कमला कृति

मंगलवार, 16 अप्रैल 2019

संजीव वर्मा 'सलिल' की रचनाएँ


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


जोड़-तोड़ है मुई सियासत (नवगीत)


मेरा गलत
सही है मानो।
अपना सही
गलत अनुमानो।
सत्ता पाकर, 
कर लफ्फाजी-
काम न हो तो
मत पहचानो।
मैं शत गुना 
खर्च कर पाऊँ
इसीलिए तुम
करो किफायत

मैं दो दूनी
तीन कहूँ तो
तुम दो दूनी
पाँच बताना।
मैं तुमको
झूठा बोलूँगा
तुम मुझको 
झूठा बतलाना।
लोकतंत्र में
लगा पलीता
संविधान से
करें बगावत

यह ले उछली
तेरी पगड़ी।
झट उछाल तू
मेरी पगड़ी।
भत्ता बढ़वा, 
टैक्स बढ़ा दें
लड़ें जातियाँ
अगड़ी-पिछड़ी।
पा न सके सुख
आम आदमी, 
लात लगाकर
कहें इनायत।

प्रजातंत्र का अर्थ हो गया (नवगीत)


संविधान कर प्रावधान
जो देता, लेता छीन
सर्वशक्ति संपन्न लोग हैं
केवल बेबस-दीन

नाग-साँप-बिच्छू चुनाव लड़
बाँट-फूट डालें
विजयी हों, मिल जन-धन लूटें
माल लूट खा लें 
लोकतंत्र का पोस्टर करती
राजनीति बदरंग
प्रजातंत्र का अर्थ हो गया
केर-बेर का संग

आश्वासन दें, जीतें जाते 
जुमला कह झट भूल
कहें गरीबी पर गरीब को
मिटा, करें निर्मूल
खुद की मूरत लगा पहनते,
पहनाते खुद हार
लूट-खसोट करें व्यापारी
अधिकारी बटमार
भीख माँग, पा पुरस्कार
लौटा करते हुड़दंग
प्रजातंत्र का अर्थ हो गया
केर-बेर का संग

गौरक्षा का नाम, स्वार्थ ही
साध रहे हैं खूब
कब्ज़ा शिक्षा-संस्थान पर
कर शराब में डूब
दुश्मन के झंडे लहराते
दें सेना को दोष
बिन मेहनत पा सकें न रोटी
तब आएगा होश
जनगण जागे, गलत दिखे जो
करे उसी से जंग
प्रजातंत्र का अर्थ हो गया
केर-बेर का संग

ठेंगे पर कानून..


मलिका - राजकुँवर कहते हैं
ठेंगे पर कानून 
संसद ठप कर लोकतंत्र का
हाय! कर रहे खून

जनगण - मन ने जिन्हें चुना

उनको न करें स्वीकार
कैसी सहनशीलता इनकी?
जनता दे दुत्कार
न्यायालय पर अविश्वास कर
बढ़ा रहे तकरार
चाह यही है सजा रहे
कैसे भी हो दरबार
जिसने चुना, न चिंता उसकी
जो भूखा दो जून
मलिका - राजकुँवर कहते हैं
ठेंगे पर कानून
संसद ठप कर लोकतंत्र का
हाय! कर रहे खून

सरहद पर ही नहीं

सडक पर भी फैला आतंक
ले चरखे की आड़
सँपोले मार रहे हैं डंक
जूते उठवाते औरों से
फिर भी हैं निश्शंक
भरें तिजोरी निज,जमाई की
करें देश को रंक
स्वार्थों की भट्टी में पल - पल
रहे लोक को भून
मलिका - राजकुँवर कहते हैं
ठेंगे पर कानून
संसद ठप कर लोकतंत्र का
हाय! कर रहे खून

परदेशी से करें प्रार्थना

आ, बदलो सरकार
नेताजी को बिना मौत ही
दें कागज़ पर मार
संविधान को मान द्रौपदी
चाहें चीर उतार
दु:शासन - दुर्योधन की फिर
हो अंधी सरकार
मृग मरीचिका में जीते
जैसे इन बिन सब सून
मलिका - राजकुँवर कहते हैं
ठेंगे पर कानून
संसद ठप कर लोकतंत्र का
हाय! कर रहे खून

जिक्र नोटा का हुआ तो.. (मुक्तिका)


अभावों का सूर्य, मौसम लापता बरसात का।
प्रभातों पर लगा पहरा अंधकारी रात का।।

वास्तव में श्री लिए जो वे न रह पाए सुबोध 
समय जाने कब कहेगा दर्द इस संत्रास का।।

जिक्र नोटा का हुआ तो नोटवाले डर गए
संकुचित मजबूत सीने विषय है परिहास का।।

लोकतंत्री निजामत का राजसी देखो मिजाज
हार से डर कर बदलता हाय डेरा खास का।।

सांत्वना है 'सलिल' इतनी लोग सच सुन सनझते
मुखौटा हर एक नेता है चुनावी मास का।।

राजनीति है बेरहम..(दोहे) 


अपराधी हो यदि खड़ा, मत करिए स्वीकार।
नोटा बटन दबाइए, खुद करिए उपचार।।

जन भूखा प्रतिनिधि करे, जन के धन पर मौज।
मतदाता की शक्ति है, नोटा मत की फौज।।

नेता बात न सुन रहा, शासन देता कष्ट।
नोटा ले संघर्ष कर, बाधा करिए नष्ट।

राजनीति है बेरहम, सगा न कोई गैर 
कुर्सी जिसके हाथ में, मात्र उसी की खैर 

कुर्सी पर काबिज़ हुए, चेन्नम्मा के खास 
चारों खाने चित हुए, अम्मा जी के दास 

दोहा देहरादून में, मिला मचाता धूम
जितने मतदाता बने, सब है अफलातून

वाह वाह क्या बात है?, केर-बेर का संग 
खाट नहीं बाकी बची, हुई साइकिल तंग

आया भाषणवीर है, छाया भाषणवीर 
किसी काम का है नहीं, छोड़े भाषण-तीर

मत मत का सौदा करो, मत हो मत नीलाम
कीमत मत की समझ लो, तभी बनेगा काम

एक मरा दूजा बना, तीजा था तैयार 
जेल हुई चौथा बढ़ा, दो कुर्सी-गल हार

गाँधी जी के नाम पर, नकली गाँधी-भक्त 
चित्र छाप पल-पल रहे, सत्ता में अनुरक्त 

लालू के लल्ला रहें, भले मैट्रिक फेल 
मंत्री बन डालें 'सलिल', शासन-नाक नकेल 

ममता की समता करे, किसमें है सामर्थ?
कौन कर सकेगा 'सलिल', पल-पल अर्थ-अनर्थ??

बाप बाप पर पुत्र है, चतुर बाप का बाप 
धूल चटाकर चचा को, मुस्काता है आप 

साइकिल-पंजा मिल हुआ, केर-बेर का संग 
संग कमल-हाथी मिलें, तभी जमेगा रंग 

त्रिपदिक छंद हाइकु

(विधा: गीत)


लोकतंत्र का / निकट महापर्व / हावी है तंत्र

मूक है लोक / मुखर राजनीति / यही है शोक
पूछे पलाश / जनता क्यों हताश / कहाँ आलोक?
सत्ता की चाह / पाले हरेक नेता / दलों का यंत्र

योगी बेहाल / साइकिल है पंचर / हाथी बेकार
होता बबाल / बुझी है लालटेन / हँसिया फरार
रहता साथ / गरीबों के न हाथ / कैसा षड़्यंत्र?

दलों को भूलो / अपराधी हराओ / न हो निराश
जनसेवी ही / जनप्रतिनिधि हो / छुए आकाश
ईमानदारी/ श्रम सफलता का / असली मंत्र

कुण्डलिया 


राजनीति आध्यात्म की, चेरी करें न दूर 
हुई दूर तो देश पर  राज करेंगे सूर
राज करेंगे सूर, लड़ेंगे हम आपस में 
सृजन छोड़ आनंद गहेँगे, निंदा रस में 
देरी करें न और, वरें राह परमात्म की 
चेरी करें न दूर, राजनीति आध्यात्म की


आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल


विश्ववाणी हिंदी संस्थान,
204, विजय अपार्टमेंट, 
नेपियर टाउन, जबलपुर-482001
मोबाइल: 9425183244 
ई-मेल: salil.sanjiv@gmail.com

8 टिप्‍पणियां:

  1. ब्लॉग बुलेटिन टीम और मेरी ओर से आप सब को हनुमान जयंती की हार्दिक मंगलकामनाएँ !!

    ब्लॉग बुलेटिन की दिनांक 19/04/2019 की बुलेटिन, " हनुमान जयंती की हार्दिक मंगलकामनाएँ - ब्लॉग बुलेटिन “ , में आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  2. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (21-04-2019)"सज गई अमराईंयां" (चर्चा अंक-3312) को पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    आप भी सादर आमंत्रित है
    - अनीता सैनी

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  3. बहुत सुन्दर सलिल जी. संविधान, लोकतंत्र और जन-भावनाओं पर नित्य ही हो रहे कुठाराघात का आपने निर्भीकता से खुलासा किया है. भगवान् आपको आक़ा के कोप-प्रकोप से बचाए रखे !

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  4. वाह क्या रचनायें है ,बहुत बढ़िया

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