथ मिल जाये हवा का,

आग भड़काने को चिन्गारी बहुत है।

काश होती ये वफ़ादारी की मूरत,

वैसे सूरत आपकी प्यारी बहुत है।

दिल हमें ‘राजेन्द्र’ समझाता है अक्सर,

कम करो इतनी रवादारी बहुत है।




राजेन्द्र तिवारी



  • जन्म- 02 मार्च-1960 (कानपुर)
  • शिक्षा- परास्नातक कानपुर विश्वविद्यालय
  • लेखन - तीन दशकों से अधिक समय से ग़ज़लों से गहरा जुड़ाव। यदा-कदा गीत, आलेख, समीक्षा आदि।
  • प्रकाशन - ‘‘संभाल कर रखना’’ ग़ज़ल संग्रह प्रकाशित 2012, ‘‘ज़बान काग़ज़ पर’’ ग़ज़ल संग्रह प्रकाशनाधीन।
  • ‘समकालीन हिन्दी ग़ज़ल संग्रह’, ‘ग़ज़ल दुष्यन्त के बाद’, ‘हिन्दी के लोकप्रिय ग़ज़लकार’, ‘नई सदी के प्रतिनिधि ग़ज़लकार’, ‘हिन्दी ग़ज़ल यानी...’, ग़ज़लें हिन्दुस्तानी’ इत्यादि अनेक समवेत ग़ज़ल संकलनों में शामिल। ग़ज़ल विश्वांकों, विशेषांकों ‘समकालीन भारतीय साहित्य’, ‘इन्द्रप्रस्थ भारती’, ‘हंस’, ‘नवनीत’, ‘कथन’, ‘कथादेश’ ‘गगनांचल’ आदि देश की सभी प्रमुख पत्रिकाओं समाचार पत्रों में प्रायः ग़ज़लों का प्रकाशन।
  • पुरस्कार - अली एवार्ड-2000  भोपाल। वाकि़फ़ रायबरेलवी सम्मान-2001 रायबरेली। ‘अनुरंजिका’, ‘सौरभ’, ‘मानस संगम’ इत्यादि विभिन्न साहित्यिक, सांस्कृतिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित।
  • सम्प्रति - लेखाकार्य व स्वतंत्र लेखन।
  • सम्पर्क - ‘तपोवन’ 38-बी, गोविन्द नगर, कानपुर-208006 (उत्तर प्रदेश)।
  • मोबाइल- 09369810411
  • ईमेल- rajendratiwari121@gmail.com

मंगलवार, 12 अप्रैल 2016

पुस्तक समीक्षा: स्मृतियाँ और शुभेच्छाएँ नहीं मानतीं ‘सरहदें’-ऋषभदेव शर्मा




सुबोध श्रीवास्तव (1966) कविता, गीत, गज़ल, दोहे, मुक्तक, कहानी, व्यंग्य, निबंध, रिपोर्ताज और बाल साहित्य जैसी विविध साहित्यिक विधाओं में दखल रखने वाले बहुआयामी प्रतिभा के धनी कलमकार है। पत्रकारीय लेखन के अतिरिक्त वे अपने काव्य संग्रह ‘पीढ़ी का दर्द’, लघुकथा संग्रह ‘ईर्ष्या’, बालकथा संग्रह ‘शेरनी माँ’ और ई-पत्रिका ‘सुबोध सृजन’ के लिए पर्याप्त चर्चित हैं।‘सरहदें’ (2016) उनका दूसरा कविता संग्रह है।

‘सरहदें’ में सुबोध श्रीवास्तव की 51 कविताएँ हैं जिन्हें दो खंडों में रखा गया है – 42 ‘सरहदें’ खंड में और 9 ‘एहसास’ खंड में. ‘एहसास’ में सम्मिलित रचनाओं को ‘प्रेम कविताएँ’ कहा गया है। यह वर्गीकरण न किया जाए, तो सारी कविताएँ मिलकर स्वयं स्वतंत्र पाठ रचने में समर्थ हैं। यह पाठ सरहद के विभिन्न रूपों से संबंधित है। हदें और सरहदें मनुष्य के वैयक्तिक और सामाजिक आचरण को नियंत्रित करती हैं। वैयक्तिकता जहाँ बे-हद और अन-हद की जिद करती है वहीं सामाजिकता सर्वत्र और सर्वदा हदों का निर्धारण करती चलती है। ‘सीमित’ और ‘सीमातीत’ के द्वंद्व में से उपजती है मनुष्यों, राष्ट्रों, समाजों और समस्त जगत के आपसी संबंधों की विडंबनाएँ। सुबोध श्रीवास्तव इन विडंबनाओं को पहचानते ही नहीं, जीते भी हैं। इस जीवंत अनुभूति से ही रची गई हैं ‘सरहदें’ की ये कविताएँ।

‘सरहदें’ हमारा समकाल या वर्तमान है। कविमन समकाल का अतिक्रमण करके कभी अतीत में जाता है तो कभी भविष्य में. अतीत स्मृतियों में वर्तमान रहता है तो भविष्य शुभेच्छा में वर्तमान रहता है। अभिप्राय यह है कि वर्तमान का सच होते हुए भी सरहदें स्मृतियों और शुभेच्छाओं को बाधित नहीं करतीं। स्मृतियाँ और शुभेच्छाएँ किसी सरहद को नहीं मानतीं। कविमन भी किसी सरहद को कब मानता है! सुबोध श्रीवास्तव की कविताओं में एक खास तरह का कथासूत्र विद्यमान रहता है जो कविताओं को संवाद की नाटकीयता प्रदान करता है। अपनी वैचारिकता को स्थापित करने के लिए कवि ने प्रश्नों, तर्कों और सीधे संबोधनों का अनेक स्थलों पर प्रयोग किया है। कवि की अपनी अभिप्रेत दुनिया की व्यवस्था का पता वे रचनाएँ देती हैं जो संभावनाओं और शुभेच्छाओं से भरी हुई हैं। 

सुबोध बच्चों को मनुष्य में विद्यमान सहजता और दिव्यता के अंश के रूप में देखते हैं और वह उनके लिए भविष्य का भी प्रतीक है। स्वार्थ, हिंसा और आतंक से भरी दुनिया में जहरीले कीड़े को बचाता नन्हा बच्चा अपनी निस्संगता में मानवता का संरक्षक बन जाता है. बच्चे और भी हैं। वर्षा के जल में खेलते अधनंगे बच्चे कवि को अतीत में ले जाते हैं – घर और बचपन की स्मृतियों में। ऐसा प्रतीत होता है कि कवि असमय इन दोनों से बिछुड़ गया है। घर, शायद इसीलिए इन कविताओं में पीड़ा और वेदना का स्रोत बनकर उभरा है। कवि की यह शुभेच्छा अनेक रूपों में व्यक्त हुई है कि एक दिन ‘टूटकर रहेंगी सरहदें’ और सरहद के इस पार के बच्चे जब उल्ल्हड़ मचाते सरहद के करीब से गुजरेंगे तो उस पार के बच्चे भी साथ खेलने को मचल उठेंगे – “फिर सब बच्चे/ हाथ थाम कर/ एक दूसरे का/ दूने उत्साह से/ निकल जाएँगे दूर/ खेलेंगे संग-संग/ गाएँगे गीत/ प्रेम के, बंधुत्व के/ तब/ न रहेंगी सरहदें/ न रहेंगी लकीरें.” ‘सरहदें’ का विखंडन करने पर यही तथ्य सामने आता है कि कवि बात तो सरहदों की कर रहा है लेकिन सरहदों के ‘न होने’ का प्रबल हामी है। यह तथ्य कवि की मुक्ति चेतना का द्योतक है। यह मुक्ति चेतना हर सरहद को नकारती है, बावजूद इसके कि बार-बार सरहदों की स्वीकृति आ उपस्थित होती है। कवि जब आह्वान करता है – ‘निकलो/ देहरी के उस पार/ वंदन अभिनंदन में/ श्वेत अश्वों के रथ पर सवार/ नवजात सूर्य के’ ××× ‘उठो निकलो/ देहरी के उस पार/ इंतजार में है वक्त’ तो वह ऐसी बेहतर दुनिया का स्वप्न देख रहा होता है जहाँ सरहदें न हों। इसीलिए आतंक की खेती करने वालों को उनकी कविता सीधे संबोधित करते हुए कहती है – ‘तुम्हें/ भले ही भाती हो/ अपने खेतों में खड़ी/ बंदूकों की फसल/ लेकिन -/ मुझे आनंदित करती है/ पीली-पीली सरसों/ और/ दूर तक लहलहाती/ गेहूं की बालियों से  उपजता/ संगीत./ तुम्हारे बच्चों को/ शायद/ लोरियों सा सुख भी देती होगी/ गोलियों की तड़तड़ाहट/ लेकिन/ सुनो..../ कभी खाली पेट नहीं भरा करतीं/ बंदूकें,/ सिर्फ कोख उजाड़ती हैं’।

यादों में वह शक्ति है जिसके सामने सरहदें कायम नहीं रह पातीं। घर हो या समाज या देश या दुनिया – हृदय की रागात्मकता इनमें से किसी को भी हदों और सरहदों में बाँधने और बाँटने में यकीन नहीं रखती – ‘हमेशा/ कायम नहीं रहतीं/ सरहदें.../ याद है मुझे/ उस रोज/ जब/ अतीत की कड़वाहट/ भूलकर/ उसने/ भूले-बिसरे/ सपनों को फिर संजोया,/ यादों के घरौंदे में रखी/ प्यार की चादर ओढ़ी/ और/ उम्मीद की उंगली थामकर/चल  पड़ा/ ‘उसे’ मनाने./ तेज आवाज के साथ टूटीं/ सरहदें/ और/ रूठ कर गई जिंदगी/ वापस दौड़ी चली आई...।’ कवि को विश्वास है कि सरहदें टूटने से ही चुप्पी की दुनिया का विनाश संभव है क्योंकि इस चुप्पी ने ही ऐसी स्थितियाँ उत्पन्न की है कि यादों को स्थगित करके कवि को नियतिवादी बनना पड़ा है – ‘हम सफर/ गुजरे वक्त को/ याद करके/ विचलित न करो मन को/ मेरा मुजरिम/ तू नहीं/ नियति है/ जिस पर किसी का जोर नहीं।’ सीमाओं और मर्यादाओं को स्वीकार करते हुए भी नियति और विवशता के बहाने हम उन्हें अस्वीकार और स्थगित ही तो करते हैं। अपनी-अपनी हदों में बंधे हम एक दूसरे की खुशी और मजबूरी की दुहाई देते रहते हैं – ‘सरहद, न तेरी थी कोई/ सरहद, न मेरी थी कोई/ वो खुशी थी कल की/ ये विवशता है आज की/ इक सरहद तेरी भी/ है इक सरहद मेरी भी...!’ 

कुलमिलाकर सरहदें हमें शिद्धत के साथ यह अहसास कराती हैं कि हमें उनका अतिक्रमण करने का पूरा हक है। इसीलिए कवि न तो चाँद को चाहता है, न सूरज को और न आकाश को। न वह चाँद, सूरज और आकाश जैसा होना चाहता है। वह तो अपने शाश्वत अस्तित्व की समस्त संभावनाओं के साथ बस हर सरहद का अतिक्रमण करना चाहता है। कुछ इस तरह कि..

मैं घुलना चाहता हूँ 
खेतों की सोंधी माटी में, 
गतिशील रहना चाहता हूँ 
किसान के हल में, 
खिलखिलाना चाहता हूँ 
दुनिया से अनजान 
खेलते बच्चों के साथ,
हाँ, मैं चहचहाना चाहता हूँ 
सांझ ढले/ घर लौटते 
पंछियों के संग-संग, 
चाहत है मेरी 
कि बस जाऊं/ वहाँ-वहाँ 
जहाँ –
सांस लेती है जिंदगी 
और/ यह तभी संभव है 
जबकि 
मेरे भीतर जिंदा रहे
एक आम आदमी!


  • पुस्तक-सरहदें/ कविता संग्रह
  • कवि-सुबोध श्रीवास्तव
  • पृष्ठ-96
  • मूल्य-120 रुपये
  • बाईंडिंग-पेपरबैक
  • प्रकाशक-अंजुमन प्रकाशन,
  • 942 मुट्ठीगंज, इलाहाबाद,
  • उत्तर प्रदेश (भारत)
  • मोबाइल: +91-9453004398
  • ISBN12: 9789383969722
  • ISBN10: 9383969722
  • http://www.anjumanpublication.com

प्रो. ऋषभदेव शर्मा 


(पूर्व आचार्य एवं अध्यक्ष,
उच्च शिक्षा और शोध संस्थान,
दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, हैदराबाद)
208-ए, सिद्धार्थ अपार्टमेंट्स,
गणेश नगर, रामंतापुर– 500013 
मोबाइल - 08121435033
ईमेल – rishabhadeosharma@yahoo.com