कमला कृति

रविवार, 10 फ़रवरी 2019

डॉ.राजेन्द्र वर्मा की वासंती रचनाएँ


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


मौसम भी वाचाल हो रहा..(गीत)


मौसम भी वाचाल हो रहा,
आओ, कुछ बतिया लें !

आया है वसन्त बाग़ों में, 
मुसकातीं कलियाँ लाखों में,
हर दिशि में सौरभ बिखरा है,
धरती पर अनंग उतरा है,

भौरे भी अलमस्त गा रहे,
कुछ मस्ती हथिया लें ।

गेहूँ पर कैशौर्य छा गया,
हुक्के लेकर चना आ गया,
सरसों की चुनरी पियरायी,
प्रकृति-पालने स्वस्ति पल रही,
इस पर भी पतिया लें ।

रंगों का मौसम आने को,
औघड़ फागुन बौराने को, 
नागफनी लगती पलाश है, 
उसको भी पी की तलाश है, 

पुरवा प्रीति-पत्रिका बाँचे,
क्यों न उसे छतिया लें !


पोर-पोर जीवन..


धारयित्री को 
नवजीवन देने
आया वसन्त !

पञ्चवाण ने 
देख भर लिया है 
वसुन्धरा को, 
पूर्ण कामना; 
मिला नव्य यौवन 
पीत जरा को 

दसों दिशाएँ 
स्वागत को आतुर,
आओ महन्त !

देह हुई है 
कंचन-कंचन--सी 
उष्मा पाकर; 
नयी कोपलें, 
पोर-पोर जीवन,
हर्षा अन्तर, 

कल्पद्रुम है 
एक-एक फुनगी,
शोभा अनन्त!

जब आया मधुमास (दोहे)


स्वागत में ऋतुराज के, बिछे पर्णकालीन ।
वन्दन-अभिनन्दन करें, दिशि-दिशि भ्रमर प्रवीन ।।

धरती का वैकल्य लख, आ पहुँचा ऋतुराज ।
नवकोपल के वस्त्र से, लगा ढाँपने लाज ।।

नयी कोपलों से हुआ, वट लज्जा से लाल ।
पीपल ताली पीटता, देख विटप के हाल ।।

फूलों पर छायी हँसी, कलियों पर मुस्कान ।
पत्ती-पत्ती चंचला, सुन भ्रमरों का गान ।।

फुनगी-फुनगी हँस रही, पल्लव उगे नवीन ।
हर कोई रसवन्त है, रहा न कोई हीन ।।

आम्रकुंज में मंजरी, देती मदिर सुवास ।
कचनारी कलियाँ खिलीं, निरख-निरख मधुमास ।।

दसों  दिशाओं में भरी, मनमोहनी सुगन्ध ।
भीनी-भीनी गन्ध से, मौसम का अनुबन्ध ।।

कामदेव के बाण से, आहत अंग-प्रत्यंग ।
महादेव की भी हुई कठिन तपस्या भंग ।।

खुलने को व्याकुल हुए, लाज-शरम के बन्द ।
ऐसे में कैसे रचे, मन संयम के छन्द !

पतझर और वसन्त से, प्रकृति बनी अभिराम ।
शिव-ब्रह्मा जैसे करें, अपना-अपना काम ।।


वसन्त आया (कविता)


आ चलें, देखें, वसन्त आया !

गया पतझर दिगम्बर,  

धरा सजने लगी—
फ़सल गेहूँ की’ जैसे हो हरी चूनर,
खिली सरसों की’ छापी पीतवर्णी,
किनारी-सी सजी है बर्र, देखो, नीलवर्णी,
लगी हैं कानाफुस्की में किशोरी बालियाँ,
सहेली बन हवा करने लगी अठखेलियाँ,
मटर की छीमियों के पड़ गये झूले
उठाये हाथ में हुक्के चने फूले,
किनारे खेत में चुप है खड़ा गन्ना 
बीज बनने की प्रतीक्षा में,
रस पिलायेगा वो अगले साल ।
ख़ुशी से कूकती कोयल
कि आया आम पर फिर बौर,
मगन-मन खोजता महुआ,
कहाँ है वारुणी का ठौर ?
तपस्वी वट के सिर बैठीं  
सहस्रों कोपलें,
कि उसके हाल पर ताली बजाता 
हँस रहा पीपल ।
लदा फूलों से हरसिंगार,
सजा सेमल पहन कुण्डल,
गमकती रात की रानी,
दहकते गुलमोहर का है कोई सानी !

खिले हैं पुष्प निर्जन में,

सुरभि व्यापी है कण-कण में।
भ्रमर मचलाः बजायी बीन,
तितलिका भी हुई रंगीन
पवन डोलाः सुरभि बिखरी,
दिशा हर महमहा उट्ठी ।
नयन-भर देखता अम्बर
कि उतरा स्वर्ग धरती पर
नज़र उसको न लग जाए,
कि उसने तान दी चादर—
टँके जिसमें/सहस्रों चाँद-तारे,
सजे जिसमें/सुनहरे-श्वेत-भूरे मेघ कजरारे,
हृदय, आनन्द की वर्षा छुपाये,
धरा के रूप का रसपान करने/दौड़ते आये ।

दिवस बीता ठिठोली में,

हुई सन्ध्या, छलकती लालिमा,
नभ हो गया मधुपात्र जैसे,
जिसे देखो वही नश्शे में जैसे !
क्षितिज के अंक में है क्लान्त दिनकर
विहँस उट्ठी तमिस्रा तान चादर,
अनैतिकता हुई आश्वस्त,
अहा! सूरज हुआ है अस्त ।
मनुज की फिर गयी है मति,
रुके कैसे अधोगति?`

हुई तत्काल बैठक उडुगनों की,

हुआ प्रस्ताव पारित—
उजाला सूर्य का लेकर

बनेगा चन्द्रमा प्रहरी धरा का ।

समुज्ज्वल अमृत की वर्षा, 
चतुर्दिक शान्ति का शासन, 
अघट घटने को था लेकिन,
हुआ है उसका निर्वासन ।

प्रहर अष्टम अभी बस बीतने को,

कि देखो, चन्द्रिका पसरी धरा पर,
कि देखो, ओस बैठी दूर्वा पर,
प्रतीक्षा भोर की करती—
पधारे सूर्य ज्यों ही,
चरन उसके पखारे,
सकल सर्वस्व वारे !
प्राण दूँ मैं भी उसी पर वार,
दीप्त कर दे जो सकल संसार !  
.........................................................................................................................

राजेन्द्र वर्मा 


  • जन्म-8-11-1957 (बाराबंकी, उ.प्र.)
  • प्रकाशन-प्रसारण-गीत,  ग़ज़ल, दोहा, हाइकु, कहानी, लघुकथा, व्यंग्य, निबन्ध आदि 
  • विधाओं में बीस पुस्तकें प्रकाशित । महत्वपूर्ण संकलनों में सम्मिलित । 
  • विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ एवं समीक्षाएँ प्रकाशित ।
  • लखनऊ दूरदर्शन तथा आकाशवाणी से रचनाएँ प्रसारित ।
  • पुरस्कार-सम्मान-उ.प्र.हिन्दी संस्थान के व्यंग्य व निबन्ध-नामित पुरस्कारों सहित देश की 
  • अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित । 
  • अन्य-लखनऊ विश्वविद्यालय द्वारा रचनाकार पर एम्.फिल । अनेक शोधग्रन्थों में संदर्भित । 
  • कुछ लघुकथाओं और ग़ज़लों का पंजाबी में अनुवाद । 
  • चुनी हुई कविताओं का अँगरेज़ी में अनुवाद ।
  • सम्प्रति-भारतीय स्टेट बैंक में मुख्य प्रबन्धक के पद से सेवानिवृत्ति के बाद स्वतन्त्र लेखन। 
  • सम्पर्क-3/29 विकास नगर, लखनऊ (उ.प्र.)-226022  
  • मो. 80096 60096
  • ई-मेल: rajendrapverma@gmail.com

मंगलवार, 29 जनवरी 2019

डा. मधुर बिहारी गोस्वामी के दोहे


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


मिथ्या है अभिमान..


देख जरा मजदूर को, कैसा है बदहाल।
खाने को तरसे सदा,रोटी,चावल,दाल।।

राजनीति भरमा रही, नेता मालामाल।
भूखी जनता चाहती, रोटी,चावल,दाल।।

कहाँ गई अमराइयाँ, कहाँ गए घन घोर।
सूखा ही सूखा दिखे, क्यों नाचे मन-मोर।।

चहूँ ओर हैं दीखते, हरियाली के चोर।
दिख पाएगा कब तलक,यह वनवासी मोर।।

छूटेगा तन एक दिन, होगा काल प्रहार।
झूठा मत अभिमान कर,मेरे प्यारे यार।।

क्यों करता है रात-दिन, मिथ्या है अभिमान।
भीलन लूटी गोपिका, निष्फल अर्जुन बान।।

चार दिनों की चाँदनी, मान सके तो मान।

फिर गहरा अँधियार लख,मत कर तू अभिमान।।

क्यों खोजूँ गिरि कन्दरा, क्यों यमुना के तीर।
मुझको तो कान्हा दिखे,सदा पराई पीर।।

जब पड़ता है काम तो, दुनिया से मुख मोड़।
गर्दभ का आदर करें, बाप कहें, कर जोड़।।

जीवन अब कैसे बचे,दिल में उठती हूक।
जगह-जगह रहजन खड़े, लिए हाथ बन्दूक।।


डा. मधुर बिहारी गोस्वामी


  • जन्मतिथि-25 फरवरी-1953
  • शिक्षा-एम.ए.पी-एच.डी.
  • पद-सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर, एस.बी.जे.महाविद्यालय,बिसावर (हाथरस)।
  • लेखन-अनेक पत्रिकाओं में निबंध, दोहे आदि प्रकाशित। आकाशवाणी दिल्ली और मथुरा-वृन्दावन से अनेक वार्ताएँ प्रसारित। अनेक साहित्यिक गोष्ठियों में पत्र वाचन।
  • संपर्क-34, बिहारीपुरा,वृंदावन (मथुरा)।
  • मो.9719648204,8755846327
  • ईमेल-madhurbihari0565@gmail.com
.............................................................................................................................

                    डॉ. मंजु शर्मा सारस्वत सम्मान से अलंकृत


चिरेक इंटरनेश्नल स्कूल की हिंदी विभाग अध्यक्ष डॉ. मंजु शर्मा को श्रीनाथद्वारा (हैदराबाद) में आयोजित विशाल सम्मान समारोह में श्रीनाथद्वारा साहित्य मंडल एवं केन्द्रीय हिंदी संस्थान के सयुंक्त तत्वावधान में ‘ललितशंकर दीक्षित स्मृति सम्मान’ से अलंकृत किया गया। यह सम्मान उन्हें दक्षिण भारत में रहकर हिंदी भाषा और साहित्य की उत्कृष्ट सेवा के लिए की विनोद बब्बर और डॉ. किशोर काबरा जैसे साहित्यकारों की उपस्थिति में डॉ. बीना शर्मा और श्याम जी देवपुरा ने प्रदान किया.सम्मान के अंतर्गत श्री फल,प्रमाण पत्र, अंगवस्त्र, मेवाती पगड़ी और नकद धन राशि शामिल है।

तीन दिन के इस समारोह में देशभरसे आए हिंदी सेवियों और साहित्यकारों ने भाग लिया जिनमेंडॉ. विजय प्रकाश त्रिपाठी (कानपुर), अवधेश शुक्ल( सीतापुर),डॉ सविता चड्ढा(दिल्ली) हेमराज मीणा, कल्पना गवली (बड़ोदरा)अमरेंद्र पत्रकार (लोकसभा चैनल) आदि के नाम प्रमुख हैं। कार्यक्रम के अंतर्गत कुल विचार स्त्र सम्पन्न हुए जिनमें हिंदी भाषा और साहित्य के विविध पक्षों और समस्याओं पर गहन मंथन हुआ. डॉ. मंजु शर्मा ने ‘दक्षिण में हिंदी की स्थिति’ पर अपना आलेख प्रस्तुत किया। उन्होंने यह सुझाव दिया कि दक्षिण में हिंदी की स्वीकार्यता को भावनात्मक स्तर पर बढ़ाने के लिए यह आवश्यक है कि हिंदी भाषी प्रान्तों में  बच्चों को प्राथमिक स्तर से ही एक दक्षिण भारतीय भाषा की शिक्षा दी जाए.उनके इस प्रस्ताव का उपस्थित विद्वानों ने खुले मन से स्वागत किया।

प्रेषक-डॉ. मंजु शर्मा

विभागाध्यक्ष (हिंदी विभाग)
चिरेक इंटरनेश्नल स्कूल कोंडापुर, हैदराबाद।
ईमेल-manju.samiksha@gmail.com

मंगलवार, 1 जनवरी 2019

राजेन्द्र वर्मा के चार नवगीत


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार



एक जनवरी आयी 

         
जींस-टॉप कुहरे के डाले  
एक जनवरी आयी !

महल-अटारी पर न्योछावर

बिजली वाले लट्टू 
अपनी बस्ती के खम्भों में 
लटके बल्ब निखट्टू 

जलते टायर से घबराती

एक जनवरी आयी!

अम्मा को गठिया ने जकड़ा,

बापू को जूड़ी ने 
नींद उड़ा रक्खी भैया की 
जवाँ हुई बेटी ने 

शिक्षा ऋण की नोटिस लेकर 

एक जनवरी आयी ।

दो पैसे की बचत नहीं, 

खेती लेकिन करनी है
केसीसी की किश्त पुरानी  
कैसे भी भरनी है 

आलू पर पाला बरसाती 

एक जनवरी आयी ।       


भाग्य की बही  


नया साल आया,
पर समय वही ।

सर्द-सर्द रातें
गलन-भरे दिन
मौसम की घातें
बेबस पल-छिन

कर्मों पर भारी
भाग्य की बही ।

फटी रजाई है
फटा सलूका
चीथड़े लपेटे
बने बिजूका

साहब के लेखे
सभी कुछ सही ।

ऊनी में जकड़े
आये प्रधान,
बँटने को उतरन
दौड़ते श्वान

घर के कौड़े में
आग हँस रही ।    
   

नवल वर्ष आया 

       
नवल उमंगें, नवल तरंगें   
नवल वर्ष लाया !

विगत वर्ष ने सदा की तरह 
दीं कुछ सौग़ातें 
यादों की सरि में तिरतीं कुछ  
खट-मिट्ठी बातें 

नवल सर्जना के सपने ले 
नवल वर्ष आया !

श्रम के फल पर बैठी सत्ता 
फन अपना काढ़े 
पूँजीपतियों के दलाल हैं 
सिर के बल ठाढ़े 

नये पहरुए ने भी खल का 
करतब दिखलाया ।

फुटपाथों पर जीना जैसे 
मौत बुलाना है 
न्यायपालिका के आगे 
ख़ुद को समझाना है 
भोर-साँझ लेकिन हमने 
भैरव में ही गाया । 

अभी घना कुहरा है लेकिन,
सूरज निकलेगा
दिग्पालों को अचरज होगा,
मौसम बदलेगा 

पात-पात पूछेगा, हिय को  
किसने सरसाया !          
 

समय नहीं बदला 



नया साल आया है लेकिन, 
समय नहीं बदला !

आँखों का माड़ा कब उतरे, कौन जानता है?
साठे के अनुभव को भी अब, कौन मानता है?

कुहराये मौसम का सूरज, है अपने हिस्से,
कहने को नवयुग आया पर,
हमको कहाँ फला !

नये-नये ईश्वर हैं लेकिन, हैं तो वे पत्थर,
हम बेबस इंसानों का है, एक नहीं ईश्वर,
कलाकार बेशक़ बदले, पर एक चरित उनका, 
विश्वग्राम के ज़मींदार ये 
अपना करें भला ।

अपराधों को मिली हुई, दुर्घटना की संज्ञा,
संविधान के शीश चढ़ी है, मनुवाली सत्ता,
धर्म-अँजी आँखों में तैरे, जन्मों का लेखा,
कायरता के उच्छ्वास से 
कब दुर्भाग्य टला !

................................................................................................................................

राजेन्द्र वर्मा 



  • जन्म: 8 नवम्बर 1957, बाराबंकी (उ.प्र.) के एक गाँव में ।
  • प्रकाशन-प्रसारण: गीत,  ग़ज़ल, दोहा, हाइकु, कहानी, लघुकथा, व्यंग्य, निबन्ध आदि विधाओं में इक्कीस पुस्तकें प्रकाशित । महत्वपूर्ण संकलनों में सम्मिलित । 
  • विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ एवं समीक्षाएँ प्रकाशित ।
  • लखनऊ दूरदर्शन तथा आकाशवाणी से रचनाएँ प्रसारित ।
  • पुरस्कार-सम्मान: उ.प्र.हिन्दी संस्थान के व्यंग्य एवं निबन्ध-नामित पुरस्कारों सहित देश की अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित । 
  • अन्य:लखनऊ विश्वविद्यालय द्वारा रचनाकार पर एम्.फिल । अनेक शोधग्रन्थों में संदर्भित । कुछ लघुकथाओं और ग़ज़लों का पंजाबी में अनुवाद । चुनी हुई कविताओं का अँगरेज़ी में अनुवाद ।
  • सम्प्रति:भारतीय स्टेट बैंक में मुख्य प्रबन्धक के पद से सेवानिवृत्ति के बाद स्वतन्त्र लेखन। 
  • सम्पर्क:3/29 विकास नगर, लखनऊ 226022 
  • मो. 80096 60096
  • ई-मेल : rajendrapverma@gmail.com

परिक्रमा: साहित्य यथार्थ की आलोचना करता है-ऋषभदेव शर्मा




                  एलूरु में दोदिवसीय त्रिभाषी अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन संपन्न


         साहित्य का मूल प्रयोजन लोक मंगल की साधना है, न कि मनोरंजन। समाज के लिए जो कुछ भी अशुभ और अमंगलकारी हो सकता है साहित्य उस यथार्थ की आलोचना करता है और मंगलकारी आदर्श की स्थापना करता है। इस दृष्टि से भारतीय भाषाओं का भक्ति आंदोलन, नवजागरण आंदोलन और स्वतंत्रता आंदोलन के समय का साहित्य पूरी तरह सुधारात्मक दृष्टिकोण से प्रेरित है। इसी प्रकार समकालीन विमर्शों का साहित्य भी कर्मक्षेत्र के सौंदर्य को सामने लाते हुए सामाजिक परिवर्तन के लिए दिशा प्रदान कर सकता है।"  

       ये विचार सर सी.आर. रेड्डी (स्वायत्त) महाविद्यालय एलूरु (आंध्र प्रदेश) में आयोजित संस्कृत, तेलुगु और हिंदी के द्विदिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के हिंदी केंद्रित विचार-विमर्श के बीज भाषण के दौरान दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के पूर्व आचार्य डॉ. ऋषभदेव शर्मा ने प्रकट किए। उन्होंने हर्ष व्यक्त किया कि भयंकर मूल्य विघटन और उपभोक्ता संस्कृति से ग्रसित वर्तमान परिस्थितियों में इस प्रकार एक सार्थक सम्मेलन का आयोजन हो रहा है। उन्होंने कहा कि एक ठेठ तेलुगु प्रदेश में इतने बड़े पैमाने पर हिंदी में अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन होना अपूर्व है। भाषा और संस्कृति विभाग, आंध्र प्रदेश सरकार के सहयोग से विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा प्रायोजित तथा हिंदी, तेलुगु व संस्कृत विभागों के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में समाज पर भाषा एवं साहित्य के प्रभाव को लेकर कई महत्वपूर्ण चर्चाओं को स्थान मिला। आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु, पांडिच्चेरी आदि राज्यों के साथ-साथ अमेरिका, इंग्लैंड, जर्मनी, कोरिया और जापान से आए विद्वानों, हिंदी सेवियों और छात्रों ने बड़ी संख्या में उपस्थित होकर इस सम्मेलन को सफल बनाया। 

      दक्षिण कोरिया से पधारे हिंदी लेखक और आलोचक डॉ. को जोंग किम ने कहा कि दक्षिण कोरिया और भारत के बीच बहुत प्राचीनकाल से अच्छे रिश्ते रहे हैं। उन्होंने हिंदी को भारतीय संस्कृति की संवाहक बताते हुए उसे ‘दिल की भाषा’ कहा। आंध्र प्रदेश के पूर्व सांसद और फिल्म विकास निगम के अध्यक्ष अंबिका कृष्ण ने अपने संबोधन में तेलुगु भाषा और साहित्य को संरक्षित करने की बता कही तथा उसके आंदोलनात्मक और सुधारवादी चरित्र पर प्रकाश डाला। हिंदी साहित्य संबंधी विचार सत्रों में समाज और भाषा के संबंध में आंध्र विश्वविद्यालय के प्रो. एन. सत्यनारायण, सैंट जोसेफ महिला महाविद्यालय की डॉ. पी.के.जयलक्ष्मी, नरसापुर के डॉ. कुमार नागेश्वर राव, तमिलनाडु केंद्रीय विश्वविद्यालय के आचार्य डॉ. एस.वी.एस.एस.नारायण राजु, कांचीपुरम विश्वविद्यालय के डॉ. दंडिबोट्ला नागेश्वर राव, नागार्जुन विश्वविद्यालय के डॉ. काकानि कृष्ण, मानु के डॉ. डी. शेषुबाबु, काकिनाडा के डॉ. पी. हरिराम प्रसाद तथा हैदराबाद की डॉ. पूर्णिमा शर्मा सहित अनेक विद्वानों और शोधार्थियों ने शोधपत्र प्रस्तुत किए।

      सर सी.आर.रेड्डी शैक्षिक संस्थाओं के अध्यक्ष श्री कोम्मारेड्डि राम बाबू, महाविद्यालय के कॉरस्पॉन्डन्ट एवं अन्य पदाधिकारियों ने समारोह में भाषा के महत्व पर अपनी राय जताई। समापन समारोह में प्रो. ऋषभदेव शर्मा ने तेलुगु में भाषण देकर श्रोताओं को अभिभूत कर दिया। सर सी.आर. रेड्डी (स्वायत्त) महाविद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ.आर.एन.वी.एस.राजाराव और प्राध्यापक के.शैलजा ने अतिथियों का स्वागत और धन्यवाद किया। साथ ही सम्मेलन के दौरान ही शोधपत्रों का संग्रह प्रकाशित करके अपनी कार्य-दीक्षा और लगन का परिचय दिया। 


प्रस्तुति: डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा 


सह संपादक 'स्रवंति' 
सहायक आचार्य 
उच्च शिक्षा और शोध संस्थान
दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा
हैदराबाद - 500004

.......................................................................................................................

             मिस्र में विश्व मैत्री मंच का नौवाँ अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन 



मिस्र की राजधानी कायरो स्थित  पिरामिड पार्क में अंतरराष्ट्रीय साहित्यिक संस्था विश्व मैत्री मंच का नौवाँ सम्मेलन पिछले दिनों डॉ सी. वी .रमन विश्वविद्यालय ,पटना के कुलाधिपति श्री विजय कांत वर्मा के मुख्य आतिथ्य एवं आगरा महाविद्यालय की प्राचार्य डॉ सुषमा सिंह की अध्यक्षता में संपन्न हुआ।कार्य्क्रम के उद्घाटन सत्र में संस्था की अध्यक्ष संतोष श्रीवास्तव ने  प्रमुख अतिथियों का स्वागत  स्मृति चिन्ह से करते हुए अपने स्वागत भाषण में पर्यटन के महत्वपूर्ण पक्षों  पर प्रकाश डाला।

सम्मेलन में परिचर्चा के विषय 'साहित्य में अनुवाद 'के महत्व को लक्ष्य करते हुए विद्वानों ने अपने वक्तव्य प्रस्तुत किए।  डॉ विद्या सिंह (प्रो. देहरादून महाविद्यालय)  ने विभिन्न भाषाओं में अनुवाद के महत्व को परिभाषित किया। प्रमुख वक्ता डॉ ज्योति गजभिए,  डॉ प्रणव शास्त्री, डॉ क्षमा पांडे एवं पूनम तिवारी ने राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लिखे जा रहे साहित्य तथा विदेशी साहित्य को लेकर अनुवाद की भूमिका का मूल्यांकन किया। अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में डॉ सुषमा सिंह ने कहा कि "भ्रमण हमारे अनुभवों को समृद्ध करता है । विश्व मैत्री मंच से जुड़कर और उसकी गतिविधियों का व्यापक विस्तार देख कर मुझे महसूस होता है  कि यह हमारी सृजनात्मक प्रतिभा के विकास में अत्यंत सहायक है ।" रानी मोटवानी  तथा रेखा कक्कड़ की पुस्तकों का विमोचन इस दौरान हुआ । मधु सक्सेना ने “गांव की धोबन की” एकल नाट्य प्रस्तुत की।

कार्यक्रम के अंतिम सत्र में विशिष्ट अतिथि डॉ प्रमिला वर्मा , सुनीता राजपाल और  माला गुप्ता ने सभी प्रतिभागियों को स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया। सम्मेलन के तीसरे दिन नाइल क्रूज में कवि सम्मेलन आयोजित किया गया। जिसमें डॉ ज्योति गजभिए की अध्यक्षता में 24 कवियों ने कविता पाठ कर लाउंज में उपस्थित अन्य देशों से आए पर्यटकों को भी मंत्रमुग्ध कर लिया। इस विशेष कवि सम्मेलन का संचालन बेहद रोचक तरीके से अंजना श्रीवास्तव एवं उमा तिवारी ने किया।


प्रस्तुति: संतोष श्रीवास्तव


रविवार, 21 अक्टूबर 2018

नाज़िम हिक़मत की कविताएँ


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


मेरी कविता के बारे में


मेरे पास सवारी करने के लिए
चाँदी की काठी वाला अश्व न था
रहने के लिए कोई पैतृक निवास न था
न धन दौलत थी और न ही अचल सम्पत्ति
एक प्याला शहद ही था जो मेरा अपना था
एक प्याला शहद
जो आग की तरह सुर्ख़ था !
मेरा शहद ही मेरे लिए सब कुछ था
मैनें अपनी धन दौलत
अपनी अचल सम्पदा की रखबाली की
हर क़िस्म के जीव-जन्तुओं से उसकी रक्षा की
मेरे सहोदर, तनिक प्रतीक्षा तो करो
यहाँ मेरा आशय
मेरे शहद भरे पात्र से ही है
जैसे ही मैं
अपना पात्र शहद से भर लूँगा
मक्खियाँ टिम्बकटू से चलकर
इस तक आएँगी !


कुछ सलाह उनके लिए जो उद्देश्य के लिए जेल में हैं


गर्दन पर फन्दा कसने के बजाय
यदि धकेल दिया जाए तुम्हें काल-कोठरी में
महज़ इसलिए
कि दुनिया के लिए, अपने देश के लिए,
अपनों के लिए उम्मीद नही छोड़ी तुमने
यदि ज़िन्दगी के बाक़ी बचे दस-पन्द्रह वर्षों में भी
तुम्हारे साथ यही सुलूक होता रहे
तो तुम यह भी नही कह पाओगे कि अच्छा होता
जो मुझे रस्सी के छोर पर एक झण्डे की तरह टाँग दिया जाता
किन्तु तुम्हें डटे रहना होगा और जीना होगा
वास्तव में यह तुम्हें ख़ुशी नही दे सकता
लेकिन तुम्हारा यह परम कर्तव्य है
दुश्मन का विरोध करने के लिए तुम
एक दिन और जियो
मुमकिन है कि
कुएँ के तल से आती आवाज़ की तरह
तुम्हारा अन्तर्मन भी अकेलेपन से भर उठे
किन्तु दूसरी ओर
दुनिया की हड़बड़ी देख
भीतर ही भीतर सिहर उठोगे तुम
बाह्य जगत में एक पत्ती भी
चालीस दिनों के अन्तराल पर निकलती है
अन्तर्घट से आती आवाज़ के लिए प्रतीक्षा करना
दुःख भरे गीत गाना
या पूरी रात छत ताकते हुए जागते रहना
भला तो है किन्तु डरावना भी है
हर बार हजामत बनाते हुए
अपने चेहरे को देखो !
भूल जाओ अपनी उम्र !
दुश्मन से सतर्क रहो
और मधुमास की रातों के लिए
रोटी का आख़िरी टुकड़ा खाना
हमेशा याद रखो
और कभी मत भूलो
दिल से खिलखिलाना !
कौन जानता है
वह महिला जिसे तुम प्रेम करते हो
कल तुम्हें प्रेम करना ही छोड़ दे
मत कहना यह कोई बड़ा मसला नही है
यह मनुष्य के लिए
मन की हरी डाली तोड़ देने जैसा होगा
मन ही मन गुलाबों और बाग़ीचों के बारे में
सोचते रहना फिजूल है
वहीँ समन्दर और पर्वतों के बारे में सोचना उत्तम होगा
बिना रुके पढ़ते-लिखते रहो
और मैं तुम्हें बुनने और
दर्पण बनाने की सलाह भी दूँगा
मेरा आशय यह कतई नही है
तुम दस या पन्द्रह वर्ष
जेल में नही रह सकते
इससे कहीं ज़्यादा .....
तुम कर सकते हो
जब तक
तुम्हारे हृदय के बाईं ओर स्थित मणि
अपनी कान्ति न गँवा दे !

(अंग्रेज़ी से अनुवाद : नीता पोरवाल)

................................................................................................................................

ईश्वर करुण अभिनंदन ग्रंथ' हेतु रचनाएँ आमंत्रित


         साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्था 'साहित्य मंथन' (हैदराबाद) के तत्वावधान में चेन्नै के  सुप्रतिष्ठित साहित्यकार और हिंदीसेवी  ईश्वर करुण (ईश्वर चंद्र झा) के व्यक्तित्व और कृतित्व पर केंद्रित अभिनंदन ग्रंथ के प्रकाशन की योजना निश्चित हुई है। इस ग्रंथ का संपादन प्रो. ऋषभ देव शर्मा और डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा संयुक्त रूप से करेंगे। संपादकों ने ईश्वर करुण और उनके साहित्य से परिचित लेखकों से अनुरोध किया है कि लगभग 1000 शब्दों में ईश्वर करुण से संबंधित अपना संस्मरण या समीक्षात्मक आलेख अभिनंदन ग्रंथ के लिए उपलब्ध कराएँ।
        ग्रंथ की प्रकृति के अनुसार आलेख - ईश्वर करुण : जैसा मैंने देखा (अंतरंग संस्मरण), कवि सम्मेलनों का लाड़ला रचनाकार ईश्वर करुण, ईश्वर करुण और उनके गीत, हिंदी ग़ज़ल को ईश्वर करुण की देन, पत्रकार और संपादक ईश्वर करुण, राजभाषा अधिकारी के रूप में ईश्वर करुण की उपलब्धियाँ, ईश्वर करुण की कहानियों में समकालीन समाज, नई कविता और ईश्वर करुण की रचनाधर्मिता, ईश्वर करुण के साहित्य में मैथिल लोक, ईश्वर करुण के साहित्य में चेन्नई की धड़कन, इलेक्ट्रानिक जनसंचार : ईश्वर करुण की उपलब्धियाँ, ईश्वर करुण के काव्य में लालित्य आदि विषयों पर केंद्रित हो सकते हैं। यह सामग्री rishabhadeosharma@yahoo.com/ neerajagkonda@gmail.com/ ishwar_karun@yahoo.co.in  पते पर ईमेल द्वारा भेजी जा सकती है।

  • डॉ.गुर्रमकोंडा नीरजा


पुस्तक समीक्षा: कंगाल होता जनतंत्र–एम.एम.चन्द्रा




मेरे हसीन बचपन में कोई नयापन नहीं आता..


‘कंगाल होता जनतंत्र’ अनिल कुमार शर्मा का पहला काव्य संग्रह है. यह संग्रह पिछले दो दशकों के आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्र का एक ऐसा दस्तावेज़ है जिसने न सिर्फ लेखक की चेतना का ही निर्माण किया बल्कि आम जनमानस की चेतना की निर्माण प्रकिया को आसानी से समझने का प्रयास किया. सन् 1993 से लेकर आज तक का हमारा समय वैचारिक विभ्रम, विघटन, उत्थान और पतन के दौर से गुजर रहा है. यह काव्य संग्रह मुझे ऐसे समय में पढ़ने को मिला जब नये रचनाकारों पर सवाल दर सवाल दागे जा रहे हैं. ऐसे समय में अनिल कुमार की रचनाएँ साहित्य जगत में बहुत सी संभावनाओं को जन्म देती हैं. ‘कली रहने दो’ एक लम्बी कविता है जिसमें ‘डर’ विभिन्न रूपों में हमारे सामने आता है और कहता है कि-

तुम मत उगो सूरज
तुम्हारे डूबने उगने से
मेरे हसीन बचपन में कोई नयापन नहीं आता

1992-93 के उस मंजर को अनिल ने बहुत ही गम्भीरता से महसूस किया है जब देश में अराजकता, साम्प्रदायिकता और धार्मिक उन्मांद आज की तरह ही अपनी चरम सीमा तक पहुँच गया था तब ऐसे समय में अनिल कुमार की कविताये अपने से संवाद करती हुई दिखाई देती है-  

ईश्वर होने का कितना बड़ा प्रपंच
धर्म की ज्वाला कितनी प्रचंड
रक्तपात होते हैं
अपने स्वकृत ईश्वर की स्थापना में
जो शाश्वत है
न विगत है
न आगत है
गढ़े मूल्यों की परिधि में
विवाद है
एकांगी सोच के नशे में
अब जागती हुई नींद आधी है

1990 के दशक में शुरू हुई भारत की विकास यात्रा भारत निर्माण, ग्लोबल विलेज, शाइनिंग इण्डिया इत्यादि मुहावरों की यथास्थिति 2010 आते-आते लेखक की नजरों में एकदम साफ़ हो जाती है. इसी का नतीजा है कि भूमंडलीकरण का सब्जबाग़ और उसकी नियति अब नये तरह की सभ्यता और संस्कृति को जन्म दे रही है जिससे कोई भी अछूता नहीं है-

भूमंडलीकरण के चंगुल में
बाजार का विस्तार होगा
खरीदने बेचने का व्यवहार होगा
यही सभ्यता और संस्कार होगा
भावनाओं का मोल-भाव होगा
बिकाऊ सद्भाव होगा
सारा विश्व एक गाँव होगा

भूमंडलीकरण से जहाँ एक तरफ देश की रहस्मय बीमारियों से लड़ने के लिए फाइफ स्टार जैसे अस्पताल भारतीय महानगरों की शोभा बढ़ा रहे हैं वहीं दूसरी तरफ गरीब लोग छोटी-छोटी बीमारियों में बगैर इलाज के मर रहे हैं. निजीकरण की आंधी ने बिमारियों को भी एक अच्छा धंधा बना दिया है-

क्लीनिक के आगे दो कतार है
एक में बीमार हैं
दूसरे में एम.आर. हैं
एक दवा खायेगा
दूसरा दवा खपायेगा

युवा रचनाकार के सामने सही मूल्यांकन का सवाल बहुत बड़ा होता है. सही साहित्य की समझ को बनाये रखने के लिए युवा रचनाकारों को सचेत करते हुए अनिल कुमार इशारा करते हैं कि आलोचना के सांचे बन चुके हैं उसके झांसे में आने से बचने की आवश्यकता है -

ये आलोचना तो सात अंधों की जुबान है
जो एक हाथी के जिस्म की कहानी है
समग्र खंडित है
बहुत बड़ा पंडित है

साधु-संतो के वेश में चोर, लुटेरे, बलात्कारी, अंधविश्वासी समाज में भरे हुए है. वे देश की भोली-भाली जनता को अपना जाल बिछा कर फंसाती है और जनता को मुर्ख बनाने के गोरखधंधे को देश के हर कोने में फैला रही है. वे अन्धविश्वासी, तार्किक परम्परा का गला घोटने के लिए नये तौर-तरीकों से पुराने मूल्यों को जबरदस्ती थोप रहे हैं-

अध्यात्मिक अलगाव की बुझे राख को...
पुराने मूल्यों के नाश्ते को
नई तकनीक की गोली से पचा रहे थे
और मीडिया संविधान की धाराओं में
बड़ी ही सुरक्षित गुफा तलाश रहा था
या यों कहें कि देश चला रहा था .

भारतीय जनतंत्र में भीड़ के द्वारा मोर्चा, अनशन, विरोध-प्रदर्शन एवं भूख हड़ताल जैसी कार्यवाही के पीछे नेताओं की हकीकत को अनिल कुमार की कविता बेनकाब ही नहीं करती बल्कि भारतीय जनतंत्र की खोखली हो रही जमीन को और भी खोदने की काम करती है. ‘कंगाल होता जनतंत्र’ भी बाकी कविताओं की तरह लम्बी कविता है जिसमें कंगाल होते भारतीय जनतंत्र को चिन्हित किया गया है-

विदेशी पूँजी से छलकते हुए
समृद्धि की हवाओं से
कंगाल होता जनतंत्र हूँ

लेखक भारतीय जनतंत्र पर प्रश्न चिन्ह लगाने का प्रयास ही नहीं करता बल्कि उसकी जर-जर होती सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक सच्चाइयों को सामने लाता है-

इस देश महान में खेत में खलिहान में
बाबा के संविधान में
सिद्धांत यह है कि समानता का अधिकार है
एक वैचारिक विकार है
सामान्य में कुछ विशेष है
विशेष में अति विशेष है
बाकी अवशेष है

मीडिया की भूमिका जनतंत्र में चौथे स्तम्भ के रूप में मानी जाती है लेकिन देशी-विदेशी पूँजी के गठजोड़ ने मीडिया के चरित्र को बदल दिया है. जहाँ मीडिया को जनपक्ष होना था वहीँ आज मीडिया सरकार की चाटुकारी करती नजर आती है. इस व्यवहार को लेखक ने अपनी कविता के रूप में इस प्रकार व्यक्त किया है-

यह मूल्यहीन अर्थव्यवस्था
डिब्बे बंद पूँजी तलाश रही है
उदारीकरण की वातानुकूलित हवा में खांस रही है
मीडिया उससे टपकते मधु को चाट रही है...
यह लोकतंत्र एक खिलौने की दुकान है...
सब मूल्य और तर्क तोड़ कर बाजार के लायक बना दो
जो बिक सके वही टिक सके
अब तो हद है कि न्यूज चैनलों में हो रहा दंगा है
अख़बार कैमरे की आँख से भी नंगा है...
तिकड़म तो बस यही है कि
जिसने लोकतंत्र कमा लिया
झोंपड़ी से महल बना लिया

भूखों, किसानों, मजदूरों के लिए भारतीय लोकतन्त्र के नारों के अनुभवों को अनिल कुमार ने खूब लताड़ा है. सड़ते हुए लोकतंत्र का विकल्प अनिल कुमार प्रस्तुत नहीं करते. वे सिर्फ कंगाल होते लोकतन्त्र की सामाजिक, राजनैतिक व आर्थिक ढांचे की सच्चाइयों को हमारे सामने प्रस्तुत करते हैं. उनकी कविताएँ दुखद अनुभव और पीडाओं से गुजरी हैं लेकिन इसके बावजूद अनिल कुमार शर्मा की उम्मीद अभी भी जिन्दा है क्योंकि ‘इन्कलाब अभी जिन्दा है’.

  • कंगाल होता जनतंत्र:अनिल कुमार शर्मा
  • विकल्प प्रकाशन | कीमत:300 रुपये 

बुधवार, 12 सितंबर 2018

देवेन्द्र सफल के गीत


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


बादल बरसे हैं..


आँखें भीगीं, होंठ आचमन
तक को तरसे हैं
प्यासों का घर छोड़ महल पर
बादल बरसे हैं ।

उमड़-घुमड़, झूमें, गरजें घन
तपिश बढ़ा जायें
जैसे जल बिन मछली तड़पे
वैसे तड़पायें
हम इनसे अनुनय कर हारे
ढीठ, निडर -से हैं ।

हवन–यज्ञ सब निष्फल कैसे
नई फसल बोयें
हल जोता अम्मा–चाची ने
इंदर खुश होयें
हरियाली गुम हुई खेत
ऊसर बंजर -से हैं

पोखर, ताल- कुँआ बेबस हैं
सूखी नहर–नदी
सागर अट्टहास करता
मुट्ठी में नई सदी
भूखे लोग देव को अपनी
थाली परसे हैं ।


कर्मयोग के तुम ज्ञाता हो..


कर्मयोग के तुम ज्ञाता हो
तुम गाण्डीव धनुर्धारी हो
तुमको कितना याद दिलायें
शोभा तुम्हें नहीं देती हैं
व्रहन्नला-वाली मुद्रायें ।

सूरज जैसे तेजस्वी,तुम
रहे उजाले की परिभाषा
शरशैया पर पड़े भीष्म की
तुमने पूरी की अभिलाषा
शंखनाद जब किया युद्ध में
बैरी की बढ़ गयीं व्यथायें ।

कालजयी जन -जन के नायक
जग में चर्चित कीर्ति तुम्हारी 
बने सारथी युद्ध-भूमि में,रहे
हांकते रथ गिरधारी
कर्मयोग के तुम ज्ञाता हो
नीति भला क्या तुम्हें बतायें ।

द्वापर की वो बात और थी
कलयुग में मत वेश बदलना
शर्तों पर अधिकार मिले तो
जीते जी होता है मरना
अब गूँजे स्वर देवदत्त का
गूँज उठें फिर सभी दिशायें ।


सूरज के घर उथल पुथल है..


फिर चर्चा हर ओर हो रही
सूरज के घर उथल पुथल है ।

दियासलाई सोचे अब तो 
अपने मन का काम मिलेगा
ख़ुशी मनाते जुगनू अब तो 
अपना भी कुछ मान बढ़ेगा
उल्लू, चमगादड़ के डेरों
में भी दिखती चहल पहल है।

झींगुर छेड़े राग बेसुरा
स्यार बोलते हुआ- हुआ सब
अजब तमाशा शुरू हुआ है
सभी दिखाना चाहें करतब
जंगल-जंगल शोर मच गया
शुभ दिन आने वाला कल है ।

इधर बढ़ी मावस की स्याही
उधर गगन में चमकें तारे
सब अपने मन ही मन सोचें
शायद बदलें भाग्य हमारे
रवि की महिमा चन्दा समझे
तभी छुपा वह अगल बगल है ।


हमसे मांग रहे जवाब अब..


छोटे प्रश्नों के समूह भी
इतने हुए बड़े
हमसे मांग रहे जवाब अब
कई सवाल खड़े।

कैसे उनके हक़ में आये
जंगल और नदी
क्यों पंछी रटते पिंजरों में
नेकी और बदी
प्रगतिशील भी यहां रूढ़ियों में
अब तक जकड़े।

कुछ के अधरों पर मुस्कानें
कुछ के होंठ सिले
कुछ को फूलों के गुलदस्ते
कुछ को शूल मिले
निर्गुट में गुटबन्दी है, क्यों
दिखते कई धड़े ।

जल, थल,वायु,वनस्पतियों नें
सबको सुख बांटे
हम क्यों खुशियाँ लुटा न पाये
खींचे सन्नाटे
किसने लिखा हमारी किस्मत
में अगड़े-पिछड़े ।

क्यों हंगामा बरपा, कोई
गया नहीं तह में
पत्थर इतनी तेज उछलते
दर्पण हैं सहमें
आदमखोर सियासत के क्यों
हैं चौड़े जबड़े ।


सुना भूख के दरवाजे पर..


सुना भूख के दरवाजे पर
बजता अलगोजा
लगता रटे, पेट पर अपने
पत्थर रख सो जा ।

सूत नहीं पर राजाज्ञा है
चले खूब चरखा
आधी रोटी मिली उसी को
चबा-चबा कर खा
जितनी झुकती कमर ,और
उतना बढ़ता बोझा।

सबको भूख सताती,वह हो
पण्डित  या मुल्ला
कोई मरता भूखा तो 
मचता हल्लागुल्ला
राजा हँस-हँस खाता है
आयातित  चिलगोजा ।

बैठक हुई, मन्त्रिमण्डल ने
माथा पच्ची  की
फोटो छपी न्यूज पेपर में
हँसती बच्ची की
नीचे लिखी अपील, सब रखें
अब नित व्रत-रोज़ा ।

राजा कहता जन-गण-मन
अधिनायक गान करो
लेकिन अपनी हद में रहकर
डूबो और मरो
समझो, राजा तो राजा है
परजा है परजा ।


जाने क्यों मेरा बीता कल..


जाने क्यों मेरा बीता कल
मुझको याद करे
जितना दूर-दूर रहता
उतना संवाद करे ।

मेरे सिरहाने आ बैठा
खुलकर बोल रहा
बचपन की खोई किताब के
पन्ने खोल रहा
वह रातों की  नींद उड़ाए
दिन बरबाद करे।

कभी गोद में मुझे उठा ले
कभी गाल चूमें
कभी थाम कर ऊँगली मेरी
साथ-साथ घूमें
मेरे गूंगे शब्दों का भी
वह अनुवाद करे ।

बाग, खेत -खलिहान,पोखरे
तुम कैसे भूले
बता रहा फागुन की मस्ती
दिखा रहा झूले
लौट चलो अपने अतीत में
फिर फरियाद करे ।

कहता, निष्ठुर-निर्मोही तू
मुझसे दूर हुआ
सोंधी रोटी याद क्यों रहे
खाकर मालपुआ 
बहस वकीलों जैसी करता
दाखिल वाद करे ।


आज एक और वचन..


आज एक और वचन
अपनों से हार गया  ।

घास- फूस की मड़ई,पूंजी बस गठरी
पेट-पीठ एक किये रघुआ की ठठरी
पटवारी सुबह- शाम नीम तले आये
नीयत जो डोल गई देख-देख बकरी
कल फिर धमकी देकर 
धरमी सरदार गया ।

सपने सब रीत गए,जलते दिन बीते
कथरी -सी हो गई कमीज़ फटी सीते
दूध,बतासा खातिर बुधुआ है बिलखा
मुश्किल से सोया है आंसू को पीते
अब न हँसेगी पायल
सेंदुर धिक्कार गया ।

खेल-तमाशा भूला,भूल गया मेला
रघुआ वैरागी-सा,ऊंघता अकेला
बारहमासे भूला ,भूल गया कजरी
खोया है अपने में संझियाई बेला
चूल्हे में आग नहीं
रोते त्यौहार गया ।

बीमारी आग हुई हाथ नहीं पाई
सूदखोर बनिया भी हो गया कसाई
रामभरोसे बैठी बबुआ को ताके
बस आँखें पोछ रही बुधुआ की माई
घर-वाला मुँह बाँधे
करने बेगार गया ।


आधी कटी उँगलियाँ..


कैसे वक्त करूँ मुट्ठी में
अपनी आधी कटी उँगलियाँ ।

घूरें शातिर खड़े मछेरे
दाना डालें शाम-सबेरे
अब इनसे बच पाना मुश्किल
कसे हुए सम्मोहक घेरे
जाल सुनहरा फैलाया तो
इसमें अनगिन फंसी मछलियाँ ।

दिन के सहचर रात सराहें
पल में बदलें अपनी चाहें
उलझन बढ़ती ही जाती है
मैं भी भूलूँ सीधी राहें
रंगों का ऐसा संयोजन
लगता आगे घिरी बदलियाँ ।

गिरजाघर, मस्जिद, मन्दिर-मठ
इन सबके अपने-अपने हठ

किसके आगे शीश नवाऊँ
यीशु , रहीम , राम की है रट
उन्मादी नारों को सुनकर
भयवश फैली हुई पुतलियाँ ।

स्वीकारे हैं कई विभाजन
सूख रहा है मन-वृंदावन
जूझ रहा हूँ झंझाओं से
फिर भी चाहूँ महके आँगन
मिले न चैन किसी करवट में
दर्द बहुत कर रहीं पसलियाँ ।

.......................................................................................................................................


देवेन्द्र सफल


  • पूरा नाम-देवेन्द्र कुमार शुक्ल
  • पिता- कीर्तिशेष लक्षमी नारायण शुक्ल
  • माता- समृतिशेष अलक नंदा देवी शुक्ला
  • जन्म-स्थान-कानपुर महानगर (उ.प्र)
  • जन्म तिथि-04-01-1958
  • शिक्षा-स्नातक
  • प्रकाशन-गीत-नवगीत संग्रह: पखेरू गन्ध के,  नवांतर, लेख लिखे माटी ने, सहमी हुई सदी, हरापन बाक़ी है।
  • अन्य अनेक सामूहिक संकलनों में रचनाएँ प्रकाशित।
  • प्रसारण-आकाशवाणी के मान्य कवि ।
  • सम्मान-देश-विदेश में अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित/ पुरस्कृत।
  • संपर्क-117/क्यू / 759 -ए,शारदा नगर, कानपुर, उत्तर प्रदेश-208025
  • ईमेल-devendrasafal@gmail.com