कमला कृति

मंगलवार, 16 अप्रैल 2019

संजीव वर्मा 'सलिल' की रचनाएँ


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


जोड़-तोड़ है मुई सियासत (नवगीत)


मेरा गलत
सही है मानो।
अपना सही
गलत अनुमानो।
सत्ता पाकर, 
कर लफ्फाजी-
काम न हो तो
मत पहचानो।
मैं शत गुना 
खर्च कर पाऊँ
इसीलिए तुम
करो किफायत

मैं दो दूनी
तीन कहूँ तो
तुम दो दूनी
पाँच बताना।
मैं तुमको
झूठा बोलूँगा
तुम मुझको 
झूठा बतलाना।
लोकतंत्र में
लगा पलीता
संविधान से
करें बगावत

यह ले उछली
तेरी पगड़ी।
झट उछाल तू
मेरी पगड़ी।
भत्ता बढ़वा, 
टैक्स बढ़ा दें
लड़ें जातियाँ
अगड़ी-पिछड़ी।
पा न सके सुख
आम आदमी, 
लात लगाकर
कहें इनायत।

प्रजातंत्र का अर्थ हो गया (नवगीत)


संविधान कर प्रावधान
जो देता, लेता छीन
सर्वशक्ति संपन्न लोग हैं
केवल बेबस-दीन

नाग-साँप-बिच्छू चुनाव लड़
बाँट-फूट डालें
विजयी हों, मिल जन-धन लूटें
माल लूट खा लें 
लोकतंत्र का पोस्टर करती
राजनीति बदरंग
प्रजातंत्र का अर्थ हो गया
केर-बेर का संग

आश्वासन दें, जीतें जाते 
जुमला कह झट भूल
कहें गरीबी पर गरीब को
मिटा, करें निर्मूल
खुद की मूरत लगा पहनते,
पहनाते खुद हार
लूट-खसोट करें व्यापारी
अधिकारी बटमार
भीख माँग, पा पुरस्कार
लौटा करते हुड़दंग
प्रजातंत्र का अर्थ हो गया
केर-बेर का संग

गौरक्षा का नाम, स्वार्थ ही
साध रहे हैं खूब
कब्ज़ा शिक्षा-संस्थान पर
कर शराब में डूब
दुश्मन के झंडे लहराते
दें सेना को दोष
बिन मेहनत पा सकें न रोटी
तब आएगा होश
जनगण जागे, गलत दिखे जो
करे उसी से जंग
प्रजातंत्र का अर्थ हो गया
केर-बेर का संग

ठेंगे पर कानून..


मलिका - राजकुँवर कहते हैं
ठेंगे पर कानून 
संसद ठप कर लोकतंत्र का
हाय! कर रहे खून

जनगण - मन ने जिन्हें चुना

उनको न करें स्वीकार
कैसी सहनशीलता इनकी?
जनता दे दुत्कार
न्यायालय पर अविश्वास कर
बढ़ा रहे तकरार
चाह यही है सजा रहे
कैसे भी हो दरबार
जिसने चुना, न चिंता उसकी
जो भूखा दो जून
मलिका - राजकुँवर कहते हैं
ठेंगे पर कानून
संसद ठप कर लोकतंत्र का
हाय! कर रहे खून

सरहद पर ही नहीं

सडक पर भी फैला आतंक
ले चरखे की आड़
सँपोले मार रहे हैं डंक
जूते उठवाते औरों से
फिर भी हैं निश्शंक
भरें तिजोरी निज,जमाई की
करें देश को रंक
स्वार्थों की भट्टी में पल - पल
रहे लोक को भून
मलिका - राजकुँवर कहते हैं
ठेंगे पर कानून
संसद ठप कर लोकतंत्र का
हाय! कर रहे खून

परदेशी से करें प्रार्थना

आ, बदलो सरकार
नेताजी को बिना मौत ही
दें कागज़ पर मार
संविधान को मान द्रौपदी
चाहें चीर उतार
दु:शासन - दुर्योधन की फिर
हो अंधी सरकार
मृग मरीचिका में जीते
जैसे इन बिन सब सून
मलिका - राजकुँवर कहते हैं
ठेंगे पर कानून
संसद ठप कर लोकतंत्र का
हाय! कर रहे खून

जिक्र नोटा का हुआ तो.. (मुक्तिका)


अभावों का सूर्य, मौसम लापता बरसात का।
प्रभातों पर लगा पहरा अंधकारी रात का।।

वास्तव में श्री लिए जो वे न रह पाए सुबोध 
समय जाने कब कहेगा दर्द इस संत्रास का।।

जिक्र नोटा का हुआ तो नोटवाले डर गए
संकुचित मजबूत सीने विषय है परिहास का।।

लोकतंत्री निजामत का राजसी देखो मिजाज
हार से डर कर बदलता हाय डेरा खास का।।

सांत्वना है 'सलिल' इतनी लोग सच सुन सनझते
मुखौटा हर एक नेता है चुनावी मास का।।

राजनीति है बेरहम..(दोहे) 


अपराधी हो यदि खड़ा, मत करिए स्वीकार।
नोटा बटन दबाइए, खुद करिए उपचार।।

जन भूखा प्रतिनिधि करे, जन के धन पर मौज।
मतदाता की शक्ति है, नोटा मत की फौज।।

नेता बात न सुन रहा, शासन देता कष्ट।
नोटा ले संघर्ष कर, बाधा करिए नष्ट।

राजनीति है बेरहम, सगा न कोई गैर 
कुर्सी जिसके हाथ में, मात्र उसी की खैर 

कुर्सी पर काबिज़ हुए, चेन्नम्मा के खास 
चारों खाने चित हुए, अम्मा जी के दास 

दोहा देहरादून में, मिला मचाता धूम
जितने मतदाता बने, सब है अफलातून

वाह वाह क्या बात है?, केर-बेर का संग 
खाट नहीं बाकी बची, हुई साइकिल तंग

आया भाषणवीर है, छाया भाषणवीर 
किसी काम का है नहीं, छोड़े भाषण-तीर

मत मत का सौदा करो, मत हो मत नीलाम
कीमत मत की समझ लो, तभी बनेगा काम

एक मरा दूजा बना, तीजा था तैयार 
जेल हुई चौथा बढ़ा, दो कुर्सी-गल हार

गाँधी जी के नाम पर, नकली गाँधी-भक्त 
चित्र छाप पल-पल रहे, सत्ता में अनुरक्त 

लालू के लल्ला रहें, भले मैट्रिक फेल 
मंत्री बन डालें 'सलिल', शासन-नाक नकेल 

ममता की समता करे, किसमें है सामर्थ?
कौन कर सकेगा 'सलिल', पल-पल अर्थ-अनर्थ??

बाप बाप पर पुत्र है, चतुर बाप का बाप 
धूल चटाकर चचा को, मुस्काता है आप 

साइकिल-पंजा मिल हुआ, केर-बेर का संग 
संग कमल-हाथी मिलें, तभी जमेगा रंग 

त्रिपदिक छंद हाइकु

(विधा: गीत)


लोकतंत्र का / निकट महापर्व / हावी है तंत्र

मूक है लोक / मुखर राजनीति / यही है शोक
पूछे पलाश / जनता क्यों हताश / कहाँ आलोक?
सत्ता की चाह / पाले हरेक नेता / दलों का यंत्र

योगी बेहाल / साइकिल है पंचर / हाथी बेकार
होता बबाल / बुझी है लालटेन / हँसिया फरार
रहता साथ / गरीबों के न हाथ / कैसा षड़्यंत्र?

दलों को भूलो / अपराधी हराओ / न हो निराश
जनसेवी ही / जनप्रतिनिधि हो / छुए आकाश
ईमानदारी/ श्रम सफलता का / असली मंत्र

कुण्डलिया 


राजनीति आध्यात्म की, चेरी करें न दूर 
हुई दूर तो देश पर  राज करेंगे सूर
राज करेंगे सूर, लड़ेंगे हम आपस में 
सृजन छोड़ आनंद गहेँगे, निंदा रस में 
देरी करें न और, वरें राह परमात्म की 
चेरी करें न दूर, राजनीति आध्यात्म की


आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल


विश्ववाणी हिंदी संस्थान,
204, विजय अपार्टमेंट, 
नेपियर टाउन, जबलपुर-482001
मोबाइल: 9425183244 
ई-मेल: salil.sanjiv@gmail.com

पुस्तक समीक्षा: शब्दहीन का बेमिसाल सफर-गोपाल शर्मा




‘संपादकीयम्’ पुस्तक में संकलित  और ‘डेली हिंदी मिलाप’ में पूर्व प्रकाशित विभिन्न  सामयिक विषयों पर  डॉ. ऋषभदेव शर्मा द्वारा लिखे गए ‘संपादकीय’  हिंदी पत्रकारिता के क्षेत्र में पदार्पण करने के इच्छुक और अनुभवी दोनों प्रकार के पत्रकारों के लिए समान रूप से पठनीय हैं, क्योंकि इनमें आदर्श संपादकीय के सभी गुण हैं। विषय-चयन और शीर्षक के चुनाव से लेकर वर्णन की सहज शैली से होते हुए उनके समापन संदर्भ तक लेखनी का गतिशील रहना पाठक को अनायास ही बाँधता चला जाता है।

संपादकीय–शीर्षकों पर नजर दौड़ाते ही ठहर जाती है। कहीं प्रश्न हैं- अब किसके पिता की बारी है? कहीं विस्मययुक्त प्रश्न- सबका अन्नदाता हड़ताल पर है !? कहीं कविता के शिल्प में- जलाओ पटाखे पर रहे ध्यान इतना; और कहीं लोक और लोकवाणी सिंचित- ऊपरवाला देख रहा है! और फिर आता है- लीड वाक्य। संपादकीय वह उत्तम माना जाता है जिसमें पाठक को बेकार में ही वर्णन-विवरण  की हवाई पट्टी पर न दौड़ना पड़े। उसकी उड़ान  हैलीकॉप्टर सी बुलंद और उत्तुंग हो। इस निगाह से ये संपादकीय प्रिंट-मीडिया के पहले पाठ को आत्मसात करके लिखे गए लगते हैं। पहला वाक्य सब कुछ तो कहता ही है, और कुछ पढ़ने की ललक भी जगाता है। एक उदाहरण है - ‘मी टू अभियान के तहत मनोरंजन उद्योग, मीडिया, राजनीति, शिक्षा जगत और अध्यात्म की दुनिया तक से महिलाओं के यौन उत्पीड़न की घटनाओं के खुलासों से आम लोग सहमे हुए हैं।’

इसी प्रकार संपादकीय का समापन वाक्य चिंतन का समाहार उपसंहार की तरह करता है और पाठक को वांछित ‘फूड फॉर थॉट’ देता चलता है- ‘जब तक व्यवस्था की ओर से यह संदेश आपराधिक तत्वों तक नहीं जाएगा, तब तक वे भीड़ का  मुखौटा लगाकर इसी तरह उपद्रव मचाते रहेंगे , हत्याएँ करते रहेंगे और हर बार किसी बेटे को यह पूछना ही पड़ेगा कि- अब किसके पिता की बारी है?’

लेखन में शब्दों की धार यूँ तो सहजता को निभाती चली है, किंतु मार्मिक स्थलों पर धार नुकीली भी हो जाती है – धनुष की टंकार हो जाती है। ‘समानता और पूजा-पद्धति के अधिकारों का टकराव’ और ‘परंपरा के नाम पर भेदभाव कब तक’  में लेखक धर्म और उपासना जैसे नाजुक मसलों पर क्षुब्ध होकर कहता है- “यदि प्रभु के  राज्य में भी असमानता-पूर्ण नियम लागू हैं तो या तो वह राज्य प्रभु का नहीं (पुजारियों का है), या फिर वह नियम प्रभु का नहीं  (दरबानों का है)।”

अपने वक्तव्यों को धार देने के लिए और उपसंहार करने के लिए कई बार  लेखक  के मन में उकड़ू बैठने को मजबूर सा हो गया कवि तेवरी चढ़ाकर काव्य पंक्तियाँ  उधार भी लेता है – वैभव की दीवानी दिल्ली – और कभी थोड़ा बदलकर – जलाओ पटाखे पर रहे ध्यान इतना – बोलता है; और कभी फिलहाली बयान करने के लिए कह उठता है- भीड़ पर तलवार हैं, खंजर गुलेले हैं। कल्लो क्या कल्लोगे ? है तो है।  चुटकी ली जाए तो चुटकी लगे और चूँटी काटी जाए तो वही लगे। ऐसे अवसर भी  रंदे पर घिसे गए, पर पेशे खिदमत रहे हैं- ‘खूब नाच-गाना हो, शराबे  बहें, उपहार लिए-दिए जाएँ, उन्माद की वर्षा हो, वशीकरण के लिए यह जरूरी है । बार में भी, और चुनाव में भी।’

 कहा जाता है कि अखबारी दुनिया से जुड़ने के बाद भाव, भाषा, भंगिमा और भूमिका को नए सिरे से साधना पड़ता है और लोगों को बहुत उठना-गिरना पड़ता है। वे और होंगे शोर-ए-तलातुम में खो जाने वाले! ‘संपादकीयम्’ में ‘कोरे कागद’ कारे भर नहीं किए गए हैं, बल्कि एक युगधर्म का पालन भी किया गया है। इसलिए ‘भव’ साधना संभव हुआ है। लगता है, यह खेल खेल में ही हो  गया है; और जो हुआ वो ग्रेट  है। तोप मुक़ाबिल हो तो अखबार निकालने के दिन अब नहीं रहे, पर तरवार की धार पर दौड़ने वाले दीवानों को कोई  ‘रवि’ तभी प्रकाशित कर सकता है, जब कलम में कमाल हो और उसकी  श्री वास्तव  में हो!

‘संपादकीयम्’ के इस पाठ को लिखने से किसी पत्रकारिता महाविद्यालय में  फीस भरे बिना मुझे  पहला पाठ मिल  गया। इसका शुक्रगुजार होना बनता है। यह भी मेरा फर्ज़ बनता है कि नाई की ताईं आपको बुलावा दे दूँ, ‘परिलेख प्रकाशन, नजीबाबाद’ से प्रकाशित इस मोर-पंखी पुस्तक के साथ फ़र्स्ट  डेट पर जरूर-बेजरूर  जाना । दूसरी-तीसरी किताब की प्रतीक्षा न करना; वे पाइप-लाइन में हैं।

  • समीक्षित कृति : संपादकीयम् (लेख/ पत्रकारिता)/ लेखक- ऋषभदेव शर्मा/ आईएसबीएन: 97893-84068-790/ प्रकाशक- परिलेख, नजीबाबाद/ वितरक- श्रीसाहिती प्रकाशन, हैदराबाद।

गोपाल शर्मा

प्रोफेसर, 
अंग्रेजी विभाग, 
अरबा मींच विश्वविद्यालय, 
अरबा मींच, इथियोपिया।
ई-मेल:prof.gopalsharma@gmail.com  

सबरंग-कार्यपालिका-न्यायपालिका संबंध




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मंगलवार, 26 मार्च 2019

विनोद श्रीवास्तव के पाँच गीत


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार

रेत के घर हो गये हैं हम..


रेत के घर 
हो गये हैं हम 
क्या पता 
किस क्षण हमें ढहना पड़े 

सब्र के घर 

हो गये हैं हम 
क्या पता 
कितने युगों दहना पड़े 

मोम होकर 

पीर पिघली है 
या कि सांसें हो गई ठंडी 
रात की आवाज़ 
कातिल है 
जागती है जबकि पगडंडी 

नीर के घर 

हो गये हैं हम 
क्या पता 
किस छोर तक बहना पड़े 

बंद आँखों में 

शहर वीरान 
दीप की लौ क्या करे बोलो 
हो गये झूठे 
सभी अनुमान 
सूर्यवंशी मुट्ठियाँ खोलो 

भूख के घर 

हो गये हैं हम 
क्या पता 
कब क्या हमें सहना पड़े 

इं दिनों तूफान को ओढ़े 

बाँसुरी का गीत पागल है 
हर पहर चिंगारियां 
छोड़े
क्या यही हर बात का हाल है 

धूप के घर 

हो गये हैं हम 
क्या पता 
कब आग में रहना पड़े


शाम-सुबह महकी हुई..


शाम-सुबह महकी हुई 
देह बहुत बहकी हुई 
ऐसा रूप कि 
बंजर-सा मन 
चन्दन-चन्दन हो गया 

रोम-रोम सपना संवरा
पोर-पोर जीवन निखरा
अधरों की तृष्णा धोने 
बूँद-बूँद जलधर बिखरा 

परिमल पल होने लगे 
प्राण कहीं खोने लगे 
ऐसा रूप कि 
पतझर-सा मन 
सावन-सावन हो गया 

दूर हुई तनहाइयाँ 
गमक उठी अमराइयां 
घाटी में झरने उतरे 
गले मिली परछाइयाँ

फूलों-सा खिलता हुआ 
लहरों-सा हिलता हुआ 
ऐसा रूप कि 
खण्डहर सा मन 
मधुवन–मधुवन हो गया 

डूबें भी, उतरायें भी 
खिलें और कुम्हलायें भी 
घुलें-मिलें तो कभी-कभी 
मिलने में शरमायें भी 

नील वरन गहराइयाँ 
साँसों में शहनाईयां
ऐसा रूप कि 
सरवर-सा मन 
दर्पण-दर्पण हो गया


नदी के तीर पर..


नदी के तीर पर 
ठहरे 
नदी के बीच से 
गुजरे 
कहीं भी तो 
लहर की बानगी 
हमको नहीं मिलती 

हवा को हो गया क्या 
नहीं पत्ते खड़कते हैं 
घरों में गूजते खंडहर
बहुत सीने धड़कते हैं 

धुएं के शीर्ष पर 
ठहरे 
धुएं के बीच से 
गुजरे
कहीं भी तो 
नज़र की बानगी 
हमको नहीं मिलती 

नकाबें पहनते हैं दिन 
कि लगता रात पसरी है 
जिसे सब स्वर्ग कहते हैं 
न जाने कौन नगरी है 
गली के मोड़ पर 
ठहरे 
गली के बीच से 
गुजरे
कहीं भी तो 
शहर की बानगी 
हमको नहीं मिलती 

कहाँ मन्दिर, कहाँ गिरजा 
कहाँ चैतन्य की आभा 
कहाँ नानक, कहाँ कबिरा
कहाँ खोया हुआ काबा 

अवध की शाम को 
ठहरे 
बनारस की सुबह 
गुजरे 
कहीं भी तो 
सफ़र की बानगी 
हमको नहीं मिलती


गीत हम गाते नहीं तो..


गीत 
हम गाते नहीं तो 
कौन गाता?

ये पटरियाँ 
ये धुआँ
उस पर अंधेरे रास्ते
तुम चले आओ 
यहाँ 
हम हैं तुम्हारे वास्ते 

गीत!
हम आते नहीं तो 
कौन आता?

छीनकर सब ले चले 
हमको 
हमारे शहर से 
पर कहाँ सम्भव 
कि बह ले 
नीर 
बचकर लहर से 
गीत 
हम लाते नहीं तो 
कौन लाता?

प्यार ही छूटा नहीं 
घर-बार भी 
त्योहार भी 
और शायद छूट जाये 
प्राण का आधार भी 

गीत 
हम पाते नहीं तो 
कौन पाता?


हमारी देह का तपना..


हमारी देह का तपना 
तुम्हारी धूप क्या जाने 

बहुत गहरे नहीं सम्बन्ध होते 
रंक राजा के 
न रौंदें गाँव की मिट्टी 
किसी के बूट आ-जा के 

हमारे गाँव का सपना 
तुम्हारा भूप क्या जाने 

नशें में है बहुत ज्यादा 
अमीरी आपकी कमसिन 

गरीबी मौन है फिर भी 
उजाड़ी जा रही दिन-दिन 

तुम्हारी प्यास का बढ़ना 
तुम्हारा कूप क्या जाने 

हमारे दर्द गूगे हैं 
तुम्हारे कान बहरे हैं 
तुम्हारा हास्य सतही है 
हम्रारे घाव गहरे हैं 

हमारी भूख का उठना
तुम्हारा सूप क्या जाने

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विनोद श्रीवास्तव


  • जन्म-2 जनवरी, 1955 (कानपुर)
  • पिता-श्री शिव कुमार श्रीवास्तव
  • माता-श्रीमती शांती देवी श्रीवास्तव
  • शिक्षा-एम.ए. अर्थशास्त्र/ हिन्दी साहित्य।
  • प्रकाशित कृतियाँ-भीड़ में बांसुरी और अक्षरों की कोख (गीत संग्रह)।
  • प्रकाशन-देश की अनेक पत्र-पत्रिकाओं में गीतों का प्रकाशन। अनेक गीत संचयनों में सहभागिता। दूरदर्शन एवं आकाशवाणी के विभिन्न केन्द्रों से काव्य-पाठ।
  • सम्प्रति-उत्तर प्रदेश राज्य कताई कंपनी, कानपुर से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के दैनिक जागरण के साहित्यिक पृष्ठ और अर्द्धवार्षिक पत्रिका 'पुनर्नवा' से संबद्ध एवं जागरण समूह की लक्ष्मी देवी ललित कला अकादमी, कानपुर में प्रबंधक।
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परिक्रमा-भाषा : राष्ट्रीयता, समन्वय और समरसता’ पर व्याख्यान संपन्न


“भाषा किसी राष्ट्र की बुनियाद होती है। वही अलग-अलग समुदायों को इस तरह बाँध कर रख सकती है कि बड़े से बड़े हमले में भी देश की संरचना बिखरने न पाए। भाषा को यह शक्ति उसमें छिपे जन-संस्कृति के सूत्रों से मिलती है। इसलिए किसी भाषा को इस्तेमाल करना सीखना ही काफी नहीं होता। बल्कि उसमें निहित सांस्कृतिक तत्वों की पहचान भी ज़रूरी होती है। अनेक बोलियों और भाषाओं के बीच संपर्क का काम करते-करते संस्कृति की दृष्टि से हिंदी अत्यंत समृद्ध भाषा बन गई है तथा अपने विपुल मौलिक और अनूदित साहित्य के माध्यम से वह भारत की राष्ट्रीय अस्मिता का प्रतिनिधित्व करती है। भक्ति साहित्य और नव जागरण काल के साहित्य द्वारा हिंदी ने राष्ट्रीय समन्वय और समरसता को पुष्ट किया था। वर्तमान में भी वह विघटनकारी ताकतों को पहचान कर जनता को सावधान कर रही है और सह-अस्तित्व के भाव को पुख्ता करने के लिए प्रयासरत है।“

ये विचार प्रो. ऋषभदेव शर्मा ने कर्नाटक विश्वविद्यालय में विभिन्न भाषा-साहित्य और कला विषयों के प्राध्यापकों को संबोधित करते हुए प्रकट किए। वे विश्वविद्यालय के मानव संसाधन विकास केंद्र (धारवाड़) में संपन्न पुनश्चर्या पाठ्यक्रम के तहत “भाषा : राष्ट्रीयता, समन्वय और समरसता” विषय पर दो-सत्रीय व्याख्यानमाला में बोल रहे थे। कार्यक्रम में कर्नाटक के विभिन्न विश्वविद्यालयों से आए 65 प्राध्यापकों ने भाग लिया। डॉ. साहिबहुसैन जहगीरदार के धन्यवाद के साथ व्याख्यानमाला का समापन हुआ। 

प्रस्तुति: डॉ गुर्रामकोंडा नीरजा 


सह संपादक 'स्रवंति'
असिस्टेंट प्रोफेसर
उच्च शिक्षा और शोध संस्थान,
दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा,
हैदराबाद - 500004

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छत्तीसगढ़ी उपन्यास ‘मोर दुलरुआ’ और बड़का दाई’ लोकार्पित


केंद्रीय हिंदी संस्थान (मैसूर) के व्याख्यान कक्ष में संपन्न क्षेत्रीय निदेशक डॉ. राम निवास साहू के सेवा निवृत्ति समारोह के अवसर पर उनकी दो छत्तीसगढ़ी पुस्तकों 'मोर दुलरुआ' (जीवनीपरक उपन्यास) और 'बड़का दाई' (अनुवाद : डॉ. गीता शर्मा) का लोकार्पण किया गया। अध्यक्षता मैसूर विश्वविद्यालय की प्रो. प्रतिभा मुदलियार ने की। बतौर मुख्य अतिथि लोकार्पण प्रो. ऋषभदेव शर्मा ने किया। एनसीईआरटी के डॉ. सर्वेश मौर्य और केंद्रीय हिंदी संस्थान के डॉ. परमान सिंह ने लोकार्पित पुस्तकों की समीक्षा प्रस्तुत की। वल्लभविद्यानगर से पधारे डॉ. योगेन्द्रनाथ मिश्र तथा हैदराबाद से पधारे चंद्रप्रताप सिंह ने शुभाशंसा व्यक्त की। इस अवसर पर आशा रानी साहू, शशिकांत साहू, श्रीकांत साहू और श्रीदेवी साहू ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। नराकास-मैसूर के प्रतिनिधियों के अलावा डॉ साहू के गृहनगर कोरबी-छत्तीसगढ़ से आए समूह के सदस्यों ने भी उत्साहपूर्वक भागीदारी निबाही।

-डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा

रविवार, 10 फ़रवरी 2019

डॉ.राजेन्द्र वर्मा की वासंती रचनाएँ


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


मौसम भी वाचाल हो रहा..(गीत)


मौसम भी वाचाल हो रहा,
आओ, कुछ बतिया लें !

आया है वसन्त बाग़ों में, 
मुसकातीं कलियाँ लाखों में,
हर दिशि में सौरभ बिखरा है,
धरती पर अनंग उतरा है,

भौरे भी अलमस्त गा रहे,
कुछ मस्ती हथिया लें ।

गेहूँ पर कैशौर्य छा गया,
हुक्के लेकर चना आ गया,
सरसों की चुनरी पियरायी,
प्रकृति-पालने स्वस्ति पल रही,
इस पर भी पतिया लें ।

रंगों का मौसम आने को,
औघड़ फागुन बौराने को, 
नागफनी लगती पलाश है, 
उसको भी पी की तलाश है, 

पुरवा प्रीति-पत्रिका बाँचे,
क्यों न उसे छतिया लें !


पोर-पोर जीवन..


धारयित्री को 
नवजीवन देने
आया वसन्त !

पञ्चवाण ने 
देख भर लिया है 
वसुन्धरा को, 
पूर्ण कामना; 
मिला नव्य यौवन 
पीत जरा को 

दसों दिशाएँ 
स्वागत को आतुर,
आओ महन्त !

देह हुई है 
कंचन-कंचन--सी 
उष्मा पाकर; 
नयी कोपलें, 
पोर-पोर जीवन,
हर्षा अन्तर, 

कल्पद्रुम है 
एक-एक फुनगी,
शोभा अनन्त!

जब आया मधुमास (दोहे)


स्वागत में ऋतुराज के, बिछे पर्णकालीन ।
वन्दन-अभिनन्दन करें, दिशि-दिशि भ्रमर प्रवीन ।।

धरती का वैकल्य लख, आ पहुँचा ऋतुराज ।
नवकोपल के वस्त्र से, लगा ढाँपने लाज ।।

नयी कोपलों से हुआ, वट लज्जा से लाल ।
पीपल ताली पीटता, देख विटप के हाल ।।

फूलों पर छायी हँसी, कलियों पर मुस्कान ।
पत्ती-पत्ती चंचला, सुन भ्रमरों का गान ।।

फुनगी-फुनगी हँस रही, पल्लव उगे नवीन ।
हर कोई रसवन्त है, रहा न कोई हीन ।।

आम्रकुंज में मंजरी, देती मदिर सुवास ।
कचनारी कलियाँ खिलीं, निरख-निरख मधुमास ।।

दसों  दिशाओं में भरी, मनमोहनी सुगन्ध ।
भीनी-भीनी गन्ध से, मौसम का अनुबन्ध ।।

कामदेव के बाण से, आहत अंग-प्रत्यंग ।
महादेव की भी हुई कठिन तपस्या भंग ।।

खुलने को व्याकुल हुए, लाज-शरम के बन्द ।
ऐसे में कैसे रचे, मन संयम के छन्द !

पतझर और वसन्त से, प्रकृति बनी अभिराम ।
शिव-ब्रह्मा जैसे करें, अपना-अपना काम ।।


वसन्त आया (कविता)


आ चलें, देखें, वसन्त आया !

गया पतझर दिगम्बर,  

धरा सजने लगी—
फ़सल गेहूँ की’ जैसे हो हरी चूनर,
खिली सरसों की’ छापी पीतवर्णी,
किनारी-सी सजी है बर्र, देखो, नीलवर्णी,
लगी हैं कानाफुस्की में किशोरी बालियाँ,
सहेली बन हवा करने लगी अठखेलियाँ,
मटर की छीमियों के पड़ गये झूले
उठाये हाथ में हुक्के चने फूले,
किनारे खेत में चुप है खड़ा गन्ना 
बीज बनने की प्रतीक्षा में,
रस पिलायेगा वो अगले साल ।
ख़ुशी से कूकती कोयल
कि आया आम पर फिर बौर,
मगन-मन खोजता महुआ,
कहाँ है वारुणी का ठौर ?
तपस्वी वट के सिर बैठीं  
सहस्रों कोपलें,
कि उसके हाल पर ताली बजाता 
हँस रहा पीपल ।
लदा फूलों से हरसिंगार,
सजा सेमल पहन कुण्डल,
गमकती रात की रानी,
दहकते गुलमोहर का है कोई सानी !

खिले हैं पुष्प निर्जन में,

सुरभि व्यापी है कण-कण में।
भ्रमर मचलाः बजायी बीन,
तितलिका भी हुई रंगीन
पवन डोलाः सुरभि बिखरी,
दिशा हर महमहा उट्ठी ।
नयन-भर देखता अम्बर
कि उतरा स्वर्ग धरती पर
नज़र उसको न लग जाए,
कि उसने तान दी चादर—
टँके जिसमें/सहस्रों चाँद-तारे,
सजे जिसमें/सुनहरे-श्वेत-भूरे मेघ कजरारे,
हृदय, आनन्द की वर्षा छुपाये,
धरा के रूप का रसपान करने/दौड़ते आये ।

दिवस बीता ठिठोली में,

हुई सन्ध्या, छलकती लालिमा,
नभ हो गया मधुपात्र जैसे,
जिसे देखो वही नश्शे में जैसे !
क्षितिज के अंक में है क्लान्त दिनकर
विहँस उट्ठी तमिस्रा तान चादर,
अनैतिकता हुई आश्वस्त,
अहा! सूरज हुआ है अस्त ।
मनुज की फिर गयी है मति,
रुके कैसे अधोगति?`

हुई तत्काल बैठक उडुगनों की,

हुआ प्रस्ताव पारित—
उजाला सूर्य का लेकर

बनेगा चन्द्रमा प्रहरी धरा का ।

समुज्ज्वल अमृत की वर्षा, 
चतुर्दिक शान्ति का शासन, 
अघट घटने को था लेकिन,
हुआ है उसका निर्वासन ।

प्रहर अष्टम अभी बस बीतने को,

कि देखो, चन्द्रिका पसरी धरा पर,
कि देखो, ओस बैठी दूर्वा पर,
प्रतीक्षा भोर की करती—
पधारे सूर्य ज्यों ही,
चरन उसके पखारे,
सकल सर्वस्व वारे !
प्राण दूँ मैं भी उसी पर वार,
दीप्त कर दे जो सकल संसार !  
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राजेन्द्र वर्मा 


  • जन्म-8-11-1957 (बाराबंकी, उ.प्र.)
  • प्रकाशन-प्रसारण-गीत,  ग़ज़ल, दोहा, हाइकु, कहानी, लघुकथा, व्यंग्य, निबन्ध आदि 
  • विधाओं में बीस पुस्तकें प्रकाशित । महत्वपूर्ण संकलनों में सम्मिलित । 
  • विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ एवं समीक्षाएँ प्रकाशित ।
  • लखनऊ दूरदर्शन तथा आकाशवाणी से रचनाएँ प्रसारित ।
  • पुरस्कार-सम्मान-उ.प्र.हिन्दी संस्थान के व्यंग्य व निबन्ध-नामित पुरस्कारों सहित देश की 
  • अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित । 
  • अन्य-लखनऊ विश्वविद्यालय द्वारा रचनाकार पर एम्.फिल । अनेक शोधग्रन्थों में संदर्भित । 
  • कुछ लघुकथाओं और ग़ज़लों का पंजाबी में अनुवाद । 
  • चुनी हुई कविताओं का अँगरेज़ी में अनुवाद ।
  • सम्प्रति-भारतीय स्टेट बैंक में मुख्य प्रबन्धक के पद से सेवानिवृत्ति के बाद स्वतन्त्र लेखन। 
  • सम्पर्क-3/29 विकास नगर, लखनऊ (उ.प्र.)-226022  
  • मो. 80096 60096
  • ई-मेल: rajendrapverma@gmail.com

मंगलवार, 29 जनवरी 2019

डा. मधुर बिहारी गोस्वामी के दोहे


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


मिथ्या है अभिमान..


देख जरा मजदूर को, कैसा है बदहाल।
खाने को तरसे सदा,रोटी,चावल,दाल।।

राजनीति भरमा रही, नेता मालामाल।
भूखी जनता चाहती, रोटी,चावल,दाल।।

कहाँ गई अमराइयाँ, कहाँ गए घन घोर।
सूखा ही सूखा दिखे, क्यों नाचे मन-मोर।।

चहूँ ओर हैं दीखते, हरियाली के चोर।
दिख पाएगा कब तलक,यह वनवासी मोर।।

छूटेगा तन एक दिन, होगा काल प्रहार।
झूठा मत अभिमान कर,मेरे प्यारे यार।।

क्यों करता है रात-दिन, मिथ्या है अभिमान।
भीलन लूटी गोपिका, निष्फल अर्जुन बान।।

चार दिनों की चाँदनी, मान सके तो मान।

फिर गहरा अँधियार लख,मत कर तू अभिमान।।

क्यों खोजूँ गिरि कन्दरा, क्यों यमुना के तीर।
मुझको तो कान्हा दिखे,सदा पराई पीर।।

जब पड़ता है काम तो, दुनिया से मुख मोड़।
गर्दभ का आदर करें, बाप कहें, कर जोड़।।

जीवन अब कैसे बचे,दिल में उठती हूक।
जगह-जगह रहजन खड़े, लिए हाथ बन्दूक।।


डा. मधुर बिहारी गोस्वामी


  • जन्मतिथि-25 फरवरी-1953
  • शिक्षा-एम.ए.पी-एच.डी.
  • पद-सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर, एस.बी.जे.महाविद्यालय,बिसावर (हाथरस)।
  • लेखन-अनेक पत्रिकाओं में निबंध, दोहे आदि प्रकाशित। आकाशवाणी दिल्ली और मथुरा-वृन्दावन से अनेक वार्ताएँ प्रसारित। अनेक साहित्यिक गोष्ठियों में पत्र वाचन।
  • संपर्क-34, बिहारीपुरा,वृंदावन (मथुरा)।
  • मो.9719648204,8755846327
  • ईमेल-madhurbihari0565@gmail.com
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                    डॉ. मंजु शर्मा सारस्वत सम्मान से अलंकृत


चिरेक इंटरनेश्नल स्कूल की हिंदी विभाग अध्यक्ष डॉ. मंजु शर्मा को श्रीनाथद्वारा (हैदराबाद) में आयोजित विशाल सम्मान समारोह में श्रीनाथद्वारा साहित्य मंडल एवं केन्द्रीय हिंदी संस्थान के सयुंक्त तत्वावधान में ‘ललितशंकर दीक्षित स्मृति सम्मान’ से अलंकृत किया गया। यह सम्मान उन्हें दक्षिण भारत में रहकर हिंदी भाषा और साहित्य की उत्कृष्ट सेवा के लिए की विनोद बब्बर और डॉ. किशोर काबरा जैसे साहित्यकारों की उपस्थिति में डॉ. बीना शर्मा और श्याम जी देवपुरा ने प्रदान किया.सम्मान के अंतर्गत श्री फल,प्रमाण पत्र, अंगवस्त्र, मेवाती पगड़ी और नकद धन राशि शामिल है।

तीन दिन के इस समारोह में देशभरसे आए हिंदी सेवियों और साहित्यकारों ने भाग लिया जिनमेंडॉ. विजय प्रकाश त्रिपाठी (कानपुर), अवधेश शुक्ल( सीतापुर),डॉ सविता चड्ढा(दिल्ली) हेमराज मीणा, कल्पना गवली (बड़ोदरा)अमरेंद्र पत्रकार (लोकसभा चैनल) आदि के नाम प्रमुख हैं। कार्यक्रम के अंतर्गत कुल विचार स्त्र सम्पन्न हुए जिनमें हिंदी भाषा और साहित्य के विविध पक्षों और समस्याओं पर गहन मंथन हुआ. डॉ. मंजु शर्मा ने ‘दक्षिण में हिंदी की स्थिति’ पर अपना आलेख प्रस्तुत किया। उन्होंने यह सुझाव दिया कि दक्षिण में हिंदी की स्वीकार्यता को भावनात्मक स्तर पर बढ़ाने के लिए यह आवश्यक है कि हिंदी भाषी प्रान्तों में  बच्चों को प्राथमिक स्तर से ही एक दक्षिण भारतीय भाषा की शिक्षा दी जाए.उनके इस प्रस्ताव का उपस्थित विद्वानों ने खुले मन से स्वागत किया।

प्रेषक-डॉ. मंजु शर्मा

विभागाध्यक्ष (हिंदी विभाग)
चिरेक इंटरनेश्नल स्कूल कोंडापुर, हैदराबाद।
ईमेल-manju.samiksha@gmail.com

मंगलवार, 1 जनवरी 2019

राजेन्द्र वर्मा के चार नवगीत


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार



एक जनवरी आयी 

         
जींस-टॉप कुहरे के डाले  
एक जनवरी आयी !

महल-अटारी पर न्योछावर

बिजली वाले लट्टू 
अपनी बस्ती के खम्भों में 
लटके बल्ब निखट्टू 

जलते टायर से घबराती

एक जनवरी आयी!

अम्मा को गठिया ने जकड़ा,

बापू को जूड़ी ने 
नींद उड़ा रक्खी भैया की 
जवाँ हुई बेटी ने 

शिक्षा ऋण की नोटिस लेकर 

एक जनवरी आयी ।

दो पैसे की बचत नहीं, 

खेती लेकिन करनी है
केसीसी की किश्त पुरानी  
कैसे भी भरनी है 

आलू पर पाला बरसाती 

एक जनवरी आयी ।       


भाग्य की बही  


नया साल आया,
पर समय वही ।

सर्द-सर्द रातें
गलन-भरे दिन
मौसम की घातें
बेबस पल-छिन

कर्मों पर भारी
भाग्य की बही ।

फटी रजाई है
फटा सलूका
चीथड़े लपेटे
बने बिजूका

साहब के लेखे
सभी कुछ सही ।

ऊनी में जकड़े
आये प्रधान,
बँटने को उतरन
दौड़ते श्वान

घर के कौड़े में
आग हँस रही ।    
   

नवल वर्ष आया 

       
नवल उमंगें, नवल तरंगें   
नवल वर्ष लाया !

विगत वर्ष ने सदा की तरह 
दीं कुछ सौग़ातें 
यादों की सरि में तिरतीं कुछ  
खट-मिट्ठी बातें 

नवल सर्जना के सपने ले 
नवल वर्ष आया !

श्रम के फल पर बैठी सत्ता 
फन अपना काढ़े 
पूँजीपतियों के दलाल हैं 
सिर के बल ठाढ़े 

नये पहरुए ने भी खल का 
करतब दिखलाया ।

फुटपाथों पर जीना जैसे 
मौत बुलाना है 
न्यायपालिका के आगे 
ख़ुद को समझाना है 
भोर-साँझ लेकिन हमने 
भैरव में ही गाया । 

अभी घना कुहरा है लेकिन,
सूरज निकलेगा
दिग्पालों को अचरज होगा,
मौसम बदलेगा 

पात-पात पूछेगा, हिय को  
किसने सरसाया !          
 

समय नहीं बदला 



नया साल आया है लेकिन, 
समय नहीं बदला !

आँखों का माड़ा कब उतरे, कौन जानता है?
साठे के अनुभव को भी अब, कौन मानता है?

कुहराये मौसम का सूरज, है अपने हिस्से,
कहने को नवयुग आया पर,
हमको कहाँ फला !

नये-नये ईश्वर हैं लेकिन, हैं तो वे पत्थर,
हम बेबस इंसानों का है, एक नहीं ईश्वर,
कलाकार बेशक़ बदले, पर एक चरित उनका, 
विश्वग्राम के ज़मींदार ये 
अपना करें भला ।

अपराधों को मिली हुई, दुर्घटना की संज्ञा,
संविधान के शीश चढ़ी है, मनुवाली सत्ता,
धर्म-अँजी आँखों में तैरे, जन्मों का लेखा,
कायरता के उच्छ्वास से 
कब दुर्भाग्य टला !

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राजेन्द्र वर्मा 



  • जन्म: 8 नवम्बर 1957, बाराबंकी (उ.प्र.) के एक गाँव में ।
  • प्रकाशन-प्रसारण: गीत,  ग़ज़ल, दोहा, हाइकु, कहानी, लघुकथा, व्यंग्य, निबन्ध आदि विधाओं में इक्कीस पुस्तकें प्रकाशित । महत्वपूर्ण संकलनों में सम्मिलित । 
  • विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ एवं समीक्षाएँ प्रकाशित ।
  • लखनऊ दूरदर्शन तथा आकाशवाणी से रचनाएँ प्रसारित ।
  • पुरस्कार-सम्मान: उ.प्र.हिन्दी संस्थान के व्यंग्य एवं निबन्ध-नामित पुरस्कारों सहित देश की अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित । 
  • अन्य:लखनऊ विश्वविद्यालय द्वारा रचनाकार पर एम्.फिल । अनेक शोधग्रन्थों में संदर्भित । कुछ लघुकथाओं और ग़ज़लों का पंजाबी में अनुवाद । चुनी हुई कविताओं का अँगरेज़ी में अनुवाद ।
  • सम्प्रति:भारतीय स्टेट बैंक में मुख्य प्रबन्धक के पद से सेवानिवृत्ति के बाद स्वतन्त्र लेखन। 
  • सम्पर्क:3/29 विकास नगर, लखनऊ 226022 
  • मो. 80096 60096
  • ई-मेल : rajendrapverma@gmail.com