कमला कृति

सोमवार, 21 अक्तूबर 2019

नाज़िम हिक़मत की कविताएँ


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


मेरी कविता के बारे में


मेरे पास सवारी करने के लिए
चाँदी की काठी वाला अश्व न था
रहने के लिए कोई पैतृक निवास न था
न धन दौलत थी और न ही अचल सम्पत्ति
एक प्याला शहद ही था जो मेरा अपना था
एक प्याला शहद
जो आग की तरह सुर्ख़ था !
मेरा शहद ही मेरे लिए सब कुछ था
मैनें अपनी धन दौलत
अपनी अचल सम्पदा की रखबाली की
हर क़िस्म के जीव-जन्तुओं से उसकी रक्षा की
मेरे सहोदर, तनिक प्रतीक्षा तो करो
यहाँ मेरा आशय
मेरे शहद भरे पात्र से ही है
जैसे ही मैं
अपना पात्र शहद से भर लूँगा
मक्खियाँ टिम्बकटू से चलकर
इस तक आएँगी !


कुछ सलाह उनके लिए जो उद्देश्य के लिए जेल में हैं


गर्दन पर फन्दा कसने के बजाय
यदि धकेल दिया जाए तुम्हें काल-कोठरी में
महज़ इसलिए
कि दुनिया के लिए, अपने देश के लिए,
अपनों के लिए उम्मीद नही छोड़ी तुमने
यदि ज़िन्दगी के बाक़ी बचे दस-पन्द्रह वर्षों में भी
तुम्हारे साथ यही सुलूक होता रहे
तो तुम यह भी नही कह पाओगे कि अच्छा होता
जो मुझे रस्सी के छोर पर एक झण्डे की तरह टाँग दिया जाता
किन्तु तुम्हें डटे रहना होगा और जीना होगा
वास्तव में यह तुम्हें ख़ुशी नही दे सकता
लेकिन तुम्हारा यह परम कर्तव्य है
दुश्मन का विरोध करने के लिए तुम
एक दिन और जियो
मुमकिन है कि
कुएँ के तल से आती आवाज़ की तरह
तुम्हारा अन्तर्मन भी अकेलेपन से भर उठे
किन्तु दूसरी ओर
दुनिया की हड़बड़ी देख
भीतर ही भीतर सिहर उठोगे तुम
बाह्य जगत में एक पत्ती भी
चालीस दिनों के अन्तराल पर निकलती है
अन्तर्घट से आती आवाज़ के लिए प्रतीक्षा करना
दुःख भरे गीत गाना
या पूरी रात छत ताकते हुए जागते रहना
भला तो है किन्तु डरावना भी है
हर बार हजामत बनाते हुए
अपने चेहरे को देखो !
भूल जाओ अपनी उम्र !
दुश्मन से सतर्क रहो
और मधुमास की रातों के लिए
रोटी का आख़िरी टुकड़ा खाना
हमेशा याद रखो
और कभी मत भूलो
दिल से खिलखिलाना !
कौन जानता है
वह महिला जिसे तुम प्रेम करते हो
कल तुम्हें प्रेम करना ही छोड़ दे
मत कहना यह कोई बड़ा मसला नही है
यह मनुष्य के लिए
मन की हरी डाली तोड़ देने जैसा होगा
मन ही मन गुलाबों और बाग़ीचों के बारे में
सोचते रहना फिजूल है
वहीँ समन्दर और पर्वतों के बारे में सोचना उत्तम होगा
बिना रुके पढ़ते-लिखते रहो
और मैं तुम्हें बुनने और
दर्पण बनाने की सलाह भी दूँगा
मेरा आशय यह कतई नही है
तुम दस या पन्द्रह वर्ष
जेल में नही रह सकते
इससे कहीं ज़्यादा .....
तुम कर सकते हो
जब तक
तुम्हारे हृदय के बाईं ओर स्थित मणि
अपनी कान्ति न गँवा दे !

(अंग्रेज़ी से अनुवाद : नीता पोरवाल)

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ईश्वर करुण अभिनंदन ग्रंथ' हेतु रचनाएँ आमंत्रित


         साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्था 'साहित्य मंथन' (हैदराबाद) के तत्वावधान में चेन्नै के  सुप्रतिष्ठित साहित्यकार और हिंदीसेवी  ईश्वर करुण (ईश्वर चंद्र झा) के व्यक्तित्व और कृतित्व पर केंद्रित अभिनंदन ग्रंथ के प्रकाशन की योजना निश्चित हुई है। इस ग्रंथ का संपादन प्रो. ऋषभ देव शर्मा और डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा संयुक्त रूप से करेंगे। संपादकों ने ईश्वर करुण और उनके साहित्य से परिचित लेखकों से अनुरोध किया है कि लगभग 1000 शब्दों में ईश्वर करुण से संबंधित अपना संस्मरण या समीक्षात्मक आलेख अभिनंदन ग्रंथ के लिए उपलब्ध कराएँ।
        ग्रंथ की प्रकृति के अनुसार आलेख - ईश्वर करुण : जैसा मैंने देखा (अंतरंग संस्मरण), कवि सम्मेलनों का लाड़ला रचनाकार ईश्वर करुण, ईश्वर करुण और उनके गीत, हिंदी ग़ज़ल को ईश्वर करुण की देन, पत्रकार और संपादक ईश्वर करुण, राजभाषा अधिकारी के रूप में ईश्वर करुण की उपलब्धियाँ, ईश्वर करुण की कहानियों में समकालीन समाज, नई कविता और ईश्वर करुण की रचनाधर्मिता, ईश्वर करुण के साहित्य में मैथिल लोक, ईश्वर करुण के साहित्य में चेन्नई की धड़कन, इलेक्ट्रानिक जनसंचार : ईश्वर करुण की उपलब्धियाँ, ईश्वर करुण के काव्य में लालित्य आदि विषयों पर केंद्रित हो सकते हैं। यह सामग्री rishabhadeosharma@yahoo.com/ neerajagkonda@gmail.com/ ishwar_karun@yahoo.co.in  पते पर ईमेल द्वारा भेजी जा सकती है।

  • डॉ.गुर्रमकोंडा नीरजा


पुस्तक समीक्षा: कंगाल होता जनतंत्र–एम.एम.चन्द्रा




मेरे हसीन बचपन में कोई नयापन नहीं आता..


‘कंगाल होता जनतंत्र’ अनिल कुमार शर्मा का पहला काव्य संग्रह है. यह संग्रह पिछले दो दशकों के आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्र का एक ऐसा दस्तावेज़ है जिसने न सिर्फ लेखक की चेतना का ही निर्माण किया बल्कि आम जनमानस की चेतना की निर्माण प्रकिया को आसानी से समझने का प्रयास किया. सन् 1993 से लेकर आज तक का हमारा समय वैचारिक विभ्रम, विघटन, उत्थान और पतन के दौर से गुजर रहा है. यह काव्य संग्रह मुझे ऐसे समय में पढ़ने को मिला जब नये रचनाकारों पर सवाल दर सवाल दागे जा रहे हैं. ऐसे समय में अनिल कुमार की रचनाएँ साहित्य जगत में बहुत सी संभावनाओं को जन्म देती हैं. ‘कली रहने दो’ एक लम्बी कविता है जिसमें ‘डर’ विभिन्न रूपों में हमारे सामने आता है और कहता है कि-

तुम मत उगो सूरज
तुम्हारे डूबने उगने से
मेरे हसीन बचपन में कोई नयापन नहीं आता

1992-93 के उस मंजर को अनिल ने बहुत ही गम्भीरता से महसूस किया है जब देश में अराजकता, साम्प्रदायिकता और धार्मिक उन्मांद आज की तरह ही अपनी चरम सीमा तक पहुँच गया था तब ऐसे समय में अनिल कुमार की कविताये अपने से संवाद करती हुई दिखाई देती है-  

ईश्वर होने का कितना बड़ा प्रपंच
धर्म की ज्वाला कितनी प्रचंड
रक्तपात होते हैं
अपने स्वकृत ईश्वर की स्थापना में
जो शाश्वत है
न विगत है
न आगत है
गढ़े मूल्यों की परिधि में
विवाद है
एकांगी सोच के नशे में
अब जागती हुई नींद आधी है

1990 के दशक में शुरू हुई भारत की विकास यात्रा भारत निर्माण, ग्लोबल विलेज, शाइनिंग इण्डिया इत्यादि मुहावरों की यथास्थिति 2010 आते-आते लेखक की नजरों में एकदम साफ़ हो जाती है. इसी का नतीजा है कि भूमंडलीकरण का सब्जबाग़ और उसकी नियति अब नये तरह की सभ्यता और संस्कृति को जन्म दे रही है जिससे कोई भी अछूता नहीं है-

भूमंडलीकरण के चंगुल में
बाजार का विस्तार होगा
खरीदने बेचने का व्यवहार होगा
यही सभ्यता और संस्कार होगा
भावनाओं का मोल-भाव होगा
बिकाऊ सद्भाव होगा
सारा विश्व एक गाँव होगा

भूमंडलीकरण से जहाँ एक तरफ देश की रहस्मय बीमारियों से लड़ने के लिए फाइफ स्टार जैसे अस्पताल भारतीय महानगरों की शोभा बढ़ा रहे हैं वहीं दूसरी तरफ गरीब लोग छोटी-छोटी बीमारियों में बगैर इलाज के मर रहे हैं. निजीकरण की आंधी ने बिमारियों को भी एक अच्छा धंधा बना दिया है-

क्लीनिक के आगे दो कतार है
एक में बीमार हैं
दूसरे में एम.आर. हैं
एक दवा खायेगा
दूसरा दवा खपायेगा

युवा रचनाकार के सामने सही मूल्यांकन का सवाल बहुत बड़ा होता है. सही साहित्य की समझ को बनाये रखने के लिए युवा रचनाकारों को सचेत करते हुए अनिल कुमार इशारा करते हैं कि आलोचना के सांचे बन चुके हैं उसके झांसे में आने से बचने की आवश्यकता है -

ये आलोचना तो सात अंधों की जुबान है
जो एक हाथी के जिस्म की कहानी है
समग्र खंडित है
बहुत बड़ा पंडित है

साधु-संतो के वेश में चोर, लुटेरे, बलात्कारी, अंधविश्वासी समाज में भरे हुए है. वे देश की भोली-भाली जनता को अपना जाल बिछा कर फंसाती है और जनता को मुर्ख बनाने के गोरखधंधे को देश के हर कोने में फैला रही है. वे अन्धविश्वासी, तार्किक परम्परा का गला घोटने के लिए नये तौर-तरीकों से पुराने मूल्यों को जबरदस्ती थोप रहे हैं-

अध्यात्मिक अलगाव की बुझे राख को...
पुराने मूल्यों के नाश्ते को
नई तकनीक की गोली से पचा रहे थे
और मीडिया संविधान की धाराओं में
बड़ी ही सुरक्षित गुफा तलाश रहा था
या यों कहें कि देश चला रहा था .

भारतीय जनतंत्र में भीड़ के द्वारा मोर्चा, अनशन, विरोध-प्रदर्शन एवं भूख हड़ताल जैसी कार्यवाही के पीछे नेताओं की हकीकत को अनिल कुमार की कविता बेनकाब ही नहीं करती बल्कि भारतीय जनतंत्र की खोखली हो रही जमीन को और भी खोदने की काम करती है. ‘कंगाल होता जनतंत्र’ भी बाकी कविताओं की तरह लम्बी कविता है जिसमें कंगाल होते भारतीय जनतंत्र को चिन्हित किया गया है-

विदेशी पूँजी से छलकते हुए
समृद्धि की हवाओं से
कंगाल होता जनतंत्र हूँ

लेखक भारतीय जनतंत्र पर प्रश्न चिन्ह लगाने का प्रयास ही नहीं करता बल्कि उसकी जर-जर होती सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक सच्चाइयों को सामने लाता है-

इस देश महान में खेत में खलिहान में
बाबा के संविधान में
सिद्धांत यह है कि समानता का अधिकार है
एक वैचारिक विकार है
सामान्य में कुछ विशेष है
विशेष में अति विशेष है
बाकी अवशेष है

मीडिया की भूमिका जनतंत्र में चौथे स्तम्भ के रूप में मानी जाती है लेकिन देशी-विदेशी पूँजी के गठजोड़ ने मीडिया के चरित्र को बदल दिया है. जहाँ मीडिया को जनपक्ष होना था वहीँ आज मीडिया सरकार की चाटुकारी करती नजर आती है. इस व्यवहार को लेखक ने अपनी कविता के रूप में इस प्रकार व्यक्त किया है-

यह मूल्यहीन अर्थव्यवस्था
डिब्बे बंद पूँजी तलाश रही है
उदारीकरण की वातानुकूलित हवा में खांस रही है
मीडिया उससे टपकते मधु को चाट रही है...
यह लोकतंत्र एक खिलौने की दुकान है...
सब मूल्य और तर्क तोड़ कर बाजार के लायक बना दो
जो बिक सके वही टिक सके
अब तो हद है कि न्यूज चैनलों में हो रहा दंगा है
अख़बार कैमरे की आँख से भी नंगा है...
तिकड़म तो बस यही है कि
जिसने लोकतंत्र कमा लिया
झोंपड़ी से महल बना लिया

भूखों, किसानों, मजदूरों के लिए भारतीय लोकतन्त्र के नारों के अनुभवों को अनिल कुमार ने खूब लताड़ा है. सड़ते हुए लोकतंत्र का विकल्प अनिल कुमार प्रस्तुत नहीं करते. वे सिर्फ कंगाल होते लोकतन्त्र की सामाजिक, राजनैतिक व आर्थिक ढांचे की सच्चाइयों को हमारे सामने प्रस्तुत करते हैं. उनकी कविताएँ दुखद अनुभव और पीडाओं से गुजरी हैं लेकिन इसके बावजूद अनिल कुमार शर्मा की उम्मीद अभी भी जिन्दा है क्योंकि ‘इन्कलाब अभी जिन्दा है’.

  • कंगाल होता जनतंत्र:अनिल कुमार शर्मा
  • विकल्प प्रकाशन | कीमत:300 रुपये 

बुधवार, 12 सितंबर 2018

देवेन्द्र सफल के गीत


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


बादल बरसे हैं..


आँखें भीगीं, होंठ आचमन
तक को तरसे हैं
प्यासों का घर छोड़ महल पर
बादल बरसे हैं ।

उमड़-घुमड़, झूमें, गरजें घन
तपिश बढ़ा जायें
जैसे जल बिन मछली तड़पे
वैसे तड़पायें
हम इनसे अनुनय कर हारे
ढीठ, निडर -से हैं ।

हवन–यज्ञ सब निष्फल कैसे
नई फसल बोयें
हल जोता अम्मा–चाची ने
इंदर खुश होयें
हरियाली गुम हुई खेत
ऊसर बंजर -से हैं

पोखर, ताल- कुँआ बेबस हैं
सूखी नहर–नदी
सागर अट्टहास करता
मुट्ठी में नई सदी
भूखे लोग देव को अपनी
थाली परसे हैं ।


कर्मयोग के तुम ज्ञाता हो..


कर्मयोग के तुम ज्ञाता हो
तुम गाण्डीव धनुर्धारी हो
तुमको कितना याद दिलायें
शोभा तुम्हें नहीं देती हैं
व्रहन्नला-वाली मुद्रायें ।

सूरज जैसे तेजस्वी,तुम
रहे उजाले की परिभाषा
शरशैया पर पड़े भीष्म की
तुमने पूरी की अभिलाषा
शंखनाद जब किया युद्ध में
बैरी की बढ़ गयीं व्यथायें ।

कालजयी जन -जन के नायक
जग में चर्चित कीर्ति तुम्हारी 
बने सारथी युद्ध-भूमि में,रहे
हांकते रथ गिरधारी
कर्मयोग के तुम ज्ञाता हो
नीति भला क्या तुम्हें बतायें ।

द्वापर की वो बात और थी
कलयुग में मत वेश बदलना
शर्तों पर अधिकार मिले तो
जीते जी होता है मरना
अब गूँजे स्वर देवदत्त का
गूँज उठें फिर सभी दिशायें ।


सूरज के घर उथल पुथल है..


फिर चर्चा हर ओर हो रही
सूरज के घर उथल पुथल है ।

दियासलाई सोचे अब तो 
अपने मन का काम मिलेगा
ख़ुशी मनाते जुगनू अब तो 
अपना भी कुछ मान बढ़ेगा
उल्लू, चमगादड़ के डेरों
में भी दिखती चहल पहल है।

झींगुर छेड़े राग बेसुरा
स्यार बोलते हुआ- हुआ सब
अजब तमाशा शुरू हुआ है
सभी दिखाना चाहें करतब
जंगल-जंगल शोर मच गया
शुभ दिन आने वाला कल है ।

इधर बढ़ी मावस की स्याही
उधर गगन में चमकें तारे
सब अपने मन ही मन सोचें
शायद बदलें भाग्य हमारे
रवि की महिमा चन्दा समझे
तभी छुपा वह अगल बगल है ।


हमसे मांग रहे जवाब अब..


छोटे प्रश्नों के समूह भी
इतने हुए बड़े
हमसे मांग रहे जवाब अब
कई सवाल खड़े।

कैसे उनके हक़ में आये
जंगल और नदी
क्यों पंछी रटते पिंजरों में
नेकी और बदी
प्रगतिशील भी यहां रूढ़ियों में
अब तक जकड़े।

कुछ के अधरों पर मुस्कानें
कुछ के होंठ सिले
कुछ को फूलों के गुलदस्ते
कुछ को शूल मिले
निर्गुट में गुटबन्दी है, क्यों
दिखते कई धड़े ।

जल, थल,वायु,वनस्पतियों नें
सबको सुख बांटे
हम क्यों खुशियाँ लुटा न पाये
खींचे सन्नाटे
किसने लिखा हमारी किस्मत
में अगड़े-पिछड़े ।

क्यों हंगामा बरपा, कोई
गया नहीं तह में
पत्थर इतनी तेज उछलते
दर्पण हैं सहमें
आदमखोर सियासत के क्यों
हैं चौड़े जबड़े ।


सुना भूख के दरवाजे पर..


सुना भूख के दरवाजे पर
बजता अलगोजा
लगता रटे, पेट पर अपने
पत्थर रख सो जा ।

सूत नहीं पर राजाज्ञा है
चले खूब चरखा
आधी रोटी मिली उसी को
चबा-चबा कर खा
जितनी झुकती कमर ,और
उतना बढ़ता बोझा।

सबको भूख सताती,वह हो
पण्डित  या मुल्ला
कोई मरता भूखा तो 
मचता हल्लागुल्ला
राजा हँस-हँस खाता है
आयातित  चिलगोजा ।

बैठक हुई, मन्त्रिमण्डल ने
माथा पच्ची  की
फोटो छपी न्यूज पेपर में
हँसती बच्ची की
नीचे लिखी अपील, सब रखें
अब नित व्रत-रोज़ा ।

राजा कहता जन-गण-मन
अधिनायक गान करो
लेकिन अपनी हद में रहकर
डूबो और मरो
समझो, राजा तो राजा है
परजा है परजा ।


जाने क्यों मेरा बीता कल..


जाने क्यों मेरा बीता कल
मुझको याद करे
जितना दूर-दूर रहता
उतना संवाद करे ।

मेरे सिरहाने आ बैठा
खुलकर बोल रहा
बचपन की खोई किताब के
पन्ने खोल रहा
वह रातों की  नींद उड़ाए
दिन बरबाद करे।

कभी गोद में मुझे उठा ले
कभी गाल चूमें
कभी थाम कर ऊँगली मेरी
साथ-साथ घूमें
मेरे गूंगे शब्दों का भी
वह अनुवाद करे ।

बाग, खेत -खलिहान,पोखरे
तुम कैसे भूले
बता रहा फागुन की मस्ती
दिखा रहा झूले
लौट चलो अपने अतीत में
फिर फरियाद करे ।

कहता, निष्ठुर-निर्मोही तू
मुझसे दूर हुआ
सोंधी रोटी याद क्यों रहे
खाकर मालपुआ 
बहस वकीलों जैसी करता
दाखिल वाद करे ।


आज एक और वचन..


आज एक और वचन
अपनों से हार गया  ।

घास- फूस की मड़ई,पूंजी बस गठरी
पेट-पीठ एक किये रघुआ की ठठरी
पटवारी सुबह- शाम नीम तले आये
नीयत जो डोल गई देख-देख बकरी
कल फिर धमकी देकर 
धरमी सरदार गया ।

सपने सब रीत गए,जलते दिन बीते
कथरी -सी हो गई कमीज़ फटी सीते
दूध,बतासा खातिर बुधुआ है बिलखा
मुश्किल से सोया है आंसू को पीते
अब न हँसेगी पायल
सेंदुर धिक्कार गया ।

खेल-तमाशा भूला,भूल गया मेला
रघुआ वैरागी-सा,ऊंघता अकेला
बारहमासे भूला ,भूल गया कजरी
खोया है अपने में संझियाई बेला
चूल्हे में आग नहीं
रोते त्यौहार गया ।

बीमारी आग हुई हाथ नहीं पाई
सूदखोर बनिया भी हो गया कसाई
रामभरोसे बैठी बबुआ को ताके
बस आँखें पोछ रही बुधुआ की माई
घर-वाला मुँह बाँधे
करने बेगार गया ।


आधी कटी उँगलियाँ..


कैसे वक्त करूँ मुट्ठी में
अपनी आधी कटी उँगलियाँ ।

घूरें शातिर खड़े मछेरे
दाना डालें शाम-सबेरे
अब इनसे बच पाना मुश्किल
कसे हुए सम्मोहक घेरे
जाल सुनहरा फैलाया तो
इसमें अनगिन फंसी मछलियाँ ।

दिन के सहचर रात सराहें
पल में बदलें अपनी चाहें
उलझन बढ़ती ही जाती है
मैं भी भूलूँ सीधी राहें
रंगों का ऐसा संयोजन
लगता आगे घिरी बदलियाँ ।

गिरजाघर, मस्जिद, मन्दिर-मठ
इन सबके अपने-अपने हठ

किसके आगे शीश नवाऊँ
यीशु , रहीम , राम की है रट
उन्मादी नारों को सुनकर
भयवश फैली हुई पुतलियाँ ।

स्वीकारे हैं कई विभाजन
सूख रहा है मन-वृंदावन
जूझ रहा हूँ झंझाओं से
फिर भी चाहूँ महके आँगन
मिले न चैन किसी करवट में
दर्द बहुत कर रहीं पसलियाँ ।

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देवेन्द्र सफल


  • पूरा नाम-देवेन्द्र कुमार शुक्ल
  • पिता- कीर्तिशेष लक्षमी नारायण शुक्ल
  • माता- समृतिशेष अलक नंदा देवी शुक्ला
  • जन्म-स्थान-कानपुर महानगर (उ.प्र)
  • जन्म तिथि-04-01-1958
  • शिक्षा-स्नातक
  • प्रकाशन-गीत-नवगीत संग्रह: पखेरू गन्ध के,  नवांतर, लेख लिखे माटी ने, सहमी हुई सदी, हरापन बाक़ी है।
  • अन्य अनेक सामूहिक संकलनों में रचनाएँ प्रकाशित।
  • प्रसारण-आकाशवाणी के मान्य कवि ।
  • सम्मान-देश-विदेश में अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित/ पुरस्कृत।
  • संपर्क-117/क्यू / 759 -ए,शारदा नगर, कानपुर, उत्तर प्रदेश-208025
  • ईमेल-devendrasafal@gmail.com

परिक्रमा: मारीशस में रामकथा पर अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियाँ एवं सम्मान समारोह




            भारत और मारीशस का संबंध दुनिया के किन्हीं अन्य दो देशों से बिलकुल अलग किस्म का है। मारीशस अपनी पहचान और इतिहास की जड़ें खोजने के लिए भारत की ओर देखता है। हिंदी भाषा और रामकथा के मजबूत धागों से इन दोनों देशों के रिश्ते बुने हुए हैं। मारीशस की नई पीढ़ी को अपने पुरखों की ज़मीन से जोड़े रखने के लिए हमें हिंदी और राम की आज भी ज़रूरत है।

             ये विचार पिछले दिनों विश्व हिंदी सम्मेलन के संदर्भवश मारीशस गए साहित्यिक-सांस्कृतिक शोध संस्था, मुंबई के प्रतिनिधिमंडल के सम्मान में महात्मा गांधी संस्थान, मारीशस के सुब्रह्मण्य भारती सभागार में वहाँ के हिंदी छात्रों के निमित्त आयोजित एक विशिष्ट परिसंवाद (एन इंटेरेक्टिव सेशन)का उदघाटन करते हुए महात्मा गांधी संस्थान की निदेशक डॉ. विद्योत्तमा कुंजल ने प्रकट किए। छात्रों को संबोधित करने वाले विद्वानों में मारीशस के प्रो. हेमराज सुंदर, प्रो. अलका धनपत और प्रो. प्रीति हरदयाल, रूस के डॉ. रामेश्वर सिंह और नादिया सिंह तथा भारत के प्रो. संतप्रसाद गौतम, प्रो. प्रदीप कुमार सिंह, प्रो. प्रदीप के. शर्मा और प्रो. हरिमोहन के नाम सम्मिलित है।

            दूसरे चरण में हिंदी प्रचारिणी सभा, मारीशस में “वैश्विक राम की कथायात्रा” पर अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी एवं सम्मान समारोह संपन्न हुआ। अध्यक्षता करते हुए सभा के वर्तमान प्रधान डॉ. यंतु देव बुधु ने मारीशस में हिंदी के इतिहास और हिंदीसेवियों के संघर्ष पर प्रकाश डाला। मुख्य अतिथि के रूप में सभा के मंत्री धनराज शंभु और कोषाध्यक्ष टहल रामदीन ने संबोधित किया। विषय विशेषज्ञ के रूप में कुलपति प्रो. एसपी गौतम ने जिज्ञासाओं का समाधान किया।

          मारीशस, रूस और भारत के 50 हिंदी सेवियों को हिंदी प्रचारिणी सभा, मारीशस और साहित्यिक सांस्कृतिक शोध संस्था, मुंबई की ओर से “अंतरराष्ट्रीय हिंदीसेवी सम्मान” से अलंकृत किया गया तथा विभिन्न विधाओं की 12 पुस्तकें लोकार्पित की गईं। दोनों आयोजनों का संचालन प्रो. ऋषभदेव शर्मा और डॉ. सत्यनारायण ने किया। धन्यवाद प्रो. प्रदीप कुमार सिंह और डॉ. सतीश कनौजिया ने व्यक्त किया।

प्रस्तुति-सतीश कनौजिया


प्रबंधक, 
साहित्यिक सांस्कृतिक शोध संस्था,
उल्हासनगर, मुंबई (भारत)

बुधवार, 22 अगस्त 2018

श्रीधर आचार्य "शील" के पाँच गीत


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


सावन घिर आया..


पारे सा फिसल गया पावस जब दाँव में
चुपके से सावन घिर आया इस गाँव में

लहरों-सी लहर गयीं बादलों की टोलियाँ
बिजली की कड़कें हैं दाग रही गोलियाँ
तन मन सब भीग गया गीले अनुबंध पर
अँधियारे घिर आये खुशबू की बाँह में

अंतस का सूनापन सिहर गया द्वार पर
आशाएँ  शाल  ओढ़  बैठ गयीं पार पर
सूरज ने फेंक दिया मुट्ठी भर रोशनी
बिखर गयीं अनगिनती किरणें हर ठाँव में

रस भर कर बरस गये सावन के बादल
अँखियों में आँज दिया मेघों ने काजल
सुरमयी इशारों को पानी की ताल पर
देख लिया गोरी ने बरगद की छाँव में

टूट गयीं रेखाएँ  सावन  के रात की
चीख उठीं इच्छाएँ भीगी बरसात की
मटमैली चूनर ओढ़ अधरों की पोर पर
बाँध लिया गीतों ने घुँघरू जब पाँव में


सोने की मछरिया..


सोने की मछरिया है,
रेशम का जाल है
अंधों की नगरिया में,
रोशनी का ताल है
आदमी मछेरा बना पूछता सवाल है

चंद मुट्ठियों में ये बहारें कैद हैं
आँसूओं में डूबते नजारे कैद हैं
शांति के कपोत हैं पंख हैं कहाँ
चाँद कैद है यहाँ सितारे कैद हैं 
किसने नेकी कर दिया दरिया में डाल है

आश्वासन के ताड़वृक्ष के भार से
टपकेंगे अक्षर भाषण के धार से
फसलें खनकेंगी मौसम लहरायेगा
प्रजातंत्र में दिन ऐसा कब आयेगा
सही दाम राशन क्या मिले मजाल है

जंगल में भटकेंगी जब सूरज की किरणें
चांदनी  मुट्ठी  भर भर  बाँटी  जायेगी
जुल्म करेंगे अक्षर जब अपने पृष्ठों पर
सच कहता हूँ मुझको नींद न आयेगी
यहाँ वायदों के बकरों का होता रोज हलाल है
आदमी मछेरा बना पूछता सवाल है


मीत नही बन पाया..


मेरे तृषित अधर अकुलाये
कोई गीत नही बन पाया
एक अकिंचन रूप न उभरा
कोई मीत नही बन पाया
छूकर छेड़ दिया है किसने
मन की इस पावन सरिता को
संबोधन सब टूट गये तो
कोई प्रीत नही बन पाया

एक चित्र अंकित करने का

आधार नही मिलता है
छंद अपरिचित रह जाते हैं
पर अधिकार नही मिलता है
किसने सींच दिया है फिर से
घर के इस सूने आँगन को
बहुत कथानक हार गये तो
कोई जीत नही बन पाया

साँझ अलसता की क्यारी में

सूरज को ढलते देखा है
अनजानी राहों पर किसने
दीपक को जलते देखा है
एक भ्रमर गुंजित कर जाता
है इस जीवन की बगिया को
सावन मुझसे रूठ गया तो
कोई रीत नही बन पाया

पुरवा पवन बही जब धीरे

महक उठी मन की अमराई
चातक स्वाति जल पाने की
रीत   गयी   सारी   गहराई
किसने  झकझोर  दिया  है
फिर से तन की व्याकुलता को
कारक कर्म सभी बन पाये
केवल मीत नही बन पाया


बादल जब-जब घिरने लगते हैं


स्मृति के नीले आँचल पर
दूर क्षितिज के पार कहीं
बादल जब जब घिरने लगते हैं
मन का मोर आस का लेकर समाधान
गलबहियाँ डाले नाच उठा करता है
पुखराजी आँचल के सपने
नयनों में तिरने लगते हैं

गुमनामी पत्रों-सी  लगती शाम
कहीं मत हो मौसम बदनाम
अधर के कंपित   कोलाहल
खींच दें कोई परिचित  नाम
सूरज के सारे रेखांकन
कोहिनूरी किरणें  बिखेरकर
बरगद की  शाखाओं   से
सहसा मुझको तकने लगते हैं

बादल जब-जब घिरने लगते हैं
एक मौन आख्यान उभर कर
चुपके-चुपके अंतस्थल पर
गुमसुम  हो लहरा जाता  है
तब  निर्जन पर मर्म व्यथाएँ
गुँजित  हो  खिलने लगतीं हैं
मन के  सारे अगणित  चिंतन
आहट पाकर किसी सपन का
संबोधन देने लगते हैं


हिंदुस्तान है कविता


कविता है एक मंजिल
बढ़ते  चले  चलो
उस  ठौर   पर  पहुँचो
तो गढ़ते चले चलो

कविता है आग,तोप और 
आतंक है कविता
कविता है युद्ध ,शांति और
डंक है कविता

कविता दिलों को जोड़ती
और तोड़ती कविता
कविता  कभी-कभी   तो
मुख मोड़ती कविता

कविता है लाड़-प्यार और
दुलार है कविता
कविता समय है सत्य है
साकार है कविता

कविता हृदय का प्यार है
श्रृंगार है कविता
कविता है  रागिनी  कोई
उपहार है कविता

कविता कली है फूल है
बहार है कविता
कविता है हार,यारऔर
संचार है कविता

कविता  है  धूप-छाँव
एक गाँव है कविता
बहती  हुई  नदी   है
एक नाव है कविता

कविता है गंध माटी की
श्रमदान है कविता
कविता किसान, खेत और
खलिहान है कविता

कविता है द्रास,कारगिल और
जवान है कविता
सचमुच हमारा देश
हिंदुस्तान है कविता


श्रीधर आचार्य "शील"


  • पिता का नाम--स्व.श्री लोकनाथ आचार्य
  • जन्मतिथि--3/8/1948 (बिलासपुर)
  • योग्यता-- एम.ए.(हिंदी साहित्य)
  • व्यवसाय--सेवानिवृत्त अध्यापक एवं स्वतंत्र लेखन
  • प्रकाशित कृति-काव्य-संग्रह "गीत को स्वर कौन देगा?'
  • सम्मान-राष्ट्रीय उद्योग और व्यापार मेला द्वारा "छत्तीसगढ़ रत्न", समन्वय साहित्य समिति द्वारा "समन्वय रत्न", "शब्दश्री सम्मान"
  • सम्पर्क-रामा रेसीडेन्सी ( B6/GF), तोरवा /मेन रोड,विनीत पेट्रोल पंप के पास, देवरीखुर्द , बिलासपुर (छत्तीसगढ़)-495004
  • मो.09977559161
  • ई-मेल-sdacharya03@gmail.com

बुधवार, 15 अगस्त 2018

पावस विशेष: राजेन्द्र वर्मा के गीत और दोहे


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


बारिश  का ढंग (गीत)


बारिश  का भी अजब ढंग है ।

मरुथल बूँद-बूँद को तरसे,
बादल सागर में ही बरसे,
धरा गगन को है निहारती,
जीवन का उड़ रहा रंग है ।

कहीं जलद ही नहीं दिखा है,
कहीं बाढ़ की विभीषिका है,
जाने कैसे दिन आये हैं,
दिनचर्या भी हुई तंग है ।

कोई समझाओ ‘इन्दर’ को,
सूरज, पवन और सागर को,
क्या थोड़ा-सा सुख न मिलेगा,
क्या दुख ही का साथ-संग है !


आसार नहीं..


धरती! धीरज धार, अभी तो 
बारिस के आसार नहीं हैं ।

अभी-अभी आषाढ़ लगा है,
और तुझे परिवाद हो रहा;
पावस का आगमन कहाँ हो,
इस पर वाद-विवाद हो रहा,
दान-दक्षिणा पाने वाले 
पानी के हक़दार नहीं हैं ।

बादल तो बादल, उनका क्या!
वे तो बस हाँके जाते हैं;
कहाँ-कहाँ बारिस होनी है,
पवन देवता बतलाते हैं;
देवलोक के सभी निवासी
करुणा के आगार नहीं हैं ।

क्षीरसिन्धु के रहने वाले
प्यास भला कैसे पहचानें ?
राजस धर्म निभाने वाले
सात्विक धर्म भला क्या जानें ?
धरती! तू कर्त्तव्य निभा, बस,
तेरे कुछ अधिकार नहीं हैं ।।


मुँह फेरे बैठे..


मुँह फेरे बैठे हैं देखो,
कब से हवा और ये बादल !

धूल-धूसरित वसुंधरा है,
कंठ-कंठ में शूल भरा है,
पानी के बिन जीवन सूना,
यौवन में आ गया जरा है,
कुंए-ताल सब रिक्त-रिक्त हैं,
अब तो बस, नयनों में है जल!

छाँव नीम की मरी-मरी है
नागफनी ही एक हरी है 
आकुल-व्याकुल बेड़ धान की 
ज़हरीली हो गयी चरी है 
माड़ा-चढ़ी आँख को लगता-
छाये बदरा, बरसेगा कल!

आये देव मनाने, आये  
भू पर लोट लगाने आये 
‘पानी दे, गुड़धानी दे” कह 
सोया इन्द्र जगाने आये, 
किन्तु धरा प्यासी-की-प्यासी 
अड़े हुए हैं मेघों के दल! 


आये बादल..


तप्त धरा की 
खोज-खबर लेने 
आये बादल ।

बाग़-बगीचे
हरे-भरे जंगल 
मुरझाये हैं,
ताल-तलैया
नद-नाले-पोखर 
पपड़ाये हैं,

कर्मयोग को
व्याख्यायित करने
छाये बादल ।

श्री-वर्षण को 
सजी हुई नभ में 
वृष्टि-पालकी,
आस लगाये
जड़-चेतन, दोनों-
सुधा-पान की,

बूँद-बूँद में 
अष्ट सिद्धि, नौ निधि
लाये बादल ।


रचा प्रकृति ने रास (दोहे)


राधा दामिनि, श्याम घन, वृन्दावन आकाश ।
श्री की वर्षा के लिए, रचा प्रकृति ने रास ।।

टप-टप-टप बूँदें पड़ीं, गर्मी पर प्रतिबन्ध ।
धरती से आने लगी, सोंधेपन की गन्ध ।।

पानी पीकर पेट-भर, धरती हुई निहाल ।
धीरे-धीरे छक गये, सारे पोखर-ताल ।।

रिमझिम-रिमझिम कर रही, पानी की बौछार ।
जैसे किसी अदृश्य का, बजने लगा सितार ।।

हरियाली से हो गया, मौसम का अनुबन्ध ।
दादुर बैठे बाँचते, अपने काव्य-प्रबन्ध ।।

पावस आता है तभी, बढ़ जाता जब ताप ।
मानो कहती हो प्रकृति, फल देता तप आप ।। 

जब-जब रसवर्षण करें, पृथ्वी पर सारंग ।
मन पुष्पित-पुष्पित लगे, पुलकित-पुलकित अंग ।।

मेघदूत आये मगर, बनकर पीर फ़कीर ।
लायी पुरवाई मुई, पोर-पोर में पीर ।।

मेघों का पा आवरण, सूरज हुआ प्रसन्न ।
देख सकेगा चन्द्र-मुख, रहते हुए प्रछन्न ।।

बूँद टँगी आकाश में, लिये इन्द्रधनु-रूप ।
कमलपत्र पर जब गिरी, मोती बनी अनूप ।।

बूँदा-बाँदी हो कभी, कभी मूसलाधार ।
कभी-कभी बौछार ही, देते लम्बरदार ।।

दोनों ही दुखदायिनी, अनावृष्टि-अतिवृष्टि ।
जीवन के हित चाहिए, एक संतुलित दृष्टि ।।


राजेन्द्र वर्मा 


  • जन्म-8-11-1957 (बाराबंकी, उ.प्र.)
  • प्रकाशन-प्रसारण-गीत,  ग़ज़ल, दोहा, हाइकु, कहानी, लघुकथा, व्यंग्य, निबन्ध आदि 
  • विधाओं में बीस पुस्तकें प्रकाशित । महत्वपूर्ण संकलनों में सम्मिलित । 
  • विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ एवं समीक्षाएँ प्रकाशित ।
  • लखनऊ दूरदर्शन तथा आकाशवाणी से रचनाएँ प्रसारित ।
  • पुरस्कार-सम्मान-उ.प्र.हिन्दी संस्थान के व्यंग्य व निबन्ध-नामित पुरस्कारों सहित देश की अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित । 
  • अन्य-लखनऊ विश्वविद्यालय द्वारा रचनाकार पर एम्.फिल । अनेक शोधग्रन्थों में संदर्भित । कुछ लघुकथाओं और ग़ज़लों का पंजाबी में अनुवाद । चुनी हुई कविताओं का अँगरेज़ी में अनुवाद ।
  • सम्प्रति-भारतीय स्टेट बैंक में मुख्य प्रबन्धक के पद से सेवानिवृत्ति के बाद स्वतन्त्र लेखन। 
  • सम्पर्क-3/29 विकास नगर, लखनऊ (उ.प्र.)-226022  
  • मो. 80096 60096
  • ई-मेल: rajendrapverma@gmail.com

पुस्तक-समीक्षा:अंक में आकाश : मिसरी और कुनैन-सी ग़ज़लें-डॉ. कौशलेन्द्र पाण्डेय




           कविता, कहानी, निबन्ध, व्यंग्य आदिक विधाओं के बहुविश्रुत रचनाधर्मी श्री राजेन्द्र वर्मा की सद्यः प्रकाशित कृति, ‘अंक में आकाश’ मेरे सम्मुख है, जिसमें उनकी सौ ग़ज़लें हैं। ‘निवेदन’ शीर्षकीय चौबीस पृष्ठीय पुरोवाक् ग़ज़ल विधा के सर्वांगीण परिचय को समर्पित है, जिसमें उर्दू ग़ज़ल बनाम हिंदी ग़ज़ल, हिंदी ग़ज़ल का उद्भव एवं विकास, ग़ज़ल का शिल्प प्रभृति उपशीर्षकों के अंतर्गत कृतिकार ने भाषा के आधार पर ग़ज़लों के विभाजन को उचित नहीं माना है। उसके अनुसार, उर्दू ग़ज़ल और हिंदी ग़ज़ल विषयवस्तु, भाषा-शैली व बिम्ब-प्रतीकादि की दृष्टि से ही भिन्न होती हैं, जिसके मूल में रचनाकार का सांस्कृतिक धरातल रहा है या, फिर रचना की तत्सम शब्दावली। राजेंद्र वर्मा जी ने कृति में अन्तर्निहित प्रत्येक रचना के छन्द का प्रकार, उसकी समाप्ति पर अंकित किया है। मुख्यतः ये हैं— विधाता छन्द, गीतिका, मनोरम, पीयूषवर्ष, सुमेरु, भुजंगप्रयात, राधा, भुजंगी, स्रग्विणी, कुंडल, अप्सरीविलसिता, मानव, मिलिन्द, दोहा, ताटंक, वासन्ती, हरगीतिका, खफ़ीफ, मुजारे-अखरब आदि। 

क्रमांक– दो पर माँ पर आधारित ग़ज़ल से पाठक बहुत-बहुत मुतास्सिर होंगे। माँ के लिए यह कतई ज़रूरी नहीं कि नाक-नक्श और रंग से उसका पुत्र लुभावना हो। अति-सामान्य और कभी-कभी विद्रूप मुखादि का पुत्र भी उसके लिए सर्वस्व होता है..

भले ही खूबसूरत हो नहीं बेटा, पर उसकी माँ 
बुरी नज़रों से बचने को उसे टीका लगाती है। (पृ. 30)
    xx xx
ये माँ ही है, जो रह जाती है बस दो टूक रोटी पर,
             मगर बच्चों को अपने पेट-भर रोटी खिलाती है।      (पृ. वही)

         बावज़ूद इसके, वक़्त की बदनीयती जीवन के उत्तरार्द्ध में अक्सर अपना खेल खेल जाती है— जिसके प्रति वह ममता लुटाती रही, अपने सुखों की तिलांजलि दे कर्तव्यपरायण रही, वही बेगाना हो गया..

रहे जब से नहीं पापा, हुई माँ नौकरानी-सी, 
             सभी की आँख से बचकर वो चुप आँसू बहाती है।  (पृ. वही)

यह असंभव नहीं कि उपर्युक्त पंक्तियों के अवगाहन के उपरान्त कोई भी जन्मदात्री स्वयं से प्रश्न कर बैठे.. ‘मातृधर्म का निष्पादन क्या उसकी भूल थी? यह प्रश्न भले ही अनुत्तरित रहे, लेकिन पुत्र और उसके आत्मजों के सम्बन्ध शायद बद से बदतर होते जायेंगे। इस दुरवस्था का पूर्वाभास प्रखर चिन्तक, राजेन्द्र वर्मा ने किया है..

अब समय आया है ऐसा राम ही रक्षा करें,
वृद्ध माता औ’ पिता से पुत्र वन्दित हो गये। (पृ. 31)

          अनेकानेक अनेपक्षित स्थितियाँ तो अति-विशिष्ट वर्ग की ही देन हैं। पृष्ठ 39 पर गीतिका छन्द की रचना ऐसे ही वर्ग को संबोधित है जो दिमाग़दारी के बल पर सुख-सुविधाओं को क़ब्ज़ाये बैठा है, जबकि उन्हें समाजोपयोगी बनाना अहंपूरित समाज ही का दायित्व है। राजेंद्र जी कहते हैं..

धन हमारा है मगर क़ब्ज़ा किये बैठे हैं आप, 
फिर हमीं को दान दे बनते हैं दानी किसलिए? (पृ. 39)

       विसंगति के अनेक व्यंग्य चित्र खींचते हुए राजेंद्र जी आम आदमी को आचार संहिता सुलभ कराते हुए कहते है..

सच है नौकरियाँ नहीं हैं, पर पढ़ाई तो करें,
कुछ-न-कुछ होगा ही हासिल, आप मानें तो सही। (पृ. 41)
इसी ग़ज़ल में वे सांग रूपक के माध्यम से स्वार्थी वर्ग के चरित्र पर चुटकी लेते हैं..
वर्करों से मुँह छुपाते फिर रहे हैं लीडरान,
लीडरी ही खा गयी मिल, आप मानें तो सही। (पृ. वही)
xx xx
साल ही बीता अभी है नौकरी पाये हुए,
ऋण के सब खाते हुए निल, आप मानें, तो सही। (पृ. वही)

        कन्या भ्रूण-हत्या के विरुद्ध उनकी गहन संवेदनायुक्त अभिव्यक्ति द्रष्टव्य है..

जब से आयी रिपोर्ट, है बेटी,
अपनी माँ से वो डरी-डरी क्यों है? (पृ.62)

       उनकी रचनाशीलता के प्रमाणस्वरूप कुछ शे’र यहाँ दिया जाना आवश्यक प्रतीत होता है..

बहुत हो चुका अब हम अपनी करेंगे,
लड़ेंगे-भिड़ेंगे, मगर इक रहेंगे।

कभी फूल बनकर चमन में खिलेंगे,
कभी हम गगन के सितारे बनेंगे।
xx xx
कटोरा लिए क्यों फिरें आप दर-दर,
हमें काम दें, नवप्रगति हम करेंगे। (पृ.63)

         राजेन्द्र जी ने अपने अंतर्मन की मंजूषा के बिखरे स्नेहिल प्रकरणों को भी नितांत साहित्यिक अभिव्यक्ति दी है..

तुमने क्या दर्पण से वार्तालाप किया? / बात-बात में जो इतना शर्माती हो! 
रहने को रह लो तुम सबकी वांछा में / लेकिन तुम मेरे जीवन की थाती हो। 
मेरा मन-सिंहासन तुमसे सज्जित है / क्या तुम भी मुझको अन्तस् में पाती हो? (पृ. 112) 

        इसी क्रम में एक और ग़ज़ल के कुछ अशआर भी मौजूं हैं..

तुझको देखा तो ऐसा लगा / मिल गया कोई मुझको सगा।
तेरे सौन्दर्य की क्या कहूँ / रह गया मैं ठगा-का-ठगा! 
साँझ लायी तेरी ख़ुशबुएँ / ख़ुशबुएँ दे गयीं रतजगा।। (पृ.110)

‘अंक में आकाश’ शतशः दृश्यमान् ग़ज़ल की कृतियों में न केवल प्रथम पांक्तेय है, मेरे मत से यह उसमें भी प्रथम क्रम की है। समाज को दृष्टि देने के साथ-साथ गज़लगोई की कला में नवप्रवेशी तो इससे ग़ज़लों में छन्द (बहर), तुकान्त (क़ाफ़िया) और समान्त (रदीफ़) आदि के अतिरिक्त कथ्य को जीवंत रूप में कैसे साधते हैं, सीख सकते हैं। बहुविधा रचनाकार राजेन्द्र वर्मा कलाजीवी है। ऐसे व्यक्तित्व कालजयी कीर्ति के अधिकारी होते हैं।

  • समीक्षित कृति-पुस्तक-अंक में आकाश (ग़ज़ल-संग्रह)/ ग़ज़लकार- राजेन्द्र वर्मा/ प्रकाशक-अयन प्रकाशन, महरौली, नयी दिल्ली/ संस्करण- प्रथम-2016/ पृष्ठ-128/ मूल्य– रु.250/- (सजिल्द)

समीक्षक-डॉ. कौशलेन्द्र पाण्डेय 


130, मारुतिपुरम्, 
लखनऊ- 226 016
मो.9236227999