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चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार |
तुमसे मिलन की आस तो है..
बहुत गहरे में कहीं तुमसे मिलन की आस तो है |
अधर गर्वीले नकारें लाख फिर भी प्यास तो है ||
शून्यता तो है कहीं जो बिन तुम्हारे भर न पाती,
इक चुभन भी है कि जो पीछे पड़ी दिन-रात मेरे |
दो नयन जादू भरे इस भाँति भीतर बस गए हैं,
भूल पाना अब जिन्हें, बस की नहीं है बात मेरे |
सौ बहाने मैं बना लूँ, झूम लूँ या गुनगुना लूँ ;
चित्त को अपनी अधूरी नियति का आभास तो है |
भूल जाऊँ किस तरह बेबाक होठों की शरारत ?
सेब जैसे रंग वाले गाल कैसे भूल जाऊँ ?
तारकों की पंक्तियों को मात करती मुस्कुराहट,
और चंदा को लजाता भाल कैसे भूल जाऊँ ?
आवरण मैं लाख डालूँ, स्वयं को खुद से छिपा लूँ;
पर जहां 'मैं' तक नहीं वह भी तुम्हारा वास तो है |
महकता आँचल कि जिसमें खिल उठे थे स्वप्न मेरे,
बिखरती अलकें कि जिनमें खो गयी मेरी जवानी |
थिरकते सब अंग, पुलकित रोम, गदरायी उमर वो;
बहकती जिनमें दिवानी हो गयी मेरी जवानी |
यम-नियम के ढोंग सारे, हर जतन के बाद हारे;
और मेरी इस पराजय का तुम्हें अहसास तो है |
देह की मधु-गंध नंदन को अकिंचन सिद्ध करती,
स्नेह-भीना स्पर्श मेरे प्राण में पीयूष भरता |
वत्सला चितवन सिखाती अप्सराओं को समर्पण,
और आलिंगन तुम्हारा मृत्यु का उपहास करता |
वे मधुर सुधियाँ बुलातीं, विरह की दूरी घटातीं;
गहनतम अँधियार में यह झलकता विश्वास तो है |
प्रश्न
आज फिर कुछ तप्त-लोहित प्रश्न मेरे सामने हैं
और ये अंगार मुझको कर-तलों में थामने हैं
प्रश्न - मैं क्यों जी रहा हूँ ? क्या बचाना चाहता हूँ?
रक्त सा क्या पी रहा हूँ? क्या मिटाना चाहता हूँ ?
ज़िन्दगी सन्यास जैसी; क्या छिपाना चाहता हूँ ?
कल्पना मधुमास जैसी ? क्या दिखाना चाहता हूँ?
संस्कृति के गीत गाता; पल रहा प्रतिशोध कैसा?
कंठ में गाँठें लगाता ? एक सतत विरोध कैसा?
काइयाँपन खून में है? बेहया मुस्कान मुख पर !
सभ्यता पतलून में है ? शराफत की शान मुख पर !
फोन पर रिश्ते निभाता; क्रांति के उपदेश घर पर;
प्यार पर कविता सुनाता ? और दफ़्तर - सिर्फ "यस सर" ?
भीड़ का हो चुका जीवन; नौकरी क्यों कर रहा हूँ ?
भीड़ से भयभीत है मन ? रोज़ घुट-घुट मर रहा हूँ ?
कुछ नहीं अपनी खबर है; मोह है परिवार से भी;
खो न जाँऊ, मगर, डर है ? ऊबता इस भार से भी?
भटकता भ्रम के धुएं में? मुक्ति की दरकार भी है;
या कि मेंढक सा कुएं में? बन्धनों से प्यार भी है ?
कवच में खुद को लपेटे? वृद्ध संयम जूझता, फिर उलझता
किसी कछुए सा समेटे ? है जटिलता में,
संशयों के सूत्र सारे पकड़ रखे
काम ने हैं..........
आज फिर……...
हाँ! मैं जीवित हूँ
बालकनी पर शाम उतरती है तो मैं फिर जी उठता हूँ |
शाम पांच चालीस होते ही ऑफिस के उस मुर्दा घर से,
बीस-इकीस लाशों को लेकर,
एम्बुलेंस के जैसी छोटी बस (जिसको 'चार्टर्ड' कहते हैं)
आ जाती है छः चालीस तक,
और छोड़ जाती है सब लाशों को अपने-अपने घर तक |
घर, जिनमे 'घर' का प्रतिशत कितना है - यह मालूम नहीं है |
हाँ, दीवारें हैं, छत है और छोटी बालकनी भी |
मरे हुए इन लोगों में ही एक लाश मेरी भी है जो,
लिफ्ट पकड़कर चढ़ जाती है सबसे ऊपर की मंजिल पर |
चारदिवारी घिरी हुई है, छत भी है और बालकनी भी |
'घर' का प्रतिशत कितना है? शायद कुछ भी तो नहीं; और क्या?
दिन भर के उन कसे हुए कपड़ों के बंधन ढीले करके,
बालकनी पर आ जाता हूँ;
और बुझी आँखों से देखा करता हूँ ढलते सूरज को |
सिन्दूरी वह शाम अचानक जादू जैसे कर देती है;
भीतर बिखरे अंधियारे पर एक उजाला छा जाता है;
जाते-जाते सूरज कोई नयी प्रेरणा दे जाता है;
कुछ आशाएं भर जाता है, कुछ विश्वास बंधा जाता है;
इस उमंग में पागल होकर धड़कन थिरक-थिरक उठती है;
रोम-रोम अंतर-वीणा की झंकृति से पुलकित होता है;
और श्वास जो अब तक ठहरी थी, फिर से चलने लगती है;
कहीं दूर, गहरे भावों के स्वर गुंजित होने लगते हैं --
"हाँ! मैं जीवित हूँ, मैं मरा नहीं हूँ; हाँ! हाँ! मैं जीवित हूँ |"
आशुतोष द्विवेदी
भारतीय राजदूतावास,अद्दिस अबाबा,
इथियोपिया
आशुतोष द्विवेदी
- जन्म-तिथि : २ जून १९८२
- जन्म-स्थान : कानपुर, उत्तर प्रदेश
- स्थानीय पता : भारतीय राजदूतावास (इंडियन एम्बेसी), अद्दिस अबाबा, इथियोपिया
- स्थाई पता : २/१६, कमला नगर, कानपुर, उत्तर प्रदेश
- शिक्षा : परास्नातक, गणित, इलाहाबाद विश्वविद्यालय
- व्यवसाय : भारतीय विदेश सेवा (ब), विदेश मंत्रालय, नई दिल्ली
- रचना-कर्म : १९९४ से काव्य-रचना - विभिन्न विधाओं में, जैसे- छंद (घनाक्षरी, सवैया, दोहा, संस्कृत-वर्णवृत्त), गीत, ग़ज़ल, मुक्तक | कुछ मंचों पर एवं कई गोष्ठियों में काव्य-पाठ | विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में फुटकर प्रकाशन | इन्टरनेट पर kavyanchal.com आदि पर कुछ रचनाओं का संकलन | एक निजी ब्लॉगdwivediashutosh.blogspot.com पर भी कुछ रचनायें उपलब्ध |
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