कमला कृति

मंगलवार, 11 जुलाई 2017

चार गीत: कल्पना मनोरमा


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


रजनीगंधा स्वाँस-स्वाँस मॆं...


रजनीगंधा स्वाँस-स्वाँस मॆं 
याद पुरानी भर छलकाते 
वे वसंत के मौसम फ़िर-फ़िर 
किसलय-किसलय वन मुस्काते ।

दर्पण से नैना जब मिलते 
सुधियों के मृदु बंधन खुलते
दुलराती जब पकल पुतलियां
पुलकित हो दृग बिंदु मचलते 

वे दिन-रात रुपहले तारे 
फ़िर-फ़िर गीत पुराने गाते

मन अनुगामित राहें चलता 
दीप नेह  का दिप-दिप जलता 
समय सजाता स्वर्ण-मुकुट जब 
राग- विराग हृदय से मिटता 

वे फागुन के रँग चटकीले 
फ़िर-फ़िर रँग नया दे जाते

परिधि गगन आँगन-सी लगती 
नूपुर  रुनझुन-रुनझुन बजती 
सिंदूरी अलसित आभा मॆं 
प्रीत किसी की रह-रह छलती 

वे अनबोले स्वप्न सजीले 
फ़िर-फ़िर दंग हमें कर जाते ।


विश्वास जगा कर रखना है...


दीपक को तम मॆं अपना 
आभास बचा कर रखना है 
भले दिशाएं हों भ्रामक 
विश्वास जगा कर रखना है ॥

मन से मन मिलने की तो 
अब बात न करना 
आना घर संध्या से पहले 
रात न करना

जीवन के मधु छंदों से 
इतिहास सजा कर रखना है ॥

समय खेलता खेल समय पर 
तुम मत डरना 
दुविधाओं के नयनों मॆं 
तुम अभिमत भरना

वय सर के पंकिल तट पर 
उल्लास उगा कर रखना है ॥

चटकीले रंगों मॆं खोये 
उत्सव के रंग 
बाज़ारों मॆं थिरक रहे 
घर के सूखे अंग

वैदिक परम्परा वाले 
अभ्यास जमा कर रखना है ॥


दंश सहते हैं...


दंश सहते हैं 
मगर उत्साह को साधे हुए हैं 
सरहदों के बीच मॆं 
आकाश को साधे हुए हैं

जा रहे रणबांकुरे निज 
छोड़कर घरबार जो 
होश मॆं लेकर उमंगें 
हृदय मॆं परिवार को

ज़हर पीते है 
मगर अभ्यास कर साधे हुए हैं 
दुश्मनों के बीच मॆं 
उल्लास को साधे हुए हैं ॥

चाँदनी रातें सुनाती 
प्रेम की जब चिट्ठियां 
तैर जातीं सामने वो 
मद भरी-सी कनखियां

बहक जाते हैं 
मगर विश्वास को साधे हुए हैं 
हसरतों के बीच मॆं 
निश्वास को साधे हुए हैं॥

ब्याह ली तलवार तोपों 
को बना ली संगनी
युद्ध के मैदान मॆं है 
जीत बनती रंगनी

जान देते हैं 
मगर इतिहास को साधे हुए हैं 
पतझरों के बीच मॆं 
मधुमास को साधे हुए हैं 


मन ही मन सकुचाई धूप,,.


अगहन,पूस,माघ से मिलकर 
मन ही मन सकुचाई धूप॥

बदन सुखाये भोर 
शबनमी 
कली -कली मुस्काये 
गेँदे के कुर्ते मॆं उपवन 
लहर -लहर लहराये
चुनरी अटकी जा फुनगी पर 
जिसको देख लजाई धूप ॥

आँगन सिमटे कोने-कोने 
महकी चाय पतीली 

जली अँगीठी बतरस वाली 
सर्दी हुई रँगीली
प्रात गोद मॆं ठिठुरा सूरज 
लगती गंग नहाई धूप ॥

कोहरे की चादर मॆं लपटे
तारे जब घर आयें 
दुलराएं माँएं  छौंनों को 
पंछी नीड़  सजायें
आई शीत पालकी ज्यों ही 
देखो  हुई  पराई  धूप॥


कल्पना मनोरमा


  • जन्मतिथि- 04 जून, 1972
  • जन्मस्थान-ग्राम अटा, जनपद औरैया (उ०प्र०)
  • पिता-श्री प्रकाश नारायण मिश्रा
  • माता-स्व.श्रीमती मनोरमा मिश्रा
  • शिक्षा-एम॰ए॰ हिन्दी (बी॰एड)
  • लेखन-स्वतंत्र लेखन 
  • पुरस्कार-दोहा शिरोमणि सम्मान, लघुकथा-लहरी-सम्मान, मुक्तक गौरव, 
  • कुन्डलनी भूषण सम्मान।
  • प्रकाशित कृतियाँ- पहला गीत-नवगीत संग्रह प्रकाशनाधीन ।
  • संप्रति-स्नातकोत्तर शिक्षिका।
  • संपर्क-सी-5, डब्ल्यूएसी एसएमक्यू, एयरफोर्स स्टेशन, सुब्रोतो पार्क, नई दिल्ली -110010
  • मोबाइल-8953654363/ 9455878280
  • ई-मेल-kalpna2510@gmail.com

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (12-07-2017) को "विश्व जनसंख्या दिवस..करोगे मुझसे दोस्ती ?" (चर्चा अंक-2664) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    उत्तर देंहटाएं