मंगलवार, 13 मई 2014
सोमवार, 12 मई 2014
शनिवार, 26 अप्रैल 2014
'आधुनिक साहित्य' पत्रिका के अप्रैल-जून-2014 अंक में सुबोध श्रीवास्तव की कविताएं...
'आधुनिक साहित्य' पत्रिका के अप्रैल-जून-2014 अंक में सुबोध श्रीवास्तव की कविताए..
http://hellohindi.com/data/documents/Aadhunik-Sahitya-April-June-2014.pdf
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गुरुवार, 20 फ़रवरी 2014
मंगलवार, 12 नवंबर 2013
हरि नारायण तिवारी का गीत
निधरक बहा नहीं जाता है
जो लिखवाना चाह रहे तुम,
मुझसे लिखा नहीं जाता है।।
स्वार्थ सिद्धि की जिसमें रव हो,
जीवित रहते जो मन शव हो।
उसकी कहनी लोक जगत में,
खुलकर कहा नहीं जाता है।।
सुलभ न हो जिस तरुवर के फल,
नित्य नई अभिलाषा प्रति पल।
रसना के उन उच्छवासों में,
निधरक बहा नहीं जाता है।।
हम निर्जन में जन धन वाले,
अपने अन्तर उपवन वाले।
झूम झूमकर उसके रस में,
सुखमय स्वाद नहीं आता है।।
कल्प वृक्ष की हम पर दाया,
सदा सुहावन रहती छाया।
निर्मल रहना जीना सीखा,
कलुषित कर्म नहीं भाता है।।
हम हैं राह बनाते जाते,
सच सबको समझाते जाते,
सभी हमारे हम सबके हैं,
रखता मानवता से नाता।।
--
-हरि नारायण तिवारी
बी-112, विश्व बैंक कालोनी,बर्रा, कानपुर-27
सोमवार, 28 अक्टूबर 2013
चार मुक्तक /हरि नारायण तिवारी
(एक)
बड़े-बड़े सरताज बदल जाते हैं
सुर संग्राम के साज बदल जाते हैं,
बड़े-बड़े सरताज बदल जाते हैं।
होता है बलवान समय का फेरा,
राजाओं के राज बदल जाते हैं।।
--
(दो)
कभी-कभी संवाद बदल जाते हैं,
सम्बन्धी औलाद बदल जाते हैं।
जब प्रतिकूल पवन हो जाता जी,
कदम-कदम उस्ताद बदल जाते हैं।।
--
(तीन)
साहूकार घटे हैं जो थे सवा बनाने को,
लोग लिप्त हैं अब तो नकली दवा बनाने को।
पूरा माल हजम करने को अजगर बैठे हैं,
बड़े-बड़े दिग्गज लगते हैं हवा बनाने को।।
--
(चार)
झूठे मन वाले को सच्ची शपथ दिलाते हैं,
वे इतने उस्ताद कि जल में दूध मिलाते हैं।
फिर भी उन्हें मान्यवर कहकर इज्जत देते हम,
कोतवालों को चोर ही अब तो डाट पिलाते हैं।।
-हरि नारायण तिवारी
बी-112, विश्व बैंक कालोनी,
बर्रा, कानपुर-27
बड़े-बड़े सरताज बदल जाते हैं
सुर संग्राम के साज बदल जाते हैं,
बड़े-बड़े सरताज बदल जाते हैं।
होता है बलवान समय का फेरा,
राजाओं के राज बदल जाते हैं।।
--
(दो)
कभी-कभी संवाद बदल जाते हैं,
सम्बन्धी औलाद बदल जाते हैं।
जब प्रतिकूल पवन हो जाता जी,
कदम-कदम उस्ताद बदल जाते हैं।।
--
(तीन)
साहूकार घटे हैं जो थे सवा बनाने को,
लोग लिप्त हैं अब तो नकली दवा बनाने को।
पूरा माल हजम करने को अजगर बैठे हैं,
बड़े-बड़े दिग्गज लगते हैं हवा बनाने को।।
--
(चार)
झूठे मन वाले को सच्ची शपथ दिलाते हैं,
वे इतने उस्ताद कि जल में दूध मिलाते हैं।
फिर भी उन्हें मान्यवर कहकर इज्जत देते हम,
कोतवालों को चोर ही अब तो डाट पिलाते हैं।।
-हरि नारायण तिवारी
बी-112, विश्व बैंक कालोनी,
बर्रा, कानपुर-27
शनिवार, 12 अक्टूबर 2013
देश सुन रहा है...
गीत/ हरि नारायण तिवारी
देश सुन रहा है
जो वह सुना रहे हैं,
वही देश सुन रहा है।
जो जो दिखा रहे हैं,
वही देश गुन रहा है।।1।।
हम लोग बहु पठित हैं,
कुछ वर्ग संगठित हैं।
लेकिन अपढ़ अभी भी,
मौजूद परिगणित हैं।
रमुआ का पढ़ा बेटा,
क्या चीज बुन रहा है।।1।।
सड़कों का शोर घर-घर,
आवाज दे रहा है।
भाषण की गूढ़ता का,
अनुवाद कर रहा है।
वोटर समेटने की,
दीवान चुन रहा है।।2।।
भूखा कहाँ पड़ा है,
सूखा कहाँ पड़ा है।
बेघर के पास जाकर,
लालच लिये खड़ा है।
तिकड़म की अंगणित में,
हरि भी निपुण रहा।।3।।
हरि नारायण तिवारी
बी-112, विश्व बैंक कालोनी,बर्रा, कानपुर-27
मो. 9936770560
फोन 0512-2680865
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