कमला कृति

मंगलवार, 22 मार्च 2016

रंग बरसे: फागुनी दोहे-किशोर पारीक किशोर


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार

कैसे खेलूँ फाग..


गुल तितली से यों कहे, कैसे खेलूँ फाग 
भ्रमरों ने की ज्यादती, लूटा सभी पराग

हीरा पन्ना दिल हुआ, तन जैसे पुखराज 
नैना नीलम दे रहे, नवरतनी अंदाज

देख रूप उनका हुआ, मैं होली पर दंग 
चेतन से मैं जड़ हुआ, मन में बजी मृदंग

तट ने पूछा दूर से, टापू क्या है बात
जातीं लहरें दे गयी, चुम्बन की सौगात

काज़ल बोला आँख से, तुम हो पानीदार 
मेरी संगत कर बनो, तीखी कुटिल कटार

गली गरारे गोरियाँ, नहीं गोप नहिं फाग 
गीतों में झरता नहीं, पहले सा अनुराग

कृतिकार की लेखनी, काव्यलोक का मंच 
गीत ग़ज़ल ले दौड़ते, शब्दों के सरपंच


किशोर पारीक किशोर


61, माधवनगर, 
दुर्गापुरा रेलवे स्टेशन के सामने,
जयपुर-302018 
मोबाइल-9414888892

रंग बरसे: होली के दोहे-सुशीला शिवराण


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


साँवरिये के रंग-सा..


उसने यूँ देखा मुझे, हुई शर्म से लाल।
हसरत दिल में रह गई, मलती खूब गुलाल॥

कहाँ गए वो चंग-डफ़, अपनापन अनुराग।
गीतों की रसधार बिन, कितना सूना फ़ाग॥

ढोल-चंग की गूँज पर, मन उठता था झूम।
अब गलियाँ सूनी हुईं, कहाँ गई वो धूम॥

मस्तों की टोली नहीं, नहीं स्वांग के रंग।
बस यादों में रह गया, होली का हुड़दंग॥

रंग फ़िज़ा में छा गए, नीले-पीले-लाल।
मैं बिरहन सूखी रही, मुझको यही मलाल॥

संग अबीर-गुलाल के, मला कौन-सा रंग।
लोग कहें मैं बावरी, जग से हुई निसंग॥

साँवरिये के रंग-सा, मिला न दूजा कोय।
तन लागे जो साँवरा, हर दिन होली होय।।

अर्ज़ कर रहे आपसे, ये फ़ागुन के रंग।
शिकवे-गिले बिसार कर, हमें लगा लो अंग ॥

फ़ीका-फ़ीका फाग है, सूने हैं दिन-रैन ।
नैना तकते राह को, नहीं जिया को चैन ॥

कहे अबीर-गुलाल से, गोरी मन की बात ।
भीगें तन-मन प्रेम से, ऐसी हो बरसात ॥

भाग-दौड़ की ज़िंदगी, हर पल जैसे जंग ।
भूल गई है मस्तियाँ, होली का हुड़दंग ॥
  
सजी-धजी सी मॉल में, गुझिया दिखी उदास ।
अम्मा के हाथों बिना, कैसे पड़े मिठास ॥


सुशीला शिवराण


बदरीनाथ–813,
जलवायु टॉवर्स सेक्‍टर-56,
गुड़गाँव–122011
दूरभाष–09873172784
ईमेल-sushilashivran@gmail.com

रंग बरसे: अंसार क़म्बरी की ग़ज़ल


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


दिन सुहाने आ गये..



खिल उठीं सरसों की कलियाँ दिन सुहाने आ गये
आ गया फागुन कि हर बाली में दाने आ गये

फूल महुवे के झरे मौसम शराबी हो गया
आम के बाग़ों में खुशबू के ख़ज़ाने आ गये

आ गया फागुन मेरे कमरे के रौशनदान में
चन्द गौरय्यों  के जोड़े घर बसाने आ गये

नाचती-गाती हुई निकलीं सड़क पर टोलियाँ
चन्द चेहरे खिड़कियों में मुस्कुराने आ गये

एकता सदभावना के शे'र लेकर ‘क़म्बरी’
रंग की महफ़िल में लो होली मनाने आ गये


अंसार क़म्बरी


‘ज़फ़र मंजिल’, 11/116,
ग्वालटोली, कानपूर–208001
मो - 09450938629
ईमेल : ansarqumbari@gmail.com

रंग बरसे: कल्पना रामानी की ग़ज़लें और कुण्डलिया


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


चलो मीत मिलजुल के..


हुई हैं गुलाबी, हठीली हवाएँ
चलो मीत मिलजुल के, होली मनाएँ

जो बोनस में बेचैनियाँ बाँध लाए  
उमंगों के रंगों में, उनको बहाएँ

तहाकर झमेलों की बेरंग गादी
कि मस्ती की सतरंगी, चादर बिछाएँ

जो पल-प्रीत लाया है, चुन-चुन के फागुन
उन्हें गीत की धुन, बना गुनगुनाएँ  

जिसे ढूँढते हैं, सितारों से आगे
ज़मीं पर ही वो आज, दुनिया बसाएँ

ये दिन चार घर में, नहीं बैठने के
निकल महफिलों को, मवाली बनाएँ

पलाशों से होता, मगन मास फागुन
उन्हें पाश में बाँध, आँगन में लाएँ

वरें यह विरासत, नई पीढ़ियाँ ज्यों  
उन्हें होलिका की, कहानी सुनाएँ

बसे! ‘कल्पना’ पर्व, यादों के दिल में 
यही याद हो और, सब भूल जाएँ  


आ गया फागुन..


ऐ हवा रंगों नहाओ, आ गया फागुन।
धूम मौसम की मचाओ, आ गया फागुन।

देश से रूठी हुई है, रात पूनम की 
चाँद को जाकर मनाओ, आ गया फागुन।

वन चमन के फूल आतुर, देख हैं कितने 
नेह न्यौता देके आओ, आ गया फागुन। 

फिर रहे हैं मन-मुदित सब, बाल बगिया में 
झूलना उनका झुलाओ, आ गया फागुन।

साज हैं सरगम भी है, तैयार हैं घुँघरू  
सुन सखी शुभ गीत गाओ, आ गया फागुन।

खग विहग-वृंदों के जाकर, कान में कह दो 
मोर कोयल को जगाओ, आ गया फागुन।

तान पिचकारी खड़ी है, द्वार पर होली।
प्रेम की गंगा बहाओ, आ गया फागुन।


कुण्डलिया छंद



(एक)



चलो सहेली बाग में, फागुन के दिन चार
ऋतु बसंत की आ गई, करके नव शृंगार।
करके नव शृंगार, केसरी आँचल ओढ़ा
लाए पुष्प गुलाल, ढाक भी रंग कटोरा।
पर्व मनाया साथ, सभी ने होली खेली
फागुन के दिन चार, बाग में चलो सहेली  

(दो) 


किया किनारा माघ ने, फागुन आया द्वार।  
लाया पुरवा प्रेम की, होली का त्यौहार।
होली का त्यौहार, कि मौसम यों कुछ महका
हर बगिया का फूल, रंग में घुलकर बहका।
गूँजे रसमय गीत, अहा! क्या खूब नज़ारा
फागुन आया द्वार, माघ ने किया किनारा।

(तीन) 


पूनम की यह रात है, मौसम के सब रंग।
दहन हो रही होलिका, ढ़ोल ढमाके संग।
ढोल ढमाके संग, घुली मस्ती जन-जन में
पूजा और प्रसाद, भरे पावनता मन में।
उत्सव की है धूम, न कोई छाया गम की
सब रंगों के साथ, रात आई पूनम की।

(चार) 


होली ऐसी खेलिए, हो आनंद अभंग।
सद्भावों के रंग में, घुले प्रेम की भंग।
घुले प्रेम की भंग, भेद का भूत भगाएँ।
ऐसे मलें गुलाल, शत्रु भी मित्र कहाएँ।
रखकर होश हवास, कीजिये हँसी ठिठोली।
हो आनंद अभंग, खेलिए ऐसी होली।

(पांच)


कथा पुरातन काल की, हमें दिलाती याद।
जली होलिका, बच गए, ईश भक्त प्रहलाद।
ईश भक्त प्रहलाद, भक्ति से ताकत हारी
यही पर्व का सार, जानती दुनिया सारी।
भर लें हम भी स्वस्थ, रंग जीवन में नूतन।
भूलें कभी न मित्र, ‘कल्पना’ कथा पुरातन।

(छह)


होली सिर पर चढ़ गई, खूब सखी इस बार
झूम रही पिचकारियाँ, घूम रही दीवार।
घूम रही दीवार, कदम हैं लगे थिरकने
गगन, सितारे, चाँद, लगे दिन में ही दिखने
कभी न खेले रंग, ‘कल्पना’ मैं थी भोली
मगर सखी इस बार, चढ़ गई सिर पर होली।

(सात)


इन्द्रधनुष से रंग हैं, बिखरे चारों ओर।
केसर और गुलाल के, बादल हैं पुरजोर।
बादल हैं पुरजोर, चली है पवन बसंती
लाई नवल प्रकाश, सखी, होली रसवंती।
मुक्त हुए मन-प्राण, ‘कल्पना’ द्वेष-कलुष से
बिखरे चारों ओर, रंग हैं इंद्र्धनुष से।

(आठ)


रचीं ऋचाएँ प्रेम की, रंगों ने हर पात।
सजी खड़ी है बाग में, फूलों की बारात।

फूलों की बारात, शगुन लाई पिचकारी
स्नेह मिलन को आज, उमड़ आए नर-नारी।
कहनी इतनी बात, इस तरह पर्व मनाएँ
ज्यों रंगों ने मीत, प्रीत की रचीं ऋचाएँ।   

(नौ)


सुनी सुनाई बात है, होली इक लठमार।
नर पर भाँजे लाठियाँ, वृंदावन की नार।
वृंदावन की नार, यशोदा माँ बतलाते
नर कहलाते कृष्ण, सज़ा चोरी की पाते।
तब से ऐसी रीत, ‘कल्पना’ चलती आई
होली इक लठमार, बात है सुनी सुनाई।


कल्पना रामानी


ईमेल- kalpanasramani@gmail.com

मंगलवार, 15 मार्च 2016

आशा पाण्डेय ओझा के दस मुक्तक


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार



(एक)

बनो रहबर दिखा दो राह मुझको।
अधिक की फिर नहीं हो चाह मुझको।
दुआ हर साँस में शामिल रहे यूँ,
न पीड़ित की लगे फिर आह मुझको।


(दो) 

सज़ा देना भले मुझको जुर्म भी पर बता देना ।
दिलों में फर्क जो लाए अहसास वो मिटा देना ।
कभी जो घेर ले मुझको उदासी से भरे साये,
निगाहें डाल कर मुझपे उदासी तुम मिटा देना ।


(तीन) 

अंदर बाहर आग लगी है ,घर चौबारे सुलग रहे।
ये हालात सुधारें कैसे ,कैसे कोई विलग रहे।
टुकड़ा-टुकड़ा टूटा भारत ,टूटी उसकी ताक़त भी,
जांत-धर्म के झगड़े में क्यों,भाई-भाई अलग रहे।


(चार) 

कौन ऐसे पुकार लेता है।
जब भी बिखरूं सँवार लेता है।
बेटियों का ज़रा सा हंसना भी,
ग़म की ज़द से उबार लेता है।


(पांच) 

प्रेम की बहती नदी तुम त्याग की तस्वीर हो ।
दया करुणा में डूबी आँख का ज्यों नीर हो ।
सीधी सादी सरल तुम छल कपट से दूर हो,
पर नहीं अबला हो तुम,तुम शत्रु को समशीर हो ।


(छह)

सुलगता देख हर मंज़र,चमन ये काँप जाता है ।
हर इक शै को तजुरबे का तराजू नाप जाता है
छुपाओ लाख बातों को या परदे भी कई डालो,
अगर अनबन हो बेटों में,तो वालिद भांप जाता है ।


(सात)

खून के आंसू रुलाता है कोई ।
क्यूँ मुझे इतना सताता है कोई ।
रूह में इक बूंद बनकर प्यार की,
धड़कनों में उतर जाता है कोई ।


(आठ)

सबको समय ने अपनी ज़द में फँसा के मारा
इसको उठा के मारा,उसको गिरा के मारा
ऐ ज़िन्दगी तिरा भी अंदाज़ है निराला
इसको हंसा के मारा उसको रुला के मारा आशा


(नौ)

भले कश्ती हो छोटी पर समन्दर नाप लेती है।
नज़र की ओढ़नी भी लाज घर की ढांप लेती है।
फ़रेबी बच नहीं सकता कभी मेरी निगाहों से,
खरी है या नज़र खोटी ये आशा भांप लेती है।


(दस)

इसको हँसा के मारा उसको रुला के मारा।
सबको समय ने अपनी ज़द में फंसा के मारा।
आँखें हैं पानी-पानी दिल भी धुआँ-धुआँ है,
मन की तपिश ने कैसे सबको जला के मारा।


आशा पाण्डेय ओझा


c/o जितेन्द्र पाण्डेय
उपजिला कलक्टर,
पिण्डवाडा-307022
जिला सिरोही, राजस्थान
मो. 07597199995
ईमेल: asha09.pandey@gmail.com

पुस्तक समीक्षा: कोई रोता है मेरे भीतर-आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'




                               जीने की लालसा उत्पन्न करती कवितायें 


कविता और ज़िन्दगी का नाता सूरज और धूप का सा है। सूरज ऊगे या डूबे, धूप साथ होती है। इसी तरह मनुष्य का मन सुख अनुभव करे या दुख अभिव्यक्ति कविता के माध्यम से हो होती है। मनुष्येतर पशु-पक्षी भी अपनी अनुभूतियों को ध्वनि के माध्यम से व्यक्त करते हैं। ऐसी ही एक ध्वनि आदिकवि वाल्मीकि की प्रथम काव्याभिव्यक्ति का कारण बनी। कहा जाता हैं ग़ज़ल की उत्पत्ति भी हिरणी के आर्तनाद से हुई। आलोक जी के मन का क्रौंच पक्षी या हिरण जब-जब आदमी को त्रस्त होते देखता है, जब-जब विसंगतियों से दो-चार होता है, विडम्बनाओं को पुरअसर होते देखता तब-तब अपनी संवेदना को शब्द में ढाल कर प्रस्तुत कर देता है।

कोई रोता है मेरे भीतर ५८ वर्षीय कवि आलोक वर्मा की ६१ यथार्थपरक कविताओं का पठनीय संग्रह है। इन कविताओं का वैशिष्ट्य परिवेश को मूर्तित कर पाना है। पाठक जैसे-जैसे कविता पढ़ता जाता है उसके मानस में संबंधित व्यक्ति, परिस्थिति और परिवेश अंकित होता जाता है। पाठक कवि की अभिव्यक्ति से जुड़ पाता है। 'लोग देखेंगे' शीर्षक कविता में कवि परोक्षत: इंगित करता है की वह कविता को कहाँ से ग्रहण करता है-

शायद कभी कविता आएगी / हमारे पास 
जब हम भाग रहे होंगे सड़कों पर / और लिखी नहीं जाएगी 
शायद कभी कविता आएगी / हमारे पास 
जब हमारे हाथों में / दोस्त का हाथ होगा 
या हम अकेले / तेज बुखार में तप रहे होंगे / और लिखी नहीं जाएगी

दैनंदिन जीवन की सामान्य सी प्रतीत होती परिस्थितियाँ, घटनाएँ और व्यक्ति ही आलोक जी की कविताओं का उत्स हैं। इसलिए इन कविताओं में आम आदमी का जीवन स्पंदित होता है। अनवर मियाँ, बस्तर २०१०, फुटपाथ पर, हम साधारण, यह इस पृथ्वी का नन्हा है आदि कविताओं में यह आदमी विविध स्थितियों से दो-चार होता पर अपनी आशा नहीं छोड़ता। यह आशा उसे मौत के मुँह में भी जिन्दा रहने, लड़ने और जितने का हौसला देती है। 'सब ठीक हो जायेगा' शीर्षक कविता आम भारतीय को शब्दित करती है -

सुदूर अबूझमाड़ का / अनपढ़ गरीब बूढ़ा 
बैठा अकेला महुआ के घने पेड़ के नीचे 
बुदबुदाता है धीरे-धीरे / सब ठीक हो जायेगा एक दिन 

यह आशा काम ढूंढने शहर के अँधेरे फुथपाथ पर भटके, अस्पताल में कराहे या झुग्गी में पिटे, कैसा भी भयावह समय हो कभी नहीं मरती। समाज में जो घटता है उस देखता-भोगता तो हर शख्स है पर हर शख्स कवि नहीं हो सकता। कवि होने के लिए आँख और कान होना मात्र पर्याप्त नहीं। उनका खुला होना जरूरी है- 

जिनके पास खुली आँखें हैं / और जो वाकई देखते हैं.... 
... जिनके पास कान हैं / और जो वाकई सुनते हैं 
सिर्फ वे ही सुन सकते हैं / इस अथाह घुप्प अँधेरे में 
अनवरत उभरती-डूबती / यह रोने की आर्त पुकार।
'एक कप चाय' को हर आदमी जीता है पर कविता में ढाल नहीं पाता- 
अक्सर सुबह तुम नींद में डूबी होगी / और मैं बनाऊंगा चाय 
सुनते ही मेरी आवाज़ / उठोगी तुम मुस्कुराते हुए 
देखते ही चाय कहोगी / 'फिर बना दी चाय' 
करते कुछ बातें / हम लेंगे धीरे-धीरे / चाय की चुस्कियाँ 
घुला रहेगा प्रेम सदा / इस जीवन में इसी तरह 
दूध में शक्कर सा / और छिपा रहेगा 
फिर झलकेगा अनायास कभी भी 
धूमकेतु सा चमकते और मुझे जिलाते 
कि तुम्हें देखने मुस्कुराते / मैं बनाना चाहूँगा / ज़िंदगी भर यह चाय 
यूं देखे तो / कुछ भी नहीं है 
पर सोचें तो / बहुत कुछ है / यह एक कप चाय

अनुभूति को पकड़ने और अभिव्यक्त करने की यह सादगी, सरलता, अकृत्रिमता और अपनापन आलोक जी की कविताओं की पहचान हैं। इन्हें पढ़ना मात्र पर्याप्त नहीं है। इनमें डूबना पाठक को जिए क्षणों को जीना सिखाता है। जीकर भी न जिए गए क्षणों को उद्घाटित कर फिर जीने की लालसा उत्पन्न करती ये कवितायें संवेदनशील मनुष्य की प्रतीति करती है जो आज के अस्त-वस्त-संत्रस्त यांत्रिक-भौतिक युग की पहली जरूरत है।

पुस्तक- कोई रोता है मेरे भीतर,कविता संग्रह-आलोक वर्मा,
वर्ष २०१५, ISBN ९७८-९३-८५९४२-०७-५,आकार डिमाई,
आवरण, बहुरंगी, पेपरबैक, पृष्ठ १२०, मूल्य १००/-,
बोधि प्रकाशन, ऍफ़ ७७ सेक्टर ९, पथ ११, करतारपुरा
औद्योगिक क्षेत्र, बाईस गोदाम, जयपुर-३०२००६, 


आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' 


समन्वयम,
२०४-विजय अपार्टमेंट,
नेपियर टाउन जबलपुर ४८२००१,
मो. ९४२५१८३२४४, 
ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

परिक्रमा-बीकानेर में विश्व सोशल मीडिया मैत्री सम्मेलन ने जमाया रंग




विगत दिनों जब देश के कोने-कोने और विभिन्न अन्य देशों की सोशल मीडिया से जुड़ी विभिन्न विधाओं की सौ के करीब प्रतिभायें बीकानेर में एक मंच पर इकट्ठा हुईं और उन्होंने अपनी प्रतिभाआं के जौ़हर दिखाये तो सच् एक रिकार्ड ही बन गया। जी हां, हम सब साथ साथ, नई दिल्ली के तत्वावधान में और स्थानीय संस्थाओं; साहित्यिक-सामाजिक संस्था, बीकाणा आईटीआई तथा हिन्दी साहित्य मंथन आदि के सहयोग से राजस्थान के बीकानेर में 5 और 6 मार्च को चैथा सोशल मीडिया मैत्री सम्मेलन व सम्मान समारोह स्थानीय रेल्वे प्रेक्षागृह में समारोहपूर्वक आयोजित हुआ। इसमें फेसबुक, व्हाट्सएप, ट्वीटर आदि जैसी आभाषी कही जाने वाली सोशल साइट्स की सैकड़ों प्रतिभायें न केवल पहली बार एक-दूसरे से रूबरू हुईं अपितु एक प्लेटफार्म पर पहली बार इकट्ठा होकर उन्होंने मैत्री-भाईचारे का एक इतिहास भी रचा। उनकी प्रतिभाओं ने सैकड़ों लोगों को उंगली दबाने पर भी मज़बूर किया। 

मैत्री-भाईचारे के पैग़ाम के साथ शुरू हुए दो दिन के इस सम्मेलन के विभिन्न सत्रों में मैत्री-भाईचारे के प्रचार-प्रसार में सोशल मीडिया की भूमिका, कन्या भ्रूण हत्या, लिव इन रिलेशनशिप पर परिचर्चा के अलावा दो सत्रों में कवि सम्मेलन, मनोहारी सांस्कृतिक कार्यक्रम, पुस्तकों का विमोचन और चित्र, फोटो तथा कार्टून प्रदर्शनी का भी आयोजन किया गया। इस सम्मेलन में देश के विभिन्न दूर-दराज के प्रान्तों सहित नेपाल, कनाडा और यूके से एक प्रतियोगिता के जरिये चुन कर आई फेसबुक, व्हाट्सएप और ट्वीटर आदि सामाजिक साइट्स की आभाषी दुनिया की साहित्य, संगीत, नृत्य और कला क्षेत्रों की सौ के करीब प्रतिभाओं ने अपनी विभिन्न कलाओं के प्रदर्शन से उपस्थित जन समुदाय को मंत्र मुग्ध कर दिया। 


पहले दिन कला प्रदर्शनी का उद्घाटन प्रसिद्ध चित्रकार मुरली मनोहर माथुर और कनाडा से पधारे हिन्दी विद्वान सरन घई द्वारा किया गया जिसमें विवेक मित्तल (बीकानेर) एवं संगीता राज (दिल्ली) के चित्र, मीता रॉय (गाजियाबाद) एवं सृष्टि सिन्हा (झांसी) के कार्टून्स, प्रदीप आर्यन (दिल्ली) के फोटो और हर्षित सिंह (लखनऊ) के हस्त शिल्प का प्रदर्शन किया गया। तत्पश्चात् उद्घाटन सत्र की शुरूआत दिल्ली से पधारीं सुषमा भण्डारी ने अपने मधुर कंठ से कर्ण प्रिय राजस्थानी सरस्वती वंदना गाकर की। वन्दना के बाद सम्मेलन के राष्ट्रीय संयोजक श्री किशोर श्रीवास्तव (दिल्ली) व उनकी टीम (शाह आलम, किरन बाला, शशि श्रीवास्तव, मीता राय एवं सरिता भाटिया) ने ‘इंसान का इंसान से हो भाईचारा, यही पैगाम हमारा’ गीत सुनाकर आपस में मिलजुल कर रहने का संदेश देकर सभी आगंतुकों को भाव विभोर कर दिया। प्रथम सत्र के मुख्य और विशिष्ट अतिथि थे भाजपा नेता नंदकिशोर सोलंकी, राजस्थानी अकादमी के पूर्व अध्यक्ष सत्य प्रकाश आचार्य व उद्योगपति के.बी. गुप्ता। उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता कनाडा से पधारे सरन घई ने की, जबकि स्वागताध्यक्ष बीकानेर के मुख्य आयोजनकर्ता गोवर्धन चैमाल थे। 


सभी अतिथियों ने अपने उद्बोधन में भाईचारे और मैत्री के इस सम्मेलन की भूरि-भूरि प्रशंसा की। सत्र का बेहतरीन मंच संचालन संजय पुरोहित ने किया। प्रथम सत्र में ही सभी प्रतिभागियों का परिचय उन्हें बार-बारी से मंच पर आमंत्रित करते हुए श्री किशोर श्रीवास्तव ने कराया। इस अवसर पर मुंबई की प्रतिभागी लता तेजेश्वर की अंग्रेजी पुस्तक ‘वेव्स आॅफ लाइफ’ और किशोर श्रीवास्तव के कहानी संग्रह ‘कही-अनकही’ का विमोचन भी माननीय अतिथियों द्वारा किया गया। ‘मैत्री-भाईचारे के प्रचार-प्रसार में सोशल मीडिया की भूमिका’ और सोशल मीडिया के खट्टे-मीठे अनुभवों पर आधारित सम्मेलन के परिचर्चा सत्र में मुख्य अतिथि कमल रंगा, विशिष्ट अतिथि गार्गी राय चैधरी रहीं तथा अध्यक्षता मालचंद तिवाऱी ने की। परिचर्चा सत्र में अपने विचारों की गंगा बहाने वालों में शामिल थे; अमित साकिरवाल (लखनऊ), रायपुर से अमृता शुक्ला, बीकानेर से डॉ. अजय जोशी, विवेक मित्तल, सीमा भाटी, डॉ. पंकज जोशी, नीलिमा शर्मा, अपूर्वा चैमाल, दिल्ली से किरण बाला, सुरभि सप्रू, विपनेश माथुर, किरण आर्य, श्रीगंगानगर से दीपक अरोड़ा, चित्रकूट से पियूष द्विवेदी, सहारनपुर से ऊंची उड़ान पत्रिका के संपादक पवन शर्मा, गौर (नेपाल) से प्रभा सिंह, देहरादून से राहुल वर्मा, नोएडा से सोमा बिश्वास, अयोध्या से शाह आलम, जयपुर से सुरेश शर्मा, बारांबकी से सुमन श्रीवास्तव, शाहजहांपुर से डा. देशबन्धु आदि। इस सत्र में स्वागताध्यक्ष सुधीर सिंह सुधाकर थे और बेहतरीन मंच संचालन श्री नासिर जैदी ने किया। 


सायंकालीन सत्र में भव्य सांस्कृतिक संध्या का आयोजन किया गया, जिसका कुशल मंच संचालन सुशील कौशिक (बीकानेर) एवं अनुपमा श्रीवास्तव (भोपाल) ने संयुक्त रूप से किया। इस सत्र की मुख्य अतिथि अल्का डॉली पाठक थीं। नृत्य के क्षेत्र में सिक्किम के गंगतोक से पधारी प्रतिभाशाली बाल प्रतिभागी कु. अस्मिता शर्मा एवं दिल्ली की कु. वन्या कंचन सिंह सहित रांची से पधारी युवा कलाकार संदीपिका राय ने अपने खूबसूरत कला प्रदर्शन से उपस्थितजनों को मंत्र मुग्ध करते हुए दांतों तले उंगली दबाने पर मजबूर कर दिया। इसी प्रकार से गायन में हल्द्वानी से गौरी मिश्रा, श्रीगंगानगर से दीपक अरोड़ा, गाजियाबाद से मीता रॉय, भीलवाड़ा से निरंजन नीर, दिल्ली से पारूल रस्तोगी सहित बीकानेर से डॉ. मोहम्मद इकबाल, ओमप्रकाश सोनी, हसन अली, पवन सोनी और सुमधुर गायिका लता तिवारी ने अपने गीतों से उपस्थितजनों का खूब मनोरंजन किया। सांस्कृतिक कार्यक्रम के दौरान ही किशोर श्रीवास्तव की गीतों और हास्य भरी मिमिक्री ने न केवल श्रोताओं को झूमने पर मजबूर किया अपितु हंसा-हंसा कर लोटपोट भी किया। तबले पर लाजवाब संगत की चुरू से पधारे प्रतिभागी राजेन्द्र शर्मा ने।


रात्रिकालीन सत्र में कवि सम्मेलन (पार्ट एक) का आयोजन किया गया, जिसका मंच संचालन बीकानेर के संजय आचार्य तथा आबू रोड पिण्डवाड़ा से पधारीं आशा पाण्डेय ओझा ने संयुक्त रूप से  अत्यन्त सलीके से किया। कवि सम्मेलन में मुख्य अतिथि मो. हनीफ ‘शमीम’ बीकानेरी, विशिष्ट अतिथि इंजी. आशा शर्मा (बीकारनेर) और हरकीरत हीर (गुवाहटी) थीं। इस सत्र की अध्यक्षता कोटा से पधारे वरिष्ठ कवि रघुनाथ प्रसाद मिश्र ‘सहज’ ने की। कवि सम्मेलन में बीकानेर से जाकिर अदीब, आनंद आचार्य, बुनियाद ज़हीन, राजेन्द्र स्वर्णकार, मीनाक्षी स्वर्णकार, बाबूलाल छंगाणी, इरशाद अजीज, मनीषा आर्य,; फरीदाबाद से अजय अज्ञात, चुरू से राजेन्द्र शर्मा, दिल्ली से शुभदा वाजपेयी, सुषमा भण्डारी व नेहा नाहटा, गुवाहटी से चंद्र प्रकाश पोद्दार, जयपुर से विनीता सुराना आदि सहित संचालक द्वय व मंचस्थ अतिथियों ने भी काव्य पाठ किया और खूब वाहवाही लूटी। 


दूसरे और अंतिम दिन 6 मार्च को सम्मेलन की शुरूआत दो ज्वलंत विषयों पर परिचर्चा के साथ हुई, विषय थे- कन्या भ्रूण हत्या व लिव इन रिलेशनशिप। चर्चा के लिए खुला मंच था, जिसमें अनेक प्रतिभागियों ने इन विषयों पर विस्तृत चर्चा की। शशि श्रीवास्तव, नेहा नाहटा व किरण बाला ने इस सत्र का मंच संचालन संयुक्त रूप से किया। इस सत्र के मुख्य अतिथि धर्मचंद जैन, विशिष्ट अतिथि, कमान्डर (डॉ) प्रेम दास निगम, श्याम स्नेही व अतुल प्रभाकर थे तथा अध्यक्षता मुरली मनोहर के माथुर ने की। इस सत्र में अतिथियों ने भी अपने विचार रखे। इसके बाद कवि सम्मेलन का दूसरा सत्र आरम्भ हुआ, जिसकी अध्यक्षता यूके से पधारी शील निगम ने की। मुख्य अतिथि थे भवानी शंकर व्यास व विशिष्ट अतिथि उषा किरण सोनी थीं। मंच संचालन नमिता राकेश व अरविंद पथिक ने संयुक्त रूप से किया। कवि सम्मेलन के इस सत्र में दिल्ली से बादल चैधरी, सुधीर सिंह, संजय शाफ़ी, नरेश मलिक, सरिता भाटिया, शाहजहांपुर से देशबंधु, चम्पावत से कैलाश चंद्र जोशी, मुंबई से लता तेजेश्वर, नौएडा से सीमा गुप्ता शारदा, लखनऊ से निवेदिता श्रीवास्तव, राहुल द्विवेदी, सीकर से निर्मला मुस्कान बरवड़, ग्वालियर से पियूष चतुर्वेदी, वारासिवनी से प्रीति सुराना, राहुल द्विवेदी, मुंबई से लता तेजेश्वर, सरोज लोढाया, गुड़गांव से श्याम स्नेही, कंचनपुर (नेपाल) से सरिता पंथी, तेजपुर (असम) से सरिता शर्मा, भिवानी से डा. अनीता भारद्वाज, बीकानेर से मोनिका गौड़, कासिम बीकानेरी, सरदार अली पडि़हार, गोविंद नारायण, अब्दुल वाहिद अशरफी, कृष्णा आचार्य, गजेन्द्र सिंह राजपुरोहित और बड़ोदरा से वीरेन्द्र सिंह, बारासिवनी से प्रीति समकित सुराना, ग्वालियर से पियूष चतुर्वेदी, आदि प्रतिभागियों ने अपने बेहतरीन काव्य पाठ से लोगों को बार बार तालियां बजाने पर मजबूर किया। 


सम्मेलन का सबसे भावुक क्षण समापन सत्र का रहा, जब चैथे सोशल मीडिया मैत्री सम्मेलन के चयनित

प्रतिभागियों को सम्मानित किये जाने के साथ ही उनकी बिदाई का समय आया। पुरस्कार वितरण समारोह का संचालन करते हुए प्रतिभागियों के महत्व और उनकी खूबियों को दर्शाने वाली काव्य पंक्तियों से सत्र के संयोजक, संचालक किशोर श्रीवास्तव ने माहौल को और भी अधिक रोचक और भाव विभोर कर दिया। समापन सत्र की अध्यक्षता लक्ष्मीनारायण रंगा ने की, जबकि मुख्य अतिथि व विशिष्ट अतिथि क्रमशः भवानीशंकर शर्मा, नेमचंद गहलोत व अल्का डॉली पाठक रहीं। प्रतिभागियों का अंग वस्त्र पहनाकर स्वागत करते हुए उन्हें स्मृति चिन्ह, प्रमाण पत्र व पुरस्कार स्वरूप बहुमूल्य किताबों का सेट भेंट किया गया। पूरे सम्मेलन की बेहतरीन फोटोग्राफी के लिये विशाल आर्यन व वीडियोग्राफी के लिये वैशाली आर्यन को भी सम्मानित किया गया। 

इस अवसर पर अतिथियों और अध्यक्ष ने समूचे आयोजन की मुक्त कंठ से सराहना करते हुए न केवल मैत्री-भाईचारे की इस भावना की प्रशंसा की अपितु इसे बीकानेर की धरती को भी गौरवान्वित करने वाला पल बताया। सभी ने ऐसे आयोजन की महत्ता पर भी बल दिया। अंत में सम्मेलन की ओर से स्थानीय संयोजक गोवर्धन लाल और राजाराम स्वर्णकार ने सभी प्रतिभागियों और सहयोगियों के प्रति आभार व्यक्त किया। कुल मिलाकर एक शानदार कार्यक्रम का अत्यन्त खुशनुमा माहौल में न केवल आगाज़ हुआ अपितु समापन भी उसी अंदाज़ में हुआ। सम्मेलन में पारम्परिक जलपान, भोजन के अलावा राजस्थानी मेहमाननवाज़ी का भी बेजोड़ नमूना देखने को मिला जहां बीकानेर से स्थानीय संयोजक गोवर्धन लाल चैमाल, राजाराम स्वर्णकार, विनोद धानुका, आशा शर्मा, मुनीन्द्र अग्निहोत्री, क़ासिम बीकानेरी और अनिल मिश्रा आदि सहित दिल्ली से पधारे राष्ट्रीय संयोजक किशोर श्रीवास्तव और शशि श्रीवास्तव आदि की टीम ढेर सारे मेहमानों की पल पल की खबर रखते हुए उनका बराबर ख़्याल रखे रही। और उनके हर सुख-दुख में बराबर के शरीक रहे। 


सम्मेलन का मुख्य आकर्षण सभी प्रतिभागियों का बड़ा सा पोस्टर कोलाज़ भी रहा जहां, दोनों दिन विभिन्न अंदाज़ों में फोटो खिंचवाने और मीडिया को इंटरव्यू देने वालों का कुछ इस तरह से जमावड़ा लगा रहा मानों वह कोई ऐतिहासिक पर्यटन केंद्र हो। अपने तरह के इस पहले और अनूठे सम्मेलन के ज़रिये आभाषी दुनिया से जुड़े सैकड़ों व्यक्ति पहली बार समूचे विश्व का प्रतिनिधित्व करते हुए आपस में एक दूसरे से, उनकी प्रतिभाओं से तो रूबरू हुए ही; दो दिन साथ-साथ रहने से पुरानी दोस्ती भी और प्रगाढ़ हुई और अनेक नये मित्र भी बने। जाते-जाते सभी अपने साथ अनेक मीठी-मीठी यादें भी समेटे हुए ले गये। सबने माना कि ऐसे कार्यक्रमों की समूचे विश्व में आवश्यकता है और इन सम्मेलनों से दोस्ती मात्र औपचारिकता बनकर नहीं रह जाती, बल्कि आपसी प्रेम, भाईचारा, सोहार्द की भावना का भी खूब विकास होता है, जो आज कुछ लोगों के अलगाववाद और वैमनस्य फैलाने वाले माहौल में निहायत ज़रूरी भी हैं।


-रिपोर्टः शशि श्रीवास्तव


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