कमला कृति

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बुधवार, 19 फ़रवरी 2020

पुस्तक समीक्षा : दफ़न हुए शिलालेख



            
            यूँ तो इन्द्रधनुष सात रंगों का होता है, पर किसी भी ज़िंदगी में सिर्फ इतने ही रंग नहीं होते…। जीवन के अलग अलग रंगों को अपनी तेरह कहानियों में पिरो कर श्री हरभजन सिंह मेहरोत्रा ने ‘दफ़न हुए शिलालेख’ शीर्षक अपने कथा-संग्रह में पाठकों के सम्मुख रखा है । इस संग्रह की हर कहानी अपने एक नए कथानक, नए कलेवर में जब सामने आती है तो पाठकों को कुछ इस कदर बाँध लेती है कि अगली कहानी पढने की इच्छा खुद-ब-खुद जाग जाती है । चाहे वो ‘आज एक भेड़िया मारेंगे’ में एक इंसान के अन्दर विपरीत परिस्थितियों में भी बची इंसानियत हो, या फिर ‘जवाबदेह’ कहानी में मानसिक रूप से अक्षम माँ और एक निम्न मध्यमवर्गीय परिवार की परेशानियों में घिरे बेटे के बीच के रिश्ते की कहानी है। कहानी में नायक का सोचना- इससे अच्छा कि माँ मर जाए-किसी भी संवेदनशील इंसान को अन्दर तक झकझोर देता है ।

            मेरी दृष्टि में इस संग्रह की सबसे अनूठी कहानी बिलकुल आखिर में दी गई ‘माँ को क्या हो गया है’ शीर्षक कहानी है । किसी लेखक को इंसान के नज़रिए से रिश्तों को परखते-समझते तो हमने बहुत बार देखा है, पर इस कहानी को पढ़ने के बाद हरभजन जी की कल्पनाशीलता और अपने आसपास के परिवेश का सूक्ष्म विश्लेषण कर पाने की क्षमता की दाद देनी पड़ती है । एक नन्हा चितकबरा पिल्ला किस प्रकार अपनी माँ द्वारा पहले के मुकाबले कम प्यार किये जाने से न केवल आहत और दुविधाग्रस्त महसूस करता है, बल्कि सामने के घर में रहने वाली लाल कपड़ों वाली लड़की से उसके जुड़ाव को भी लेखक ने एक पिल्ले के मनोभावों के माध्यम से ही बड़ी खूबसूरती से दर्शाया है ।
             इन कहानियों के अलावा अपने अनोखे कथानक और परिवेश के कारण जो दो कहानियाँ पाठकों के मानस-पटल पर शर्तिया अपनी छाप छोड़ेंगी, वो हैं ‘जिजीविषा’ और ‘मदारी’ , ‘जिजीविषा’ कहानी में जिस तरह एक पनडुब्बी के अन्दर अपनी मौत का इंतज़ार कर रहे पाँच लोगों की मनोदशा का एकदम सटीक और गहन वर्णन किया गया है, उससे हर पाठक खुद को भी उन्हीं का एक हिस्सा मान कर उनकी उस पीड़ा से बहुत गहरे तक जुड़ जाएगा । ‘मदारी’ कहानी एक बहुत ही अनोखे थीम पर रची गई कथा है । लेखक की फैक्ट्री में एक दुर्घटना अवश्यंभावी है और समय रहते उसे टालने का सिर्फ एक उपाय उनको नज़र आता है कि अपने पूर्व-परिचित एक मदारी अल्लन की सहायता से उस दुर्घटना को टाला जाए ।
          बेहद सधे ढंग से लिखी गई यह कहानी वैसे तो पाठकों के अन्दर आगे के घटनाक्रम के प्रति एक सहज उत्सुकता बनाए रखती है, परन्तु कई जगह कुछ तकनीकी वर्णन पाठको को कहानी से थोड़ा अलग भी कर सकता है । चूँकि कहानी का ताना-बाना इस तरह का है और लेखक खुद अभियांत्रिकी विभाग से सम्बद्ध हैं, इसलिए इस तरह के वर्णन को हम कहानी की ज़रूरत के हिसाब से सहज रूप से पिरोया हुआ भी कह सकते हैं । ‘हाशिए’ शीर्षक कहानी आत्मकथात्मक है। यह कहानी लेखक की निजी ज़िंदगी के बहुत करीब कही जा सकती है | कथा संग्रह की शीर्षक कथा ‘दफ़न हुए शिलालेख’ बाप बेटे के संबंधों को एक अलग नज़रिये से प्रस्तुत करती हुई बहुत सशक्त कहानी है। हाँ, मेरे हिसाब से अगर इस कहानी का शीर्षक-चल खुसरो घर आपने- होता तो शायद ज़्यादा सटीक बैठता ।
           कहानी के हिसाब से अगर शीर्षक की सटीकता की बात करें तो इस श्रेणी में मैं ‘अपंग’ शीर्षक कहानी को रखूँगी । हमारी संवेदनाएँ किस कदर अपंग हो चुकी हैं, इसको जिस तरह से इस कहानी में बयान किया गया है, वह हरभजन जी की लेखनी की मजबूती ही दर्शाता है । बस एक कमी जो इस कहानी में खटकती है वह है- कहीं कहीं इसके वाक्यों का बहुत लंबा हो जाना । इस तरह के वाक्य पाठकों की एकाग्रता भंग करके कहानी को कभी कभी बोझिल भी कर देते हैं । इन कहानियों के अलावा संग्रह की बाकी कहानियाँ जैसे कि- अधूरी प्रेम कहानी, अनुत्तरित, चक्रव्यूह और मृगतृष्णा अपने अपने स्तर पर विभिन्न विषयों का निर्वाह तो करती हैं, पर मेरे हिसाब से उन्हें सामान्य कहानियों की श्रेणी में रखा जा सकता है | कुल मिला कर हरभजन सिंह मेहरोत्रा का यह कथा संग्रह अपने पास संजो कर रखा जाने वाला एक संग्रह कहा जा सकता है, जो निःसंदेह पाठकों की कसौटी पर खरा उतरेगा।


दफ़न हुए शिलालेख (कहानी संग्रह)/ लेखक- हरभजन सिंह मेहरोत्रा/ प्रकाशक- अमन प्रकाशन/मूल्य- रु. 140/= मात्र

समीक्षक-प्रियंका गुप्ता


मंगलवार, 16 अप्रैल 2019

पुस्तक समीक्षा: शब्दहीन का बेमिसाल सफर-गोपाल शर्मा




‘संपादकीयम्’ पुस्तक में संकलित  और ‘डेली हिंदी मिलाप’ में पूर्व प्रकाशित विभिन्न  सामयिक विषयों पर  डॉ. ऋषभदेव शर्मा द्वारा लिखे गए ‘संपादकीय’  हिंदी पत्रकारिता के क्षेत्र में पदार्पण करने के इच्छुक और अनुभवी दोनों प्रकार के पत्रकारों के लिए समान रूप से पठनीय हैं, क्योंकि इनमें आदर्श संपादकीय के सभी गुण हैं। विषय-चयन और शीर्षक के चुनाव से लेकर वर्णन की सहज शैली से होते हुए उनके समापन संदर्भ तक लेखनी का गतिशील रहना पाठक को अनायास ही बाँधता चला जाता है।

संपादकीय–शीर्षकों पर नजर दौड़ाते ही ठहर जाती है। कहीं प्रश्न हैं- अब किसके पिता की बारी है? कहीं विस्मययुक्त प्रश्न- सबका अन्नदाता हड़ताल पर है !? कहीं कविता के शिल्प में- जलाओ पटाखे पर रहे ध्यान इतना; और कहीं लोक और लोकवाणी सिंचित- ऊपरवाला देख रहा है! और फिर आता है- लीड वाक्य। संपादकीय वह उत्तम माना जाता है जिसमें पाठक को बेकार में ही वर्णन-विवरण  की हवाई पट्टी पर न दौड़ना पड़े। उसकी उड़ान  हैलीकॉप्टर सी बुलंद और उत्तुंग हो। इस निगाह से ये संपादकीय प्रिंट-मीडिया के पहले पाठ को आत्मसात करके लिखे गए लगते हैं। पहला वाक्य सब कुछ तो कहता ही है, और कुछ पढ़ने की ललक भी जगाता है। एक उदाहरण है - ‘मी टू अभियान के तहत मनोरंजन उद्योग, मीडिया, राजनीति, शिक्षा जगत और अध्यात्म की दुनिया तक से महिलाओं के यौन उत्पीड़न की घटनाओं के खुलासों से आम लोग सहमे हुए हैं।’

इसी प्रकार संपादकीय का समापन वाक्य चिंतन का समाहार उपसंहार की तरह करता है और पाठक को वांछित ‘फूड फॉर थॉट’ देता चलता है- ‘जब तक व्यवस्था की ओर से यह संदेश आपराधिक तत्वों तक नहीं जाएगा, तब तक वे भीड़ का  मुखौटा लगाकर इसी तरह उपद्रव मचाते रहेंगे , हत्याएँ करते रहेंगे और हर बार किसी बेटे को यह पूछना ही पड़ेगा कि- अब किसके पिता की बारी है?’

लेखन में शब्दों की धार यूँ तो सहजता को निभाती चली है, किंतु मार्मिक स्थलों पर धार नुकीली भी हो जाती है – धनुष की टंकार हो जाती है। ‘समानता और पूजा-पद्धति के अधिकारों का टकराव’ और ‘परंपरा के नाम पर भेदभाव कब तक’  में लेखक धर्म और उपासना जैसे नाजुक मसलों पर क्षुब्ध होकर कहता है- “यदि प्रभु के  राज्य में भी असमानता-पूर्ण नियम लागू हैं तो या तो वह राज्य प्रभु का नहीं (पुजारियों का है), या फिर वह नियम प्रभु का नहीं  (दरबानों का है)।”

अपने वक्तव्यों को धार देने के लिए और उपसंहार करने के लिए कई बार  लेखक  के मन में उकड़ू बैठने को मजबूर सा हो गया कवि तेवरी चढ़ाकर काव्य पंक्तियाँ  उधार भी लेता है – वैभव की दीवानी दिल्ली – और कभी थोड़ा बदलकर – जलाओ पटाखे पर रहे ध्यान इतना – बोलता है; और कभी फिलहाली बयान करने के लिए कह उठता है- भीड़ पर तलवार हैं, खंजर गुलेले हैं। कल्लो क्या कल्लोगे ? है तो है।  चुटकी ली जाए तो चुटकी लगे और चूँटी काटी जाए तो वही लगे। ऐसे अवसर भी  रंदे पर घिसे गए, पर पेशे खिदमत रहे हैं- ‘खूब नाच-गाना हो, शराबे  बहें, उपहार लिए-दिए जाएँ, उन्माद की वर्षा हो, वशीकरण के लिए यह जरूरी है । बार में भी, और चुनाव में भी।’

 कहा जाता है कि अखबारी दुनिया से जुड़ने के बाद भाव, भाषा, भंगिमा और भूमिका को नए सिरे से साधना पड़ता है और लोगों को बहुत उठना-गिरना पड़ता है। वे और होंगे शोर-ए-तलातुम में खो जाने वाले! ‘संपादकीयम्’ में ‘कोरे कागद’ कारे भर नहीं किए गए हैं, बल्कि एक युगधर्म का पालन भी किया गया है। इसलिए ‘भव’ साधना संभव हुआ है। लगता है, यह खेल खेल में ही हो  गया है; और जो हुआ वो ग्रेट  है। तोप मुक़ाबिल हो तो अखबार निकालने के दिन अब नहीं रहे, पर तरवार की धार पर दौड़ने वाले दीवानों को कोई  ‘रवि’ तभी प्रकाशित कर सकता है, जब कलम में कमाल हो और उसकी  श्री वास्तव  में हो!

‘संपादकीयम्’ के इस पाठ को लिखने से किसी पत्रकारिता महाविद्यालय में  फीस भरे बिना मुझे  पहला पाठ मिल  गया। इसका शुक्रगुजार होना बनता है। यह भी मेरा फर्ज़ बनता है कि नाई की ताईं आपको बुलावा दे दूँ, ‘परिलेख प्रकाशन, नजीबाबाद’ से प्रकाशित इस मोर-पंखी पुस्तक के साथ फ़र्स्ट  डेट पर जरूर-बेजरूर  जाना । दूसरी-तीसरी किताब की प्रतीक्षा न करना; वे पाइप-लाइन में हैं।

  • समीक्षित कृति : संपादकीयम् (लेख/ पत्रकारिता)/ लेखक- ऋषभदेव शर्मा/ आईएसबीएन: 97893-84068-790/ प्रकाशक- परिलेख, नजीबाबाद/ वितरक- श्रीसाहिती प्रकाशन, हैदराबाद।

गोपाल शर्मा

प्रोफेसर, 
अंग्रेजी विभाग, 
अरबा मींच विश्वविद्यालय, 
अरबा मींच, इथियोपिया।
ई-मेल:prof.gopalsharma@gmail.com  

रविवार, 21 अक्टूबर 2018

पुस्तक समीक्षा: कंगाल होता जनतंत्र–एम.एम.चन्द्रा




मेरे हसीन बचपन में कोई नयापन नहीं आता..


‘कंगाल होता जनतंत्र’ अनिल कुमार शर्मा का पहला काव्य संग्रह है. यह संग्रह पिछले दो दशकों के आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्र का एक ऐसा दस्तावेज़ है जिसने न सिर्फ लेखक की चेतना का ही निर्माण किया बल्कि आम जनमानस की चेतना की निर्माण प्रकिया को आसानी से समझने का प्रयास किया. सन् 1993 से लेकर आज तक का हमारा समय वैचारिक विभ्रम, विघटन, उत्थान और पतन के दौर से गुजर रहा है. यह काव्य संग्रह मुझे ऐसे समय में पढ़ने को मिला जब नये रचनाकारों पर सवाल दर सवाल दागे जा रहे हैं. ऐसे समय में अनिल कुमार की रचनाएँ साहित्य जगत में बहुत सी संभावनाओं को जन्म देती हैं. ‘कली रहने दो’ एक लम्बी कविता है जिसमें ‘डर’ विभिन्न रूपों में हमारे सामने आता है और कहता है कि-

तुम मत उगो सूरज
तुम्हारे डूबने उगने से
मेरे हसीन बचपन में कोई नयापन नहीं आता

1992-93 के उस मंजर को अनिल ने बहुत ही गम्भीरता से महसूस किया है जब देश में अराजकता, साम्प्रदायिकता और धार्मिक उन्मांद आज की तरह ही अपनी चरम सीमा तक पहुँच गया था तब ऐसे समय में अनिल कुमार की कविताये अपने से संवाद करती हुई दिखाई देती है-  

ईश्वर होने का कितना बड़ा प्रपंच
धर्म की ज्वाला कितनी प्रचंड
रक्तपात होते हैं
अपने स्वकृत ईश्वर की स्थापना में
जो शाश्वत है
न विगत है
न आगत है
गढ़े मूल्यों की परिधि में
विवाद है
एकांगी सोच के नशे में
अब जागती हुई नींद आधी है

1990 के दशक में शुरू हुई भारत की विकास यात्रा भारत निर्माण, ग्लोबल विलेज, शाइनिंग इण्डिया इत्यादि मुहावरों की यथास्थिति 2010 आते-आते लेखक की नजरों में एकदम साफ़ हो जाती है. इसी का नतीजा है कि भूमंडलीकरण का सब्जबाग़ और उसकी नियति अब नये तरह की सभ्यता और संस्कृति को जन्म दे रही है जिससे कोई भी अछूता नहीं है-

भूमंडलीकरण के चंगुल में
बाजार का विस्तार होगा
खरीदने बेचने का व्यवहार होगा
यही सभ्यता और संस्कार होगा
भावनाओं का मोल-भाव होगा
बिकाऊ सद्भाव होगा
सारा विश्व एक गाँव होगा

भूमंडलीकरण से जहाँ एक तरफ देश की रहस्मय बीमारियों से लड़ने के लिए फाइफ स्टार जैसे अस्पताल भारतीय महानगरों की शोभा बढ़ा रहे हैं वहीं दूसरी तरफ गरीब लोग छोटी-छोटी बीमारियों में बगैर इलाज के मर रहे हैं. निजीकरण की आंधी ने बिमारियों को भी एक अच्छा धंधा बना दिया है-

क्लीनिक के आगे दो कतार है
एक में बीमार हैं
दूसरे में एम.आर. हैं
एक दवा खायेगा
दूसरा दवा खपायेगा

युवा रचनाकार के सामने सही मूल्यांकन का सवाल बहुत बड़ा होता है. सही साहित्य की समझ को बनाये रखने के लिए युवा रचनाकारों को सचेत करते हुए अनिल कुमार इशारा करते हैं कि आलोचना के सांचे बन चुके हैं उसके झांसे में आने से बचने की आवश्यकता है -

ये आलोचना तो सात अंधों की जुबान है
जो एक हाथी के जिस्म की कहानी है
समग्र खंडित है
बहुत बड़ा पंडित है

साधु-संतो के वेश में चोर, लुटेरे, बलात्कारी, अंधविश्वासी समाज में भरे हुए है. वे देश की भोली-भाली जनता को अपना जाल बिछा कर फंसाती है और जनता को मुर्ख बनाने के गोरखधंधे को देश के हर कोने में फैला रही है. वे अन्धविश्वासी, तार्किक परम्परा का गला घोटने के लिए नये तौर-तरीकों से पुराने मूल्यों को जबरदस्ती थोप रहे हैं-

अध्यात्मिक अलगाव की बुझे राख को...
पुराने मूल्यों के नाश्ते को
नई तकनीक की गोली से पचा रहे थे
और मीडिया संविधान की धाराओं में
बड़ी ही सुरक्षित गुफा तलाश रहा था
या यों कहें कि देश चला रहा था .

भारतीय जनतंत्र में भीड़ के द्वारा मोर्चा, अनशन, विरोध-प्रदर्शन एवं भूख हड़ताल जैसी कार्यवाही के पीछे नेताओं की हकीकत को अनिल कुमार की कविता बेनकाब ही नहीं करती बल्कि भारतीय जनतंत्र की खोखली हो रही जमीन को और भी खोदने की काम करती है. ‘कंगाल होता जनतंत्र’ भी बाकी कविताओं की तरह लम्बी कविता है जिसमें कंगाल होते भारतीय जनतंत्र को चिन्हित किया गया है-

विदेशी पूँजी से छलकते हुए
समृद्धि की हवाओं से
कंगाल होता जनतंत्र हूँ

लेखक भारतीय जनतंत्र पर प्रश्न चिन्ह लगाने का प्रयास ही नहीं करता बल्कि उसकी जर-जर होती सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक सच्चाइयों को सामने लाता है-

इस देश महान में खेत में खलिहान में
बाबा के संविधान में
सिद्धांत यह है कि समानता का अधिकार है
एक वैचारिक विकार है
सामान्य में कुछ विशेष है
विशेष में अति विशेष है
बाकी अवशेष है

मीडिया की भूमिका जनतंत्र में चौथे स्तम्भ के रूप में मानी जाती है लेकिन देशी-विदेशी पूँजी के गठजोड़ ने मीडिया के चरित्र को बदल दिया है. जहाँ मीडिया को जनपक्ष होना था वहीँ आज मीडिया सरकार की चाटुकारी करती नजर आती है. इस व्यवहार को लेखक ने अपनी कविता के रूप में इस प्रकार व्यक्त किया है-

यह मूल्यहीन अर्थव्यवस्था
डिब्बे बंद पूँजी तलाश रही है
उदारीकरण की वातानुकूलित हवा में खांस रही है
मीडिया उससे टपकते मधु को चाट रही है...
यह लोकतंत्र एक खिलौने की दुकान है...
सब मूल्य और तर्क तोड़ कर बाजार के लायक बना दो
जो बिक सके वही टिक सके
अब तो हद है कि न्यूज चैनलों में हो रहा दंगा है
अख़बार कैमरे की आँख से भी नंगा है...
तिकड़म तो बस यही है कि
जिसने लोकतंत्र कमा लिया
झोंपड़ी से महल बना लिया

भूखों, किसानों, मजदूरों के लिए भारतीय लोकतन्त्र के नारों के अनुभवों को अनिल कुमार ने खूब लताड़ा है. सड़ते हुए लोकतंत्र का विकल्प अनिल कुमार प्रस्तुत नहीं करते. वे सिर्फ कंगाल होते लोकतन्त्र की सामाजिक, राजनैतिक व आर्थिक ढांचे की सच्चाइयों को हमारे सामने प्रस्तुत करते हैं. उनकी कविताएँ दुखद अनुभव और पीडाओं से गुजरी हैं लेकिन इसके बावजूद अनिल कुमार शर्मा की उम्मीद अभी भी जिन्दा है क्योंकि ‘इन्कलाब अभी जिन्दा है’.

  • कंगाल होता जनतंत्र:अनिल कुमार शर्मा
  • विकल्प प्रकाशन | कीमत:300 रुपये 

बुधवार, 15 अगस्त 2018

पुस्तक-समीक्षा:अंक में आकाश : मिसरी और कुनैन-सी ग़ज़लें-डॉ. कौशलेन्द्र पाण्डेय




           कविता, कहानी, निबन्ध, व्यंग्य आदिक विधाओं के बहुविश्रुत रचनाधर्मी श्री राजेन्द्र वर्मा की सद्यः प्रकाशित कृति, ‘अंक में आकाश’ मेरे सम्मुख है, जिसमें उनकी सौ ग़ज़लें हैं। ‘निवेदन’ शीर्षकीय चौबीस पृष्ठीय पुरोवाक् ग़ज़ल विधा के सर्वांगीण परिचय को समर्पित है, जिसमें उर्दू ग़ज़ल बनाम हिंदी ग़ज़ल, हिंदी ग़ज़ल का उद्भव एवं विकास, ग़ज़ल का शिल्प प्रभृति उपशीर्षकों के अंतर्गत कृतिकार ने भाषा के आधार पर ग़ज़लों के विभाजन को उचित नहीं माना है। उसके अनुसार, उर्दू ग़ज़ल और हिंदी ग़ज़ल विषयवस्तु, भाषा-शैली व बिम्ब-प्रतीकादि की दृष्टि से ही भिन्न होती हैं, जिसके मूल में रचनाकार का सांस्कृतिक धरातल रहा है या, फिर रचना की तत्सम शब्दावली। राजेंद्र वर्मा जी ने कृति में अन्तर्निहित प्रत्येक रचना के छन्द का प्रकार, उसकी समाप्ति पर अंकित किया है। मुख्यतः ये हैं— विधाता छन्द, गीतिका, मनोरम, पीयूषवर्ष, सुमेरु, भुजंगप्रयात, राधा, भुजंगी, स्रग्विणी, कुंडल, अप्सरीविलसिता, मानव, मिलिन्द, दोहा, ताटंक, वासन्ती, हरगीतिका, खफ़ीफ, मुजारे-अखरब आदि। 

क्रमांक– दो पर माँ पर आधारित ग़ज़ल से पाठक बहुत-बहुत मुतास्सिर होंगे। माँ के लिए यह कतई ज़रूरी नहीं कि नाक-नक्श और रंग से उसका पुत्र लुभावना हो। अति-सामान्य और कभी-कभी विद्रूप मुखादि का पुत्र भी उसके लिए सर्वस्व होता है..

भले ही खूबसूरत हो नहीं बेटा, पर उसकी माँ 
बुरी नज़रों से बचने को उसे टीका लगाती है। (पृ. 30)
    xx xx
ये माँ ही है, जो रह जाती है बस दो टूक रोटी पर,
             मगर बच्चों को अपने पेट-भर रोटी खिलाती है।      (पृ. वही)

         बावज़ूद इसके, वक़्त की बदनीयती जीवन के उत्तरार्द्ध में अक्सर अपना खेल खेल जाती है— जिसके प्रति वह ममता लुटाती रही, अपने सुखों की तिलांजलि दे कर्तव्यपरायण रही, वही बेगाना हो गया..

रहे जब से नहीं पापा, हुई माँ नौकरानी-सी, 
             सभी की आँख से बचकर वो चुप आँसू बहाती है।  (पृ. वही)

यह असंभव नहीं कि उपर्युक्त पंक्तियों के अवगाहन के उपरान्त कोई भी जन्मदात्री स्वयं से प्रश्न कर बैठे.. ‘मातृधर्म का निष्पादन क्या उसकी भूल थी? यह प्रश्न भले ही अनुत्तरित रहे, लेकिन पुत्र और उसके आत्मजों के सम्बन्ध शायद बद से बदतर होते जायेंगे। इस दुरवस्था का पूर्वाभास प्रखर चिन्तक, राजेन्द्र वर्मा ने किया है..

अब समय आया है ऐसा राम ही रक्षा करें,
वृद्ध माता औ’ पिता से पुत्र वन्दित हो गये। (पृ. 31)

          अनेकानेक अनेपक्षित स्थितियाँ तो अति-विशिष्ट वर्ग की ही देन हैं। पृष्ठ 39 पर गीतिका छन्द की रचना ऐसे ही वर्ग को संबोधित है जो दिमाग़दारी के बल पर सुख-सुविधाओं को क़ब्ज़ाये बैठा है, जबकि उन्हें समाजोपयोगी बनाना अहंपूरित समाज ही का दायित्व है। राजेंद्र जी कहते हैं..

धन हमारा है मगर क़ब्ज़ा किये बैठे हैं आप, 
फिर हमीं को दान दे बनते हैं दानी किसलिए? (पृ. 39)

       विसंगति के अनेक व्यंग्य चित्र खींचते हुए राजेंद्र जी आम आदमी को आचार संहिता सुलभ कराते हुए कहते है..

सच है नौकरियाँ नहीं हैं, पर पढ़ाई तो करें,
कुछ-न-कुछ होगा ही हासिल, आप मानें तो सही। (पृ. 41)
इसी ग़ज़ल में वे सांग रूपक के माध्यम से स्वार्थी वर्ग के चरित्र पर चुटकी लेते हैं..
वर्करों से मुँह छुपाते फिर रहे हैं लीडरान,
लीडरी ही खा गयी मिल, आप मानें तो सही। (पृ. वही)
xx xx
साल ही बीता अभी है नौकरी पाये हुए,
ऋण के सब खाते हुए निल, आप मानें, तो सही। (पृ. वही)

        कन्या भ्रूण-हत्या के विरुद्ध उनकी गहन संवेदनायुक्त अभिव्यक्ति द्रष्टव्य है..

जब से आयी रिपोर्ट, है बेटी,
अपनी माँ से वो डरी-डरी क्यों है? (पृ.62)

       उनकी रचनाशीलता के प्रमाणस्वरूप कुछ शे’र यहाँ दिया जाना आवश्यक प्रतीत होता है..

बहुत हो चुका अब हम अपनी करेंगे,
लड़ेंगे-भिड़ेंगे, मगर इक रहेंगे।

कभी फूल बनकर चमन में खिलेंगे,
कभी हम गगन के सितारे बनेंगे।
xx xx
कटोरा लिए क्यों फिरें आप दर-दर,
हमें काम दें, नवप्रगति हम करेंगे। (पृ.63)

         राजेन्द्र जी ने अपने अंतर्मन की मंजूषा के बिखरे स्नेहिल प्रकरणों को भी नितांत साहित्यिक अभिव्यक्ति दी है..

तुमने क्या दर्पण से वार्तालाप किया? / बात-बात में जो इतना शर्माती हो! 
रहने को रह लो तुम सबकी वांछा में / लेकिन तुम मेरे जीवन की थाती हो। 
मेरा मन-सिंहासन तुमसे सज्जित है / क्या तुम भी मुझको अन्तस् में पाती हो? (पृ. 112) 

        इसी क्रम में एक और ग़ज़ल के कुछ अशआर भी मौजूं हैं..

तुझको देखा तो ऐसा लगा / मिल गया कोई मुझको सगा।
तेरे सौन्दर्य की क्या कहूँ / रह गया मैं ठगा-का-ठगा! 
साँझ लायी तेरी ख़ुशबुएँ / ख़ुशबुएँ दे गयीं रतजगा।। (पृ.110)

‘अंक में आकाश’ शतशः दृश्यमान् ग़ज़ल की कृतियों में न केवल प्रथम पांक्तेय है, मेरे मत से यह उसमें भी प्रथम क्रम की है। समाज को दृष्टि देने के साथ-साथ गज़लगोई की कला में नवप्रवेशी तो इससे ग़ज़लों में छन्द (बहर), तुकान्त (क़ाफ़िया) और समान्त (रदीफ़) आदि के अतिरिक्त कथ्य को जीवंत रूप में कैसे साधते हैं, सीख सकते हैं। बहुविधा रचनाकार राजेन्द्र वर्मा कलाजीवी है। ऐसे व्यक्तित्व कालजयी कीर्ति के अधिकारी होते हैं।

  • समीक्षित कृति-पुस्तक-अंक में आकाश (ग़ज़ल-संग्रह)/ ग़ज़लकार- राजेन्द्र वर्मा/ प्रकाशक-अयन प्रकाशन, महरौली, नयी दिल्ली/ संस्करण- प्रथम-2016/ पृष्ठ-128/ मूल्य– रु.250/- (सजिल्द)

समीक्षक-डॉ. कौशलेन्द्र पाण्डेय 


130, मारुतिपुरम्, 
लखनऊ- 226 016
मो.9236227999

बुधवार, 8 अगस्त 2018

पुस्तक समीक्षा-पेट और तोंद : एक वैचारिक व्यंग्य-संग्रह-राहुल देव




          ‘पेट और तोंद’ व्यंग्यकार राजेन्द्र वर्मा का तीसरा व्यंग्य संग्रह हैl इस संग्रह में साहित्यिक, राजनीतिक और धार्मिक विसंगतियों पर लिखे गए उनके 24 व्यंग्य शामिल हैं। इस संग्रह के व्यंग्यों की एक प्रमुख विशेषता यह है कि यह कोई एक-डेढ़ पृष्ठों वाला स्तम्भीय लेखन का संकलन नही है बल्कि इसमें संग्रहीत व्यंग्य विशुद्ध साहित्यिकता की दृष्टि से लिखे गये हैंl बिलकुल शरद जोशी की ‘तिलिस्म’ शैली की व्यंग्य कथाओं की तरह यहाँ राजेन्द्र जी ने शब्दसीमा के बंधन से बाहर निकलकर उन्मुक्त ढंग से अपनी बात कही है।

‘मैं’ शीर्षक संग्रह का पहला व्यंग्य तमाम ऐतिहासिक और साहित्यिक सन्दर्भों के साथ दार्शनिक अप्रोच के साथ लिखा गया अपनी तरह के एक अलग आस्वाद का व्यंग्य है। इस व्यंग्य से एक अंश देखें, ‘’मैं’ अभिमान और स्वाभिमान से बना है, पर दोनों ऐसे हिल-मिल रहते हैं, कि उन्हें पहचानना कठिन है। बुद्धि स्वाभिमान की रक्षा करना सिखाती है पर, स्वाभिमान कब अभिमान में बदल जाता है, पता नही चलता! जिस अनुपात में ‘स्व’ की मात्रा बढ़ती है, उसी अनुपात में ‘अहम्’ की मात्रा भी बढ़ती है। अहम् खाज की तरह होता है, जितना खुजाओ उतना ही मज़ा! जलन का पता तो बाद में चलता है। अस्थिर बुद्धि पहले अहंकार को जन्म देती है, फिर पराजय के आँसुओं से उसका शमन करती है।’


        शीर्षक व्यंग्य ‘पेट और तोंद’ में ‘पेट’ श्रम और ‘तोंद’ पूँजी के प्रतीक के रूप में आया है। व्यंग्य करते हुए लेखक एक जगह लिखता है, ‘पेट और तोंद की मिश्रित रुई के ढेर को जब व्यवस्था की तकली से काता जाता है, तो ‘हम’ और ‘वे’ नामक दो प्रकार के मोटे और महीन धागे निकलते हैंl देश की सवा अरब आबादी में से एक सौ चौबीस करोड़ ‘हम’ हैं, तो एक करोड़ ‘वे’। लोकतंत्र की दृष्टि से हम ‘लोक’ हैं, तो ‘वे’ तंत्र। हम ‘पेट’ हैं तो वे ‘तोंद’। इस प्रकार ‘हम’ और ‘वे’ की हेमिंग्वे थ्योरी को तोंद अपडेटेड रखती है ताकि आने वाली पीढ़ियों के सामने पेट और तोंद की पहचान का संकट न उत्पन्न हो।‘


’धोती और सरकार’ शीर्षक व्यंग्य बाजारवादी व्यवस्था के पाखंड पर तीखी चोट करता हैl इस व्यंग्य में लेखक ने स्थानीयता को भी जगह दी है। इस एक पंक्ति में वह मानो पूरे व्यंग्य का सार सा प्रस्तुत कर देता है, ‘प्रबल आस्था के लिए आँखों का बंद होना बहुत जरुरी है।’ बाज़ार की नित नई चालों को भांपकर वह पाठक को सावधान करते हुए इसी में एक जगह और वह लिखता है, ‘हम भेली बनाने में लगे हैं। बदले में शैम्पू, बिस्कुट, बर्गर, पिज्जा, कैम्पाकोला, मोबाइल लैपटॉप, फेसबुक, चैटिंग जैसी चीज़ें पाने के लिए बेताब हैंl यह नए किस्म का व्यापार है, नयी गुलामी का आगाज़ है! इस गुलामी को लागू करने में हममें से कितने ही विभीषण सहयोग कर रहे हैं।‘ 


’क’ से कविता’ समकालीन कविता की दशा-दिशा पर आलोचनात्मक दृष्टि से लिखा गया सार्थक व्यंग्य हैl यह व्यंग्य हमें लेखक की अध्ययनशीलता से भी परिचित कराता हैl तमाम व्यंग्योक्तियों और उदाहरणों के माध्यम से लेखक कविता के क्षेत्र में छाए हुए कुहासे को दिखाता हैl राजेन्द्र वर्मा के पास व्यंग्य लेखन की पूरी सलाहियत हैl बेहद सहज-सरल प्रवाहमय भाषा-शैली। अपने लेखन में व्यंग्यकार अपने अनुभवों का बहुत अच्छा रचनात्मक प्रयोग करते नज़र आते हैंl वे तल्ख़ भी होते हैं तो भाषा का संयम नही खोते दिखते, बल्कि तार्किक ढंग से पाठक से रूबरू होते हैंl निश्चय ही व्यंग्य-लेखन उनके लिए बेहतर जीवन की तलाश करती हुई एक सरोकारी विधा हैl उसके उद्देश्य को लेकर उनमें कोई भ्रम नही है।


‘ज्ञ’ से ज्ञानी शीर्षक व्यंग्य में उन्होंने विभिन्न धर्मों में मौजूद वर्ण व्यवस्था की पड़ताल व्यंग्य के दायरे में रहकर की हैl वह जिस प्रकार धर्म और जातियों के राजनीतिक इस्तेमाल पर प्रहार करते हैं उसकी आवाज़ दूर तक सुनायी देने वाली साबित हुई हैl विषय की संवेदनशीलता को देखते हुए यहाँ पर साहसपूर्ण संतुलित व्यंग्य कौशल की आवश्यकता थी जिसे लेखक बखूबी साध ले गया हैl वह साफ़ शब्दों में लिखता है, ‘आज ज्ञानी की पहचान यह है कि वह संसार को भय का पाठ पढ़ाये और भयमुक्ति के चालू नुस्खे बेचकर अपनी तिजोरी भरे!’ निम्न समझी जाने वाली जातियों के बीच विद्यमान श्रेष्ठताभाव को भी रेखांकित करते हुए वह अक्षरशः सत्य और धारदार टिप्पणी करते हैंl उनके व्यंग्यबाणों से कोई नही बच पाता।


‘तथापि’ शीर्षक व्यंग्य सामाजिक शब्दों के आशयों में निहित अर्थों पर की गयी एक व्यंग्यात्मक चुटकी है- ‘किसी भी मोहल्ले में यह आसानी से सुना जा सकता है कि वर्मा जी का लड़का शराबी अवश्य है, तथापि बदचलन नही! या फिर, शर्मा जी की बेटी के कई बॉयफ्रेंड हैं, तथापि उसके चरित्र के बारे में कोई ऊँगली नही उठा सकता।... दहेज़ लेना यों तो अच्छी प्रथा नही है, तथापि यदि न लिया जाए, तो बेटी के विवाह में क्या दिया जाए? अथवा, सामने वालों का वेतन अधिक तो नही, तथापि ऊपरी कमाई इतनी अधिक है कि उनकी दो पीढ़ियों को हाथ-पाँव हिलाने की आवश्यकता नहीं!’ इसी व्यंग्य से एक बेहतरीन अंश और द्रष्टव्य है, ‘तथापि’ अविवाहितों और विधुरों का रेड एरिया है, तो स्त्रियों का पर्दा हैl साधु-संतों का मनोरंजन है, पुलिस वालों की कैप है, नेता की टोपी है, जज का गाउन है!... यह पब्लिक की चुटहिल आत्मा का मरहम है!... तुलसीदास की दो अर्धालियों- ‘होइ है सोई जो राम रचि राखा’ और ‘कर्म प्रधान विश्व रचि राखा’ को आपस में जोड़ने वाला आस्था का फेविकोल है।’


जहाँ एक ओर राजेन्द्र जी ने दीमक, घोंघा, केंचुआ, सांप और मुर्गा जैसे लघु जीवों के बहाने से सफल प्रतीकात्मक व्यंग्य लिखे है, वहीं ‘ब्राह्मण और श्रमण’ जैसे प्रखर व्यंग्यसंपन्न विचारात्मक आलेख भीl इन्हें सामाजिक-आर्थिक असमानताओं पर की गयी उनकी बेबाक वैचारिक टिप्पणियाँ भी कह सकते हैंl इन्हें पढ़कर पाठक को समय-समाज को जानने का एक अलग नज़रिया प्राप्त होता हैl लेखक ने इस संग्रह में हर ज्वलंत मुद्दे को गहरे तक छुआ हैl ‘यत्र नार्यन्तु पूज्यन्ते’ में जहाँ उन्होंने समकालीन स्त्री विमर्श का अपनी तरह से जायजा लिया है, वहीं आज की स्त्री के सामने दोतरफा चुनौती की भी पड़ताल की है। आधुनिकता स्त्री को घर से बाहर निकाल कर उसका शिकार करना चाहती है, तो परंपरा उसे घर के भीतर ही मार डालना चाहती है। ऐसे में उसे अपने विवेक पर भरोसा करके कदम बढ़ाना ही ठीक होगा। लेखक ने  ‘झूठै भोजन, झूठ चबेना’ लिखकर पौराणिक गाथाओं के पठनीय प्रसंगों को हमारे समक्ष रखकर उनकी व्यंग्यपूर्ण तार्किक व्याख्या की हैl इस प्रकार उनके लेखन में बड़ी ही विविधता हैl वह इतिहास में कभी पीछे जाते हैं और फिर उसे एक परिपक्व लेखक की तरह वर्तमान की समस्याओं से जोड़ते हुए आसानी से लौट भी आते हैंl अपने पूरे लेखन में राजेन्द्र वर्मा उपेक्षितों की लड़ाई लड़ते नज़र आते हैंl उनकी पक्षधरता सबसे अंतिम पायदान पर खड़े हुए व्यक्ति के साथ हमेशा बनी रही है |


व्यंग्य साहित्य के प्रति समर्पित राजेन्द्र वर्मा बगैर किसी शोर-शराबे के चुपचाप अपना लेखन करने वाले लोगों में से हैंl मेरी दृष्टि में वह समकालीन व्यंग्य समय के ज़रूरी हस्ताक्षरों में से एक हैंl उनका यह व्यंग्य संग्रह पठनीय भी है और संग्रहणीय भी।


  • समीक्षित कृति-पेट और तोंद (व्यंग्य-संग्रह)/ व्यंग्यकार-राजेन्द्र वर्मा/ प्रकाशक-प्रकाशन संस्थान, नई दिल्ली/ संस्करण-प्रथम, 2017/ पृष्ठ संख्या-160/ मूल्य-300/-

समीक्षक-राहुल देव


-9/48 साहित्य सदन, 
कोतवाली मार्ग, महमूदाबाद (अवध), 
सीतापुर, उ.प्र. 261203 
मो. 9454112975

मंगलवार, 11 जुलाई 2017

पुस्तक समीक्षा:लिव इन रिलेशन की विसंगतियों से जूझता महत्वपूर्ण उपन्यास




          पिछले दो दशकों से नारी विमर्श को केंद्र में रखकर महिला लेखकों के संग संग पुरुष लेखकों ने भी सृजन किया और समाज में नारी की स्थिति का खुलासा किया। बदलते हुए समाज और समाज में तेजी से बढ़ रही विदेशी संस्कृति लिव इन रिलेशन को लेकर लिखा गया वरिष्ठ लेखिका संतोष श्रीवास्तव का उपन्यास "लौट आओ दीपशिखा" लिव इन रिलेशन की तमाम विसंगतियों से जूझती कथा नायिका दीपशिखा के करुण अंत का जीवंत दस्तावेज है । संतोष कम लिखती हैं पर जब भी लिखती है कुछ नया ही लिखती हैं। कथा के प्रत्येक चरित्र को समेटकर उसके हर पहलू को व्यक्त करने का कौशल लेखिका के लेखन की पहचान है। भाव ,कथानक, बिम्ब, प्रतीक ,छोटे छोटे लम्हों को लिए चलते हैं कथा के संग संग और पाठक चकित हुए बिना नहीं रहता कि अरे यह तो हूबहू उसकी कहानी है ।

          "लौट आओ दीपशिखा" का कथानक भी कुछ ऐसा ही है गुजरात के दंगो की मर्मांतक पीड़ा से गुज़र चुकी दीपशिखा को सिजोफ्रेनिया हो जाता है और उसे हर वक्त यह भय सताता है कि कोई उसे मारने आ रहा है। यहां तक कि हर आगंतुक मित्र पर भी वह संदेह करने लगती है। मानो खुद शापित है वह या किसी का शाप ढो रही है जबकि वह जूनागढ़ के नवाब के यहां कानून मंत्री रह चुके पिता की इकलौती बेटी है। समृद्धि उसके कदम चूमती है। चित्रकला में भी वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नाम कमा चुकी है। जीवन में पुरुष भी आए। मुकेश के आकर्षण को प्यार का नाम दे वह देह के बंधन में बंधी। नीलकांत का प्यार सच्चा लगा था पर वहां भी देह थी और देह के संग संग अपने फिल्मी कारोबार में उसे इस्तेमाल करने की साजिश भी....... पर दोनों से धोखा खाकर टूट जाती दीपशिखा अगर उस के जीवन में गौतम नहीं आता

            गौतम ने उसका अंत तक साथ दिया उसके सुख दुख में वह सच्चा साथी साबित हुआ था।हालांकि गौतम को उससे कोई सुख नहीं मिला। मानसिक रोगी जूनागढ़ में अपनी हवेली को लेकर, मां सुलोचना को लेकर, चित्रकला की जुनूनी प्रवृत्ति को लेकर और हर लम्हा साथ देने के बावजूद वर्तमान और भविष्य के लिए चिंतित दीपशिखा को उसने खुद को भूल कर सम्हाला। लिव इन रिलेशन जैसी समाज में पूर्ण रुप से स्वीकार नहीं की गई आधुनिक विदेशी कल्चर को उसने दीपशिखा के लिए स्वीकार किया। ऐसा प्यार करने वाले विरले ही होते हैं। संतोष जी ने इस प्यार को पढ़ने के लिए मजबूर सा कर दिया। पढ़ कर उसमें खो जाने के लिए भी....... दीपशिखा का नजरिया आधुनिक है।वह देह की आजादी को महत्वपूर्ण मानती है लेकिन वहां जहां प्यार हो ,निभाने का माद्दा हो। शायद यही वजह है कि हर बार प्रेम संबंधों के टूटने पर वह बिखरी है ,अवसाद से घिरी है। लेकिन कैनवास, रंग और ब्रश ने उसे समेट कर फिर खड़ा कर दिया है । चित्रकला की जो जानकारी इस पुस्तक में है उसे पढ़कर यह समझने में देर नहीं लगती कि संतोष खुद चित्रकार भी हैं। कोलाज, थीम ,रेखाचित्र तो बहुत कॉमन जानकारी है। 

           " वॉटर कलर्स के साथ-साथ दीपशिखा ने ग्रेफाइट, क्रेयांस और ऑयल कलर्स का भी इस्तेमाल किया। उसके ब्रश से प्रेम के सातों रंग उभर आते हैं। प्रेम, विश्वास ,आतुरता ,जुनून, घृणा ,तिरस्कार, धोखा उसके ब्रश का जुनून इसी में छलांग मारता है।" संतोष जी ने इस में पूरे विश्व की चित्रकला को समेटा है। भारत और विश्व में अपनी धाक जमा चुका फ्रांस तक उनकी नजरों से नहीं चूका है। पिछले आठ सालों से संतोष जी यात्रा संस्मरण में भी अपनी पहचान बना चुकी है। उनके संस्मरण बहुचर्चित, बहुप्रशंसित हैं। यात्रा संस्मरण की उनकी पुस्तक "नीले पानियों की शायराना हरारत "को मध्य प्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति द्वारा नारी लेखन पुरस्कार भी मध्य प्रदेश के गवर्नर के हाथों मिल चुका है। इस पुस्तक में भी लद्दाख और फ्रांस का जो उन्होंने वर्णन किया है पाठक को एहसास होता है जैसे लेखिका उसकी उंगली पकड़ तमाम जगहों की सैर करा रही हों।
 लुव संग्रहालय विश्व विख्यात सुंदरी मोनालिसा की पेंटिंग के सामने वह बुत की तरह खड़ी रही । कितना दर्द है मोनालिसा के चेहरे पर लेकिन आंखों में हंसी जैसे कहना चाह रही हो कि दुख से भरी जिंदगी में हंसते रहना एक ईमानदार कोशिश है । संसार की मरीचिका का एहसास दिलाती यह पेंटिंग । मूज़े दल 'म.... मनुष्य का संग्रहालय जिसमें मानव सभ्यता के गुहा काल से अब तक के दृश्य हैं । कुछ दुर्लभ चीजे ,कुछ तस्वीरें ,इम्प्रेसनिस्ट...प्रभाववादी चित्रकला का संग्रहालय जहाँ वेन गॉग का स्वनिर्मित आत्म चित्र और विश्व प्रसिद्ध चित्र सूरजमुखी और उनका कमरा है। सेजां के चित्र भी जिनके कंस्ट्रक्शंस का हवाला ऑरो कार्तिए ब्रेंसो ने दिया था। दीपशिखा मानो बिना पंख आसमान में उड़ रही थी। इन चित्रों की बारीकियां समझने की कोशिश करती, गैलरियों में चित्रों की प्रदर्शनी देखती, रोदां की बनाई विशाल मूर्ति देखती जो फ्रांसीसी लेखक बालज़ाक की थी । कितना सुंदर है पेरिस..... पूरा का पूरा कला संग्रहालय और अपार खिले फूलों से भरा ।" लगता है जैसे पूरा का पूरा संग्रहालय आंखों के सामने से गुजर रहा है।

            लौट आओ दीपशिखा में कसक है, कशिश है, इंसानी हकीकत का बयान है ।संतोष जी ने हर एक पहलू को बड़ी ईमानदारी से साफ शफ्फाक चित्रण किया है। कथावस्तु में सम्वेदनाओं की पूरकशिश नमी है जिस पर हर लम्हा अंकुरित, पल्लवित होता है ।और यही वजह है कि जिंदगी के तमाम रिश्ते कभी दिलकश तो कभी मुरझाए से प्रतीत होते हैं । ज़मीनी हकीकत से जुड़ी तमाम सच्चाईयों को कैनवास पर उतारती कथावस्तु के पास विस्तृत फलक है लेकिन चरित्रों की भीड़ नहीं। भाषा बेहद खूबसूरत ,शैली में कसाव और कहन में तारतम्यता लिए सहज बहाव है । लौट आओ दीपशिखा निश्चय ही लिव इन रिलेशन पर लिखे अब तक के उपन्यासों में एक ज़रुरी दखल है।

  • समीक्षित कृति: लौट आओ दीपशिखा (उपन्यास)/ लेखिका-संतोष श्रीवास्तव/ प्रकाशक-किताब वाले, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली/ पृष्ठ -136/ मूल्य- 250 रुपये


समीक्षक-प्रमिला वर्मा


सी 1/1, स्नेह नगर, सरकारी आवास, 
गवर्नमेंट इंजीनियरिंग कॉलेज के सामने,
रेलवे स्टेशन रोड,
औरंगाबाद- 431005 (महाराष्ट्र)

मंगलवार, 12 जुलाई 2016

पुस्तक समीक्षा: सात्विकता के साथ ही सामीप्य की विरल अनुभूति कराते गीत




                 ‘यादों की नागफनी’-गीत-नवगीत संग्रह/स्व. श्याम़ श्रीवास्तव 


                    ‘यादों की नागफनी’सनातन सलिला नर्मदा के तट पर बसी संस्कारधानी जबलपुर के लाड़ले रचनाकार स्व. श्याम़ श्रीवास्तव की प्रतिनिधि रचनाओं का संकलन है जिसे उनके स्वजनों ने अथक प्रयास कर उनके ७५ वें जन्म दिवस पर प्रकाशित कर उनके सरस-सरल व्यक्तित्व को पुनः अपने बीच महसूसने का श्लाघ्य प्रयास किया। स्व. श्याम ने कभी खुद को कवि, गायक, गीतकार नहीं कहा या माना, वे तो अपनी अलमस्ती में लिखते - गाते रहे। आकाशवाणी ए ग्रेड कलाकार कहे या श्रोता उनके गीतों-नवगीतों पर वाह-वाह करें, उनके लिये रचनाकर्म हमेशा आत्मानंद प्राप्ति का माध्यम मा़त्र रहा। आत्म में परमात्म को तलाशता-महसूसता रचनाकार विधाओं और मानकों में बॅंधकर नहीं लिखता, उसके लिखे में कहा-क्या बिना किसी प्रयास के आ गया यह उसके जाने के बाद देखा-परखा जाता है। यादों की नागफनी में गीत-नवगीत, कविता तीनों हैं। श्याम का अंदाज़े-बया अन्य समकालिकों से जुदा है- 

‘‘आकर अधेरे घर में/चौंका दिया न तुमने
मुझको अकेले घर में/मौका दिया न तुमने
तुम दूर हो या पास/क्यों फर्क नहीं पड़ता?
मैं तुमको गा रहा हू/हू का दिया न तुमने

                ‘जीवन इक कुरुक्षेत्र’ में श्याम खुद से ही संबोधित हैं- "जीवन / इक कुरुक्षेत्र है / मैं अकेला युद्ध लड़ रहा /अपने ही विरुद्ध लड़ रहा ......... शांति / अहिंसा क्षमा को त्याग / मुझमें मेरा बुद्ध लड़ रहा।" यह बुद्ध आजीवन श्याम की ताकत भी रहा और कमजोरी भी। इसने उन्हें बड़े से बड़े आघात को चुपचाप सहने और बिल्कुल अपनों से मिले गरल को पीने में सक्षम बनांया तो अपने ‘स्व’ की अनदेखी करने की ओर प्रवृत्त किया। फलतः, जमाना ठगकर खुश होता रहा और श्याम ठगे जाकर। श्याम के नवगीत किसी मानक विधान के मोहताज नहीं रहे। आनुभूतिक संप्रेषण को वरीयता देते हुए श्याम ‘कविता कोख में’ शीर्षक नवगीत में संभवतः अपनी और अपने बहाने हर कवि की रचना प्रक्रिया का उल्लेख करते हैं। 

                    तुमने जब/समर्पण किया 
                    धरती आसमान मुझे/हर जगह क्षितिज लगे।
                    छुअन-छुअन मनसिज लगे। 
                    कविता आ गई कोख में।
                    वैचारिक लयता / उगी /मिटटी पगी
                    राग के बयानों की/भाषा जगी
                    छंद-छंद अलंकार- पोषित हुए
                    नव रसों को ले कूदी /चिंतन मृगी
                    सृष्टि का/ अर्पण किया
                    जनपद की खान मुझे 
                    समकालिक क्षण खनिज लगे।
                    कथ्य उकेरे स्याहीसोख में।
                    कविता आ गई कोख में। 

                  श्याम के श्रृंगारपरक गीत सात्विकता के साथ-साथ सामीप्य की विरल अनुभूति कराते हैं। ‘नमाज़ी’शीर्षक नवगीत श्याम की अन्वेषी सोच का परिचायक है-

                    पूर्णिमा का चंद्रमा दिखा
                    विंध्याचल-सतपुड़ा से प्रण
                    पत्थरों से गोरे आचरण
                    नर्मदा का क्वांरापन नहा
                    खजुराहो हो गये हैं क्षण
                    सामने हो तुम कुरान सी
                    मैं नमाज़ी बिन पढ़ा-लिखा

                   ‘बना-ठना गाव’ में श्याम की आंचलिक सौंदर्य से अभिभूत हैं। उरदीला गोदना, माथे की लट बाली, अकरी की वेणी, मक्का सी मुस्कान, टिकुली सा फूलचना, सरसों की चुनरिया, अमारी का गोटा, धानी किनार, जुन्नारी पैजना, तिली कम फूल जैसे कर्णफूल, अरहर की झालर आदि सर्वथा मौलिक प्रतीक अपनी मिसाल आप हैं। समूचा परिदृश्य श्रोता/पाठक की आखों के सामने झूलने लगता है। 

                    गोरी सा / बना-ठना गाव 
                    उरदीला गोदना गाव।
                    माथे लट गेहू की बाली
                    अकरी ने वेणी सी ढाली,
                    मक्का मुस्कान भोली-भाली 
                    टिकुली सा फूलचना गाव।

                    सरसों की चूनरिया भारी
                    पल्लू में गोटा अमारी,
                    धानी-धानी रंग की किनारी 
                    जुन्नारी पैंजना गाव।

                    तिली फूल करनफूल सोहे
                    अरहर की झालर मन मोहे,
                    मोती अजवाइन के पोहे।
                    लौंगों सा खिला धना गाव।

                   श्रेष्ठ-ज्येष्ठ गीतकार स्व, शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ ने श्याम की रचनाओं को ‘विदग्ध, विलोलित, विभिन्न आयामों से गुजरती हुई अनुभूति के विरल क्षणों को समेटने में समर्थ, पौराणिक संदर्भों के साथ-साथ नई उदभावनाओं को सॅंजोने में समर्थ तथा भावना की आच में ढली भाषा से संपन्न‘’ ठीक ही कहा है। किसी रचनाकार के महाप्रस्थान के आठ वर्ष पश्चात भी उसके सृजन को केंद्र में रखकर सारस्वत अनुष्ठान होना ही इस बात का परिचायक है कि उसका रचनाकर्म जन-मन में पैठने की सामथ्र्य रखता है। स्व. रामेश्वर शुक्ल ‘अंचल’ के अनुसार ‘‘कवि का निश्छल सहज प्रसन्न मन अपनम कथ्य के प्रति आश्वस्त है और उसे अपनी निष्ठा पर विश्वास है। पुराने पौराणिक प्रतीकों की भक्ति तन्मयता को उसने अपनी रूपवर्णना और प्रमोक्तियों में नये रूप् में ढालकर उन्हें नयी अर्थवत्ता प्रदान की हैं।’’
                    श्याम के समकालीन चर्चित रचनाकारों सर्वश्री मोहन शशि, डा. राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’, संजीव वर्मा ‘सलिल’ की शब्दांजलियों से समृद्ध और श्रीमती पुष्पलता श्रीवास्तव, माधुरी श्रीवास्तव, मनोज श्रीवास्तव, रचना खरे तथा सुमनलता श्रीवास्तव की भावांजलियों से रससिक्त हुआ यह संग्रह नयी पीढ़ी के नवगीतकारों ही नहीं तथाकथित समीक्षकों और पुरोधाओं को नर्मदांचल के प्रतिनिधि गीतकार श्याम श्रीवास्तव के अवदान सें परिचित कराने का सत्प्रयास है जिसके लिये शैली निगम तथा मोहित श्रीवास्तव वास्तव में साधुवाद के पात्र हैं। श्याम सामाजिक विसंगतियों पर आघात करने में भी पीछे नहीं हैं। "ये रामराजी किस्से / जनता की सुख-कथाए / भूखे सुलाते बच्चों को / कब तलक सुनायें", "हम मुफलिस अपना पेट काट / पत्तल पर झरकर परस रहे", "गूँथी हुई पसीने से मजदूर की रोटी, पेट खाली लिये गीत गाता रहा" आदि अनेक रचनाए इसकी साक्षी हैं। तत्सम-तदभव शब्द प्रयोग की कला में कुशल श्याम श्रीवास्तव हिंदी, बुंदेली, उर्दू, अंग्रेजी के शब्दों को भाव-भंगिमाओं की टकसाल में ढालकर गीत, नवगीत, ग़ज़ल, कविता के खरे सिक्के लुटाते चले गये। समय आज ही नहीं, भविष्य में भी उनकी रचनाओं को दुहराकर आश्वस्ति की अनुभूति करता रहेगा।

  • समीक्ष्य पुस्तक-यादों की नागफनी/गीत संग्रह, स्व. श्याम़ श्रीवास्तव/प्रथम संस्करण-2016/ प्रकाशक: शैली प्रकाशन, 20 सहज सदन, शुभम विहार, कस्तूरबा मार्ग, रतलाम (म.प्र.) /मूल्य रू. 150/संपादन- डा. सुमनलता श्रीवास्तव 


आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' 


समन्वयम, 204-विजय अपार्टमेंट,
नेपियर टाउन, जबलपुर-482001
मो. 9425183244, 
ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

मंगलवार, 14 जून 2016

पुस्तक समीक्षा: गज़ल के क्षितिज को वुसअत देता एक मौलिक इज़हार-मयंक अवस्थी




                     पाल ले इक रोग नादाँ–गज़ल संग्रह/ ग़ौतम राजरिशी


मैं कई उपमायें सोच रहा हूँ कि क्या नाम दूँ इस किरदार को ?!! 'एक आतिशफिशाँ जिसने खुद को ज़ब्त कर रखा है' –एक सूरज जिसमें शीतलता है–एक चाँद जिसमें आँच है–लेकिन शायद तश्बीहों की असीरी की ज़रूरत नहीं है। मैं अगर सिर्फ कर्नल गौतम राजरिशी ही कह देता हूँ इस किरदार को तो सब शुमार हो जायेगा खुद ब खुद। गौतम बर्फ़ में सुलगती आग पर काबू रखने की नौकरी कर रहे हैं –यानी कश्मीर में भारतीय फौज में कर्नल के पद पर नियुक्त हैं। आप कहेंगे “कर्नल और शाइरी”?!” फौलाद का मोम से क्या रिश्ता ??!! लेकिन एक असम्भव से तसव्वुर को जीवंत और साकार देखने के लिये इस पुस्तक से गुज़र जाइये।

बहुत दिनों बाद एक मौलिक इज़हार सामने आया है 'पाल ले इक रोग नादाँ' के रूप में–शाइरी की बन्दिशों को तोडता हुआ नहीं, बल्कि गज़ल के क्षितिज को वुसअत देता हुआ। एक कैनवस जिसमें न्यूज़ पेपर, फोन , सिगार, सिगरेट, टावल, कार , बाइक , बैरक , बर्फ़ , समन्दर, साहिल सभी बिल्कुल सही जगह पर बनाये गये हैं और सुर्ख़ नहीं गुलाबी रंग से बनाये गये हैं- दिमाग़ से नहीं दिल से बनाये गये हैं। ये कैनवस एक शाइर की  तस्वीर बना रहा है जिसका नाम गौतम राजरिशी है। इस तस्वीर की शिनाख़्त मैं नहीं कर रहा बल्कि दौरे हाज़िर की शाइरी के सबसे मक्बूल सुतून यानी डा राहत इन्दौरी और मुनव्वर राअना कर रहे हैं। इस किताब का इलस्ट्रेशन साइज़ और इंतख़ाब सब विशिष्ट की श्रेणी में आता है। डा राहत इन्दौरी की बेहद सरगर्भित भूमिका भी इस संकलन में अवश्य बार बार पठनीय है –

शाइरी का संसार पहले से ही बहुत समृध है। इसे रिवायती, जदीद,अरूज़ ए फ़िक्रो फन वगैरह के मेयार पर आँकने वाले तनक़ीदकार भी बहुतायत में हैं –लेकिन इसमे ग़ालिब –इकबाल –फिराक और बशीर बद्र जैसे साहिर हुये हैं जिन्होने इस विधा की दिशा अपनी शख़्सीयत के दम पर अपने मुताबिक मोड दी और तनक़ीदकारों को ये मानने पर बेबेस किया कि अच्छे शेर का एक ही पैमाना है –कि वो सुनने वाले को अच्छा लगता है!! गौतम चाहते तो अरूज़ ए फ़िक़्रो फन की शायरी पर अपनी बुलन्द इमारत मंसूब कर सकते थे – मेयारी शेर आसानी से कहना उनकी क्षमता मे आता है। बानगी-

तू दौडता है हर पल बन कर लहू नसों में
तेरे वज़ूद से ही मैं भी हूँ फ़लसफ़ों में  (1)
उठी जब हूक कोई मौसमों की आवाजाही से
तेरी तस्वीर बन जाती है यादों की सियाही से (2)
धूप लुटा कर सूरज जब कंगाल हुआ
चाँद उगा फिर अम्बर मालामाल हुआ (3)

लेकिन अरूज़ की शायरी शेर गौतम की वरीयता नहीं हैं। गोस्वामी तुलसीदास ने भी मानस के हर अध्याय आरंभ संस्कृत के श्लोकों से किया है जो उनके समकालीन विद्वानो के लिये एक नज़ीर थी-कि अगर महज पांडित्य का ही प्रदर्शन करना होता तो तुलसी नि:सन्देह अपने समकालीन कवियों की कहकशाँ में चाँद की हैसियत रखते ही थे ।लेकिन तुलसी का ध्येय ही कुछ और था उन्हें अपने युग के बिखराव को तरतीब देनी थी –मर्यादा की सीमा रेखाये पुनर्निर्मित करनी थीं और नाउमीदी के दौर में लोकमानस को नई संचेतना देनी थी। इसलिये उन्होने रामचरित मानस  की भाषा लोकभाषा अवधी रखी। इसी के माध्यम से उनका काव्य अमर हुआ और आज तक मानस की चौपाइयाँ हमारी लोकमर्यादा की प्रतिनिधि हैं। दरअस्ल किसी भी युग की घनीभूत पीडा जब प्रवाहमय हुई है तो कविता के स्वरूप में ही ज़ाँविदानी सरहदों तक पहुंची है।शाइर को पैगम्बर से ठीक पहले का मर्तबा प्राप्त है क्योंकि उसकी पीडा में उसके समय को अपना इलहाम मिलता है। श्रुति हो या स्मृति , सामवेद की ऋचाये हों या उपनिषदों के श्लोक सभी गहरी तपस्या के समर होते हैं और निश्चित रूप से वो काव्य के स्वरूप में अपने अमरत्व का सफर तय करते हैं।गौतम ने भी ये इज़हार खुद को एक मोतबर शाइर के रूप में स्थापित करने के लिये नहीं किया है, उनका उद्देश्य एक सीमाप्रहरी के जीवनव्रत्त की काव्यमय प्रस्तुति  है-इसलिये उन्होने इस संकलन की भाषा की ग्राह्यशीलता को तज़ीह दी है और शब्द्चित्रों के मध्यम से यह तस्वीर बनाई है।एक फौजी जो अपने परिवार, अपनी जीवंत संवेदनाओं से देश का प्रहरी होने के कारण दूर है अपनी मन:स्थिति ग़ज़ल के माध्यम से कागज़ पर उकेरता है –और उसका बयान उसके जैसे लाखों सीमा प्रहरियों का दस्तावेज़ बन जाता है। पुस्तक का मूल स्वर विप्रलम्भ श्रंगार( हिज्र) है लेकिन इसके शेड्स एक खास ज़िन्दगी का पूरा स्पेक्ट्रम बनाते हैं-

ट्रेन ओझल हो गई इक हाथ हिलता रह गया
वक़्ते रुख़्सत की उदासी चूडियों में आ गई (1)
नाम तेरा कभी आने न दिया होंठों पर
हाँ तेरे ज़िक्र से कुछ कुछ शेर संवारे यूँ तो (2)
बस गयी है रग रग में बामो दर की खामोशी
चीरती सी जाती है अब ये घर की खामोशी (3)
रात भर चाँद को यूँ रिझाते रहे
उनके हाथों का कंगन घुमाते रहे (4)

फैज अहमद फैज भी फौजी थे जिनकी शाइरी रूमान के मरहले से आगे बढ कर युग की पीडा की अमर शाइरी बन गई। कर्नल गौतम राजरिशी की अभिव्यक्ति में भी सामाजिक सरोकार के तमाम ज़ाविये पूरी शिद्दत जे साथ मौजूद हैं जो इस बात की तस्दीक़ करते हैं कि यह सीमाप्रहरी देश की स्थितियों के प्रति किस कदर संजीदा और फिक्रमन्द है।इस बयान में सामाजिक संचेतना का स्वर खूब प्रखर और मुखर है। सियासी साज़िशें,आतंकवाद ब्यूरोक्रेसी की कलाबाजियाँ , आम आदमी का अवसाद , ढहते जीवन मूल्य और इन सब के बीच तडपती हुई मानवीय संवेदनायें –गौतम की अभिव्यक्ति को वैयक्तिक से उठा  कर वृहत्तर क्षितिज पर ले जाती हैं –

भेद जब सरगोशियों का खुल के आया सामने
शोर वो उठ्ठा है , अपना हुक्मराँ बेचैन है (1)
इधर है खौफ़ बाढ का, बहस में दिल्ली है उधर
नदी का ज़ोर तेज़ है कि बाँध में दरार है (2)
मसीहा सा बना फिरता था जो इक हुक्मराँ अपना
मुखौटा हट गया तो कातिलों का सरगना निकला(3)
मत करो बातें कि दरिया ने डुबोई कश्तियाँ
साहिलों ने की है जो उन साजिशों की बात हो (4)
कुछ अहले ज़ुबाँ आये तो हैं देने गवाही
आँखों से मगर ख़ौफ़ का साया न गया है (5)

गालिब की शाइरी मसाइले तसव्वुफ़ का रूहानी पैकर है – उनकी हर गज़ल क्लासिक गज़ल का जीवंत आइना है – इकबाल की शाइरी गुमराह कौम की रूह को कोंचती है जिसमें खोये हुये वैभव को फिर पा लेने की तडप है-उनके प्रतीक भी शाहीन जैसे हैं। जैसा शाइर का तस्व्वुर होता है वैसा ही उसकी शाइरी का कैनवस भी होता है ।इस हिसाब से गौतम का कैनवस बशीर बद्र के कैनवस के नज़दीक है – रोज़मर्रा की ज़िन्दगी के चित्र शाइरी के मासूम प्रतीकों के साथ –जैसे कि बारिश की धीमी फुहार पड रही हो – धूप , किचन साडी , ज़ुल्फ़ , शावर,  शाम, सितारे फूल चाँद , जुगनू, तौलिया , बिस्तर . सिलवटें , गलियारा , चौबारा , आँगन , ओसरा , तितलियाँ , चूडियाँ , नींद ख़्वाब , बादल, आइना, बर्फ़ और ऐसे ही अनेक अल्फाज़ फल्सफ़ों की ज़द से निकल कर बेहद  खूबसूरत चित्र बनाते हैं । ये पुस्तक ऐसे सैकडों खुशरंग चित्रों का अल्बम भी है। गौरतलब ये है कि ये सभी बिम्ब एक फौजी की ज़िन्दगी भी दिखाते हैं और मन:स्थिति भी और साथ ही शाइरी को भी एक खास ज़ाविये से सम्रद्ध करते हैं-

गुज़र जायेगी शाम तकरार में
चलो चल के बैठो भी अब कार में (1)
जो धुन निकली हवा की सिम्फनी से
हुआ है चाँद पागल आज उसी से (2)
मकाँ की बालकोनी की वो धडकनें बढा गयी
अभी –अभी जो पोर्टिको में आई नीली कार है (3)
चाँद उछल कर आ जाता है कमरे में जब रात गये
दीवारों पर यादों के कितने जंगल उग आते हैं (4)
बिस्तरों की सिलवटों की देख कर बेचैनियाँ
सिसकियाँ तकिये ने लीं चादर मचलती रह गई (5)

बकौल डा राहत इन्दौरी गौतम की शाइरी में – नासिर की तनहाई – बशीर का कैनवस और फिराक की शोख़ उदासी बडे ही दिल्कश रूप में परिलक्षित होती है।ये दौरे –हाज़िर के सरताज शाइर का गौतम की शाइरी पर एक सच्चा और संश्लिष्ट बयान है जिसे बगैर किसी बहस के तस्लीम किया जा सकता है।हम धरती पर कहीं भी रहें सितारे चाँद सूरज जुग्नू फूल और हवा का कहत कहीं नहीं है –इन्हीं बिम्बों से शाइरी में हज़ार तरीके की मन:स्थितियाँ कागज़ पर उतारी जाती हैं। इन मनाज़िर में पोशीदा और नुमाया गौतम का एक निजत्व भी है यानी एक फौजी के स्पेसिफिक शेर जिनके ज़िक्र के बिना बात अधूरी रहेगी। फौजी के शेर देखिये –

होती हैं इनकी बेटियाँ कैसे बडी रह कर परे
दिन रात इन मुस्तैद सीमा प्रहरियों से पूछ लो (1)
घडी तुमको सुलाती है घडी के साथ जगते हो
ज़रा सी नींद क्या है चीज़ पूछो इक सिपाही से (2)
है लौट आया काफिला जो सरहदों से फौज का
तो कैसे हँस पऎडी उदास छावनी अभी अभी (3)
चीड के जंगल खडे थे देखते लाचार से
गोलियाँ चलती रहीं इस पार से उस पार से(4)

पलाश का फूल पाषाण का विभव नहीं बल्कि पत्थर की जडता की पराजय का प्रतीक होता है !! कश्मीर की सर्द वादियों में एक फौजी के भीतर शायर के ह्रदय का स्पन्दन ऐसी ही घटना है जो निशानदेही करती है कि ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति मनुष्य की आत्मिक ऊर्जा ऊर्ध्वमुखी है और अति विषम स्थितियों में भी मनुष्यत्व की गरिमा के प्रतीक साहित्य संगीत और कला विकसित होते रहेंगे और परवान चढते रहेंगे। गौतम का शाइर इसकी जीती जागती मिसाल है।ग़ज़ल एक विधा है जिसकी अंतहीन समृध्धि का कारण भी यही है कि एक ही ग़ज़ल में कई मंज़र कई शेडस कई मन;स्थितियाँ और कई रंग पिरोये जा सकते हैं इसका व्याकरण ऐसा है कि रदीफ कफिये के चलते इन अनेक रंगों के प्रवाह में कतई बिखराव नहीं आता। गौतम ने अपने जज़्बात इस विधा के माध्यम से मंज़रे आम किये हैं –जिससे उनको अधिक से अधिक सोचा समझा और जाना जा सकता है- 

 चलो चलते रहो पहचान रुकने से नहीं बनती
बहे दरिया तो पानी पत्थरों पर नाम लिखता है

गौतम की शाइरी में रूमान उनकी संवेदनाओं की प्रोटेक्टिव -शील्ड भी है –जहाँ वो हैं वहाँ प्रेम अपने साकार रूप में उपस्थित नहीं है –लेकिन हाफिज़े से बार बार गुज़र कर तसव्वुर को बार बार ज़िन्दा करके इज़हार को बार बार धारदार करके उन्होने अपने प्रेम को संरक्षित किया है-
जबसे तूने मुझको छुआ है
रातें पूनम दिन गेरुआ है

कश्मीर में सिर्फ़ बर्फ़ है तनाव है और गोलियों की सनसनाहट है लेकिन उन्होने अपने तसस्व्वुर से अपनी ग़ज़ल में  एक भरे पूरे कैनवस को खुशरंग रखा है जिसे जीवन की सीमित उपलब्धता में जीवन को पूरे दायरे में जीने की कोशिश के तौर पर दाद दी जा सकती है-

दूर क्षितिज पर सूरज चमका , सुबह खडी है आने को
धुन्ध हटेगी , धूप खिलेगी , वक़्त नया है छाने को

इसके सिवा उन्होने शायरी की गरिमा को भी बख़ूबी बरकरार रखा है और कमोबेश हर ग़ज़ल में ऐसे शेर कहे हैं जो उन्हें अव्वल पाँत का शायर साबित करते हैं –

हैं जितनी परतें यहाँ आसमान में शामिल
सभी हुईं मेरी हद्दे –उडान में शामिल (1)
कि इससे पहले खिज़ाँ का शिकार हो जाऊँ
सजा लूँ खुद को मुकम्मल बहार हो जाऊँ (2)

एक व्यक्तिगत बात भी इस समीक्षा के हवाले से कहना चाहूँगा गौतम से –“ गौतम!! सन 1989 -65 फील्ड रेजीमेण्ट –मेजर एम जी मिश्रा की चिता को मैने खुद अग्नि दी थी जो तीन मासूम बेटियों को छोड कर इस देश के लिये बार्डर पर शहीद हो गये थे !! ये मेरे सगे बहनोई थे !! सैकडों फौजियों के हुजूम और राइफलों की सलामी के बाद ये परिवार कैण्टोमेण्ट की सुरक्षित बाउंड्री से निकल कर अराजक सिविल लाइफ में आ गया और फिर फिर जीवन के एक अंतहीन संघर्ष में मेरी बहन को भी कैंसर की सियाही निगल गई – इस शेर ने 27 बरस पहले का मंज़र जगा दिया –

मूर्तियाँ बन रह गये वो चौक पर , चौराहे पर
खींच लाये थे जो किश्ती मुल्क की मँझधार से

गौतम अपनी शाइरी में इस तरह शुमार हैं जैसे कि बर्फ़ में पानी- जैसे लहू में सुर्ख़ रंग – जैसे अहसास में दिल शामिल होता है। इनका हर शेर व्यक्तिगत अनुभूति की उपज है और बेहद निर्दोष और सच्चा है जैसे मासूम बच्चे की मुस्कुराहट या सूरज की किरने होती हैं।भारतीय स्वतंत्रता के इतिहास में जिन कारंतिकारियों की अग्रणी भूमिका है उनकी ज़िन्दगी का एक जीवंत द्स्तावेज़ यशपाल के “सिन्हावलोकन” में मिलता है –यशपाल क्रांतिकारी भी थे और साहित्यकार भी। मैं गौतम के शतजीवी होने की कमना करता हूँ ताकि आगे कभी हमें कश्मीर की सच्ची दास्तान ग़ज़ल के इलावा भी साहित्य के अन्य आयामों में उपलब्ध हो सके। मेरी और इस मुल्क  की तमाम दुआयें अपने इस योद्धा के साथ हैं जिसके पास पत्थर का कलेजा और मोम का दिल है।

  • समीक्ष्य पुस्तक-पाल ले इक रोग नादां/ गज़ल संग्रह-गौतम राजरिशी/2014/ प्रकाशक: शिवना प्रकाशन, पी सी लैब,सम्राट काम्प्लेक्स बेसमेंट, बस स्टैंड,सीहोर-466001 (म.प्र.) /मूल्य रू. 200


मयंक अवस्थी


बी -11,
भारतीय रिज़र्व बैंक अधिकारी आवास,
तिलक नगर, कानपुर-208002
ईमेल-awasthimka@gmail.com


मंगलवार, 31 मई 2016

पुस्तक समीक्षा: सामाजिक असंगतियों को बेनकाब करती कवितायें-डा.राधेश्याम बंधु




                          

                       कविता संग्रह-‘ठहरी बस्ती-ठिठके लोग’/ अवधेश सिंह


‘ठहरी बस्ती-ठिठके लोग’ चर्चित कवि अवधेश सिंह का दूसरा कविता संग्रह है। इसके पहले भी उनका पहला कविता संग्रह ‘छूना बस मन’ प्रकाशित और चर्चित हो चुका है। प्रथम कविता संग्रह की प्रेम कविताओं में जहां रागात्मक अनुभूतियों की पारम्परिक थरथराहट देखने को मिलती है, वहीं दूसरे संग्रह की कविताओं मंजे कवि की वस्तुपूरकता और वस्तुवादी वर्गीय चेतना के प्रमाण भी स्पष्ट रूप से देखने को मिलते हैं और यह कवि की अध्ययनशीलता और सजगता के कारण ही सम्भव हो सका है । ये कवितायें दैनिक अखबार की तरह रोज घटने वाली घटनाओं की मात्रा सूचनायें ही नहीं देतीं बल्कि तत्कालीन चुनौतियों के अनुरूप अपने को तैयार रखने के लिए दिशा निर्देश भी देती हैं । जिन्दगी में, समाज में चाहे जितनी निराशाजनक असंगतियां, अराजकता, खुदगर्जी हो, पिफर भी जिन्दगी और जिन्दगी के सपने कभी मरते नहीं हैं।
      ‘ठहरी बस्ती-ठिठके लोग’ की कवितायें निश्चितरूप से उपभोक्तावादी, यथास्थितिवादी सोच वाले लोगों के लिए भी चुनौतीपूर्ण सवाल प्रस्तुत करती हैं कि यदि बस्ती के लोगों की जिन्दगी में ठहराव और उदासीनता है तो उसके लिए कौन जिम्मेदार है? कविता में थोथी बौद्धिकता की शाब्दिक, भाषिक बाजीगरी करने वाले कवियों से भी यह सवाल है कि क्या उन्होंने इस सामाजिक निष्क्रियता और प्रतिगामिता के बारे भी कभी सोचा कि इसके लिए कौन जिम्मेदार है? इस द्रष्टिकोण से अवधेश सिंह की सामाजिक सरोकारों की जागरूक कवितायें सीधी -सहज भाषा में आम आदमी के दुख-दर्द, गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी को विषय बनाकर उनसे संवाद स्थापित करने का प्रयास करती हुई भी प्रतीत होती हैं साथ ही उनकों इन असंगतियों से जूझना भी सिखाती हैं। हम देखते हैं कि प्रत्यक्षतः ये गद्य कवितायें हैं किन्तु इनकी अन्तरात्मा की आन्तरिक बुनावट पूर्णरूपेण गीतात्मक है।
     इससे स्पष्ट होता है कि हर कवि में विकास की सम्भावनायें होती हैं वशर्तें कि कवि में अपने को युगानुरूप बदलने की प्रबल इच्छा हो और साथ ही उसमें  अध्ययनशीलता की जिज्ञासा भी हो । यहां यह भी बताना जरूरी है कि जब कवि कविता की वस्तुवादी आलोचना से भी परिचित होता है, तो उसे अपनी कविताओं को मानव की बेहतरी की चिन्ता के अनुरूप न्यायपरक बनाना ज्यादा आसान होता है । यही बात मैंने अपनी पुस्तक ‘नवगीत के नये प्रतिमान’ में भी समझाने का प्रयास किया है कि ‘‘साहित्य का वस्तुतत्व यदि क्या, क्यों, और किसके लिए प्रश्नों के जवाब की खोज का परिणाम है तो वह साहित्य को जनप्रिय और यथार्थवादी दोनों बनायेगा और इससे भिन्न हुआ तो वह निरन्तर अमूर्त होता जायेगा। वस्तुतः वस्तुतत्व साहित्य में मनुष्य के मनुष्य होने का प्रमाण है।’’  ;( ‘नवगीत के नये प्रतिमान’ डा. राधेश्याम बंधु पृष्ठ 14 )
    इस दृष्टि  से इस संग्रह की कवितायें काफी  हद तक आश्वस्त करती हैं और विश्वास दिलाती हैं कि कवि सिर्फ कविता ही नहीं लिखता है बल्कि वह कविता की वस्तुवादी आलोचना और वर्गीय चेतना से भी प्रिचित है और उसने उसका निर्वाह करना भी जानता है। इसका प्रमाण है उनकी कविता ‘जिन्दगी फुटपाथ की सेल हो गई ’। आज बाजारबाद समाज पर जिस तरह प्रभावी होता जा रहा है यह हम सबके लिए एक चिन्ता की बात है। इसी का दुष्परिणाम है कि हमारे रिश्ते, नाते, आचार, विचार के मूल्यों में अनवरत गिरावट देखने को मिल रही है। कुछ पंक्तियां दृष्टव्य हैं-  

महंगाई
इतनी बढ़ी 
अझेल हो गयी 
गृहस्थी
समस्याओं की 
रेल हो गयी 
हर घर की
बस एक सी कहानी
आपसी सारी बातें
बेमेल हो गयी [ पृष्ठ 31 से ]

    इसी प्रकार की एक मार्मिक कविता है ‘बीमार मिल का सायरन’ । हम जानते हैं कि पहले मिल, कारखाने जो कामगारों को काम देते थे, मिस्त्री , मजदूरों के चूल्हों को गरम बनाये रखते थे और पीठ पर बस्ता लादे हुए बच्चों को पढ़ने के लिए स्कूल भेजते थे, वे आज अवसरवादी राजनीति के कारण खुद ही बीमार हो गये हैं और उनमें बन्दी के ताले पड़ गये हैं। इससे लाखों कामगार बेकार हो गये हैं । बहुतों के घरों में चूल्हा भी नहीं जल पाता। कविता की कुछ पंक्तियां यहां दृष्टव्य हैं-

मिल की दीवार पर
यह सदियों से जड़ा है
बीमार मिल का सायरन
बना मूक दर्शक चुप पड़ा है

कभी था बस्ती की
गलियों से कामगारों की
भीड़ को मिल के गेट तक 
ले जाने वाला
जाना माना पथ प्रदर्शक
बन गया है मूकदर्शक
अब यह सायरन!
हो दुखी , हो अनमन
हो लाचार 
देखता है खोलियों के
तंग हाल भूखे नंगे
फटे हाल बीमार तन ! [ पृष्ठ 68 से ]

 अब तो उंगलिया और हथेलियाँ
स्याही की कलम से रंगती  नहीं हैं
बेदाग साफ सुथरे हाथ
बाल पेन की
सरसराती सांप सी लिखावट से
आदेश निर्देश प्रस्ताव के जहर बोते है
कागजों  पर
उगाते हैं मौत - बदहवासी -पीड़ाओं
की लहलहाती फसलें
सिर्फ बस सिर्फ एक रोटी के खातिर  [ पृष्ठ 72 से ]

        इस प्रकार हम देखते हैं कि ‘पेट की खातिर’ और ‘रोटी’ के नाम पर कुछ लोगों का समाज में अपराध का धंधा  खूब फल-फूल रहा है और वे सफेद कालर उचा करके सभ्य होने का नाटक भी करते हैं । ऐसे रंगे स्यारों को बेनकाब करके यह कविता शरीफ लोगों की आखे भी खोलती है और उनसे सतर्क रहना भी सिखाती है। इस संग्रह में ऐसी ही व्यंजनापरक कई कवितायें हैं जो सीधी -सहज भाषा में सामाजिक असंगतियों से परिचित कराने में पूरी तरह सक्षम हैं जैसे जिन्दगी सिपर्फ कविता नहीं, बंद तो सब बंद है, आम आदमी, बजट, पर्यावरण उवाच, द्रोपदी का चीरहरण, लक्ष्मण रेखा, मेरे बच्चे, भ्रष्टाचार, छले जाने का भय, रोटी, दलितोत्थान, आदि ।
      ये यथार्थवादी कवितायें सामाजिक सरोकारों को लोक धर्मी  भाषा और शिल्प में अपने सम्बोध्य आम जनता तक सम्प्रेषित करने में पूरी तरह सक्षम हैं और पठनीय भी हैं । किन्तु  वहीं  यह  भी  स्पष्ट  करना बहुत जरूरी है कि आचार्य नन्ददुलारे बाजपेयी के अनुसार कविता सिर्फ अखबार की कतरन नहीं है बल्कि कविता कुछ अलग और आगे की बात भी व्यंजनापरक शैली में करती है । इसलिए किसी भाव को प्रस्तुत करने के लिए उसे एक कलात्मक स्वरूप भी ग्रहण करना पड़ता है, तभी वह दूरगामी जीवन्तता और प्रभाव ग्रहण कर पाती है । इसलिए ‘ठहरी बस्ती-ठिठके लोग’ के लिए अवधेश सिंह को बधाई  देने के साथ मैं यह संकेतित करना भी जरूरी समझता हूं और मुझे पूरा  विश्वास है कि वे अपने आगामी कविता संग्रह की तैयारी में और भी मेहनत करेंगे  तथा हमें उनसे और भी सार्थक तथा सजग कवितायें पढ़ने को मिलेंगी ।

  • समीक्ष्य पुस्तक-ठहरी बस्ती ठिठके लोग/कविता संग्रह-अवधेश सिंह/2014/ ISBN : 978-93-81480/प्रकाशक: विजय बुक्स, सुभाष पार्क नवीन शाहदरा, दिल्ली-110032/पृष्ठ : 86/मूल्य 195/ 
     

डा. राधेश्याम बंधु


सम्पादक,
‘समग्र चेतना’   
पता-बी-3/163, यमुना विहार,            
दिल्ली-110053                  

मंगलवार, 24 मई 2016

पुस्तक समीक्षा: संक्रांतिकाल की साक्षी कवितायें-आचार्य भगवत दुबे




कविता को परखने की कोई सर्वमान्य कसौटी तो है नहीं जिस पर कविता को परखा जा सके। कविता के सही मूल्याङ्कन की सबसे बड़ी बाधा यह है कि लोग अपने पूर्वाग्रहों और तैयार पैमानों को लेकर किसी कृति में प्रवेश करते हैं और अपने पूर्वाग्रही झुकाव के अनुरूप अपना निर्णय दे देते हैं। अतः, ऐसे भ्रामक नतीजे हमें कृतिकार की भावना से सामंजस्य स्थापित नहीं करने देते। कविता को कविता की तरह ही पढ़ना अभी अधिकांश पाठकों को नहीं आता है। इसलिए श्री दिनकर सोनवलकर ने कहा था कि 'कविता निश्चय ही किसी कवि के सम्पूर्ण व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति है। किसी व्यक्ति का चेहरा किसी दूसरे व्यक्ति से नहीं मिलता, इसलिए प्रत्येक कवी की कविता से हमें कवी की आत्मा को तलाशने का यथासम्भव यत्न करना चाहिए, तभी हम कृति के साथ न्याय कर सकेंगे।' शायद इसीलिए हिंदी के उद्भट विद्वान डॉ. रामप्रसाद मिश्र जब अपनी पुस्तक किसी को समीक्षार्थ भेंट करते थे तो वे 'समीक्षार्थ' न लिखकर 'न्यायार्थ' लिखा करते थे।
रचनाकार का मस्तिष्क और ह्रदय, अपने आसपास फैले सृष्टि-विस्तार और उसके क्रिया-व्यापारों को अपने सोच एवं दृष्टिकोण से ग्रहण करता है। बाह्य वातावरण का मन पर सुखात्मक अथवा पीड़ात्मक प्रभाव पड़ता है। उससे कभी संवेद नात्मक शिराएँ पुलकित हो उठती हैं अथवा तड़प उठती हैं। स्थूल सृष्टि और मानवीय भाव-जगत तथा उसकी अनुभूति एक नये चेतन संसार की सृष्टि कर उसके साथ संलाप का सेतु निर्मित कर, कल्पना लोक में विचरण करते हुए कभी लयबद्ध निनाद करता है तो कभी शुष्क, नीरस खुरदुरेपन की प्रतीति से तिलमिला उठता है।


गीत-नवगीत संग्रह 'काल है संक्रांति का' के रचनाकार आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' श्रेष्ठ साहित्यिक पत्रिका 'दिव्य नर्मदा' के यशस्वी संपादक रहे हैं जिसमें वे समय के साथ चलते हुए १९९४ से अंतरजाल पर अपने चिट्ठे (ब्लॉग) के रूप में निरन्तर प्रकाशित करते हुए अब तक ४००० से अधिक रचनाएँ प्रकाशित कर चुके हैं। अन्य अंतर्जालीय मंचों (वेब साइटों) पर भी उनकी लगभग इतनी ही रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी हैं। वे देश के विविध प्रांतों में भव्य कार्यक्रम आयोजित कर 'अखिल भारतीय दिव्य नर्मदा अलंकरण' के माध्यम से हिंदी के श्रेष्ठ रचनाकारों के उत्तम कृतित्व को वर्षों तक विविध अलंकरणों से अलंकृत करने, सत्साहित्य प्रकाशित करने तथा पर्यावरण सुधर, आपदा निवारण व् शिक्षा प्रसार के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने का श्रेय प्राप्त अभियान संस्था के संस्थापक-अध्यक्ष हैं। इंजीनियर्स फॉर्म (भारत) के महामंत्री के अभियंता वर्ग को राष्ट्रीय-सामाजिक दायित्वों के प्रति सचेत कर उनकी पीड़ा को समाज के सम्मुख उद्घाटित कर सलिल जी ने सथक संवाद-सेतु बनाया है। वे विश्व हिंदी परिषद जबलपुर के संयोजक भी हैं। अभिव्यक्ति विश्वम दुबई द्वारा आपके प्रथम नवगीत संग्रह 'सड़क पर...' की पाण्डुलिपि को 'नवांकुर अलंकरण २०१६' (१२०००/- नगद) से अलङ्कृत किया गया है। अब तक आपकी चार कृतियाँ कलम के देव (भक्तिगीत), लोकतंत्र का मक़बरा तथा मीत मेरे (काव्य संग्रह) तथा भूकम्प ले साथ जीना सीखें (लोकोपयोगी) प्रकाशित हो चुकी हैं।

सलिल जी छन्द शास्त्र के ज्ञाता हैं। दोहा छन्द, अलंकार, लघुकथा, नवगीत तथा अन्य साहित्यिक विषयों के साथ अभियांत्रिकी-तकनीकी विषयों पर आपने अनेक शोधपूर्ण आलेख लिखे हैं। आपको अनेक सहयोगी संकलनों, स्मारिकाओं तथा पत्रिकाओं के संपादन हेतु साहित्य मंडल श्रीनाथद्वारा ने 'संपादक रत्न' अलंकरण से सम्मानित किया है। हिंदी साहित्य सम्मलेन प्रयाग ने संस्कृत स्त्रोतों के सारगर्भित हिंदी काव्यानुवाद पर 'वाग्विदाम्बर सम्मान' से सलिल जी को सम्मानित किया है। कहने का तात्पर्य यह है कि सलिल जी साहित्य के सुचर्चित हस्ताक्षर हैं। 'काल है संक्रांति का' आपकी पाँचवी प्रकाशित कृति है जिसमें आपने दोहा, सोरठा, मुक्तक, चौकड़िया, हरिगीतिका, आल्हा अदि छन्दों का आश्रय लेकर गीति रचनाओं का सृजन किया है।
भगवन चित्रगुप्त, वाग्देवी माँ सरस्वती तथा पुरखों के स्तवन एवं अपनी बहनों (रक्त संबंधी व् मुँहबोली) के रपति गीतात्मक समर्पण से प्रारम्भ इस कृति में संक्रांतिकाल जनित अराजकताओं से सजग करते हुए चेतावनी व् सावधानियों के सन्देश अन्तर्निहित है। 

'सूरज को ढाँके बादल
सीमा पर सैनिक घायल
नाग-सांप फिर साथ हुए
गुँजा रहे वंशी मादल
लूट-छिप माल दो
जगो, उठो।'


उठो सूरज, जागो सूर्य आता है, उगना नित, आओ भी सूरज, उग रहे या ढल रहे?, छुएँ सूरज, हे साल नये आदि शीर्षक नवगीतों में जागरण का सन्देश मुखर है। 'सूरज बबुआ' नामक बाल-नवगीत में प्रकृति उपादानों से तादात्म्य स्थापित करते हुए गीतकार सलिल जी ने पारिवारिक रिश्तों के अच्छे रूपक बाँधे हैं- 

'सूरज बबुआ!
चल स्कूल।
धरती माँ की मीठी लोरी
सुनकर मस्ती खूब करी।
बहिम उषा को गिर दिया
तो पिता गगन से डाँट पड़ीं।
धूप बुआ ने लपक उठाया
पछुआ लायी
बस्ते फूल।'


गत वर्ष के अनुभवों के आधार पर 'में हिचक' नामक नवगीत में देश की सियासी गतिविधियों को देखते हुए कवी ने आशा-प्रत्याशा, शंका-कुशंका को भी रेखांकित किया है।

'नये साल
मत हिचक
बता दे क्या होगा?
सियासती गुटबाजी
क्या रंग लाएगी?
'देश एक' की नीति
कभी फल पाएगी?
धारा तीन सौ सत्तर
बनी रहेगी क्या?
गयी हटाई
तो क्या
घटनाक्रम होगा?'


पाठक-मन को रिझाते ये गीत-नवगीत देश में व्याप्त गंभीर समस्याओं, बेईमानी, दोगलापन, गरीबी, भुखमरी, शोषण, भ्रष्टाचार, उग्रवाद एवं आतंक जैसी विकराल विद्रूपताओं को बहुत शिद्दत के साथ उजागर करते हुए गम्भीरता की ओर अग्रसर होते हैं।
बुंदेली लोकशैली का पुट देते हुए कवि ने देश में व्याप्त सामाजिक, आर्थिक, विषमताओं एवं अन्याय को व्यंग्यात्मक शैली में उजागर किया है। 

मिलती काय ने ऊँचीबारी
कुर्सी हमखों गुईंया
पैला लेऊँ कमिसन भारी
बेंच खदानें सारी
पाँछू घपले-घोटालों सों
रकम बिदेस भिजा री


समीक्ष्य कृति में 'अच्छे दिन आने वाले' नारे एवं स्वच्छता अभियान को सटीक काव्यात्मक अभिव्यक्ति दी गयी है। 'दरक न पायेन दीवारें नामक नवगीत में सत्ता एवं विपक्ष के साथ-साथ आम नागरिकों को भी अपनी ज़िम्मेदारियों के प्रति सचेष्ट करते हुए कवि ने मनुष्यता को बचाये रखने की आशावादी अपील की है।
कवी आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' ने वर्तमान के युगबोधी यथार्थ को ही उजागर नहीं किया है अपितु अपनी सांस्कृतिक अस्मिता के प्रति सुदृढ़ आस्था का परिचय भी दिया है। अतः, यह विश्वास किया जा सकता है कि कविवर सलिल जी की यह कृति 'काल है संक्रांति का' सारस्वत सराहना प्राप्त करेगी।


  • पुस्तक -काल है संक्रांति का, गीत-नवगीत संग्रह, आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल', प्रथम संस्करण 2016, आकार 22 से.मी. x 13.5 से.मी., आवरण बहुरंगी, पेपरबैक जैकेट सहित, पृष्ठ 128, मूल्य जन संस्करण 200/-, पुस्तकालय संस्करण 300/-, समन्वय प्रकाशन, 204 विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन जबलपुर-482003]

आचार्य भगवत दुबे


पिसनहारी मढ़िया के निकट,
जबलपुर-482003
फ़ोन-9300613975

मंगलवार, 12 अप्रैल 2016

पुस्तक समीक्षा: स्मृतियाँ और शुभेच्छाएँ नहीं मानतीं ‘सरहदें’-ऋषभदेव शर्मा




सुबोध श्रीवास्तव (1966) कविता, गीत, गज़ल, दोहे, मुक्तक, कहानी, व्यंग्य, निबंध, रिपोर्ताज और बाल साहित्य जैसी विविध साहित्यिक विधाओं में दखल रखने वाले बहुआयामी प्रतिभा के धनी कलमकार है। पत्रकारीय लेखन के अतिरिक्त वे अपने काव्य संग्रह ‘पीढ़ी का दर्द’, लघुकथा संग्रह ‘ईर्ष्या’, बालकथा संग्रह ‘शेरनी माँ’ और ई-पत्रिका ‘सुबोध सृजन’ के लिए पर्याप्त चर्चित हैं।‘सरहदें’ (2016) उनका दूसरा कविता संग्रह है।

‘सरहदें’ में सुबोध श्रीवास्तव की 51 कविताएँ हैं जिन्हें दो खंडों में रखा गया है – 42 ‘सरहदें’ खंड में और 9 ‘एहसास’ खंड में. ‘एहसास’ में सम्मिलित रचनाओं को ‘प्रेम कविताएँ’ कहा गया है। यह वर्गीकरण न किया जाए, तो सारी कविताएँ मिलकर स्वयं स्वतंत्र पाठ रचने में समर्थ हैं। यह पाठ सरहद के विभिन्न रूपों से संबंधित है। हदें और सरहदें मनुष्य के वैयक्तिक और सामाजिक आचरण को नियंत्रित करती हैं। वैयक्तिकता जहाँ बे-हद और अन-हद की जिद करती है वहीं सामाजिकता सर्वत्र और सर्वदा हदों का निर्धारण करती चलती है। ‘सीमित’ और ‘सीमातीत’ के द्वंद्व में से उपजती है मनुष्यों, राष्ट्रों, समाजों और समस्त जगत के आपसी संबंधों की विडंबनाएँ। सुबोध श्रीवास्तव इन विडंबनाओं को पहचानते ही नहीं, जीते भी हैं। इस जीवंत अनुभूति से ही रची गई हैं ‘सरहदें’ की ये कविताएँ।

‘सरहदें’ हमारा समकाल या वर्तमान है। कविमन समकाल का अतिक्रमण करके कभी अतीत में जाता है तो कभी भविष्य में. अतीत स्मृतियों में वर्तमान रहता है तो भविष्य शुभेच्छा में वर्तमान रहता है। अभिप्राय यह है कि वर्तमान का सच होते हुए भी सरहदें स्मृतियों और शुभेच्छाओं को बाधित नहीं करतीं। स्मृतियाँ और शुभेच्छाएँ किसी सरहद को नहीं मानतीं। कविमन भी किसी सरहद को कब मानता है! सुबोध श्रीवास्तव की कविताओं में एक खास तरह का कथासूत्र विद्यमान रहता है जो कविताओं को संवाद की नाटकीयता प्रदान करता है। अपनी वैचारिकता को स्थापित करने के लिए कवि ने प्रश्नों, तर्कों और सीधे संबोधनों का अनेक स्थलों पर प्रयोग किया है। कवि की अपनी अभिप्रेत दुनिया की व्यवस्था का पता वे रचनाएँ देती हैं जो संभावनाओं और शुभेच्छाओं से भरी हुई हैं। 

सुबोध बच्चों को मनुष्य में विद्यमान सहजता और दिव्यता के अंश के रूप में देखते हैं और वह उनके लिए भविष्य का भी प्रतीक है। स्वार्थ, हिंसा और आतंक से भरी दुनिया में जहरीले कीड़े को बचाता नन्हा बच्चा अपनी निस्संगता में मानवता का संरक्षक बन जाता है. बच्चे और भी हैं। वर्षा के जल में खेलते अधनंगे बच्चे कवि को अतीत में ले जाते हैं – घर और बचपन की स्मृतियों में। ऐसा प्रतीत होता है कि कवि असमय इन दोनों से बिछुड़ गया है। घर, शायद इसीलिए इन कविताओं में पीड़ा और वेदना का स्रोत बनकर उभरा है। कवि की यह शुभेच्छा अनेक रूपों में व्यक्त हुई है कि एक दिन ‘टूटकर रहेंगी सरहदें’ और सरहद के इस पार के बच्चे जब उल्ल्हड़ मचाते सरहद के करीब से गुजरेंगे तो उस पार के बच्चे भी साथ खेलने को मचल उठेंगे – “फिर सब बच्चे/ हाथ थाम कर/ एक दूसरे का/ दूने उत्साह से/ निकल जाएँगे दूर/ खेलेंगे संग-संग/ गाएँगे गीत/ प्रेम के, बंधुत्व के/ तब/ न रहेंगी सरहदें/ न रहेंगी लकीरें.” ‘सरहदें’ का विखंडन करने पर यही तथ्य सामने आता है कि कवि बात तो सरहदों की कर रहा है लेकिन सरहदों के ‘न होने’ का प्रबल हामी है। यह तथ्य कवि की मुक्ति चेतना का द्योतक है। यह मुक्ति चेतना हर सरहद को नकारती है, बावजूद इसके कि बार-बार सरहदों की स्वीकृति आ उपस्थित होती है। कवि जब आह्वान करता है – ‘निकलो/ देहरी के उस पार/ वंदन अभिनंदन में/ श्वेत अश्वों के रथ पर सवार/ नवजात सूर्य के’ ××× ‘उठो निकलो/ देहरी के उस पार/ इंतजार में है वक्त’ तो वह ऐसी बेहतर दुनिया का स्वप्न देख रहा होता है जहाँ सरहदें न हों। इसीलिए आतंक की खेती करने वालों को उनकी कविता सीधे संबोधित करते हुए कहती है – ‘तुम्हें/ भले ही भाती हो/ अपने खेतों में खड़ी/ बंदूकों की फसल/ लेकिन -/ मुझे आनंदित करती है/ पीली-पीली सरसों/ और/ दूर तक लहलहाती/ गेहूं की बालियों से  उपजता/ संगीत./ तुम्हारे बच्चों को/ शायद/ लोरियों सा सुख भी देती होगी/ गोलियों की तड़तड़ाहट/ लेकिन/ सुनो..../ कभी खाली पेट नहीं भरा करतीं/ बंदूकें,/ सिर्फ कोख उजाड़ती हैं’।

यादों में वह शक्ति है जिसके सामने सरहदें कायम नहीं रह पातीं। घर हो या समाज या देश या दुनिया – हृदय की रागात्मकता इनमें से किसी को भी हदों और सरहदों में बाँधने और बाँटने में यकीन नहीं रखती – ‘हमेशा/ कायम नहीं रहतीं/ सरहदें.../ याद है मुझे/ उस रोज/ जब/ अतीत की कड़वाहट/ भूलकर/ उसने/ भूले-बिसरे/ सपनों को फिर संजोया,/ यादों के घरौंदे में रखी/ प्यार की चादर ओढ़ी/ और/ उम्मीद की उंगली थामकर/चल  पड़ा/ ‘उसे’ मनाने./ तेज आवाज के साथ टूटीं/ सरहदें/ और/ रूठ कर गई जिंदगी/ वापस दौड़ी चली आई...।’ कवि को विश्वास है कि सरहदें टूटने से ही चुप्पी की दुनिया का विनाश संभव है क्योंकि इस चुप्पी ने ही ऐसी स्थितियाँ उत्पन्न की है कि यादों को स्थगित करके कवि को नियतिवादी बनना पड़ा है – ‘हम सफर/ गुजरे वक्त को/ याद करके/ विचलित न करो मन को/ मेरा मुजरिम/ तू नहीं/ नियति है/ जिस पर किसी का जोर नहीं।’ सीमाओं और मर्यादाओं को स्वीकार करते हुए भी नियति और विवशता के बहाने हम उन्हें अस्वीकार और स्थगित ही तो करते हैं। अपनी-अपनी हदों में बंधे हम एक दूसरे की खुशी और मजबूरी की दुहाई देते रहते हैं – ‘सरहद, न तेरी थी कोई/ सरहद, न मेरी थी कोई/ वो खुशी थी कल की/ ये विवशता है आज की/ इक सरहद तेरी भी/ है इक सरहद मेरी भी...!’ 

कुलमिलाकर सरहदें हमें शिद्धत के साथ यह अहसास कराती हैं कि हमें उनका अतिक्रमण करने का पूरा हक है। इसीलिए कवि न तो चाँद को चाहता है, न सूरज को और न आकाश को। न वह चाँद, सूरज और आकाश जैसा होना चाहता है। वह तो अपने शाश्वत अस्तित्व की समस्त संभावनाओं के साथ बस हर सरहद का अतिक्रमण करना चाहता है। कुछ इस तरह कि..

मैं घुलना चाहता हूँ 
खेतों की सोंधी माटी में, 
गतिशील रहना चाहता हूँ 
किसान के हल में, 
खिलखिलाना चाहता हूँ 
दुनिया से अनजान 
खेलते बच्चों के साथ,
हाँ, मैं चहचहाना चाहता हूँ 
सांझ ढले/ घर लौटते 
पंछियों के संग-संग, 
चाहत है मेरी 
कि बस जाऊं/ वहाँ-वहाँ 
जहाँ –
सांस लेती है जिंदगी 
और/ यह तभी संभव है 
जबकि 
मेरे भीतर जिंदा रहे
एक आम आदमी!


  • पुस्तक-सरहदें/ कविता संग्रह
  • कवि-सुबोध श्रीवास्तव
  • पृष्ठ-96
  • मूल्य-120 रुपये
  • बाईंडिंग-पेपरबैक
  • प्रकाशक-अंजुमन प्रकाशन,
  • 942 मुट्ठीगंज, इलाहाबाद,
  • उत्तर प्रदेश (भारत)
  • मोबाइल: +91-9453004398
  • ISBN12: 9789383969722
  • ISBN10: 9383969722
  • http://www.anjumanpublication.com

प्रो. ऋषभदेव शर्मा 


(पूर्व आचार्य एवं अध्यक्ष,
उच्च शिक्षा और शोध संस्थान,
दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, हैदराबाद)
208-ए, सिद्धार्थ अपार्टमेंट्स,
गणेश नगर, रामंतापुर– 500013 
मोबाइल - 08121435033
ईमेल – rishabhadeosharma@yahoo.com

मंगलवार, 15 मार्च 2016

पुस्तक समीक्षा: कोई रोता है मेरे भीतर-आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'




                               जीने की लालसा उत्पन्न करती कवितायें 


कविता और ज़िन्दगी का नाता सूरज और धूप का सा है। सूरज ऊगे या डूबे, धूप साथ होती है। इसी तरह मनुष्य का मन सुख अनुभव करे या दुख अभिव्यक्ति कविता के माध्यम से हो होती है। मनुष्येतर पशु-पक्षी भी अपनी अनुभूतियों को ध्वनि के माध्यम से व्यक्त करते हैं। ऐसी ही एक ध्वनि आदिकवि वाल्मीकि की प्रथम काव्याभिव्यक्ति का कारण बनी। कहा जाता हैं ग़ज़ल की उत्पत्ति भी हिरणी के आर्तनाद से हुई। आलोक जी के मन का क्रौंच पक्षी या हिरण जब-जब आदमी को त्रस्त होते देखता है, जब-जब विसंगतियों से दो-चार होता है, विडम्बनाओं को पुरअसर होते देखता तब-तब अपनी संवेदना को शब्द में ढाल कर प्रस्तुत कर देता है।

कोई रोता है मेरे भीतर ५८ वर्षीय कवि आलोक वर्मा की ६१ यथार्थपरक कविताओं का पठनीय संग्रह है। इन कविताओं का वैशिष्ट्य परिवेश को मूर्तित कर पाना है। पाठक जैसे-जैसे कविता पढ़ता जाता है उसके मानस में संबंधित व्यक्ति, परिस्थिति और परिवेश अंकित होता जाता है। पाठक कवि की अभिव्यक्ति से जुड़ पाता है। 'लोग देखेंगे' शीर्षक कविता में कवि परोक्षत: इंगित करता है की वह कविता को कहाँ से ग्रहण करता है-

शायद कभी कविता आएगी / हमारे पास 
जब हम भाग रहे होंगे सड़कों पर / और लिखी नहीं जाएगी 
शायद कभी कविता आएगी / हमारे पास 
जब हमारे हाथों में / दोस्त का हाथ होगा 
या हम अकेले / तेज बुखार में तप रहे होंगे / और लिखी नहीं जाएगी

दैनंदिन जीवन की सामान्य सी प्रतीत होती परिस्थितियाँ, घटनाएँ और व्यक्ति ही आलोक जी की कविताओं का उत्स हैं। इसलिए इन कविताओं में आम आदमी का जीवन स्पंदित होता है। अनवर मियाँ, बस्तर २०१०, फुटपाथ पर, हम साधारण, यह इस पृथ्वी का नन्हा है आदि कविताओं में यह आदमी विविध स्थितियों से दो-चार होता पर अपनी आशा नहीं छोड़ता। यह आशा उसे मौत के मुँह में भी जिन्दा रहने, लड़ने और जितने का हौसला देती है। 'सब ठीक हो जायेगा' शीर्षक कविता आम भारतीय को शब्दित करती है -

सुदूर अबूझमाड़ का / अनपढ़ गरीब बूढ़ा 
बैठा अकेला महुआ के घने पेड़ के नीचे 
बुदबुदाता है धीरे-धीरे / सब ठीक हो जायेगा एक दिन 

यह आशा काम ढूंढने शहर के अँधेरे फुथपाथ पर भटके, अस्पताल में कराहे या झुग्गी में पिटे, कैसा भी भयावह समय हो कभी नहीं मरती। समाज में जो घटता है उस देखता-भोगता तो हर शख्स है पर हर शख्स कवि नहीं हो सकता। कवि होने के लिए आँख और कान होना मात्र पर्याप्त नहीं। उनका खुला होना जरूरी है- 

जिनके पास खुली आँखें हैं / और जो वाकई देखते हैं.... 
... जिनके पास कान हैं / और जो वाकई सुनते हैं 
सिर्फ वे ही सुन सकते हैं / इस अथाह घुप्प अँधेरे में 
अनवरत उभरती-डूबती / यह रोने की आर्त पुकार।
'एक कप चाय' को हर आदमी जीता है पर कविता में ढाल नहीं पाता- 
अक्सर सुबह तुम नींद में डूबी होगी / और मैं बनाऊंगा चाय 
सुनते ही मेरी आवाज़ / उठोगी तुम मुस्कुराते हुए 
देखते ही चाय कहोगी / 'फिर बना दी चाय' 
करते कुछ बातें / हम लेंगे धीरे-धीरे / चाय की चुस्कियाँ 
घुला रहेगा प्रेम सदा / इस जीवन में इसी तरह 
दूध में शक्कर सा / और छिपा रहेगा 
फिर झलकेगा अनायास कभी भी 
धूमकेतु सा चमकते और मुझे जिलाते 
कि तुम्हें देखने मुस्कुराते / मैं बनाना चाहूँगा / ज़िंदगी भर यह चाय 
यूं देखे तो / कुछ भी नहीं है 
पर सोचें तो / बहुत कुछ है / यह एक कप चाय

अनुभूति को पकड़ने और अभिव्यक्त करने की यह सादगी, सरलता, अकृत्रिमता और अपनापन आलोक जी की कविताओं की पहचान हैं। इन्हें पढ़ना मात्र पर्याप्त नहीं है। इनमें डूबना पाठक को जिए क्षणों को जीना सिखाता है। जीकर भी न जिए गए क्षणों को उद्घाटित कर फिर जीने की लालसा उत्पन्न करती ये कवितायें संवेदनशील मनुष्य की प्रतीति करती है जो आज के अस्त-वस्त-संत्रस्त यांत्रिक-भौतिक युग की पहली जरूरत है।

पुस्तक- कोई रोता है मेरे भीतर,कविता संग्रह-आलोक वर्मा,
वर्ष २०१५, ISBN ९७८-९३-८५९४२-०७-५,आकार डिमाई,
आवरण, बहुरंगी, पेपरबैक, पृष्ठ १२०, मूल्य १००/-,
बोधि प्रकाशन, ऍफ़ ७७ सेक्टर ९, पथ ११, करतारपुरा
औद्योगिक क्षेत्र, बाईस गोदाम, जयपुर-३०२००६, 


आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' 


समन्वयम,
२०४-विजय अपार्टमेंट,
नेपियर टाउन जबलपुर ४८२००१,
मो. ९४२५१८३२४४, 
ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com