कमला कृति

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बुधवार, 19 फ़रवरी 2020

वीरेन्द्र खरे 'अकेला' की ग़ज़लें


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार



(एक)


आत्मा आहत हुई तो शब्द बाग़ी हो गये
कहते कहते हम ग़ज़ल दुष्यंत त्यागी हो गये

 है सियासत कोठरी काजल की, रखना एहतियात
अच्छे-अच्छे लोग इसमें जा के दाग़ी हो गये

गेह-त्यागन और ये सन्यास धारण सब फ़रेब
ज़िन्दगी से हारने वाले विरागी हो गये

गालियाँ बकते रहे जिनको उन्हीं के सामने
क्या हुआ ऐसा कि श्रीमन् पायलागी हो गये

आप जिन कामों को करके हो गये पुण्यात्मा
हम उन्हीं को करके क्यों पापों के भागी हो गये


(दो)


वास्ता हर पल नई उलझन से है
फिर भी हमको प्यार इस जीवन से है

किस ग़लतफहमी में हो तुम राधिके
मेल मनमोहन का हर ग्वालन से है

दिल दिया मानो कि सब कुछ दे दिया
और क्या उम्मीद इस निर्धन से है

यार उसको भूलना मुमकिन नहीं
उसका रिश्ता दिल की हर धड़कन से है

माफ़ करना आप हैं जिस पर फ़िदा
सारी रौनक़ उसपे रंग रोगन से है

जो सही उसने दिखाया बस वही
क्यों शिकायत आपको दरपन से है

ये कहाँ मुमकिन कि लिखना छोड़ दूँ
शायरी का शौक़ तो बचपन से है

ऐ ‘अकेला’ मन में हैं जब सौ फ़साद
फ़ायदा फिर क्या भजन.पूजन से है


(तीन)


जो जैसा दिख रहा है उसको वैसा मत समझ लेना
खड़ी हो जायेगी वरना बड़ी दिक्कत समझ लेना

उसे तो बेसबब ही मुस्कुरा देने की आदत है
सो उसके मुस्कुराने को न तुम चाहत समझ लेना

कभी सोचा नहीं था तुम भी धोखेबाज़ निकलोगे
सरल होता नहीं इंसान की फ़ितरत समझ लेना

भरोसा ख़ुद पे कितना भी हो लेकिन जंग से पहले
ज़रूरी है ज़रा दुश्मन की भी ताक़त समझ लेना

अदावत  की डगर पे आखि़रश चल तो पड़े हैं हम
न होगी वापसी की कोई भी सूरत समझ लेना

तुम्हारी सात पुश्तें भी चुका पायें नहीं मुमकिन
लगाते हो मिरे ईमान की क़ीमत, समझ लेना

किसी की भी मदद को ‘ऐ अकेला’ दौड़ पड़ते हो
कहीं का भी नहीं छोड़ेगी ये आदत समझ लेना


(चार)


कुछ ऐसे ही तुम्हारे बिन ये दिल मेरा तरसता है
खिलौनों के लिए मुफ़लिस का ज्यों बच्चा तरसता है 

गए वो दिन कि जब ये तिश्नगी फ़रियाद करती थी
बुझाने को हमारी प्यास अब दरिया तरसता है 

नफ़ा-नुक़सान का झंझट तो होता है तिज़ारत में 
मुहब्बत हो तो पीतल के लिये सोना तरसता है

न जाने कब तलक होगी मेहरबानी घटाओं की
चमन के वास्ते कितना ये वीराना तरसता है

यही अंजाम अक्सर हमने देखा है मुहब्बत का
कहीं राधा तरसती है कहीं कान्हा तरसता है

पता कुछ भी नहीं हमको मगर हम सब समझते हैं
किसी बस्ती की खातिर क्यों वो बंजारा तरसता है 

कि आख़िर ऐ 'अकेला' सब्र भी रक्खे कहाँ तक दिल
बहुत कुछ बोलने को अब तो ये गूंगा तरसता है 


(पाँच)

जिसपे मरते हैं उस पे मरते हैं
क्या बुरा है जो इश्क़ करते हैं

दिल की धड़कन सम्हल नहीं पाती
तेरी गलियों  से जब गुज़रते हैं

हमको परवाह जान की भी नहीं
आप रूसवाईयों से डरते हैं

देते क्यों हैं उड़ान की तालीम
बाद में पर अगर कतरते हैं

बात उनसे जो हो तो हो कैसे
वो फ़लक से कहाँ उतरते हैं

ज़िन्दगी उनको सौंप दी हमने
जिनसे गेसू नहीं संवरते हैं

अब के कैसी बहार आई है
पत्ता पत्ता शजर बिखरते हैं

सब्र से काम लें ‘अकेला’ जी
वक़्त के साथ ज़ख़्म भरते हैं 


(छह)


बंदा तो हुजूर आपके काम आया बहुत है
ये भी है बजा आपने ठुकराया बहुत है

उल्फ़त है कि है दिल्लगी मुझको नहीं मालूम
फिर चाँद मुझे देख के मुस्काया बहुत है

दुनिया मुझे सूली पे चढ़ा दे, तो चढ़ा दे
उल्फ़त का सबक़ मैंने भी दोहराया बहुत है

ये बात बजा, की है मदद, शुक्रिया साहिब
अहसान मगर आपने जतलाया बहुत है

गुमसुम सा कई रोज़ से दिखता है वो ज़ालिम
शायद मेरा दिल तोड़ के पछताया बहुत है

खु़द की भी कभी शक्ल ज़रा देख लें साहिब
आईना मुझे आपने दिखलाया बहुत है

अब अक्ल का दुश्मन जो न समझे, तो न समझे
मैंने दिले-नादान को समझाया बहुत है

अफ़सोस नहीं क़त्ल का मुझको मेरे क़ातिल
ग़म है यही तूने मुझे तड़पाया बहुत है

ईमानो-धरम ताक पे देखो तो ‘अकेला’
पैसे के लिए आदमी पगलाया बहुत है 


(सात)


सच्ची अगर लगन है सफल हो ही जायेगी
मतला हुआ है पूरी  ग़ज़ल हो ही जायेगी


माना कि पूर्णिमा की खिली चाँदनी है वो
शरमा गई तो नीलकमल हो ही जायेगी

यूँ ही बनी रही जो इनायत ये आपकी
ये ज़िन्दगानी रंग महल हो ही जायेगी

उम्मीद है रिज़ल्ट तो अच्छा ही आयेगा
सख्ती हो चाहे जितनी नक़ल हो ही जायेगी

छिड़ ही गया है बज़्म में जब उसका ज़िक्र तो
लाज़िम है आँख मेरी सजल हो ही जायेगी

माना कि प्रॉब्लम है बड़ी फिर भी क्या हुआ
हिम्मत से काम लोगे तो हल हो ही जायेगी

घबराइए न, चार क़दम चल के देखिए 
बेहद कठिन ये राह सरल हो ही जायेगी

माना 'अकेला' आज है रूठी सी ज़िन्दगी
हम पर भी मेहरबान ये कल हो ही जायेगी



वीरेन्द्र खरे 'अकेला'     


  • जन्म : 18 अगस्त 1968 को छतरपुर (म.प्र.) 
  • पिता : स्व० श्री पुरूषोत्तम दास खरे
  • माता : श्रीमती कमला देवी खरे
  • शिक्षा :एम०ए० (इतिहास), बी०एड०
  • लेखन विधा : ग़ज़ल, गीत, कविता, व्यंग्य-लेख, कहानी, समीक्षा आलेख ।
  • प्रकाशित कृतियाँ : शेष बची चौथाई रात 1999 (ग़ज़ल संग्रह), [अयन प्रकाशन, नई दिल्ली],सुबह की दस्तक 2006 (ग़ज़ल-गीत-कविता), [सार्थक एवं अयन प्रकाशन, नई दिल्ली],अंगारों पर शबनम 2012(ग़ज़ल संग्रह) [अयन प्रकाशन, नई दिल्ली] 
  • उपलब्धियाँ : वागर्थ, कथादेश,वसुधा सहित विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं रचनाओं का प्रकाशन । लगभग 25 वर्षों से आकाशवाणी छतरपुर से रचनाओं का निरंतर प्रसारण । आकाशवाणी द्वारा गायन हेतु रचनाएँ अनुमोदित । ग़ज़ल-संग्रह 'शेष बची चौथाई रात' पर अभियान जबलपुर द्वारा 'हिन्दी भूषण' अलंकरण । मध्यप्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन एवं बुंदेलखंड हिंदी साहित्य-संस्कृति मंच सागर [म.प्र.] द्वारा कपूर चंद वैसाखिया 'तहलका ' सम्मान। अ०भा० साहित्य संगम, उदयपुर द्वारा काव्य कृति ‘सुबह की दस्तक’ पर राष्ट्रीय प्रतिभा सम्मान के अन्तर्गत 'काव्य-कौस्तुभ' सम्मान तथा लायन्स क्लब द्वारा ‘छतरपुर गौरव’ सम्मान ।
  • सम्प्रति :अध्यापन
  • सम्पर्क : छत्रसाल नगर के पीछे, पन्ना रोड, छतरपुर (म.प्र.)पिन-471001
  • मोबाइल-09981585

सोमवार, 17 जून 2019

अंसार क़म्बरी की ग़ज़लें


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार



ज़िन्दा रहे तो हमको..


ज़िन्दा रहे तो हमको क़लन्दर कहा गया
सूली पे चढ़ गये तो पयम्बर कहा गया

ऐसा हमारे दौर में अक्सर कहा गया
पत्थर को मोम, मोम को पत्थर कहा गया

खुद अपनी पीठ ठोंक ली कुछ मिल गया अगर
जब कुछ नहीं मिला तो मुक़द्दर कहा गया

वैसे तो ये भी आम मकानों की तरह था
तुम साथ हो लिये तो इसे घर कहा गया

जिस रोज़ तेरी आँख ज़रा डबडबा गयी
क़तरे को उसी दिन से समन्दर कहा गया

जो रात छोड़ दिन में भी करता है रहज़नी
ऐसे सफेद पोश को रहबर कहा गया


तेरा आँचल जो ढल गया होता..


तेरा आँचल जो ढल गया होता..
रुख़ हवा का बदल गया होता

देख लेता जो तेरी एक झलक
चाँद का दम निकल गया होता

छू न पायी तेरा बदन वरना
धूप का हाथ जल गया होता

झील पर ख़ुद ही आ गए वरना
तुझको लेने कमल गया होता

मैं जो पीता शराब आँखों से
गिरते-गिरते सँभल गया होता

माँगते क्यूँ वो आईना मुझसे
मैं जो लेकर ग़ज़ल गया होता


हम कहाँ आ गये..


हम कहाँ आ गये आशियाँ छोड़कर
खिलखिलाती हुई बस्तियां छोड़कर

उम्र की एक मंजिल में हम रुक गये
बचपना बढ़ गया उँगलियाँ छोड़कर

नाख़ुदा ख़ुद ही आपस में लड़ने लगे
लोग जायें कहाँ कश्तियाँ छोड़कर

आज अख़बार में फिर पढ़ोगे वही
कल जो सूरज गया सुर्ख़ियाँ छोड़कर

लाख रोका गया पर चला ही गया
वक़्त यादों की परछाईयाँ छोड़कर


बह रही है जहाँ पर नदी..


बह रही है जहाँ पर नदी आजकल
जाने क्यूँ है वहीं तश्नगी आजकल

अपने काँधे पे अपनी सलीबे लिये
फिर रहा है हर एक आदमी आजकल

बोझ काँधों पे है, ख़ार राहों में हैं
आदमी की ये है ज़िन्दगी आजकल

पाँव दिन में जलें, रात में दिल जले
घूप से तेज़ है  चाँदनी आजकल

एक तुम ही नहीं हो मेरे पास बस
और कोई नहीं है कमी आजकल

अपना चेहरा दिखाये किसे ‘क़म्बरी’
आईना भी लगे अजनबी आजकल


कोई खिलता गुलाब क्या जाने..


कोई खिलता गुलाब क्या जाने
आ गया कब शबाब क्या जाने

गर्मिये-हुस्न की लताफ़त को
तेरे रुख़ का नक़ाब क्या जाने

इस क़दर मैं नशे में डूबा हूँ
जामो-मीना शराब क्या जाने

लोग जीते हैं कैसे बस्ती में
इस शहर का  नवाब क्या जाने

ए.सी. कमरों में बैठने वाले
गर्मिए-आफ़ताब क्या जाने

नींद में ख़्वाब देखने वाले
जागी आँखों के ख़्वाब क्या जाने

जिसको अल्लाह पर यकीन नहीं
वो सवाबो-अज़ाब क्या जाने
...........................................................................................................................

अंसार क़म्बरी



  • पिता का नाम : स्व. ज़व्वार हुसैन रिज़वी
  • जन्म : 03-11-1950
  • लेखन : ग़ज़ल, गीत, दोहा, मुक्तक, नौहा, सलाम, यदा-कदा आलेख एवं पुस्तक समीक्षा आदि
  • प्रकाशित कृति : ‘अंतस का संगीत’ (दोहा व गीत काव्य संग्रह) नवचेतन प्रकाशन, दिल्ली वर्ष–2011
  • सम्मान : उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ व्दारा 1996  के सौहार्द पुरस्कार एवंसमय-समय
  • पर नगर व देश की अनेकानेक साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओंव्दारा पुरस्कृत व सम्मानित
  • सम्पर्क : ‘ज़फ़र मंजिल’ 11/116, ग्वालटोली, कानपूर – 208001
  • मो - 9450938629
  • ई-मेल: ansarqumbari@gmail.com

मंगलवार, 12 जुलाई 2016

सपना मांगलिक की ग़ज़लें


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


(एक)


गली मोहब्बतों की जाके ,क्या भला मिला
मिला राह में जो भी वो ही दिलजला मिला

कहा इश्कजादे ले खुशियों की लूट दौलतें
ख़ुशी दूर हमको अश्कों का सिलसिला मिला

जहाँ पूछ ना तू ,करके मुहब्बत क्या मिला ?
खलिश थी नहीं लेकिन ,दिल में कुछ खला मिला

उठा है यकीं दुनिया से ,उसपे यकीन कर
मठा फूंककर पीता लोगों ,दूधों से जला मिला

तड़प दीद के उसकी ,है ख्वाईश आखिरी
झलक बेवफा की करने दर ये खुला मिला



(दो)


डुबायें क्यूँ न ,खुद को हम ,शराब में
मिली नफरत ,हमें इश्के-जवाव में

पढ़ी थीं मोहब्बतें आयतें समझ
मिलेगा लफ्ज ना अब ये किताब में

परखने से जियादा हम निरखा किये
कमी कुछ रह गयी शायद हिसाब में

भरा गोदाम खाली आज कर दिया
बिकी जागीर दिल की कोड़ी भाव में

न महकेगा कभी ये गुले दोस्त सुन
लगा कीड़ा कि अब खिलते गुलाब में



(तीन)


बारिशों में गमों को डुबाकर चले
अश्क हम इस जहाँ से छुपाकर चले

है डरे रूसबाई मगर क्या करें
दिल गली यार की हम बताकर चले

पूछते हो लहू रिस रहा क्यूँ भला
तीर दिल में मिरे वो चुभाकर चले

सीं लिए होंठ आया जिक्र जब तिरा
नाम तेरा लवों पे दबाकर चले

इश्क अरमान  ईमान सब दे दिया
पास था दिल उसे भी लुटाकर चले

सर उठा चल रहे थे जहां में कभी
शोहरत ख़ाक में अब मिलाकर चले



(चार)


गले की प्यास होंठों से छुपानी आ गई
हमें यूँ धूल बातों पर उडानी आ गई

भुला डाला जिसे कबका कभी सोचा न था
हमें फिर याद भूली वो कहानी आ गई

कि उछली मौज जज्बों की गया दरिया सहम
गया था जम लहू रग में रवानी आ गई

किया उर्दू उसे खुद रोशनाई बन गए
कि गजलों में मिरी जबसे जवानी आ गई

गया सीने मिरे कुछ आज शीशे सा दरक
उभर के चोट ज्यादा यूँ पुरानी आ गई



(पांच)


झाड़ियाँ नफरत की ,बोते हैं बो जाने दो
डूबना गर किस्मत है तो ये भी हो जाने दो

जान भी ले ले देते हैं ये हक भी तुमको
दिल अगर रोता भी है तो क्या ,रो जाने दो

जिन्दगी ने दुत्कारा हमको बेदर्दी से
मौत की बाहों में खोना है खो जाने दो

धडकनें वो सब चलती हैं जो देख तुझको
खींच ले सीने से उन्हें ,मुझको जाने दे

मैं बयां करती भी हूँ तो क्या हासिल होगा
गम मिरा चीखें सन्नाटों की हो जाने दे



(छह)


दुश्मनों से कहाँ डर मुझे है
इल्म इंसान का गर मुझे है

क्यूँ जरूरत तुझे हो हमारी

चाह तेरी सनम पर मुझे है

दर्द कैसे तुझे दूँ भला मैं

है तुझे गम असर कर मुझे है

क्या हुनर वो करे बेवफाई

बेखबर सब खबर पर मुझे है

इल्तजा ये करूँ आखिरी अब

बेवफा कर न दर  दर मुझे है



(सात)


फेरकर मुंह तू जो खड़ी है
बेखबर सुन ग़ज़ल आखिरी है

लुट गए जो नज़ारे नज़र थे
दिल तुझे मगर अपनी पड़ी है

उस खता की मिल रही सजायें
जो कि मैंने करी ही नहीं है

घूमते सब लगाकर मुखौटे
भेड़ीया नस्ल पर आदमी है

यूँ करम रव तिरे हैं बहुत से
जिन्दगी उस बिना बेबसी है

दिल मिरे जगह तेरी वही है
बेवफा तू जुबाँ से फिरी हैं

है बड़ी कशमकश दिल करूँ क्या
कल तलक थी ख़ुशी अब गमी है

फासले दरमियाँ कम न होते
दूर जैसे फ़लक से जमीं है

गोद मे में मरुँ बस तिरी ही
ये तमन्ना मिरी आखिरी है



सपना मांगलिक 


  • जन्म: 17 फरवरी-1981 भरतपुर (राजस्थान)। 
  • शिक्षा: एम.ए.; बी.एड.; एक्सपोर्ट मैनेजमेंट डिप्लोमा।
  • प्रकाशन : पापा कब आओगे, नौकी बहू (कहानी संग्रह), सफलता रास्तों से मंज़िल तक, ढाई आखर प्रेम का (प्रेरक गद्द्य संग्रह), कमसिन बाला, कल क्या होगा, बगावत (काव्य संग्रह), जज़्बा-ए-दिल भाग -प्रथम, द्वितीय, तृतीय (ग़ज़ल संग्रह), टिमटिम तारे, गुनगुनाते अक्षर, होटल जंगल ट्रीट (बाल साहित्य)
  • प्रसारण : आकाशवाणी एवं दूरदर्शन पर निरंतर रचनाओं का प्रसारण
  • संपादन : तुम को ना भूल पायेंगे (संस्मरण संग्रह) स्वर्ण जयंती स्मारिका (समानांतर साहित्य संस्थान)
  • संस्थापक : जीवन सारांश समाज सेवा समिति, बज़्म-ए-सारांश (उर्दू हिंदी साहित्य समिति)
  • सदस्य : ऑथर गिल्ड ऑफ़ इंडिया, अखिल भारतीय गंगा समिति जलगांव, महानगर लेखिका समिति आगरा, साहित्य साधिका समिति आगरा, सामानांतर साहित्य समिति आगरा, आगमन साहित्य परिषद हापुड़, इंटेलिजेंस मिडिया एसोशिसन, दिल्ली
  • सम्मान : विभिन्न राजकीय एवं प्रादेशिक मंचों से सम्मानित
  • रचना कर्म : विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित।
  • सम्पर्क : एफ-659, कमला नगर, आगरा-282005
  • फोन-9548509508
  • ईमेल –sapna8manglik@gmail.com

मंगलवार, 21 जून 2016

नवीन सी चतुर्वेदी की ब्रज-ग़ज़लें


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


(एक)


मीठे बोलन कों सदाचार समझ लेवें हैं ।
लोग टीलेन कों कुहसार समझ लेवें हैं ॥

दूर अम्बर में कोऊ आँख लहू रोवै है।
हम यहाँ वा’इ चमत्कार समझ लेवें हैं ॥

कोऊ  बप्पार सों भेजै है बिचारन की फौज।
हम यहाँ खुद कों कलाकार समझ लेवें हैं ॥

पैलें हर बात पे लड्बौ ही सूझतौ हो हमें।
अब तौ बस रार कौ इसरार समझ लेवें हैं ॥

भूल कें हू कबू पैंजनिया कों पाजेब न बोल।
सब की झनकार कों फनकार समझ लेवें हैं ॥

एक हू मौकौ गँबायौ न जखम दैबे कौ।
आउ अब संग में उपचार समझ लेवें हैं ॥

अपनी बातन कौ बतंगड़ न बनाऔ भैया।
सार इक पल में समझदार समझ लेवें हैं ॥


(दो)


सब कछ हतै कन्ट्रौल में तौ फिर परेसानी ऐ चौं।
सहरन में भिच्चम –भिच्च और गामन में बीरानी ऐ चौं॥

जा कौ डस्यौ कुरुछेत्र पानी माँगत्वै संसार सूँ।
अजहूँ खुपड़ियन में बु ई कीड़ा सुलेमानी ऐ चौं॥

धरती पे तारे लायबे की जिद्द हम नें चौं करी।
अब कर दई तौ रात की सत्ता पे हैरानी ऐ चौं॥

सगरौ सरोबर सोख कें बस बूँद भर बरसातु एँ।
बच्चन की मैया-बाप पे इत्ती महरबानी ऐ चौं॥

सब्दन पे नाहीं भाबनन पे ध्यान धर कें सोचियो।
सहरन कौ खिदमतगार गामन कौ हबा-पानी ऐ चौं॥


(तीन)


कहाँ गागर में सागर होतु ऐ भैया।
समुद्दर तौ समुद्दर होतु ऐ भैया॥

हरिक तकलीफ कौं अँसुआ कहाँ मिल’तें।
दुखन कौ ऊ मुकद्दर होतु ऐ भैया॥

छिमा तौ माँग और सँग में भलौ हू कर।
हिसाब ऐसें बरब्बर होतु ऐ भैया॥

सबेरें उठ कें बासे म्हों न खाऔ कर।
जि अतिथी कौ अनादर होतु ऐ भैया॥

कबउ खुद्दऊ तौ गीता-सार समझौ कर।
जिसम सब कौ ही नस्वर होतु ऐ भैया॥

जब’इ हाथन में मेरे होतु ऐ पतबार।
तब’इ पाँइन में लंगर होतु ऐ भैया॥

बिना आकार कछ होबत नहीं साकार।
सबद कौ मूल - अक्षर होतु ऐ भैया॥


(चार)


अपनी खुसी सूँ थोरें ई सब नें करी सही।
बौहरे नें दाब-दूब कें करबा लई सही॥

जै सोच कें ई सबनें उमर भर दई सही।
समझे कि अब की बार की है आखरी सही॥

पहली सही नें लूट लयो सगरौ चैन-चान।
अब और का हरैगी मरी दूसरी सही॥

मन कह रह्यौ है बौहरे की बहियन कूँ फार दऊँ।
फिर देखूँ काँ सों लाउतै पुरखान की सही॥

धौंताए सूँ नहर पे खड़ो है मुनीम साब।
रुक्का पे लेयगौ मेरी सायद नई सही॥

म्हाँ- म्हाँ जमीन आग उगल रइ ए आज तक।
घर-घर परी ही बन कें जहाँ बीजरी सही॥

तो कूँ भी जो ‘नवीन’ पसंद आबै मेरी बात।
तौ कर गजल पे अपने सगे-गाम की सही॥


(पांच)


अँधेरी रैन में जब दीप जगमगावतु एँ। 
अमा कूँ बैठें ई बैठें घुमेर आमतु एँ॥

अब’न के दूध सूँ मक्खन की आस का करनी। 
दही बिलोइ कें मठ्ठा ई चीर पामतु एँ॥

अब उन के ताईं लड़कपन कहाँ सूँ लामें हम। 
जो पढते-पढते कुटम्बन के बोझ उठामतु एँ॥

हमारे गाम ई हम कूँ सहेजत्वें साहब। 
सहर तौ हम कूँ सपत्तौ ई लील जामतु एँ॥

सिपाहियन की बहुरियन कौ दीप-दान अजब। 
पिया के नेह में हिरदेन कूँ जरामतु एँ॥

तरस गए एँ तकत बाट चित्रकूट के घाट। 
न राम आमें न भगतन की तिस बुझामतु एँ॥



नवीन सी. चतुर्वेदी


  • 27 अक्तूबर 1968 को ब्रज-वैभव-कृष्ण की जन्मस्थली मथुरा के मथुरास्थ माथुर चतुर्वेद परिवार में जन्मे  नवीन सी. चतुर्वेदी वैदिक-अध्ययन से तकनीकी-कारोबार तक का सफ़र करने वाले चुनिन्दा व्यक्तियों में शुमार होते हैं। मुम्बई में सीक्युरिटी-सेफ्टी-इक्विपमेण्ट्स के व्यवसाय में संलग्न, स्वभाव से संकोची नवीन जी छन्द, ग़ज़ल, गीत सहित काव्य की अनेक विधाओं के साथ ही साथ गद्य-लेखन से भी जुड़े हुये हैं। अन्तर्जालीय पोर्टल साहित्यम, लफ़्ज़ एवम् कविता-कोष आदि के सम्पादन से जुड़े हुये हैं। आपने कई ओडियो कैसेट्स के लिये लेखन किया है। आप ने ब्रज भाषा में न सिर्फ़ गजलें लिखी हैं बल्कि इस विधा को विधिवत स्थापित भी किया है। महाकवि बिहारी के भानजे कृष्ण कवि ककोर की वंश परम्परा से जुड़े ब्रज-गजल-प्रवर्तक नवीन जी को ब्रज-गजलों की पहली पुस्तक 'पुखराज हबा में उड़ गए' प्रस्तुत करने का श्रेय प्राप्त है। आप पिंगलीय-छन्दों व उर्दू-अरूज का अर्जित ज्ञान लोगों के साथ बाँटने को सहर्ष उद्यत रहते हैं। आप वर्तमान समय को साहित्य का क्षरण-काल मानते हैं तथा स्तरहीन-काव्य-आयोजनों के समक्ष सरस और वैचारिक कविताओं को पुनर्स्थापित करने के लिये समर्पित हैं। आप का सपना है जिस तरह उर्दू शायरी के पास उस का अपना प्रबुद्ध-श्रोता-वर्ग है, काव्य की अन्य विधाओं को भी उसी तरह अपने-अपने हिस्से का बुद्धिजीवी वर्ग हासिल करना चाहिये।

मंगलवार, 31 मई 2016

मयंक अवस्थी की ग़ज़लें


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


वही  अज़ाब  वही  आसरा..


वही  अज़ाब  वही  आसरा  भी  जीने का
वो मेरा दिल ही नहीं ज़ख्म भी है सीने का

मैं बेलिबास  ही शीशे के  घर में रहता हूँ
मुझे भी शौक है  अपनी तरह से जीने का

वो  देख  चाँद की पुरनूर  कहकशाओं  मे
तमाम  रंग  है  खुर्शीद  के  पसीने   का

मैं पुरख़ुलूस हूँ फागुन की दोपहर की  तरह
तेरा  मिजाज़  लगे  पूस  के  महीने  का

समंदरों  के  सफ़र  में सम्हाल कर रखना
किसी  कुयें  से जो पानी मिला है पीने का

'मयंक' आँख में सैलाब उठ न पाये कभी  
कि  एक अश्क मुसाफिर है इस सफीने का
                           

  • अज़ाब=पीड़ा 
  • पुरनूर कहकशाओं = ज्योतिर्मय व्योम गंगाओं 
  • खुर्शीद=सूर्य 
  • पुरखुलूस=अत्मीयता से भरा हुआ


क़ैदे-शबे-हयात बदन में..


क़ैदे-शबे-हयात बदन में गुज़ार के
उड़ जाऊँगा मैं सुबह अज़ीयत उतार के

इक धूप ज़िन्दगी को यूँ सहरा बना गयी
आये न इस उजाड़ में मौसम बहार के

ये बेगुनाह शम्म: जलेगी तमाम रात
उसके लबों से छू गये थे लब शरार के

सीलन को राह मिल गयी दीमक को सैरगाह
अंजाम देख लीजिये घर की दरार के

सजती नहीं है तुमपे ये तहज़ीब मग़रिबी 
इक तो फटे लिबास हैं वो भी उधार के

बादल नहीं हुज़ूर ये आँधी है आग की
आँखो से देखिये ज़रा चश्मा उतार के

जब हथकड़ी को तोड़ के क़ाफ़िर हुआ फ़रार
रोते रहे असीर ख़ुदा को पुकार के

  • क़ैदे-  शबे-  हयात- जीवन रूपी रात्रि की कैद
  • मग़रिबी –पश्चिमी  

 

कभी यकीन की दुनिया में..


कभी यकीन की दुनिया में जो गये सपने
उदासियों के समन्दर में खो गये सपने

बरस रही थी हक़ीकत की धूप घर बाहर
सहम के आँख के आँचल में खो गये सपने

कभी उड़ा के मुझे आसमान तक लाये
कभी शराब में मुझको  डुबो गये सपने

हमीं थे नींद में जो उनको सायबाँ समझा
खुली जो आँख तो दामन भिगो गये सपने

खुली रही जो मेरी आँख मेरे मरने पर
सदा–सदा के लिये आज खो गये सपने
                                                                             

खुलती ही नहीं आँख..


खुलती ही नहीं आँख उजालों के भरम से
शबरंग हुआ जाउँ मैं सूरज के करम से

तरकीब यही है उसे फूलों से ढका जाय 
चेहरे को बचाना भी है पत्थर के सनम से

इक झील सरीखी है गज़ल दश्ते-अदब में 
जो दूर थी, जो दूर रही, दूर है  हम से

आखिर ये खुला वो सभी ताज़िर थे ग़ुहर के 
जिनके भी मरासिम थे मेरे दीदा-ए-नम से

क्योंकर वो किसी मील के पत्थर पे ठहर जाय       
क्यों रिन्द की निस्बत हो तेरे दैरो-हरम से

ये मेरे तख़ल्लुस का असर मुझ पे हुआ है
अब याद नहीं अपना मुझे नाम कसम से

  • करम –कृपा
  • ताज़िर –व्यापारी
  • तख़ल्लुस –उपनाम
  • रिन्द – मयकश
  • निस्बत –सम्बन्ध
  • दैरो-हरम- मन्दिर –मस्ज़िद 

तारों से और बात में..


तारों से और बात में कमतर नहीं हूँ मैं
जुगनू हूँ इसलिये कि फ़लकपर नहीं हूँ मैं

सदमों की बारिशें मुझे कुछ तो घुलायेंगी
पुतला हूँ ख़ाक का कोई पत्थर नहीं हूँ मैं

दरिया-ए-ग़म में बर्फ के तोदे की शक्ल में

मुद्दत से अपने क़द के बराबर नहीं हूँ मैं

उसका ख़याल उसकी  ज़ुबाँ उसके तज़्किरे
उसके क़फ़स से आज भी बाहर नहीं हूँ मैं

मैं तिश्नगी के शहर पे टुकड़ा हूँ अब्र का      
कोई गिला नहीं कि समन्दर नहीं हूँ मैं

टकरा के आइने से मुझे इल्म हो गया             
किर्चों से आइने की, भी बढकर नहीं हूँ मैं

क्यूँ ज़हर ज़िन्दगी ने पिलाया मुझे “मयंक”  
वो भी तो जानती थी कि,शंकर नहीं हूं मैं   

  • तज़्किरे –ज़िक्र
  • तिश्नगी =प्यास
  • अब्र =बादल 
  • दरिया-ए-ग़म=दु:ख के दरिया में
  • बर्फ केतोदे==बर्फ क ढेर (हिमशैल का छोटा रूप )


मयंक अवस्थी



  • जन्म-25 जून, 1964/हरदोई (उत्तर प्रदेश) 
  • साहित्यिक परिचय–ग़ज़ल तथा गीत विधाओं में रचनायें तथा समीक्षायें । 
  • सम्पादन–गज़ल संग्रह 'तस्वीरें पानी पर' (1999), 'लफ़्ज़' पत्रिका के वेब एडिशन का सम्पादन सन 2012 से. 
  • सम्प्रति –भारतीय रिज़र्व बैंक कानपुर में कार्यरत 
  • सम्पर्क–बी -11, भारतीय रिज़र्व बैंक अधिकारी आवास, तिलक नगर, कानपुर-208002 
  • ईमेल-awasthimka@gmail.com 

मंगलवार, 24 मई 2016

सत्य प्रकाश शर्मा की गज़लें


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


एक सफर दिल से..


माज़ी से मुस्तकिबल तक 
एक सफर दिल से दिल तक 

रास्तों में यारी कर ले 
आ जाएगा मंजि़ल तक 

दरिया कितना भूखा है 
खा जाता है साहिल तक 

दिखता है उसका चेहरा 
तनहाई से महफि़ल तक 

रंगीनी है दुनिया की 
बस आँखों की झिलमिल तक 

मुश्किल में आसानी है 
आसानी है मुश्किल तक 


ऐसा भी कुछ कहो कि..


एहसास में हो ‘मीर’, जबाँ में ‘असद’ रहे 
ऐसा भी कुछ कहो कि जहाँ में सनद रहे 

सर ही नहीं उठाना तो डरने की बात क्या 
चेहरा हो चाहे जैसा भी, कैसा भी क़द रहे 

कोई सबब तो हो कि तुम्हें याद रख सकें 
दिल टूटने में कुछ तो तुम्हारी मदद रहे 

इल्ज़ाम हमसे कोई नकारा नहीं गया 
जिस जुर्म में शरीक रहे, नामज़द रहे 

ये जि़न्दगी की जंग लडंूगा मैं शान से 
लेकिन है शर्त साथ ग़मों की रसद रहे 


मुख्तलिफ़ रंग हैं जमाने के..


कुछ दिखाने के, कुछ छुपाने के 
मुख्तलिफ़ रंग हैं जमाने के 

छीन कर हमसे ले गया कोई 
सारे अन्दाज़ मुस्कराने के 

जि़न्दग़ी बस उसे कहा जाए 
जिसमें मौके़ हों गुनगाने के 

क्या सिले देखिए मिले हमको 
इन बुतों को खुदा बनाने के 

दाने-दाने पे उसका है 
लोग मोहताज दाने-दाने के 


चोट खाते रहे..


चोट खाते रहे ज़माने से 
बाज़ आए न मुस्कुराने से 

चार-सू रौशनी महकती है 
एक दिल का दिया जलाने से 

हमसे मिल जाओ फिर कभी आकर 
ज़ख़्म होने लगे पुराने से 

ज़िक्र उनका कोई करे हमसे 
जिनको देखा नहीं ज़माने से 

इश्क करना गुनाह ठहरा तो 
हम गुनहगार हैं ज़माने से 

कह रही हैं ख़तों की तहरीरें 
हम न मिट पाएंगे मिटाने से 

धूप के तज्रबे सुनाते हैं 
बैठकर लोग शामियाने से 

हुस्न की शान में ग़ज़ल कहना 
सीखिये ‘मीर’ के घराने से 

घर-सा लगने लगा है मयख़ाना 
रोज़ आने से, रोज जाने से 


ये तमाशा है, सब...


ये तमाशा है, सब लकीरों का 
मुन्तजि़र है शिकार तीरों का 


गाल अपने बजाओ महफि़ल में 
क्या करोगे मियाँ मँजीरों का 

जुल्म पर, कैद पर, हु़कूमत पर 
कितना एहसान है असीरों का 

कंकरी कोहेनूर कर डालें 
मर्तबा है बड़ा फ़क़ीरों का 

कौडि़यों की जिन्हें तमीज़ नहीं 
भाव तय कर रहे हैं हीरों का