कमला कृति

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रविवार, 21 अक्टूबर 2018

नाज़िम हिक़मत की कविताएँ


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


मेरी कविता के बारे में


मेरे पास सवारी करने के लिए
चाँदी की काठी वाला अश्व न था
रहने के लिए कोई पैतृक निवास न था
न धन दौलत थी और न ही अचल सम्पत्ति
एक प्याला शहद ही था जो मेरा अपना था
एक प्याला शहद
जो आग की तरह सुर्ख़ था !
मेरा शहद ही मेरे लिए सब कुछ था
मैनें अपनी धन दौलत
अपनी अचल सम्पदा की रखबाली की
हर क़िस्म के जीव-जन्तुओं से उसकी रक्षा की
मेरे सहोदर, तनिक प्रतीक्षा तो करो
यहाँ मेरा आशय
मेरे शहद भरे पात्र से ही है
जैसे ही मैं
अपना पात्र शहद से भर लूँगा
मक्खियाँ टिम्बकटू से चलकर
इस तक आएँगी !


कुछ सलाह उनके लिए जो उद्देश्य के लिए जेल में हैं


गर्दन पर फन्दा कसने के बजाय
यदि धकेल दिया जाए तुम्हें काल-कोठरी में
महज़ इसलिए
कि दुनिया के लिए, अपने देश के लिए,
अपनों के लिए उम्मीद नही छोड़ी तुमने
यदि ज़िन्दगी के बाक़ी बचे दस-पन्द्रह वर्षों में भी
तुम्हारे साथ यही सुलूक होता रहे
तो तुम यह भी नही कह पाओगे कि अच्छा होता
जो मुझे रस्सी के छोर पर एक झण्डे की तरह टाँग दिया जाता
किन्तु तुम्हें डटे रहना होगा और जीना होगा
वास्तव में यह तुम्हें ख़ुशी नही दे सकता
लेकिन तुम्हारा यह परम कर्तव्य है
दुश्मन का विरोध करने के लिए तुम
एक दिन और जियो
मुमकिन है कि
कुएँ के तल से आती आवाज़ की तरह
तुम्हारा अन्तर्मन भी अकेलेपन से भर उठे
किन्तु दूसरी ओर
दुनिया की हड़बड़ी देख
भीतर ही भीतर सिहर उठोगे तुम
बाह्य जगत में एक पत्ती भी
चालीस दिनों के अन्तराल पर निकलती है
अन्तर्घट से आती आवाज़ के लिए प्रतीक्षा करना
दुःख भरे गीत गाना
या पूरी रात छत ताकते हुए जागते रहना
भला तो है किन्तु डरावना भी है
हर बार हजामत बनाते हुए
अपने चेहरे को देखो !
भूल जाओ अपनी उम्र !
दुश्मन से सतर्क रहो
और मधुमास की रातों के लिए
रोटी का आख़िरी टुकड़ा खाना
हमेशा याद रखो
और कभी मत भूलो
दिल से खिलखिलाना !
कौन जानता है
वह महिला जिसे तुम प्रेम करते हो
कल तुम्हें प्रेम करना ही छोड़ दे
मत कहना यह कोई बड़ा मसला नही है
यह मनुष्य के लिए
मन की हरी डाली तोड़ देने जैसा होगा
मन ही मन गुलाबों और बाग़ीचों के बारे में
सोचते रहना फिजूल है
वहीँ समन्दर और पर्वतों के बारे में सोचना उत्तम होगा
बिना रुके पढ़ते-लिखते रहो
और मैं तुम्हें बुनने और
दर्पण बनाने की सलाह भी दूँगा
मेरा आशय यह कतई नही है
तुम दस या पन्द्रह वर्ष
जेल में नही रह सकते
इससे कहीं ज़्यादा .....
तुम कर सकते हो
जब तक
तुम्हारे हृदय के बाईं ओर स्थित मणि
अपनी कान्ति न गँवा दे !

(अंग्रेज़ी से अनुवाद : नीता पोरवाल)

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ईश्वर करुण अभिनंदन ग्रंथ' हेतु रचनाएँ आमंत्रित


         साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्था 'साहित्य मंथन' (हैदराबाद) के तत्वावधान में चेन्नै के  सुप्रतिष्ठित साहित्यकार और हिंदीसेवी  ईश्वर करुण (ईश्वर चंद्र झा) के व्यक्तित्व और कृतित्व पर केंद्रित अभिनंदन ग्रंथ के प्रकाशन की योजना निश्चित हुई है। इस ग्रंथ का संपादन प्रो. ऋषभ देव शर्मा और डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा संयुक्त रूप से करेंगे। संपादकों ने ईश्वर करुण और उनके साहित्य से परिचित लेखकों से अनुरोध किया है कि लगभग 1000 शब्दों में ईश्वर करुण से संबंधित अपना संस्मरण या समीक्षात्मक आलेख अभिनंदन ग्रंथ के लिए उपलब्ध कराएँ।
        ग्रंथ की प्रकृति के अनुसार आलेख - ईश्वर करुण : जैसा मैंने देखा (अंतरंग संस्मरण), कवि सम्मेलनों का लाड़ला रचनाकार ईश्वर करुण, ईश्वर करुण और उनके गीत, हिंदी ग़ज़ल को ईश्वर करुण की देन, पत्रकार और संपादक ईश्वर करुण, राजभाषा अधिकारी के रूप में ईश्वर करुण की उपलब्धियाँ, ईश्वर करुण की कहानियों में समकालीन समाज, नई कविता और ईश्वर करुण की रचनाधर्मिता, ईश्वर करुण के साहित्य में मैथिल लोक, ईश्वर करुण के साहित्य में चेन्नई की धड़कन, इलेक्ट्रानिक जनसंचार : ईश्वर करुण की उपलब्धियाँ, ईश्वर करुण के काव्य में लालित्य आदि विषयों पर केंद्रित हो सकते हैं। यह सामग्री rishabhadeosharma@yahoo.com/ neerajagkonda@gmail.com/ ishwar_karun@yahoo.co.in  पते पर ईमेल द्वारा भेजी जा सकती है।

  • डॉ.गुर्रमकोंडा नीरजा


मंगलवार, 1 अगस्त 2017

नदी​ एवं अन्य कविताएं-वंदना सहाय


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


नदी


नहीं याद है 
नदी को अपना जन्म 
या कब से उसने बहना शुरू किया था

वह कोई बर्फीली चट्टान थी 
जिसने पिघल कर उसे जन्म दिया

फिर वह उतर आई 
उस ऊँची चट्टान को छोड़ 
नीचे मैदानों में

और बहना शुरू किया 
दो किनारों के बीच, निरन्तर
अब बहना ही उसका जीवन था 
चट्टान का वात्सल्य पिघल 
उसे बनता रहा एक सशक्त नदी 
और वह अविरल प्रवहमान होती रही 

अपने तेज वेग के कारण 
कभी ठीक से देख न पाई वह 
उस ममतामयी चेहरे को 

वह बहती रही बरसों 
और जीती रही दूसरों के लिए 
कर उपकार उन पर 

बरसों बहने के बाद वह सिमट गई 
और हो गई वेगहीन तथा कृशकाय 

उसकी थकी पलकें जब खुली, तो उसने देखा-
हिममण्डित वह चट्टान खंडित हो 
मिट्टी में मिल चुकी थी

और लोग धरती का चीर सीना 
मिट्टी में बीज बो रहे थे


समय की थपकियाँ


मोतियाबिंद से हो आईं हैं आँखें धुंधली
उसे याद आने लगती हैं वे थपकियाँ-
जो समय दिया करता था उसकी पीठ पर 
अपने कोमल हाथों से उसे सुलाने के लिए 
जब वह छोटी थी 
उन थपकियों से वह सो जाया करती थी 
तुरंत ही, चुपचाप गहरी नींद में

उसके बड़े होते ही कठोर-से लगने लगे वे हाथ
अब उन थपकियों से नहीं आती नींद 
उसे घेरने लगतीं हैं अनन्त चिंताएँ
जैसे बिन बुलाए भी दे जाता है डाकिया 
कोई दुःख भरी पाती

वह पढ़ने लगी है माँ की यादों में जाकर 
उसके चेहरे पर पड़ी आशंकाओं की लकीरों को 
समझने लगी है
जागती आँखों और दुखते घुटनों का युगल-बंधन 
पहचानने लगी है 
माँ की फीकी मुस्कान और उसके चिर थकान को

वह रोज़ थोड़ा-सा दौड़ लेती है 
समय के साथ 

पर एक दिन जब वह 
खड़ी हो आइने के सामने 
केश सुलझाने बैठी 
तो आइने में उसने अपनी माँ को 
रजत केश फैलाए देखा 


मौन कलरव


सुना है 
छोड़ दिया है चिड़ियों ने
बेफ़िक्र हो चहचहाना 
गाँवों के पेड़ों की शाखों पर भी
यहाँ पहले इन चिड़ियों की चहचहाहट को 
पहचानते थे ये लोग

लेकिन अब पहचानने लगीं हैं चिड़ियाँ-
लोगों की आवाज़ें, उनकी बोलियाँ 
कब उनका रुख बदलता है 
कब बदलते हैं उनके इरादे 
और, कब भोंकेंगे वे पीठ में छुरा

वे चुपचाप सुनतीं है, उनकी ग़ुफ़्तगू 
गाँवों को शहरों में बदलने का कुप्रयास 
मीत पेड़ों के काटे जाने का षड़्यंत्र

और पेड़ों के काटे जाने पर 
निकल आती है, आह 
जो कर देता है 
उनके कलरव को 
मौन


इंतज़ार- सुबह के उजाले का


नहीं हुआ है 
इस छोटे-से क़सबे में 
कोई आंतकवादी हमला

और ना ही है यहाँ कोई शीत-युद्ध 
गोरों और कालों के बीच

न्यूक्लियर हमले का भी कोई डर नहीं

पर, फिर भी वह डरती है 
अपने पति के स्वर्गवासी 
और बेटे के प्रवासी होने के बाद 

रात का सन्नाटा उसे डराता है 
लगते हैं आवारागर्द कुत्ते, उसे दहशतगर्द

मौन पड़ी, टूटी पीली पत्तियों की चरमराहट 
जब तोड़ ख़ामोशियों को 
जन्म देतीं है, सरगोशियों को 
तो उसका मन भर उठता है आशंकाओं से

पेड़ों की हिलती परछाइयाँ भी 
धर लेती हैं आदमवेश
उसे लगता है- जैसे कोई कर रहा हो 
उसके क़त्ल की साजिश

नीरवता और हवा के थपेड़ों से जूझता 
छोटा-सा एक बल्ब 
बन जाता है उसका रहनुमा 
और बंद दरवाज़ा उसका प्रहरी

वह तकिए के नीचे रखे टॉर्च को छूकर
भींच लेती है हाथों में विष्णुसहस्त्रनामावली

फिर आँखों में क़ैद कर लेती है 
भवसागर पार कराने वाले की तस्वीर 
और इंतज़ार करने लगती है-
सुबह के उजाले का


बिना टैग का


नहीं है कोई सज़ा
इस समाज में 
उनके लिए 
जब कोई इन्हें कहता है 'किन्नर '

या फिर, 'अरे वही, औरत और मर्द के बीच का'
या फिर 'थर्ड जेंडर'
सही है,
कहने वाला नहीं करता है कोई चोरी 
या फिर किसी की हत्या 
या बलात्कार

पर, ऐसा कहने वाला शायद ही कभी सोचता है 
कि उनका ऐसा कहना 
कर जाता है चोरी, इनके स्वाभिमान की 
हत्या, इनके अरमानों की और 
बलात्कार इनके व्यक्तित्व का
और इनकी गूँगी फरियाद
एक बार फिर ऊपर वाले से पूछती है- 
क्यों भूल गए लगाना टैग 
हमें औरत या मर्द होने का? 



वंदना सहाय



  • जन्म: 29 नवंबर
  • शिक्षा: बी. एस. सी (प्राणी-शास्त्र - ऑनर्स ), एम. एस. सी (प्राणी-शास्त्र)
  • सम्प्रति: स्वतंत्र लेखन
  • विधाएं-कविताएँ, लघुकथाएँ, हाइकू, कहानियाँ, क्षणिकाएँ, ग़ज़लें, बाल साहित्य, व्यंग्य आदि का अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित प्रकाशन, हिंदी के साथ अंग्रेज़ी में भी लेखन
  • संपर्क: 613, सुंदरम–2C,रहेजा काम्प्लेक्स, टाइम्स ऑफ़ इंडिया बिल्डिंग के निकट, मलाड (ईस्ट),मुंबई-400097 (महाराष्ट्र)
  • दूरभाष-022-28403178/09325887111,09325263178 

मंगलवार, 18 जुलाई 2017

हम पत्थर एवं अन्य कविताएं-सुरेन्द्र भसीन


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


हम पत्थर


हम पत्थर
चुपके से
चिपक कर पहाड़
सटे रहते हैं
एक दूसरे से अपनत्व में।
और इंसान कहलाते हम
जब मर्जी पहुंच जाते हैं,
अपनी जरुरतों के मारे
उन्हें सताने को
काट खाने को
अपनी सँस्कृति, अपनी सभ्यता बढ़ाने को।
क्या कभी
पहाड़ भी आए हैं
हमें सताने को ?


बहते-बिखरते


जीवन में 
बिखरने से बहना ही अच्छा होता है सदा 
ढलाव पर बहना और 
निष्चित गंतव्य तक पहुँच जाना,
चाह, प्यास, व गड्ढे भरते चले जाना अनजानी राह के। 
शुरू से अंत तक -
एक प्राकृतिक प्रक्रिया के तहत 
और फिर एकत्रित हो जाना सहमति में। 
मगर, बिखरने से कुछ नहीं सजता,
तनाव ही हाथ आता है जीवन भर का। 
निरुद्देश्य, बेवजह टूट-टूट कर गिरना,
बिल्कुल भी न संभलना न समझना हालातों को
और फट ही जाना 
कभी न जुड़ने के लिये।  


कर्मों उपासना


जैसे ही 
मैं उठता हूँ सुबह, 
हाथ जोड़कर ईश्वर से लेना चाहता हूँ, 
उसके संकेत, दिशा-निर्देश दिन भर के लिये। 
ताकि मैं कर सकूँ आत्मप्रण  से 
पूरा अनुसरण उनके प्रेषित संकेतों का 
और मेरा दिन,शांति,सफलता,उपकार में बीते,
लगे मेरा कण-कण, श्रण-श्रण उसी की कर्मों उपासना में। 
और यों दिन-दिन करके ही 
जीवन बन जायेगा निर्मल-निष्पाप,
बूंद-बूंद से घड़ा भर जायेगा - 
और इस घट का जल ही कभी भवसागर में मिल जायेगा 
उसी की एक पतली सुनहरी लहर बनकर याकि 
नभ में लहरायेगा, सूर्य में मिल जायेगा 
रोशनी की एक लकीर बनकर।  


प्रकृति प्रेम-मिलन


निशा गुजर जाती है, 
सलमा सितारों टंकी काली रेशमी चादर लिये-लिये
छम-छम करती.... 
और दिवाकर भी बहता जाता है 
रात की चाह में, इंतजार में हमेशा … 
दोनों ही आते-जाते मिलते- देखते समय संधि पर 
एक दूसरे को - प्यास लिये,चाह लिये। 
महीनों रहते एक दूसरे के वियोग में,विछोह में, 
और भारी होता जाता तन-मन। 
महीनों का विछोह-वियोग फिर जब टूटता है 
तो रात चढ़ जाती है दिन के ऊपर पूरे जोश से,
ढक-काला कर लेती है अपने उत्तेजित शरीर से और 
तब रात के जिस्मों गरूर में दिन कहाँ सफेद होता है। 
तब कड़कती है बिजलियाँ,
बरसने लगता है निर्मल जलधार रूपी प्रकृति का प्यार
बहता -उतरता है शिवत्व अपने चमत्कार में, 
और धरती पर हो जाता -
सब नवल-धवल, खिला-धुला, धुला-खिला। 
पनपति वनस्पति भी उसके बाद ही,
और पृथ्वी भी हल्की-ताजी हो,
कुछ अधिक चमकती तेज, फुर्तीली हो,
घूमने लगती है अपनी धुरी पर।    
   

पेड़ का महत्व


हवा फुसफुसाती 
पेड़ के कानों में कुछ,
पेड़, हँसने-झूमने लग जाते हैं मस्ती में 
अपनी जिज्ञासा में जलता-सोचता मैं..... 
हवा से पेड़ का जो नाता है,
हमसे क्यों नहीं बन पाता है ?
क्योंकि इन्सान दूषित करता हवा को 
पेड़ प्रदूषण मिटाता है इसलिये 
इन्सान से ज्यादा 
पेड़ महत्व का हो जाता है। 


सुरेन्द्र भसीन 



  • जन्म तिथि: 17 जून/1964 (नई दिल्ली)। 
  • कार्य क्षेत्र: विभिन्न प्राइवेट कम्पनीज में एकाउंट्स के क्षेत्र में सेवा।                 
  • निवास: के -1/19 ए, न्यू पालम विहार गुड़गांव, हरियाणा में पिछले 15 वर्षों से निवास।  
  • ब्लॉग - surinderbhasin.blogspot.in
  • सम्पर्क: मो-9899034323 
  • ईमेल - surinderb2007@hotmail.com    

मंगलवार, 4 जुलाई 2017

नरेश सक्सेना की कविताएं


हरिगोपाल सन्नू हर्ष की कलाकृति


देखता हूँ अंधेरे में अंधेरा


लाल रोशनी न होने का अंधेरा
नीली रोशनी न होने के अंधेरे से 
अलग होता है 
इसी तरह अंधेरा 
अंधेरे से अलग होता है।

अंधेरे को दोस्त बना लेना आसान है
उसे अपने पक्ष में भी किया जा सकता है
सिर्फ़ उसपर भरोसा नहीं किया जा सकता।
भरोसा रोशनी पर तो हरगिज़ नहीं
हरी चीज़े लाल रोशनी में 
काली नज़र आती हैं 
दरअसल चीज़ें 
खुद कुछ कम शातिर नहीं होतीं
वे उन रंगों की नहीं दिखतीं 
जिन्हें सोख लेती हैं 
बल्कि उन रंगों की दिखाई देती हैं 
जिन्हें लौटा रही होती हैं 
वे हमेशा 
अपनी अस्वीकृति के रंग ही दिखाती हैं

औरों की क्या कहूँ 
मेरी बायीं आँख ही देखती है कुछ और
दायीं कुछ और देखती है
बायाँ पाँव जाता है कहीं और 
दायाँ, कहीं और जाता है 
पास आओ दोस्तों अलग करें 
सन्नाटे को सन्नाटे से 
अंधेरे को अंधेरे से और 
नरेश को नरेश से।


भूख


भूख सबसे पहले दिमाग खाती है
उसके बाद आंखें
फिर जिस्म में बाकी बची चीजों को
छोड़ती कुछ भी नही है भूख
वह रिश्तों को खाती है
मां का हो बहन या बच्चों का
बच्चे तो बेहद पसंद है उसे
जिन्हें वह सबसे पहले 
और बड़ी तेजी से खाती है
बच्चों के बाद
फिर बचता ही क्या है ।


दीमक


दीमकों को
पढ़ना नही आता
वे चाट जाती है
पूरी 
किताब ।


ये लोग


तूफ़ान आया था
कुछ पेड़ों के पत्ते टूट गए है
कुछ की डालें
और कुछ तो जड़ से ही
उखड़ गये है
इनमें से सिर्फ
कुछ ही भाग्यशाली ऐसे बचे है
जिनका यह तूफ़ान
कुछ भी नही बिगड़ पाया
ये लोग ठूंठ थे ।


अच्छे बच्चे


कुछ बच्चे बहुत अच्छे होते है
वे गेंद और गुब्बारे नहीं मांगते

मिठाई नहीं मांगते जिद नही करते
और मचलते तो है ही नहीं
बड़ों का कहना मानते है
वे छोटों का भी कहना मानते है
इतने अच्छे होते है
इतने अच्छे बच्चों की
तलाश में रहते है हम
और मिलते ही उन्हें ले आते है घर
अक्सर 
तीस रुपये महीने और खाने पर ।


नरेश सक्सेना 


  • जन्म-16 जनवरी 1939, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)
  • शिक्षा-एम. ई।
  • विधाएँ-कविता, नाटक, पटकथा लेखन, फिल्म निर्देशन
  • मुख्य कृतियाँ-कविता संग्रह : समुद्र पर हो रही है बारिश, सुनो चारुशीला
  • नाटक-आदमी का आ
  • पटकथा लेखन-हर क्षण विदा है, दसवीं दौड़, जौनसार बावर, रसखान, एक हती मनू (बुंदेली)
  • फिल्म निर्देशन-संबंध, जल से ज्योति, समाधान, नन्हें कदम (सभी लघु फिल्में)
  • सम्मान-पहल सम्मान, राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार (1992), हिंदी साहित्य सम्मेलन का सम्मान, शमशेर सम्मान 
  • संपर्क-2/5, विवेक खंड, गोमतीनगर, लखनऊ - 226010 (उत्तर प्रदेश)
  • फोन-08090222200, 09450390241
  • ई-मेल-nareshsaxena68@gmail.com

गुरुवार, 15 जून 2017

नवल शुक्ल की कविताएं


विनोद शाही की कलाकृति


घरों में प्रवेश के लिए


बहुत दिनों से कोई मेरे घर नहीं आया
तो मैं सबके घर गया
सबने कहा, कोई नहीं आता अब
कोई नहीं।
कुछ समय से बदल रही थी यह जगह
और साथ-साथ घर
बहुत सारी उपयोगी चीज़ें पड़ी थीं बदलने के लिए
बहुत सारी अनपेक्षित वस्तुएँ इन्तज़ार में थीं
घरों में प्रवेश के लिए।
हम किसी घर की जगह बाज़ार जाते
और वापस अपने घर लौट आते
फिर बहुत दिनों बाद
जब नहीं आता कोई
तो कुछ इसी तरह की बातें करते।



बहुत दिनों से


वह बहुत दिनों से प्रेम नहीं कर पा रही थी
मैं बहुत दिनों से झगड़ नहीं पा रहा था
मै बहुत दिनों से प्रेम करना चाहता था
वह बहुत दिनों से झगड़ना चाहती थी
इन दिनों हमारे लिए सबकी कमी का
रोज़ ध्यान आता था
आकांक्षाएँ हमारे चाहने पर भी नहीं मिलती थीं।
हम इतने शिथिल और सुस्त थे कि
थामे हुए एक कमज़ोर धागे को, देखते
अपने-अपने सिर पर बचे, झूलते खड़े थे।
दिनों-दिन बड़े होते शहर
और छोटे होते घर में
न रोते, न हँसते
आँखें खोले
सुबह के स्वप्न की तरह थे दुनिया को देखते।



प्यार चाहिए


प्यार चाहिए
कुछ नहीं चाहिए और।
स्वस्थ हैं कमाने-खाने के लिए हाथ
पचाने के लिए पेट
चलने के लिए पाँव
देखने-सुनने के लिए
खुली आँखें कान।
सहने, सतर्क रहने के लिए दोस्त
पढ़ने-सुनने के लिए
रेडियो,अख़बार
भांड
रखने के लिए मन--
बजाने के लिए पैसे।
रहने के लिए नहीं कोई मकान
अपन कतई नहीं महान।



आदमी की सुगंध


यह जो उथल-पुथल हो रही है
बाज़ार को छूट दी जा रही है
कम किए जा रहे हैं आग्नेयास्त्र
शान्ति के शब्द बोले जा रहे हैं
वह सांत्वना है सिर्फ़
थोड़े समय की राहत
बहुत अधिक दिखावट।
इस समय सबसे अधिक
बदहाल है दुनिया
सबसे अधिक खाली है पेट।
तमाम उन्नत तकनीक
और विश्व की विकास रपटों के
ये अभी भी, एक ही पल में
धूल, धुएँ और विकिरण से भर देंगे पृथ्वी
पृथ्वी अभी भी खाली है जल से
हरियाली से, अन्न से
आदमी की सुगन्ध से।

मंगलवार, 19 जुलाई 2016

शोर एवं अन्य कविताएं-आशुतोष द्विवेदी


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


शोर


मैं अकेला हूँ,
मगर ये शोर कैसा है,
मुझे घेरे हुए है जो !
यहाँ कोई नहीं फिर भी
न जाने कौन हैं वे लोग,
मुझसे बोलते ही जा रहे हैं जो !
कोई चिल्ला रहा मुझ पर,
कोई है लड़ रहा मुझसे,
कोई पुचकारता है और
कोई व्यंग्य करता है |
कोई करता हँसी मुझसे,
कोई है हँस रहा मुझ पर |
कोई धकिया रहा है औ’
शिकायत कर रहा है –
ध्यान क्यों देता नहीं मैं,
उसकी बातों पर?
कोई रूठा हुआ है -
देर तक बोला नहीं मैं इसलिए,
उत्तर नहीं सूझा मुझे जल्दी कोई,
मैं और करता क्या ?

मेरे भीतर लगी है भीड़ सी,
अनगिनत चेहरों की,
कई परिचित, अपरिचित भी,
कई देखे हुए से पर कहीं बिसरे हुए
यादों के अँधियारे, घने वन में,
उभरते, झाँकते, संकोच करते
अजनबी मन में |
मुझे बाँटा गया जैसे,
बड़े अनगढ़, बड़े बेडौल टुकड़ों में,
उछाला फिर गया उस शोर करती भीड़ के आगे
कि लूटें जाएँ वे टुकड़े मेरे अस्तित्व,
मेरे भाव के; उन धारणाओं के कि मैं एग्ज़िस्ट (exist) करता हूँ |
मेरे टुकड़े ये मेरे चाहने पर भी,
न जुड़ पायेंगे ऐसा लग रहा मुझको |
अगर जुड़ भी गए तो
क्या मेरा अस्तित्व वापस जी उठेगा,
और जीवित रह सकेगा स्वयं के एकत्व में, अद्वैत में ?

यहाँ देकार्त का वह कथन सहसा गूँज उठता है,
सुना मैंने कहीं –
“मैं सोचता हूँ, इसलिए मैं हूँ |”
मगर ये हाल अपना देख कर है लग रहा मुझको –
“मैं सोचा जा रहा हूँ, इसलिए मैं हूँ |”
“मैं देखा जा रहा हूँ, इसलिए मैं हूँ |”
“मैं जाना जा रहा हूँ, इसलिए मैं हूँ |”
“मैं समझा जा रहा हूँ, इसलिए मैं हूँ |”
यहाँ पर बर्कले की याद आती है, बहुत ज्यादा,
अरे, प्लेटो के मानस-पुत्र,
शायद देखते होगे कहीं से तुम
कि जो अनुभव किये तुमने
वही अनुभव मुझे भी हो रहे हैं,
क्यों अचानक?
दार्शनिक तो हूँ नहीं कोई,
विचारक भी नहीं मैं,
बल्कि डरता हूँ विचारों के जटिल जंजाल से
फिर भी मुझे वे निठुर, कपटी घेर लेते हैं |

अभी कुछ थम गया हो शोर,
ऐसा कुछ नहीं हैं |
कहीं कोलाहलों में कुछ कमी आयी नहीं है |
मगर जैसा कि पहले कह चुका हूँ मैं,
पुराने गीत के ज़रिये कभी यूँ –
“कलरवों की हाट में हर क्षण,
मौन का अभ्यास करता मन”
उसी संकल्प को पकड़े,
मेरे अस्तित्व का है अंश कोई,
डुबकियाँ लेने लगा जो दर्शनों की तीव्र धारा में |
वहाँ शंकर मिले मुझको, कपिल भी साथ में थे,
एक-दूजे के गले में डालकर बाहें, पुराने साथियों से,
मस्त, परमानन्द की मुस्कान होठों पर सजाए |
और मैं चकरा रहा था –
कह गए आचार्य ‘मल्ल प्रधान’ जिन मुनि को,
उन्हींके साथ गल-बहियाँ खड़े हैं |
मगर शंका उन्होंने ही मिटा दी
और उत्तर दे दिया मेरे अ-पूछे प्रश्न का ऐसे कि
‘माया’ ही प्रकृति है औ’ ‘पुरुष’ ही ‘जीव’ है
एवं अवस्था ‘ब्रह्म’ है वह जबकि
प्रकृति पर पुरुष की विजय होती है;
पुरुष की विजय क्या है -
जान भर लेना प्रकृति को पूर्णता से |
“ऋते ज्ञानान्नमुक्तिः” का यही तात्पर्य है |
अलग हैं ढंग कहने के मगर
सिद्धांत तो है एक ही,
शायद मज़ा भी तो इसी में है कि
अगणित हों तरीके वह अनोखी बात कहने के,
कि जो संभव नहीं कहनी, बहुत खुल के,
मगर, हाँ, कुछ इशारों में बताई जो गयी अब तक,
बतायी जा रही अब भी, बताई जा सकेगी और आगे भी |

कहाँ पर मैं निकल आया,
नहीं यह डगर वह, जिसपर
शुरू चलना किया था |
छुड़ाकर, जान शायद भाग निकला भीड़ से मैं |
मगर जाऊँ कहाँ तक !
मेरे हिस्से अधिकतर तो उन्हीं के बीच में हैं,
जिनसे बचकर भागता था |
खड़ा हूँ मैं पुनः कोलाहलों के बीच आकर |
फिर कोई है खीझता मुझ पर,
कोई है झगड़ता मुझसे,
कोई दुलरा रहा है और
कोई दे रहा ताने |
कोई करता ठिठोली,
औ’ कोई उपहास करता है |
मुझे महसूस होता है कभी यूँ भी,
कि जैसे इन सभी के प्रति मेरा दायित्त्व है कुछ,
जो निभाना है मुझे हर हाल में,
पर क्या सरल है यह?
नहीं, बिलकुल नहीं |
कभी लगता है ऐसा भी,
कि जैसे सब भरम है यह,
कि जैसे एक सपना है,
अभी यह टूट जायेगा,
खुलेगी आँख तो कुछ और सच होगा;
मगर सपनों के भीतर भी
तहें सपनों की होती हैं कई,
ऐसे कि जैसे प्याज के छिलके |
खुली आँखें हों, टूटी नींद हो
फिर भी वो सपने जागते हैं,
साथ चलते हैं,
उसी अंदाज़ में,
जैसे कि वो बिंदास रहते थे,
हसीना नींद की मरमरी बाहों में |

वहीँ पर प्रश्न अटका है अभी भी,
सत्य क्या है –
खिलखिलाता शोर या फिर कँपकँपाती शांति,
आखिर मैं चुनूँ किसको?
सही थे आप हे सुकरात, हे परिपूर्ण यूनानी,
कि कहते थे –
“मुझे बस ज्ञात है इतना कि मुझको ज्ञात है कुछ भी नहीं”
सही थे आप हे सिद्धार्थ गौतम, बुद्ध थे सच में,
कि सारे प्रश्न वे जग के कि जो हल हो नहीं सकते,
धरा बस मौन उन पर और ‘अव्याकृत’ कहा उनको |
मगर उस पार थे दोनों,
नदी की धार के उस दूसरे तट पर,
जहाँ से दशा और दिशा नदी की स्पष्टतर दिखती |
फँसा हूँ मैं नदी के वेग में औ’ बह रहा हूँ,
चाहता हूँ समझना मैं भी तटों की बात,
लेकिन कर नहीं सकता
कि मेरी स्थिति बहुत विपरीत है इसके |
मगर मैं चार्वाकों की शरण में जा नहीं सकता,
मुझे जँचते नहीं वे,
जब बताते हैं कि “केवल देह सच है,
मर गई जब देह तो कुछ भी न बचता |”
देखता हूँ मैं कि मैं फिर भी बचा हूँ,
बँट गयी है देह, मन भी बँट चुका है,
श्वास की सब डोरियाँ उलझी हुई हैं,
धडकनों के तार सब टूटे पड़े हैं,
और मैं बिखरा हुआ सा,
दूर तक फैला हुआ सा
देखता असहाय सा निस्तब्ध होकर
मैं स्वयं को |
ओ मेरे विटगेन्सटाइन, सच बताना
किस मनःस्थिति में बनायीं तुमने
सीमाएं विचारों की |
हुए नाराज़ क्यों इतने कि माने ही नहीं आखिर,
रसेल के, मूर के, सबके मनाने पर ?


हम अकेले 


मैं अकेला, तू अकेला, वो अकेला,
साथ बैठे रहे काफी देर तक तीनों अकेले । 
मैं गिनाता खर्च, बच्चों की पढ़ाई पर किये जो,
तू बताता - आजकल है लाभ का व्यवसाय शिक्षा,
और वो चिंता जताता एजुकेशन माफिया पर । 
मैं दुखी हूँ, कर्ज़ चुकता ही नहीं, है सूद इतना,
तू सिखाता कर्ज़ लेने, कर्ज़ देने के तरीके,
और वो चुप है कि वो खुद सूद खाकर जी रहा है । 
मैं ये कहता - बेटियों की शादियाँ कितनी कठिन हैं,
तू सुनाता शादियों की दावतों के चंद किस्से,
और वो देता दलीलें शादियों की व्यर्थता पर । 
इस तरह एक-दूसरे की समस्याओं से अपरिचित,
एक-दूजे की परिस्थिति से परस्पर अनछुए हम,
भावना के द्वार पर यूँ स्वार्थ के ताले लगाकर,
साथ बैठे भी रहे यदि उम्र भर तो क्या मिलेगा?
अंत में हम सभी पाए जायेंगे बिल्कुल अकेले । 


बहाव 


शब्दों को चूने दो,
अब धरती छूने दो
भावों की शाखों,
विचारों की डाली से;
हैं  पक चुके अब ये,
हैं भर चुके अब ये
जीवन के रस से,
अनुभव की हुलस से;
अब अधरों पर छाने दो,
भीतर तक जाने दो
आनंद कविता का,
गीतों की सरिता का
संगम हो जाएगा
सपनों की नदिया से,
भीतर की दुनिया से
आवाज़ें आती हैं,
अब तक बुलाती हैं,
ना जाने किसको वे !
अब चाहे जिसको, वे
संतृप्ति पायेंगी, 
जब गुनगुनायेंगी,
रस पी पी जायेंगी
उन पक्के शब्दों का
जिनमें मधुरता है
भीनी मादकता है
उन्मत्त करती जो
वो उड़ान भरती जो – 
तिरता रहता है मन
नभ में करता क्रीड़न
बादल के  टुकड़ों से,
चिड़ियों की टोली से,
तारों की झिलमिल से,
चंदा की महफ़िल से
चीज़ें चुरा लेता
जिनको छुपा लेता
यादों के झोले में,

मुस्कानें, उम्मीदें,

फुरसत, सुकूँ, नींदें;
सूरज से बचता है,
जलने से डरता है,
फिर भी कभी
छेड़ आता है धीरे से;
ऐसी आज़ादी है
अवसर जो देती है
अपनी हर सीमा से
बाहर निकलने का,
खुलकर मचलने का,
जीने का, मरने का,
या फिर सच्चे अर्थों में
प्यार करने का |


आशुतोष द्विवेदी


  • जन्म : 2 जून 1982  कानपुर (उत्तर प्रदेश)
  • शिक्षा : परास्नातक, गणित, इलाहाबाद विश्वविद्यालय 
  • व्यवसाय : भारतीय विदेश सेवा (ब), विदेश मंत्रालय, नई दिल्ली
  • रचना-कर्म : 1994 से काव्य-रचना - विभिन्न विधाओं में, जैसे- छंद (घनाक्षरी, सवैया, दोहा, संस्कृत-वर्णवृत्त), गीत, ग़ज़ल, मुक्तक | कुछ मंचों पर एवं कई गोष्ठियों में काव्य-पाठ | 
  • प्रकाशन: विभिन्न पत्र- पत्रिकाओं में फुटकर प्रकाशन | इन्टरनेट पर kavyanchal.com, kavitakosh.com, geeta-kavita.com, anubhuti-hindi.org, सुबोध-सृजन आदि वेब-पत्रिकाओं पर कुछ रचनाओं का संकलन |  एक निजी ब्लॉग "संवेदना" पर भी कुछ रचनायें उपलब्ध | पिछले वर्ष एक काव्य संकलन "इतना तो मैं कह सकता हूँ" नाम से प्रकाशित | 
  • सम्पर्क : मकान सं. 311, विदेश मंत्रालय आवासीय परिसर, गोल मार्किट, नई दिल्ली 
  • ईमेल:ashutoshdwivedi1982@gmail.com

मंगलवार, 5 जुलाई 2016

राग तेलंग की कविताएं


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


अनिश्चितताएं


अनिश्चितताएं 
सनातन हैं
आज भी 
घर से निकलते ही
अनिश्चितताएं भी 
चप्पल पहनकर 
हमारे पीछे-पीछे चल पड़ती हैं
हमारे अपने 
जिस भय को ओढ़े रहते हैं
वे हमारे लौटने से जुड़ी अनिश्चितताएं ही हैं
चप्पलों की आवाज़ें
स्वप्नों तक में 
प्रवेश कर जाती हैं
हम अचकचाकर जाग जाते हैं
हर आहट में 
अनगिन संदेशों की 
संभावनाएं हैं
उनमें एक 
हमारा लौटना भी शामिल है
घर से 
सब कुछ निश्चित कर निकलना
कम से कम
एक अनिश्चय को 
पीछे छोड़ जाना तो है ही ।


ऋण


मैंने 
आंगन में
एक बीज बोया
घर में 
बच्चे को खिलाया
बच्चा बड़ा हुआ
बच्चे ने 
आंगन के पेड़ पर
झूला बांधा और मुझे झुलाया
मैंने सोचा
बीज ने आज 
सारा ऋण चुकाया ।


हीरा


जो बहुतों के पास नहीं होता
उसके बारे में बातें करने को
लोगों के पास 
बहुत समय होता है
कई बार तो
पूरी उम्र गुज़ार देते हैं
उसके सपनों में
जबकि रात भर
उनके सिरहाने रखी 
मोमबत्ती के बारे में 
वे सोचते तक नहीं
उन्हें 
ख़याल ही नहीं आता कि
बेचने के नाम पर
उनके ज़ेहन में
जो चेहरा
घुसता चला आ रहा है
वह अपने समय का 
ज़रूरी रहा नायक है
जो अब 
ग़ैरज़रूरी चीज़ों को खपाने के लिए 
नियुक्त किया गया है
हीरा थीं 
वे चीज़ें जिनके बगैर
जीवन की कल्पना तक 
मुश्किल थी
आओ फ़ेहरिस्त बनाएं
और तय करें कि
पसीना किसके लिए बहाएं ।


चिराग


एक चिराग जल रहा है
यदि यह 
एक दृश्य की बात है
तो रोशनी ज़रूर हो रही है
यदि यह 
एक लिखे हुए वाक्य की बात है
तो भी रोशनी ज़रूर हो रही है
यदि यह एक स्वप्न की बात है
तो भी रोशनी होना तय है
एक चिराग 
यदि नहीं जल रहा है
तो भी 
रोशनी का सवाल तो 
खड़ा होता ही है |

मंगलवार, 14 जून 2016

अन्ना अख्मातोवा की दो कविताएँ


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार



मैं उनके साथ हूँ


मैं उनके साथ नहीं हूँ जिन्‍होंने
शत्रुओं की यंत्रणाओं के हवाले कर दी है यह भूमि
मैं उनकी चापलूसी के झाँसे में नहीं आऊँगी
उनके हाथों में नहीं सौंपूँगी अपने गीत।
कैदी की तरह, रोगी की तरह
हर निर्वासित लगता है मुझे दयनीय,
ओ यायावर, अंधकार से भरी है तुम्‍हारी राह
कसैला तो लगेगा ही दूसरों की रोटी का स्‍वाद।
यहाँ आग के बेआवाज धुएँ में
शेष बचे यौवन का गला घोंटते हुए
एक भी प्रहार का मुँहतोड़ जवाब
दे नहीं पाए हम आज तक।
मालूम है हमें कि विलंबित मूल्‍यांकन में
न्‍यायसंगत ठहराया जाएगा हर पल...
पर दुनिया में कहीं भी नहीं हैं ऐसे लोग
जो हमसे अधिक हों अक्‍खड़, अश्रुविहीन और सरल।


अमन का गीत


आकाश की लहरों पर झूलते
पर्वत और समुद्र पार करते
उड़ते रहो अमन की फाख्‍ता की तरह
ओ मेरे मधुर गीत !
बताओ उसे जो सुन रहा है
कितना पास है वह चिर-प्रतीक्षित युग
क्‍या हाल हैं मनुष्‍य के तुम्‍हारे देश में।
तुम अकेले नहीं, बढ़ती जाएगी गिनती
तुम्‍हारे साथ उड़ती फाख्ताओं की -
दूर-दूर तक इंतजार कर रहे हैं
स्‍नेहिल मित्रों के हृदय
उड़ते रहो तुम सूर्यास्‍त की ओर
कारखानों के दमघोंटू धुएँ की ओर
हब्‍शी बस्तियों
और गंगा के नीले पानी की ओर।
(रूसी से अनुवाद: वरयाम सिंह)

मंगलवार, 26 अप्रैल 2016

संतोष श्रीवास्तव की कविताएं


विनोद शाही की कलाकृति


जंग जारी है..


डूबती नाव की तरह 
मैं ज़िन्दगी के समँदर में 
ऊबती,डूबती रही 
कभी कोनों को पकड कर 
डूबने से बचती 
कभी बेसहारा सी 
लहरों की मर्ज़ी का 
शिकार हो जाती 
कभी उत्ताल 
तरंग पर सवार हो
विजयी हो 
अपने ही कंधों पर 
बैठ इठलाती 
कभी तेज़ लहर 
पाताल तक 
खींच ले जाती 
मैं हाथ पैर मारकर 
ऊपर आ जाती 
इस जद्दोजहद में 
कितनी ही बार 
खुद को टूटा,बिखरा पाती 
सतह पर शाँत 
बहते रहने के लिये 
मुझे खुद को 
काठ करना पडेगा 
और मुझे काठ होने से 
इंकार है 
मेरी जंग अब भी जारी है


सरहदें


गुलाबी पँख की परवाज़ तारी
आसमाँ पे
लो फिर आये परिंदे 
दूर मुल्कों की हदों के 
फासलों से
रौनकें गुलज़ार हैं 
दरिया के दो बाजू
परिंदे देखते हैं
हवा,पानी,सब्ज़ हों बाजू
बसाते आशियाँ अपना
नहीं बँटते हैं मुल्कों में
नहीं करते हैं तारे 
आसमाँ पे कोई हदबंदी
नहीं घिरती घटाएँ
देखकर सरहद की चौबन्दी
हवाओं को नहीं एहसास
कितना और कहाँ बहना
तो फिर इंसा बँटा है क्यों
मज़हब और मुल्कों में
खिंची हैं सरहदें
हम बँट गये हैं
टुकडों टुकडों में
खुदाया किस तरह
हम मज़हबीं हैं
किस तरह?


बहुत करीब था मयखाना

                                                             
रात के खौफनाक सन्नाटे में
रह रह कर उभर आती
अजनबी चीखें
चौंकाती रहीं रात भर
सुबह के पास
कोई आवाज़ न थी
भोर होते ही ढ्ल गया सूरज
साँस रोके रही
हर एक रहगुज़र
कोई आहट, कोई कदमों के
निशाँ भी न थे बाकी उन पर
न कहकहों की गूँज
न मासूम हँसी के फूल
सब कहाँ दफ्न हुए
थी वहाँ लपटों की तपिश 
एक मजबूर खलिश 
मस्जिद से दूर न था बुतखाना 
बीच में था मयखाना 
जहाँ न तपिश थी न खलिश 
होठों से सटे जाम थे 
मुट्ठी में कायनात 
और पहरे पर सलीबें 
न जाने किसके हिस्से की


दौड़

                                                     
क्यों दौड रही है दुनिया
हर तरफ भागमभाग
किसी को फुरसत नहीं
कि रुककर जवाब दे
मेरे सवाल का
कहाँ किस हद तक
आखिर कोई तो मुकाम होगा
इस दौड का?
ताज्जुब है पृथ्वी नहीं दौडती
अपनी धुरी पर ही रहती है
उसे सौंपे हुए कालखँड में
पूरी निष्ठा से
इंसान का उठा हुआ हर कदम
उतनी ही दूरी नापता है
जितनी तय है
फिर दुनिया क्यों और कहाँ
दौड रही है
अगर पहियों पर सवार
इंसान की चाल आँकनी है
तो पैदल चलते पाँव
किस दुनिया में गिने जाएँगे
समय की गति से कई गुना ज्यादा
तेज़ रफ्तार से दौडते
इस कारवाँ के गुबार से भरी
ज़मीन पर
आँखे मलते मलते भी हवाओं को
अपने जायज़ सवालों से नहीं भर सकी
हवाओं के पास भी
इसका क्या जवाब होगा?
वे तो खुद अपनी शीतलता
खो चुकी हैं
फिज़ाओं में अब
परिन्दों की चहचहाहट नहीं है
भागती दौडती दुनिया का शोर है
इस दौड का कहाँ है अंत?
है भी?
इंसान दौड रहा है
इंसानियत पीछे छूट रही है
तारीख में
पहले दर्ज़ हर्फ से
पहले सफे से
उससे पहले की कहानी
गहरे अँधेरे में डूबी है
लेकिन वहाँ से भी
कदमों की बेसब्र आहट
सुनाई देती है
दौड वहाँ भी पडाव डाले है।
                       

गौतम से राम तक


गौतम ने तुम्हे पुत्रीवत
पाल पोसकर बडा किया
और अपनी अंकशायिनी बनाया
तुम चुप रहीं
मन ही मन जिसे (इन्द्र) प्रेम करती थीं
उसे पाने की लालसा के बावजूद
विरोध न कर सकीं
चुप रहीं
उस दिन इन्द्र को सामने पा
रुक नहीं पाई तुम
खुद को ढह जाने दिया
उसकी बाहों में
यह तुम्हारा अधिकार भी तो था
प्यार करने का अधिकार
पर इसके एवज
गौतम के आरोप,प्रत्यारोप
तिरस्कार,शाप?
तुम्हे नहीं लगा कि वह
गौतम का
तुम पर एकाधिकार की समाप्ति का
घायल अहंकार,कायरता और दुर्बलता थी?
तुम चुप रहीं
मूक पत्थर हो गईं
पत्थर बन तुम सहती रहीं
लाचारी,बेबसी,घुटन
बदन को गीली लकडी सा सुलगाती
अपमान की ज्वाला 
तुम्हारे पाषाण वास में 
तुम्हारी पीडा के हित 
न गौतम आये न इन्द्र 
राम ने तुम्हे पैरों से छुआ 
तुम पिघल गईं 
खामोशी से पदाघात सह गईं 
सोचो अहल्या 
गौतम से राम तक की 
तुम्हारी यात्रा 
पुरुष सत्ता की बिसात पर 
औरत को मोहरा नहीं बनाती?


संतोष श्रीवास्तव


  • जन्म-23 नवम्बर (जबलपुर)
  • शिक्षा-एम.ए(हिन्दी, इतिहास) बी.एड,.पत्रकारिता मेँ बी.ए।
  • प्रकाशित पुस्तके-बहके बसँत तुम,बहते ग्लेशियर,प्रेम सम्बन्धोँ की कहानियाँ आसमानी आँखों का मौसम (कथा सँग्रह) मालवगढ की मालविका.दबे पाँव प्यार,टेम्स की सरगम,हवा मे बँद मुट्ठियाँ,(उपन्यास) मुझे जन्म दो माँ (स्त्री विमर्श) फागुन का मन(ललित निबँध सँग्रह) नही अब और नही तथा बाबुल हम तोरे अँगना की चिडिया  (सँपादित सँग्रह) नीले पानियोँ की शायराना हरारत(यात्रा सँस्मरण)।
  • विभिन्न भाषाओ मेँ रचनाएँ अनूदित,पुस्तको पर एम फिल तथा शाह्जहाँपुर की छात्रा द्वारा पी.एच.डी,रचनाओ पर फिल्माँकन,कई पत्र पत्रिकाओ मेँ स्तम्भ लेखन व सामाजिक,मीडिया,महिला एवँ साहित्यिक सँस्थाओ से सँबध्द, प्रतिवर्ष हेमंत फाउँडेशन की ओर से हेमंत स्मृतिकविता सम्मान एवं विजय वर्मा कथा सम्मान का मुम्बई मे आयोजन,महिला सँस्था विश्व मैत्री मँच की संस्थापक,अध्यक्ष।
  • पुरस्कार-बारह राष्ट्रीय एवं दो अँतरराष्ट्रीय साहित्य एवँ पत्रकारिता पुरस्कार जिनमे महाराष्ट्र के गवर्नर के हाथो राजभवन मेँ लाइफ टाइम अचीव्हमेंट अवार्ड तथा म.प्र. राष्ट्रभाषा प्रचार समिति द्वारा मध्य प्रदेश के गवर्नर के हाथों नारी लेखन पुरस्कार विशेष उल्लेखनीय है। 'मुझे जन्म दो माँ' पुस्तक पर राजस्थान विश्वविद्यालय द्वारा पी एच डी की मानद उपाधि।  महाराष्ट्र राज्य साहित्य अकादमी का राज्यस्तरीय हिन्दी सेवा सम्मान। भारत सरकार अंतरराष्टीय पत्रकार मित्रता सँघ की ओर से 20 देशो की प्रतिनिधि के रूप मेँ यात्रा।
  • सँपर्क-101 केदारनाथ को.हा.सोसाइटी, सैक्टर-7, निकट चारकोप बस डिपो, काँदिवली, पश्चिम मुम्बई-400067
  • फ़ोन-09769023188    
  • ईमेल:  kalamkar.santosh@gmail.com

सोमवार, 29 फ़रवरी 2016

दौड़ एवं अन्य कविताएं-संजीव ठाकुर


विनोद शाही की कलाकृति


दौड़


वे पहुँच गए वहाँ
जहां उन्हें पहुंचना था
अब वे उससे आगे
पहुँचने की तैयारी में हैं ।
मेरे लिए वहाँ तक
पहुंचना
नामुमकिन तो रहा ही
उस रास्ते का पता भी लापता रहा
मैं देखता रहा सबको
आगे –
और आगे जाते हुये
मैं कर भी क्या सकता था
इसके सिवा ?


मित्र


वे देते रहते थे मुझे
जीने की दुआएं
और कब्रिस्तान के किसी कोने में बैठे
काले कपड़े वाले बाबा से
करवाया करते थे काला जादू
मेरे सर्वनाश के लिए ।
उनकी इस दोगली चाल का
क्या करें ?
भिजवाते थे प्रसाद
वैष्णो देवी का
और मेरे सत्यानाश को
किया करते थे
बगुलामुखी का जाप !


क्या करते होंगे ?


क्या करते होंगे रुपयों का
कुबेर के नाती ?
गद्दों में भरवाते होंगे?
सजाते होंगे चिता
मृतकों को जलाते होंगे
इस्तेमाल करते होंगे
टॉइलेट पेपर की तरह ?
नाक का नेटा पोंछ फेंक देते होंगे ?
सेनेटेरी नैप्किन खरीदने की जहमत से
बच जाती होंगी उनकी स्त्रियाँ ?
फेंक देती होंगी डस्ट्बिन में
खून सनी गड्डियाँ ?
रगड़ती होगी आया
दस की गड्डी से
उनके घरों में बर्तन
और सहलाती होंगी
अपने कुत्ता –मूते नसीब को

मन-ही –मन ?
कितने खुश होते होंगे
कुबेर के वंशज
बाथरूम से निकलकर
रुपयों के पायदान पर
गीली स्लीपर रखकर
खड़े होते वक्त !


ज़िंदगी


आकाश में
घर बनाने की कोशिश
ही तो है यह ज़िंदगी
मुर्दा सम्बन्धों की ईटों को ढोकर
वहाँ तक पहुंचाना
आसान भी तो नहीं ?


संजीव ठाकुर


  • जन्म-1967 (मुंगेर, बिहार)
  • शिक्षा- पीएचडी (दिल्ली विश्वविद्यालय)
  • प्रकाशन-नौटंकी जा रही है फ्रीलान्स  ज़िंदगी, अब आप आली अनवर से, प्रेम सम्बन्धों की कहानियाँ (कहानी –संग्रह), झौवा-बैहार (लघु –उपन्यास), इस साज़ पर गाया नहीं जाता (कविता-संग्रह), बच्चों के लिए पंद्रह किताबें । 
  • संप्रति-स्वतंत्र  लेखन 
  • निवास-सिद्ध विनायक अपार्टमेंट, अभय खंड, इंदरापुरम, गाजियाबाद 
  • संपर्क-0120 4116718 

मंगलवार, 24 नवंबर 2015

दो कविताएं-सुधीर मौर्य ‘सुधीर’


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


तुम्हे लौटा लाएगा..


मैं जनता हूँ
तुम्हे लौटा लाएगा
एक दिन
मेरा प्रेम
तुम्हे लौटा लाएंगे
मेरे हाथ के
लिखे खत
तुम्हे लौटा लाएंगे
मेरी आँख से
झरते अश्रु

तुम्हे लौटा लाएंगी
हरसिंगार की कलियाँ
मेरे घर की
मेहंदी की महक

तुम्हे लौटा लायंगी
तुम्हारी गलियों में बहती हवा
मेरी अटारी से उड़ती पतंग
तुम्हे लौटा लाएंगे
तुम्हारी आँखों में
बसते मेरे ख्वाब
तुम लौट आओगी
इसलिए नहीं कि
मै करता हूँ तुम्हे प्रेम
इसलिए
कि मैं प्रियतम हूँ तुम्हारा।


पहेली 


मैने ख्वाबो में
ख्यालो में
लिखी हैं–अनगिनत नज़्में
होठों पे,
रुखसार और कांधो पे,
कमर और स्तनों पे
पिंडलियाँ और नितम्बों पे
चमकते हुए पाँव पे
मेरी लिखी हुई
नज़्म का
हर्फ़–हर्फ़ पढा है उसने
मेरे साथ

कभी मेरे ख्वाबो में आकर
कभी मुझे
ख्वाबो में बुलाकर

जानती हो
फिर मैं उसे
समझ नहीं पाता

नदी सी आँखों वाली
जो तुम्हारी सहेली है
मेरे लिए वो
तुमसे भी बड़ी पहेली है।


सुधीर मौर्य ‘सुधीर‘ 


  • जन्म-01/11/1979, कानपुर 
  • शिक्षा-अभियांत्रिकी में डिप्लोमा, इतिहास और दर्शन में स्नातक, प्रबंधन में पोस्ट डिप्लोमा.
  • सम्प्रति–इंजिनियर, और स्वतंत्र लेखन.
  • कृतियाँ :‘आह’ (ग़ज़ल संग्रह),‘लम्स’ (ग़ज़ल और नज़्म संग्रह), ‘हो न हो (नज़्मसंग्रह), ‘अधूरे पंख'(कहानी संग्रह) ‘एक गली कानपुर की’ (उपन्यास), किस्से संकट प्रसाद के (व्यंग्यउपन्यास),  अमलताश के फूल (उपन्यास), बुद्ध से संवाद (काव्यखंड)- प्रकाशाधीन, देवलदेवी: एक संघर्ष गाथा (ऐतहासिक उपन्यास ), क़र्ज़ और अन्य कहानिया (कहानी संग्रह)
  • पत्र-पत्रिकायों में प्रकाशन- खुबसूरत अंदाज़, अभिनव प्रयास, सोच-विचार, युग्वंशिका,कादम्बनी, बुद्ध्भूमि, अविराम,लोकसत्य, गांडीव, उत्कर्ष मेल,  जनहितइंडिया, शिवम्, सत्यम ब्यूरेट, अखिलविश्व पत्रिका, रुबरु दुनिया आदि में.
  • वेब प्रकाशन–गद्यकोश, स्वर्गविभा, काव्यांचल, इंस्टेंट खबर, बोलोजी, भड़ास, हिमधारा, जनहित इंडिया, परफेक्ट खबर, वटवृक्ष, देशबंधु, अखिलविश्व पत्रिका, प्रवक्ता, नाव्या, प्रवासी दुनिआ, रचनाकार, अपनी माटी, जनज्वार, आधी आबादी, अविराम
  • संपर्क-ग्राम और पोस्ट-गंज जलालाबाद, उन्नाव,पिन-209869, उत्तरप्रदेश                            
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