कमला कृति

मंगलवार, 2 फ़रवरी 2021

केरल में हिन्दी के झंडाबरदार अधिवक्ता मधु.बी.

महात्मा गांधी के आदर्शों एवं विचारधारा से प्रेरणा प्राप्त स्व. के. वासुदेवन पिल्लै ने 1934 में केरल हिन्दी प्रचार सभा की स्थापना की। वर्तमान में इसके मंत्री हैं अधिवक्ता मधु बी.। इस समय यह सभा मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा स्थापित अखिल भारतीय हिंदी संस्था संघ, नई दिल्ली की सदस्य संस्था है। सभा केरल की एकमात्र स्वैच्छिक हिंदी प्रचार संस्था है। सभा की मुखपत्रिका केरल ज्योति के माध्यम से केरल की हिंदी विषयक गतिविधियों को पूरे भारत में फैलाने का प्रयास हो रहा है। राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करने में और अनुवाद के जरिये भाषाई आदान-प्रदान को प्रोत्साहन देने में केरल ज्योति पत्रिका सदा जागरूक रहती है। 'राष्ट्रज्योति पब्लिशेरेस' केरल हिंदी प्रचार सभा का एक नया उद्यम है जिसका उद्देश्य केरल जैसे अहिंदी प्रदेश के हिंदी लेखकों को अपनी कृतियों के प्रकाशन और मुद्रण में सुविधा प्रदान करना है। लेखक और साहित्यकार इस सुविधा का उपयोग कर रहे हैं। केरल हिंदी प्रचार सभा के वर्तमान मंत्री अधिवक्ता मधु. बी. की कल्पना की ही उपज है राष्ट्रज्योति पब्लिशेरेस।

      भारत सरकार की राजभाषा नीति के कार्यान्वयन और राजभाषा के रूप में हिंदी के सर्वमान्य स्वरूप का विकास करने के लिए सभा द्वारा अधिवक्ता मधु के नेतृत्व में राज्य स्तर पर हिंदी दिवस, हिंदी सप्ताह या हिंदी पखवाड़ा मनाया जाता है। इस सिलसिले में राजभाषा प्रदर्शनी, राजभाषा कार्यशाला, भारतीय भाषा कवि सम्मेलन, संगोष्ठियां, भारतीय साहित्य सम्मेलन, पुस्तकों का लोकार्पण, कर्मचारियों और छात्रों के लिए प्रतियोगिताएं आदि कार्यक्रमों का आयोजन करने में केरल हिंदी प्रचार सभा के मंत्री के रूप में अधिवक्ता मधु का उत्साह सराहनीय है। वे 1983 से केरल हिंदी प्रचार सभा के प्रचारक हैं और उनका सारा जीवन ही हिंदी के साथ जुड़ा हुआ है। वे अरविंद हिंदी कॉलेज के संस्थापक और आचार्य रहे। केरल हिंदी प्रचार सभा द्वारा संचालित कला, सांस्कृतिक तथा मनोरंजन के विविध कार्यक्रमों में उनकी सक्रिय भागीदारी होती है। उन्होंने सभा में प्रस्तुत नाटकों में अभिनय भी किया है। मलयालम नाटक के हिंदी अनुवाद के लिए 1989 में वे पुरस्कृत भी हुए। सिर्फ राष्ट्रभाषा के माध्यम से ही नहीं, बल्कि सैनिक सेवा से भी मधु जी ने राष्ट्र की सेवा की है। सेवा के दौरान जम्मू कश्मीर, अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, असम, गुजरात, उत्तर प्रदेश आदि में सेवा करने से उनको विविध प्रदेशों के जन-जीवन एवं सांस्कृतिक वैविध्य का प्रत्यक्ष ज्ञान मिला है। उनके नेतृत्व में वयोवृद्ध हिंदी प्रचारकों को स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के रूप में मान्यता दिलाने के लिए वर्ष 1990 में तत्कालीन प्रधानमंत्री माननीय वी.पी. सिंह को कोझिकोड से एक निवेदन दिया गया जिसके लिए केरल के हिंदी प्रचारक उनके आभारी हैं।

      अधिवक्ता मधु. बी. ने अनेक पाठ्य पुस्तकों का सम्पादन करने के अलावा हिंदी में कई कृतियों की रचना भी की है। इनमें सरोजिनी नायडू की जीवनी, श्रीनारायण गुरु की जीवनी, केरल: एक झांकी (अनुवाद) आदि उल्लेखनीय हैं। वे हिंदी सेवा रत्न, विद्यावाचस्पति जैसे पुरस्कारों से भी नवाजे गए हैं। अधिवक्ता मधु. बी. केरल हिंदी प्रचार सभा को भारत की एक उत्कृष्ट हिंदी सेवा संस्था के रूप में परिणित करने के सर्वतोभाव से संलग्न हैं।

● प्रस्तुति: प्रो. डी. तंकप्पन नायर

बुधवार, 11 मार्च 2020

सहित्याश्रय' में दिखा साहित्य-संस्कृति का संगम





धर्मशाला (हि प्र)। 'अनहद कृति' ई-पत्रिका के 21 से 23 फरवरी तक धर्मशाला में हुए में हुए वार्षिकोत्सव 'सहित्याश्रय-2020 'में  देश के विभिन्न राज्यों, विदेश तथा हिमाचल के कांगड़ा, धर्मशाला, पालमपुर, मण्डी, शाहपुर, पदरा, ज्वालाजमुखी, नेरटी, रक्कड़,सिद्धवाड़ी के साहित्यकारों ने मिलवर्तन कार्यक्रम का भरपूर आनंद उठाया। प्रथम दिवस मौसम की अनिश्चितता ने भी रचनाकारों के उत्साह में कोई कमी न आने दी।अनौपचारिक मिलवर्तन में सभी दूरियों, संस्कृतियों, व स्थानीयता की सीमाएं भूल कर सभी ने परस्पर खुले मन से मिल अनहद कृति साहित्याश्रय में भाग लिया। फिर, माँ शारदा के समक्ष सभी प्रतिभागियों द्वारा दीप प्रज्ज्वलन के साथ सरस्वती वंदना की गई जिसे बच्चों द्वारा मंत्रोच्चारण से शुरू किया गया। सम्पादक द्वय चसवाल दंपत्ति ने सभी का स्वागत किया। 
         विजयपुरी द्वारा हिमाचल की ओर से स्वागत के बाद NYORD की डॉक्यूमेंट्री का परिचय दिया गया। साहित्याश्रय की अनूठी संवादात्मक पुस्तक प्रदर्शनी "किताब की बात" हेतु सोत्साह देश के विभिन्न राज्यों से आये सृजनशील रचनाकारों और हिमाचली रचनाकारों ने विभिन्न विधाओं की अपनी पुस्तकों को सजाया। इसमें महेश एवं नीरजा द्विवेदी (लखनऊ, ऊ. प्र.), सविता चड्ढा, मनमोहन भाटिया (दिल्ली), अमर पंकज झा (दिल्ली/बिहार), आशा शैली (नैनीताल, उत्तराखंड), गोपाल कृष्ण भट्ट 'आकुल' (कोटा, राजस्थान), शशि प्रभा, दलजीत सैनी (चंडीगढ़/पंजाब), प्रभा मुजुमदार (मुंबई, महाराष्ट्र), पुष्पराज एवं प्रेमलता चसवाल (अम्बाला, हरियाणा) एवं हिमाचल के राकेश पथरिया, विजय पुरी, प्रभात शर्मा, चंद्ररेखा डढवाल, सुमन शेखर, राकेश मस्ताना, कुशल कटोच मुख्य थे। युवा रचनाकारों-स्नेही चौबे (बेंगलुरु, कर्नाटक), सर्वेश कुमार मिश्र (हिमाचल/ वाराणसी) ने पुस्तक प्रदर्शनी सेट अप में बढ़चढ़ कर हाथ बंटाया। फिर हाई- टी के दौरान सभी ने आपसी मिलवर्तन का खूब मज़ा लिया। रात में देश भर के रचनाकारों को देवभूमि हिमाचल की संस्कृति से अवगत करवाने के लिए राकेश पथरिया के अथक प्रयास से बनी 'हिमाचल के लोक गीत एवं संस्कृति' डाक्यूमेंटरी का प्रसारण किया गया।  22 फरवरी का दिन साहित्याश्रय की औपचारिक गतिविधियों को समर्पित रहा। कार्यक्रम का शुभारंभ त्विशा चसवाल राज व सारा शर्मा बाल कलाकारों द्वारा श्लोकों एवं बलराम चसवाल रचित सरस्वती वंदना के गायन से किया गया। तत्पश्चात, अनहद कृति के सम्पादक द्वय पुष्पराज एवं प्रेमलता चसवाल ने साहित्याश्रय में सबका स्वागत किया। पुष्पराज चसवाल ने अनहद कृति के लोकार्पण दिवस 23 मार्च के शहीदी दिवस का अनुपम व्याख्यान करते हुए शहीदों को भावपूर्ण श्रद्धांजलि दी। प्रेमलता 'प्रेमपुष्प' ने साहित्यकार श्रद्धांजलि की शुरुआत की। इसमें अनहद कृति के चहेते दिवंगत रचनाकारों को श्रद्धा वाक्याँजलि में - डा. मैथिलि प्रसाद भारद्वाज को शशि प्रभा ने, डा. पीयूष गुलेरी को चंद्रलेखा डढवाल ने, डा.आनंद स्वरूप को पुष्पराज चसवाल व अमन चांदपुरी को प्रेमलता प्रेमपुष्प ने अपने श्रद्धा सुमन अर्पित किए। विनीता तिवारी द्वारा दी गयी श्रद्धांजलि में  युवा रचनाकार अमन चांदपुरी की ग़ज़ल का प्रसारण 'अनहद कृति की आवाज़ें' पोर्टल से किया गया, जिसने सभी की आँखें नम कर दी। "किताब की बात" पुस्तक प्रदर्शनी का उदघाटन युवा रचनाकारों स्नेही चौबे, विभा चसवाल ने किया। पहले सत्र में रचनाकारों (सविता चड्ढा, मनमोहन भाटिया, राकेश पथरिया, महेश द्विवेदी) ने अपने प्रकाशन अनुभवों का उपस्थित सुधि-जनों से सीधे साक्षात्कार एवं अनूठा संवाद सांझा किया, इसी के दौरान वरिष्ठ साहित्यकार गौतम व्यथित के शुभागमन ने इस सत्र में चार चाँद लगा दिए, जब उन्होंने अपने आधी सदी से भी लम्बे प्रकाशन अनुभव को सांझा कर सभी को लाभान्वित किया। लोगों की जिज्ञासा के नतीजतन हुई चर्चा ने इस प्रदर्शनी को "किताब की बात" नामारूप सार्थक बना दिया। बच्चों के हिंदी-बिंदी कैंप में कला-कृतियाँ बनाने में जुटे बच्चों अद्वित, त्विशा, सारा, विख्यात की सुन्दर कलाकृतियों का सभी ने खूब आनंद उठाया। अरुणा रंगनाथ की अनहद कृति के साथ कला यात्रा की भी बात हुई। सभी पुनःसभागार में उपस्थित हुए। किन्हीं अपरिहार्य कारणों से अनहद कृति के साहित्याश्रय में पंजीकृत होने के बावजूद अपनी भागीदारी न कर पाने वाले रचनाकारों के वीडियों संदेशों का प्रसारण किया गया। अनहद कृति परिवार की अभिन्न सदस्य विभोर चसवाल ने अमेरिका से साहित्याश्रय में साहित्यकारों के स्वागत किया। राधिका गुलेरी (दुबई) ने डा. पीयूष गुलेरी की स्मृतियों को साँझा किया। रचनाकार प्रदीप स्नेही (अम्बाला), पुष्पगंधा सम्पादक एवं कहानीकार विकेश निझावन (अम्बाला), कहानीकार मिर्ज़ा हफ़ीज़ बेग (भिलाई), कलाकार श्रीधरी देसाई (अमेरिका) के शुभकामना सन्देश प्रसारित किये गए। मध्यान्ह भोजन के बाद, अनहद कृति के परिचय, प्रस्तुति एवं पठन-पाठन के सत्र की शुरुआत में विभा चसवाल ने अनहद कृति ई-पत्रिका की वैश्विक पहुँच के बारे में और इसके वृहद साहित्यिक परिवार के बारे में आंकड़ों के साथ बताया और पत्रिका के विभीन पन्नों/पोर्टलों से अवगत करवाया। तत्पश्चात अनहद कृति के उपस्थित रचनाकारों ने ई-पत्रिका में प्रकाशित अपनी रचनाओं का पठन-पाठन सीधे ई-पोर्टल से किया। कभी लैपटॉप, कभी मोबाइल के ज़रिये, साथ ही इन रचनाओं को प्रोजेक्टर पर दिखाया भी गया। इस तकनीकी एवं कलात्मक साहित्यिक सत्र में महेश द्विवेदी (लखनऊ), प्रभा मुजुमदार (मुंबई), सविता चड्डा (दिल्ली), मनमोहन भाटिया (दिल्ली), गोपाल कृष्ण भट्ट 'आकुल' (कोटा), नीरजा द्विवेदी (लखनऊ), राकेश पत्थरिया (ज्वालामुखी), आशा शैली (नैनीताल), प्रेमलता 'प्रेमपुष्प' (अम्बाला), तथा पुष्पराज चसवाल (अम्बाला) ने अनहद कृति पोर्टल से अपनी रचनाओं का काव्य पाठ किया। उपस्थित सुधि श्रोतागण हिमाचल के अनेक रचनाकार रहे जिन्हें इस सत्र ने अपनी तकनीकी एवं कलात्मक पक्ष से अभिभूत किया। अनहद कृति वर्कशाप में स्थानीय रचनाकारों का ई-पत्रिका में पंजीकरण एवं अनहद कृति प्रयोग का प्रशिक्षण राजेश मुरली ने करवाया। 
इस सत्र के बाद एक अनूठे विमोचन के सत्र में गौतम व्यथित, सविता चड्ढा, प्रभा मुजुमदार, प्रभात शर्मा, अमर पंकज झा ने पी पी प्रकाशन की दो नई पुस्तकों डॉ प्रेमलता 'प्रेमपुष्प' का काव्य-संग्रह 'कण कण फैलता आकाश मेरा' और पुष्पराज चसवाल की अनुवाद की पुस्तक 'महात्मा, मार्टिन और मंडेला' का लोकार्पण किया। इसी सत्र में सम्पादक द्वय शामिल हुए गोपाल कृष्ण भात 'आकुल' की नयी पुस्तक 'हौसलों ने दिए पंख' के लोकार्पण में, जिसके बाद दलजीत सैनी की बाल साहित्य की पुस्तक का लोकार्पण किया बच्चों - अद्वित चिराग, त्विशा, सारा, विख्यात ने। सभी विमोचनकर्ताओं के. गौतम व्यथित और सविता चड्ढा ने 'कण-कण फैलता आकाश मेरा' की समीक्षा की। पुष्पराज चसवाल, गोपाल कृष्ण भट्ट और दलजीत सैनी ने नई पुस्तकों पर अपने कथन दिए। इस अनूठे विमोचन को सबने खूब सराहा। इसके बाद "किताब की बात" संवादात्मक प्रदर्शनी के दूसरे सत्र के रचनाकारों (चंद्ररेखा डढवाल, सुमन शेखर, प्रभात रंजन, गोपाल कृष्ण भट्ट 'आकुल', अमर पंकज झा, नीरजा द्विवेदी, आशा शैली) ने अपने प्रकाशन अनुभव सांझे किये। पारिवारिक कारणों से चंडीगढ़ गयी हिमाचली रचनाकार अदिति गुलेरी का भी इस सत्र के दौरान आगमन हुआ। उन्होंने अपनी, पीयूष गुलेरी एवं प्रत्यूष गुलेरी की किताबों की बात की। इस सत्र से साहित्याश्रय के दूसरे दिन के औपचारिक कार्यक्रम का समापन हुआ। समां में लगातार मिलवर्तन की भीनी बयार चलती रही - बाहर के साथी मिल कर धर्मशाला के शहीदी स्मारक गए।वहां से वापिस आकर सबने 'बॉन फायर' के आसपास गीत-संगीत का आनंद उठाया, बच्चों ने माइक ले कर कुछ समय तक इसे एक सत्र की तरह शुरू किया। सारा शर्मा ने केसीओ पर गानों की धुनें बजायी और गर्माते सदस्यों ने गीतों का नाम बताया और उन्हे गाया भी -  जब सारा ने 'सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा' और 'वन्दे मातरम' की धुनें बजायी तो माहौल हर्षोन्मत्त हो उठा। देवर्षि द्विवेदी के मधुर गायन ने हेमंत कुमार को सजीव कर दिया, शिवरानी झा ने ब्लैक-एंड-वाइट बॉलीवुड समय की याद दिलाई एक पुराना गीत गा कर, वहीँ आशा शैली के पंजाबी लोक गीत ने मस्त समां बाँधा, विभा-त्विशा ने भी गीत गाये, सविता चड्ढा, अमर  पंकज, आशा शैली, गोपाल कृष्ण भट्ट 'आकुल' ने अपनी कवितायेँ, ग़ज़लें, छंद सुनाए। प्रेमलता 'प्रेमपुष्प' ने  धर्मशाला के अपने समय में लिखे चीड़ के पेड़ो पर गीत 'ऊंची-ऊंची चीड़ों से आशाओं के आकार' और 'यामिनी के रूप' गीतों से नैसर्गिक समां बाँधा। सभी ने वहीँ अलाव के आसपास स्वादिष्ट खाना खाया जिसका बंदोबस्त पूरी मुस्तैदी से होटल कश्मीर हाऊस के स्टाफ़ ने सहर्ष किया। मेल-जोल के यह समागम कुछ दस बजे तक चला और अंत में पुष्पराज चसवाल के गीत 'साधना' को प्रेमपुष्प, विभा, पुष्पराज ने मिल कर गाया और यामिनी साहित्यकार हृदय की अनुपम अनुभूति से परिपूर्ण सुसज्जित हो गयी...... धौलाधार के वरदहस्त तले, चमचमाते तारों भरे आकाश में अपने बुझते अलाव की मद्धम रौशनी में, और टिमटिमाते छोटे बल्बों से सुसज्जित साहित्याश्रय का घर 'होटल कश्मीर हाउस' एक सुरम्य दृश्यावली दिखाई पड़ रहा था।

साहित्याश्रय का तीसरा अंतिम दिवस 23 फरवरी सुबह चाय-नाश्ते के बाद 'किताब की बात' का अंतिम सत्र था जिसमें पुष्पराज चसवाल और प्रेमलता ‘प्रेमपुष्प’ ने 1985 में पी पी प्रकाशन की संस्थापना से अब तक के अपने प्रकाशन अनुभव को साँझा किया, और ‘कण कण फैलता आकाश मेरा’ और ‘महात्मा, मार्टिन और मंडेला’ की किताब के हाल ही में प्रकाशन में आए उतार-चढ़ाव की बात की। इस प्रदर्शनी की अंतिम भेंट थी - प्रतिभागी किताबों के संग्रह जिसको विंसटन-सलेम, नोर्थ कैरलाइना के पुस्तकालय में अनुदान हेतु इकट्ठा किया गया - एक सशक्त तत्कालीन किताबों के इस ‘स्तम्भ' को बनाने में जुटे देश भर के रचनाकारों का उत्साह देखते ही बनता था। इसके बाद सम्पादक द्वय द्वारा सभी का धन्यवाद ज्ञापित कर इस प्रदर्शनी का समापन किया गया। 
       आख़िरी दिन का दूसरा सत्र था ‘साहित्याश्रय’ का धन्यवाद ज्ञापन, जिसमें शाहपुर के SDM जगन ठाकुर भी उपस्थित रहे। बाहर से आए साथियों के लिए हिमपाइन हैंडीक्राफ़्ट की चीड़ के पेड़ों की ट्रे “अनहद कृति की ओर से सप्रेम भेंट” के बारे में विवेक शर्मा ने जानकारी दी कि किस तरह इस कला की वस्तुएँ ज़मीन से इकट्ठी की गयी चीड़ की पत्तियों से ग्रामीण महिलाओं के हाथों बनाई जाती हैं - ग्रामीण महिला सशक्तिकरण में लगी हिमपाइन हैंडीक्राफ़्ट के इस स्मृतिचिंह की सभी ने तारीफ़ की। इसके साथ NYORD NGO की राकेश पथरिया रचित “काँगड़ा के लोकगीत एवं जीवन शैली” पुस्तक के बारे में बताया गया। पुष्पराज चसवाल ने इन दोनो संस्थाओं के उत्साहवर्धन के लिए अनुदान राशि के चेक उनको दिए। गौतम व्यथित, पुष्पराज चसवाल, प्रेमलता ‘प्रेमपुष्प’ और जगन ठाकुर ने मिल कर बाहर से आए साथियों, हिमाचली प्रतिभागियों, हिंदी-बिंदी कैम्प के बच्चों, होटल कश्मीर हाउस के पूरे स्टाफ़ को अनहद कृति के सहित्याश्रय के स्मृतिचिंह, पुस्तक, और प्रशस्ति पत्र भेंट किए। हिंदी बिंदी कैम्प के बच्चों को गोपाल कृष्ण भट्ट ‘आकुल’ (हिंदी वर्ग पहेली विज़र्ड) द्वारा रचित हिंदी वर्ग-पहेली संग्रह भी दिया गया। विभा चसवाल ने जगन ठाकुर को चसवाल दम्पत्ति की पुस्तकें भेंट की जिन्हें उन्होंने सहर्ष स्वीकार किया। सहित्याश्रय के सादे मंच पर आए हर व्यक्ति ने कार्यक्रम की प्रशंसा की और अनहद कृति कार्यकारिणी परिवार का धन्यवाद ज्ञापित किया और उनके उत्साह की भरपूर तारीफ़ की। यह सत्र औपचारिक कार्यक्रम का आख़िरी सत्र था। इसके बाद सभी ने एक साथ पाँतों में बैठ कर पत्तलों में ‘काँगड़ी धाम’ में तेलिये माश की दाल, मदरा, खट्टा, सेपु वड़ी, मीठे सिंदूरी चावल नामक हिमाचली खानों का मज़ा उठाया। क़रीब एक बजे शुरू हुआ खुले मंच का कवि-सम्मेलन ‘मिलवर्तन’ जो लगभग साढ़े-पाँच बजे तक चला, अदिति गुलेरी और विभा चसवाल के संचालन में चली इस गोष्ठी में 35 कवियों ने अपनी उत्कृष्ट रचनाओं से सभी का मन मोह लिया - नीरजा द्विवेदी ने वहीं सभागार में रचित होली पर अपनी कविता सुनाई। मस्ताना जी के मौसम के अनुरूप कविता से समा बांधा, युवा-कवि सर्वेश मिश्र ने माँ पर संवेदनशील कविता सुनाई, बबिता जी ने वट-वृक्ष का दर्द साँझा किया। महेश द्विवेदी ने शहर में बसी गंदी बस्ती की कहानी सुनाई। विजय पुरी ने सरकारी स्कूल के प्रेम में सराबोर पहाड़ी गीत सुंदर लय में सुनाया, शशि प्रभा ने अपनी कविता से पहले ‘कण कण फैलता आकाश मेरा’ पर अपनी समीक्षा के चंद अंश साँझे किए, प्रेमलता 'प्रेमपुष्प' की 'क्षुधा' को पुष्पराज चसवाल ने 'आहट' में जवाब दिया। आशा शैली ने ग़ज़ल गायी, दलजीत सैनी, प्रभात शर्मा, कुशल कटोच, प्रभा मजूमदार, गोपाल कृष्ण भट्ट आकुल, अदिति गुलेरी, सुरेश भारद्वाज ‘निराश’, लता रानी कपूर, राकेश पथरिया की कविताओं ने मन मोह लिया। अंत में गौतम व्यथित की प्राकृतिक सौंदर्य में सराबोर ग़ज़लों और कविताओं ने और हिमाचल की ओर से ‘धन्यवाद’ के कथन ने धौलाधार के अनुपम आशीर्वाद के समान अनहद कृति परिवार के सदस्यों के दिल में जगह बनाई। प्रेमलता ‘प्रेमपुष्प’ के अनुरोध पर विभा चसवाल ने भी अपनी एक कविता कार्यक्रम के अंत में सुनाई। कवि सम्मेलन के दौरान ही बाहर से आए कई साथियों को सबने विदा किया किंतु सुनने-सुनाने का सिलसिला निर्बाध गति से सुरम्यता से चलता रहा। 

● धर्मशाला से विभा चसवाल की रिपोर्ट

बुधवार, 19 फ़रवरी 2020

वीरेन्द्र खरे 'अकेला' की ग़ज़लें


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार



(एक)


आत्मा आहत हुई तो शब्द बाग़ी हो गये
कहते कहते हम ग़ज़ल दुष्यंत त्यागी हो गये

 है सियासत कोठरी काजल की, रखना एहतियात
अच्छे-अच्छे लोग इसमें जा के दाग़ी हो गये

गेह-त्यागन और ये सन्यास धारण सब फ़रेब
ज़िन्दगी से हारने वाले विरागी हो गये

गालियाँ बकते रहे जिनको उन्हीं के सामने
क्या हुआ ऐसा कि श्रीमन् पायलागी हो गये

आप जिन कामों को करके हो गये पुण्यात्मा
हम उन्हीं को करके क्यों पापों के भागी हो गये


(दो)


वास्ता हर पल नई उलझन से है
फिर भी हमको प्यार इस जीवन से है

किस ग़लतफहमी में हो तुम राधिके
मेल मनमोहन का हर ग्वालन से है

दिल दिया मानो कि सब कुछ दे दिया
और क्या उम्मीद इस निर्धन से है

यार उसको भूलना मुमकिन नहीं
उसका रिश्ता दिल की हर धड़कन से है

माफ़ करना आप हैं जिस पर फ़िदा
सारी रौनक़ उसपे रंग रोगन से है

जो सही उसने दिखाया बस वही
क्यों शिकायत आपको दरपन से है

ये कहाँ मुमकिन कि लिखना छोड़ दूँ
शायरी का शौक़ तो बचपन से है

ऐ ‘अकेला’ मन में हैं जब सौ फ़साद
फ़ायदा फिर क्या भजन.पूजन से है


(तीन)


जो जैसा दिख रहा है उसको वैसा मत समझ लेना
खड़ी हो जायेगी वरना बड़ी दिक्कत समझ लेना

उसे तो बेसबब ही मुस्कुरा देने की आदत है
सो उसके मुस्कुराने को न तुम चाहत समझ लेना

कभी सोचा नहीं था तुम भी धोखेबाज़ निकलोगे
सरल होता नहीं इंसान की फ़ितरत समझ लेना

भरोसा ख़ुद पे कितना भी हो लेकिन जंग से पहले
ज़रूरी है ज़रा दुश्मन की भी ताक़त समझ लेना

अदावत  की डगर पे आखि़रश चल तो पड़े हैं हम
न होगी वापसी की कोई भी सूरत समझ लेना

तुम्हारी सात पुश्तें भी चुका पायें नहीं मुमकिन
लगाते हो मिरे ईमान की क़ीमत, समझ लेना

किसी की भी मदद को ‘ऐ अकेला’ दौड़ पड़ते हो
कहीं का भी नहीं छोड़ेगी ये आदत समझ लेना


(चार)


कुछ ऐसे ही तुम्हारे बिन ये दिल मेरा तरसता है
खिलौनों के लिए मुफ़लिस का ज्यों बच्चा तरसता है 

गए वो दिन कि जब ये तिश्नगी फ़रियाद करती थी
बुझाने को हमारी प्यास अब दरिया तरसता है 

नफ़ा-नुक़सान का झंझट तो होता है तिज़ारत में 
मुहब्बत हो तो पीतल के लिये सोना तरसता है

न जाने कब तलक होगी मेहरबानी घटाओं की
चमन के वास्ते कितना ये वीराना तरसता है

यही अंजाम अक्सर हमने देखा है मुहब्बत का
कहीं राधा तरसती है कहीं कान्हा तरसता है

पता कुछ भी नहीं हमको मगर हम सब समझते हैं
किसी बस्ती की खातिर क्यों वो बंजारा तरसता है 

कि आख़िर ऐ 'अकेला' सब्र भी रक्खे कहाँ तक दिल
बहुत कुछ बोलने को अब तो ये गूंगा तरसता है 


(पाँच)

जिसपे मरते हैं उस पे मरते हैं
क्या बुरा है जो इश्क़ करते हैं

दिल की धड़कन सम्हल नहीं पाती
तेरी गलियों  से जब गुज़रते हैं

हमको परवाह जान की भी नहीं
आप रूसवाईयों से डरते हैं

देते क्यों हैं उड़ान की तालीम
बाद में पर अगर कतरते हैं

बात उनसे जो हो तो हो कैसे
वो फ़लक से कहाँ उतरते हैं

ज़िन्दगी उनको सौंप दी हमने
जिनसे गेसू नहीं संवरते हैं

अब के कैसी बहार आई है
पत्ता पत्ता शजर बिखरते हैं

सब्र से काम लें ‘अकेला’ जी
वक़्त के साथ ज़ख़्म भरते हैं 


(छह)


बंदा तो हुजूर आपके काम आया बहुत है
ये भी है बजा आपने ठुकराया बहुत है

उल्फ़त है कि है दिल्लगी मुझको नहीं मालूम
फिर चाँद मुझे देख के मुस्काया बहुत है

दुनिया मुझे सूली पे चढ़ा दे, तो चढ़ा दे
उल्फ़त का सबक़ मैंने भी दोहराया बहुत है

ये बात बजा, की है मदद, शुक्रिया साहिब
अहसान मगर आपने जतलाया बहुत है

गुमसुम सा कई रोज़ से दिखता है वो ज़ालिम
शायद मेरा दिल तोड़ के पछताया बहुत है

खु़द की भी कभी शक्ल ज़रा देख लें साहिब
आईना मुझे आपने दिखलाया बहुत है

अब अक्ल का दुश्मन जो न समझे, तो न समझे
मैंने दिले-नादान को समझाया बहुत है

अफ़सोस नहीं क़त्ल का मुझको मेरे क़ातिल
ग़म है यही तूने मुझे तड़पाया बहुत है

ईमानो-धरम ताक पे देखो तो ‘अकेला’
पैसे के लिए आदमी पगलाया बहुत है 


(सात)


सच्ची अगर लगन है सफल हो ही जायेगी
मतला हुआ है पूरी  ग़ज़ल हो ही जायेगी


माना कि पूर्णिमा की खिली चाँदनी है वो
शरमा गई तो नीलकमल हो ही जायेगी

यूँ ही बनी रही जो इनायत ये आपकी
ये ज़िन्दगानी रंग महल हो ही जायेगी

उम्मीद है रिज़ल्ट तो अच्छा ही आयेगा
सख्ती हो चाहे जितनी नक़ल हो ही जायेगी

छिड़ ही गया है बज़्म में जब उसका ज़िक्र तो
लाज़िम है आँख मेरी सजल हो ही जायेगी

माना कि प्रॉब्लम है बड़ी फिर भी क्या हुआ
हिम्मत से काम लोगे तो हल हो ही जायेगी

घबराइए न, चार क़दम चल के देखिए 
बेहद कठिन ये राह सरल हो ही जायेगी

माना 'अकेला' आज है रूठी सी ज़िन्दगी
हम पर भी मेहरबान ये कल हो ही जायेगी



वीरेन्द्र खरे 'अकेला'     


  • जन्म : 18 अगस्त 1968 को छतरपुर (म.प्र.) 
  • पिता : स्व० श्री पुरूषोत्तम दास खरे
  • माता : श्रीमती कमला देवी खरे
  • शिक्षा :एम०ए० (इतिहास), बी०एड०
  • लेखन विधा : ग़ज़ल, गीत, कविता, व्यंग्य-लेख, कहानी, समीक्षा आलेख ।
  • प्रकाशित कृतियाँ : शेष बची चौथाई रात 1999 (ग़ज़ल संग्रह), [अयन प्रकाशन, नई दिल्ली],सुबह की दस्तक 2006 (ग़ज़ल-गीत-कविता), [सार्थक एवं अयन प्रकाशन, नई दिल्ली],अंगारों पर शबनम 2012(ग़ज़ल संग्रह) [अयन प्रकाशन, नई दिल्ली] 
  • उपलब्धियाँ : वागर्थ, कथादेश,वसुधा सहित विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं रचनाओं का प्रकाशन । लगभग 25 वर्षों से आकाशवाणी छतरपुर से रचनाओं का निरंतर प्रसारण । आकाशवाणी द्वारा गायन हेतु रचनाएँ अनुमोदित । ग़ज़ल-संग्रह 'शेष बची चौथाई रात' पर अभियान जबलपुर द्वारा 'हिन्दी भूषण' अलंकरण । मध्यप्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन एवं बुंदेलखंड हिंदी साहित्य-संस्कृति मंच सागर [म.प्र.] द्वारा कपूर चंद वैसाखिया 'तहलका ' सम्मान। अ०भा० साहित्य संगम, उदयपुर द्वारा काव्य कृति ‘सुबह की दस्तक’ पर राष्ट्रीय प्रतिभा सम्मान के अन्तर्गत 'काव्य-कौस्तुभ' सम्मान तथा लायन्स क्लब द्वारा ‘छतरपुर गौरव’ सम्मान ।
  • सम्प्रति :अध्यापन
  • सम्पर्क : छत्रसाल नगर के पीछे, पन्ना रोड, छतरपुर (म.प्र.)पिन-471001
  • मोबाइल-09981585

पुस्तक समीक्षा : दफ़न हुए शिलालेख



            
            यूँ तो इन्द्रधनुष सात रंगों का होता है, पर किसी भी ज़िंदगी में सिर्फ इतने ही रंग नहीं होते…। जीवन के अलग अलग रंगों को अपनी तेरह कहानियों में पिरो कर श्री हरभजन सिंह मेहरोत्रा ने ‘दफ़न हुए शिलालेख’ शीर्षक अपने कथा-संग्रह में पाठकों के सम्मुख रखा है । इस संग्रह की हर कहानी अपने एक नए कथानक, नए कलेवर में जब सामने आती है तो पाठकों को कुछ इस कदर बाँध लेती है कि अगली कहानी पढने की इच्छा खुद-ब-खुद जाग जाती है । चाहे वो ‘आज एक भेड़िया मारेंगे’ में एक इंसान के अन्दर विपरीत परिस्थितियों में भी बची इंसानियत हो, या फिर ‘जवाबदेह’ कहानी में मानसिक रूप से अक्षम माँ और एक निम्न मध्यमवर्गीय परिवार की परेशानियों में घिरे बेटे के बीच के रिश्ते की कहानी है। कहानी में नायक का सोचना- इससे अच्छा कि माँ मर जाए-किसी भी संवेदनशील इंसान को अन्दर तक झकझोर देता है ।

            मेरी दृष्टि में इस संग्रह की सबसे अनूठी कहानी बिलकुल आखिर में दी गई ‘माँ को क्या हो गया है’ शीर्षक कहानी है । किसी लेखक को इंसान के नज़रिए से रिश्तों को परखते-समझते तो हमने बहुत बार देखा है, पर इस कहानी को पढ़ने के बाद हरभजन जी की कल्पनाशीलता और अपने आसपास के परिवेश का सूक्ष्म विश्लेषण कर पाने की क्षमता की दाद देनी पड़ती है । एक नन्हा चितकबरा पिल्ला किस प्रकार अपनी माँ द्वारा पहले के मुकाबले कम प्यार किये जाने से न केवल आहत और दुविधाग्रस्त महसूस करता है, बल्कि सामने के घर में रहने वाली लाल कपड़ों वाली लड़की से उसके जुड़ाव को भी लेखक ने एक पिल्ले के मनोभावों के माध्यम से ही बड़ी खूबसूरती से दर्शाया है ।
             इन कहानियों के अलावा अपने अनोखे कथानक और परिवेश के कारण जो दो कहानियाँ पाठकों के मानस-पटल पर शर्तिया अपनी छाप छोड़ेंगी, वो हैं ‘जिजीविषा’ और ‘मदारी’ , ‘जिजीविषा’ कहानी में जिस तरह एक पनडुब्बी के अन्दर अपनी मौत का इंतज़ार कर रहे पाँच लोगों की मनोदशा का एकदम सटीक और गहन वर्णन किया गया है, उससे हर पाठक खुद को भी उन्हीं का एक हिस्सा मान कर उनकी उस पीड़ा से बहुत गहरे तक जुड़ जाएगा । ‘मदारी’ कहानी एक बहुत ही अनोखे थीम पर रची गई कथा है । लेखक की फैक्ट्री में एक दुर्घटना अवश्यंभावी है और समय रहते उसे टालने का सिर्फ एक उपाय उनको नज़र आता है कि अपने पूर्व-परिचित एक मदारी अल्लन की सहायता से उस दुर्घटना को टाला जाए ।
          बेहद सधे ढंग से लिखी गई यह कहानी वैसे तो पाठकों के अन्दर आगे के घटनाक्रम के प्रति एक सहज उत्सुकता बनाए रखती है, परन्तु कई जगह कुछ तकनीकी वर्णन पाठको को कहानी से थोड़ा अलग भी कर सकता है । चूँकि कहानी का ताना-बाना इस तरह का है और लेखक खुद अभियांत्रिकी विभाग से सम्बद्ध हैं, इसलिए इस तरह के वर्णन को हम कहानी की ज़रूरत के हिसाब से सहज रूप से पिरोया हुआ भी कह सकते हैं । ‘हाशिए’ शीर्षक कहानी आत्मकथात्मक है। यह कहानी लेखक की निजी ज़िंदगी के बहुत करीब कही जा सकती है | कथा संग्रह की शीर्षक कथा ‘दफ़न हुए शिलालेख’ बाप बेटे के संबंधों को एक अलग नज़रिये से प्रस्तुत करती हुई बहुत सशक्त कहानी है। हाँ, मेरे हिसाब से अगर इस कहानी का शीर्षक-चल खुसरो घर आपने- होता तो शायद ज़्यादा सटीक बैठता ।
           कहानी के हिसाब से अगर शीर्षक की सटीकता की बात करें तो इस श्रेणी में मैं ‘अपंग’ शीर्षक कहानी को रखूँगी । हमारी संवेदनाएँ किस कदर अपंग हो चुकी हैं, इसको जिस तरह से इस कहानी में बयान किया गया है, वह हरभजन जी की लेखनी की मजबूती ही दर्शाता है । बस एक कमी जो इस कहानी में खटकती है वह है- कहीं कहीं इसके वाक्यों का बहुत लंबा हो जाना । इस तरह के वाक्य पाठकों की एकाग्रता भंग करके कहानी को कभी कभी बोझिल भी कर देते हैं । इन कहानियों के अलावा संग्रह की बाकी कहानियाँ जैसे कि- अधूरी प्रेम कहानी, अनुत्तरित, चक्रव्यूह और मृगतृष्णा अपने अपने स्तर पर विभिन्न विषयों का निर्वाह तो करती हैं, पर मेरे हिसाब से उन्हें सामान्य कहानियों की श्रेणी में रखा जा सकता है | कुल मिला कर हरभजन सिंह मेहरोत्रा का यह कथा संग्रह अपने पास संजो कर रखा जाने वाला एक संग्रह कहा जा सकता है, जो निःसंदेह पाठकों की कसौटी पर खरा उतरेगा।


दफ़न हुए शिलालेख (कहानी संग्रह)/ लेखक- हरभजन सिंह मेहरोत्रा/ प्रकाशक- अमन प्रकाशन/मूल्य- रु. 140/= मात्र

समीक्षक-प्रियंका गुप्ता


सोमवार, 17 जून 2019

अंसार क़म्बरी की ग़ज़लें


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार



ज़िन्दा रहे तो हमको..


ज़िन्दा रहे तो हमको क़लन्दर कहा गया
सूली पे चढ़ गये तो पयम्बर कहा गया

ऐसा हमारे दौर में अक्सर कहा गया
पत्थर को मोम, मोम को पत्थर कहा गया

खुद अपनी पीठ ठोंक ली कुछ मिल गया अगर
जब कुछ नहीं मिला तो मुक़द्दर कहा गया

वैसे तो ये भी आम मकानों की तरह था
तुम साथ हो लिये तो इसे घर कहा गया

जिस रोज़ तेरी आँख ज़रा डबडबा गयी
क़तरे को उसी दिन से समन्दर कहा गया

जो रात छोड़ दिन में भी करता है रहज़नी
ऐसे सफेद पोश को रहबर कहा गया


तेरा आँचल जो ढल गया होता..


तेरा आँचल जो ढल गया होता..
रुख़ हवा का बदल गया होता

देख लेता जो तेरी एक झलक
चाँद का दम निकल गया होता

छू न पायी तेरा बदन वरना
धूप का हाथ जल गया होता

झील पर ख़ुद ही आ गए वरना
तुझको लेने कमल गया होता

मैं जो पीता शराब आँखों से
गिरते-गिरते सँभल गया होता

माँगते क्यूँ वो आईना मुझसे
मैं जो लेकर ग़ज़ल गया होता


हम कहाँ आ गये..


हम कहाँ आ गये आशियाँ छोड़कर
खिलखिलाती हुई बस्तियां छोड़कर

उम्र की एक मंजिल में हम रुक गये
बचपना बढ़ गया उँगलियाँ छोड़कर

नाख़ुदा ख़ुद ही आपस में लड़ने लगे
लोग जायें कहाँ कश्तियाँ छोड़कर

आज अख़बार में फिर पढ़ोगे वही
कल जो सूरज गया सुर्ख़ियाँ छोड़कर

लाख रोका गया पर चला ही गया
वक़्त यादों की परछाईयाँ छोड़कर


बह रही है जहाँ पर नदी..


बह रही है जहाँ पर नदी आजकल
जाने क्यूँ है वहीं तश्नगी आजकल

अपने काँधे पे अपनी सलीबे लिये
फिर रहा है हर एक आदमी आजकल

बोझ काँधों पे है, ख़ार राहों में हैं
आदमी की ये है ज़िन्दगी आजकल

पाँव दिन में जलें, रात में दिल जले
घूप से तेज़ है  चाँदनी आजकल

एक तुम ही नहीं हो मेरे पास बस
और कोई नहीं है कमी आजकल

अपना चेहरा दिखाये किसे ‘क़म्बरी’
आईना भी लगे अजनबी आजकल


कोई खिलता गुलाब क्या जाने..


कोई खिलता गुलाब क्या जाने
आ गया कब शबाब क्या जाने

गर्मिये-हुस्न की लताफ़त को
तेरे रुख़ का नक़ाब क्या जाने

इस क़दर मैं नशे में डूबा हूँ
जामो-मीना शराब क्या जाने

लोग जीते हैं कैसे बस्ती में
इस शहर का  नवाब क्या जाने

ए.सी. कमरों में बैठने वाले
गर्मिए-आफ़ताब क्या जाने

नींद में ख़्वाब देखने वाले
जागी आँखों के ख़्वाब क्या जाने

जिसको अल्लाह पर यकीन नहीं
वो सवाबो-अज़ाब क्या जाने
...........................................................................................................................

अंसार क़म्बरी



  • पिता का नाम : स्व. ज़व्वार हुसैन रिज़वी
  • जन्म : 03-11-1950
  • लेखन : ग़ज़ल, गीत, दोहा, मुक्तक, नौहा, सलाम, यदा-कदा आलेख एवं पुस्तक समीक्षा आदि
  • प्रकाशित कृति : ‘अंतस का संगीत’ (दोहा व गीत काव्य संग्रह) नवचेतन प्रकाशन, दिल्ली वर्ष–2011
  • सम्मान : उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ व्दारा 1996  के सौहार्द पुरस्कार एवंसमय-समय
  • पर नगर व देश की अनेकानेक साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओंव्दारा पुरस्कृत व सम्मानित
  • सम्पर्क : ‘ज़फ़र मंजिल’ 11/116, ग्वालटोली, कानपूर – 208001
  • मो - 9450938629
  • ई-मेल: ansarqumbari@gmail.com

पुस्तक चर्चा- 'प्राचीन भारत में खेल-कूद : स्वरूप एवं महत्व’



         
           बहुज्ञ, बहुपठ, बहुश्रुत और निरंतर अध्यवसायपूर्वक शोधदृष्टि से काम करनेवाले अवधेश कुमार सिन्हा (9 सितंबर, 1950) की पुस्तक “प्राचीन भारत में खेल-कूद (स्वरूप एवं महत्व)” (2018, हैदराबाद : मिलिंद) भारतीय इतिहास के एक नितांत अचर्चित पहलू का उद्घाटन करने वाली शोधपूर्ण मौलिक रचना है। इस ग्रंथ में लेखक ने साहित्यिक और साहित्येतर विविध भौतिक साक्ष्यों के आधार पर प्राचीन राज-समाज और जन-समाज के मनोरंजन से लेकर आजीविका तक से जुड़े खेलों के इतिहास की विकासरेखा प्रस्तुत की है, जो बड़ी सीमा तक भारतीय सभ्यता के इतिहास की भी विकासरेखा होने के कारण और भी रोचक, उपादेय और ज्ञानवर्धक बन गई है। हवाले भले ही राजाओं के हों, खेल तो आम जन के भी थे न! शतरंज हो या जलक्रीड़ा, या फिर मृगया, प्राचीन भारतीय समाज ने इन्हें विधिवत नियमित खेलों का रूप दिया, इसमें कोई संदेह नहीं। खेलों का यह इतिहास हमारे प्राचीन साहित्य में बिखरा पड़ा है। लेखक ने इसे सहेज कर कालक्रम के अनुसार विवेचित किया है, जो शायद हिन्दी में अपनी तरह का पहला कार्य है!

           बिखरे साक्ष्यों के आधार पर इतिहास की रूपरेखा रचते समय यह एक स्वाभाविक चुनौती सामने आती है कि साहित्य में उपलब्ध उल्लेखों को उनके काल के संदर्भ में प्रमाणित कैसे किया जाए। यह ठीक है कि हमारे प्राचीन साहित्य में बहुत सारा इतिहास गुंथा हुआ है, लेकिन समस्या यह है कि, हमारा यह इतिहास लिखा कब गया? इसका सटीक और निर्भ्रांत उत्तर ही किसी घटना के काल-निर्धारण का आधार बन सकता है। उदाहरण के लिए, महाभारत में जिन खेलों का उल्लेख मिलता है, उन्हें इस महाकाव्य के लेखन काल का माना जाए अथवा उस युग का जब महाभारत की घटनाएँ वास्तव में घटित हुई होंगी। (आज उपलब्ध पाठ मूल घटना के बहुत बाद का है!) काल निर्धारण की इस समस्या का निराकरण अवधेश कुमार सिन्हा ने साहित्येतर सामग्री के आधार पर किया है। अतः यह कहा जा सकता है कि उनका यह ग्रंथ दोहरी प्रामाणिकता से युक्त और विश्वसनीय है। अन्यथा इसमें दो राय नहीं कि ज्ञात इतिहास से पहले का एक बड़ा अँधेरा इलाका है जिसमें गोता लगाने के लिए अवधेश कुमार सिन्हा उतरे। उस अँधेरे इलाके में जाकर वे ‘प्राचीन भारत में खेल-कूद : स्वरूप एवं महत्व’के रूप में कुछ ‘तेजस्क्रिय मणिदीप’ खोज कर लाए हैं जिनसे भारतीय सभ्यता के विकास का रहस्यलोक कुछ तो आलोकित अवश्य ही हुआ है।

          यहाँ यह सवाल उठना भी वाजिब है कि, आज अर्थात इक्कीसवीं शताब्दी में इस किताब की जरुरत क्या है ? इसका सीधा साजवाब है कि यह जो खेल-कूद नाम की चीज है, यह  मुझे मेरी संस्कृति के करीब ले जाती है। यह मुझे मेरी जड़ों से जोड़ने का काम करती है।   यह मुझे बताती है कि मेरी जड़ें कितनी पुरानी हैं। इसके अलावा, यह पुस्तक केवल प्राचीन भारत में खेल-कूद के इतिहास तक ही सीमित नहीं है, बल्कि प्रसंगवश प्राचीन भारत के साथ ही उसके समकालीन विश्व में खेल-कूद की दशा-दिशा से भी परिचित कराती है। लेखक ने अत्यंत परिश्रमपूर्वक प्राचीन साहित्य और उसके समानांतर प्राप्त ऐतिहासिक साक्ष्यों का अवगाहन करके भारत और शेष विश्व के सभ्यता-विकास का एक तुलनात्मक खाका पेश किया है। 

         यदि यह कहा जाए कि इस ग्रंथ ने आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के ‘‘प्राचीन भारत के कलात्मक विनोद’’ (1963) की परंपरा को आगे बढ़ाया है, तो अतिशयोक्ति न होगी। चौदह विद्याओं और चौसठ कलाओं की चर्चा यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है कि प्राचीन भारतीय लोक उत्सवप्रिय और क्रीड़ाजीवी था। साहित्य से लेकर मूर्तियों, शिलालेखों तथा अन्य भौतिक प्रमाण यह सिद्ध करते हैं कि द्यूत और रथ-दौड़ से लेकर जलयुद्ध और दृष्टियुद्ध तक में राजन्यवर्ग से लेकर सामान्यवर्ग तक की व्यापक भागीदारी थी। मनोरंजन, आजीविका और उत्तरजीवन की चुनौतियों के बीच आदिम काल से जिस प्रकार के वीरतापूर्ण और  मस्तीभरे मनोविनोद का विकास विश्व की अलग अलग सभ्यताओं ने किया, उसके विश्लेषण द्वारा मनुष्यता के विकास की रूपरेखा बनाई जा सकती है। ज्ञानक्षेत्र के इस विस्तार की दृष्टि से अवधेश कुमार सिन्हा का यह ग्रंथ अत्यंत उपादेय, मननीय और संग्रहणीय है। 

        इस ग्रंथ के बारे में ठोकबजा कर यह कहा जा सकता है कि यह ग्रन्थ पूरी तरह तथ्यों पर आधारित है और लेखक ने प्रमाणिकता का सर्वत्र ध्यान रखा है। वह कहीं भी भावुकता में बहकने के लिए तैयार नहीं है और किसी भी शोध कार्य से, वह भी इतिहास के शोध कार्य से, ऐसी हीअपेक्षा की जाती है। इस विषय में बहकने की काफी गुंजाइश थी  चूँकि आधार के रूप में साहित्य का इस्तेमाल किया गया है जिसकी अनेकविध व्याख्या संभव है। लेकिन यहाँ लेखक के सामने अपना लक्ष्य स्पष्ट है अतः वे बिना बहके और भटके, खेलकूद के बहाने, बार बार भारतवर्ष की सांस्कृतिक परंपरा, जीवनदर्शन की चिंताधारा और सभ्यता की विकास-सरणि को  रेखांकित करते चलते हैं। अभिप्राय यह कि यह पुस्तक खेलकूद के पाठक के लिए नहीं है, बल्कि संस्कृति, इतिहास और सभ्यता का विकास समझने के लिए एक संदर्भ ग्रंथ है।  इसमें तथ्यात्मकता और प्रमाणिकता है। और एक बड़ी चीज जो किसी भी वैज्ञानिक लेखन में होनी चाहिए वह है क्रमिकता। यहाँ चीजें क्रमशः आगे बढती हैं।   लेखक अपने पाठक को विधिवत एक एक सोपान आगे ले जाते हुए सिंधु सभ्यता से वैदिक काल, सूत्र काल, मौर्य काल, गुप्त काल तक ले आता है। इस ज्ञानयात्रा को और भी समृद्ध बनाते हैं, दो परिशिष्ट – प्राचीन भारत के परवर्ती काल में खेल-कूद का स्वरूप तथा अन्य समकालीन सभ्यताओं/देशों में खेलों का स्वरूप। परंपरा के विकास और समकालीन विश्व से जुड़े संदर्भ इस ग्रंथ को अतिरिक्त महत्वपूर्ण बनाते हैं।  

          अंतत:, भाषा और शैली की दृष्टि से अत्यंत ही सहज और प्रांजल हिंदी में लिखा हुआ यह ग्रंथ इतिहास के अध्येताओं से लेकर सामान्य जिज्ञासु पाठकों तक के लिए पठनीय है। कई जगह तो ऐसा लगता है कि जैसी औपचारिक हिंदी अवधेश जी प्रायः ‘बोलते’ हैं, उसकी तुलना में उनके ‘लेखन की भाषा’ अधिक लचीली और ललकभरी है, जो पाठक को बाँध लेती है। अतः इसे पढने के लिए शोधार्थी होना बिल्कुल ज़रूरी नहीं, शोध-दृष्टि हो यह जरूरी है। 

  • समीक्षक-ऋषभदेव शर्मा 


मंगलवार, 16 अप्रैल 2019

संजीव वर्मा 'सलिल' की रचनाएँ


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


जोड़-तोड़ है मुई सियासत (नवगीत)


मेरा गलत
सही है मानो।
अपना सही
गलत अनुमानो।
सत्ता पाकर, 
कर लफ्फाजी-
काम न हो तो
मत पहचानो।
मैं शत गुना 
खर्च कर पाऊँ
इसीलिए तुम
करो किफायत

मैं दो दूनी
तीन कहूँ तो
तुम दो दूनी
पाँच बताना।
मैं तुमको
झूठा बोलूँगा
तुम मुझको 
झूठा बतलाना।
लोकतंत्र में
लगा पलीता
संविधान से
करें बगावत

यह ले उछली
तेरी पगड़ी।
झट उछाल तू
मेरी पगड़ी।
भत्ता बढ़वा, 
टैक्स बढ़ा दें
लड़ें जातियाँ
अगड़ी-पिछड़ी।
पा न सके सुख
आम आदमी, 
लात लगाकर
कहें इनायत।

प्रजातंत्र का अर्थ हो गया (नवगीत)


संविधान कर प्रावधान
जो देता, लेता छीन
सर्वशक्ति संपन्न लोग हैं
केवल बेबस-दीन

नाग-साँप-बिच्छू चुनाव लड़
बाँट-फूट डालें
विजयी हों, मिल जन-धन लूटें
माल लूट खा लें 
लोकतंत्र का पोस्टर करती
राजनीति बदरंग
प्रजातंत्र का अर्थ हो गया
केर-बेर का संग

आश्वासन दें, जीतें जाते 
जुमला कह झट भूल
कहें गरीबी पर गरीब को
मिटा, करें निर्मूल
खुद की मूरत लगा पहनते,
पहनाते खुद हार
लूट-खसोट करें व्यापारी
अधिकारी बटमार
भीख माँग, पा पुरस्कार
लौटा करते हुड़दंग
प्रजातंत्र का अर्थ हो गया
केर-बेर का संग

गौरक्षा का नाम, स्वार्थ ही
साध रहे हैं खूब
कब्ज़ा शिक्षा-संस्थान पर
कर शराब में डूब
दुश्मन के झंडे लहराते
दें सेना को दोष
बिन मेहनत पा सकें न रोटी
तब आएगा होश
जनगण जागे, गलत दिखे जो
करे उसी से जंग
प्रजातंत्र का अर्थ हो गया
केर-बेर का संग

ठेंगे पर कानून..


मलिका - राजकुँवर कहते हैं
ठेंगे पर कानून 
संसद ठप कर लोकतंत्र का
हाय! कर रहे खून

जनगण - मन ने जिन्हें चुना

उनको न करें स्वीकार
कैसी सहनशीलता इनकी?
जनता दे दुत्कार
न्यायालय पर अविश्वास कर
बढ़ा रहे तकरार
चाह यही है सजा रहे
कैसे भी हो दरबार
जिसने चुना, न चिंता उसकी
जो भूखा दो जून
मलिका - राजकुँवर कहते हैं
ठेंगे पर कानून
संसद ठप कर लोकतंत्र का
हाय! कर रहे खून

सरहद पर ही नहीं

सडक पर भी फैला आतंक
ले चरखे की आड़
सँपोले मार रहे हैं डंक
जूते उठवाते औरों से
फिर भी हैं निश्शंक
भरें तिजोरी निज,जमाई की
करें देश को रंक
स्वार्थों की भट्टी में पल - पल
रहे लोक को भून
मलिका - राजकुँवर कहते हैं
ठेंगे पर कानून
संसद ठप कर लोकतंत्र का
हाय! कर रहे खून

परदेशी से करें प्रार्थना

आ, बदलो सरकार
नेताजी को बिना मौत ही
दें कागज़ पर मार
संविधान को मान द्रौपदी
चाहें चीर उतार
दु:शासन - दुर्योधन की फिर
हो अंधी सरकार
मृग मरीचिका में जीते
जैसे इन बिन सब सून
मलिका - राजकुँवर कहते हैं
ठेंगे पर कानून
संसद ठप कर लोकतंत्र का
हाय! कर रहे खून

जिक्र नोटा का हुआ तो.. (मुक्तिका)


अभावों का सूर्य, मौसम लापता बरसात का।
प्रभातों पर लगा पहरा अंधकारी रात का।।

वास्तव में श्री लिए जो वे न रह पाए सुबोध 
समय जाने कब कहेगा दर्द इस संत्रास का।।

जिक्र नोटा का हुआ तो नोटवाले डर गए
संकुचित मजबूत सीने विषय है परिहास का।।

लोकतंत्री निजामत का राजसी देखो मिजाज
हार से डर कर बदलता हाय डेरा खास का।।

सांत्वना है 'सलिल' इतनी लोग सच सुन सनझते
मुखौटा हर एक नेता है चुनावी मास का।।

राजनीति है बेरहम..(दोहे) 


अपराधी हो यदि खड़ा, मत करिए स्वीकार।
नोटा बटन दबाइए, खुद करिए उपचार।।

जन भूखा प्रतिनिधि करे, जन के धन पर मौज।
मतदाता की शक्ति है, नोटा मत की फौज।।

नेता बात न सुन रहा, शासन देता कष्ट।
नोटा ले संघर्ष कर, बाधा करिए नष्ट।

राजनीति है बेरहम, सगा न कोई गैर 
कुर्सी जिसके हाथ में, मात्र उसी की खैर 

कुर्सी पर काबिज़ हुए, चेन्नम्मा के खास 
चारों खाने चित हुए, अम्मा जी के दास 

दोहा देहरादून में, मिला मचाता धूम
जितने मतदाता बने, सब है अफलातून

वाह वाह क्या बात है?, केर-बेर का संग 
खाट नहीं बाकी बची, हुई साइकिल तंग

आया भाषणवीर है, छाया भाषणवीर 
किसी काम का है नहीं, छोड़े भाषण-तीर

मत मत का सौदा करो, मत हो मत नीलाम
कीमत मत की समझ लो, तभी बनेगा काम

एक मरा दूजा बना, तीजा था तैयार 
जेल हुई चौथा बढ़ा, दो कुर्सी-गल हार

गाँधी जी के नाम पर, नकली गाँधी-भक्त 
चित्र छाप पल-पल रहे, सत्ता में अनुरक्त 

लालू के लल्ला रहें, भले मैट्रिक फेल 
मंत्री बन डालें 'सलिल', शासन-नाक नकेल 

ममता की समता करे, किसमें है सामर्थ?
कौन कर सकेगा 'सलिल', पल-पल अर्थ-अनर्थ??

बाप बाप पर पुत्र है, चतुर बाप का बाप 
धूल चटाकर चचा को, मुस्काता है आप 

साइकिल-पंजा मिल हुआ, केर-बेर का संग 
संग कमल-हाथी मिलें, तभी जमेगा रंग 

त्रिपदिक छंद हाइकु

(विधा: गीत)


लोकतंत्र का / निकट महापर्व / हावी है तंत्र

मूक है लोक / मुखर राजनीति / यही है शोक
पूछे पलाश / जनता क्यों हताश / कहाँ आलोक?
सत्ता की चाह / पाले हरेक नेता / दलों का यंत्र

योगी बेहाल / साइकिल है पंचर / हाथी बेकार
होता बबाल / बुझी है लालटेन / हँसिया फरार
रहता साथ / गरीबों के न हाथ / कैसा षड़्यंत्र?

दलों को भूलो / अपराधी हराओ / न हो निराश
जनसेवी ही / जनप्रतिनिधि हो / छुए आकाश
ईमानदारी/ श्रम सफलता का / असली मंत्र

कुण्डलिया 


राजनीति आध्यात्म की, चेरी करें न दूर 
हुई दूर तो देश पर  राज करेंगे सूर
राज करेंगे सूर, लड़ेंगे हम आपस में 
सृजन छोड़ आनंद गहेँगे, निंदा रस में 
देरी करें न और, वरें राह परमात्म की 
चेरी करें न दूर, राजनीति आध्यात्म की


आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल


विश्ववाणी हिंदी संस्थान,
204, विजय अपार्टमेंट, 
नेपियर टाउन, जबलपुर-482001
मोबाइल: 9425183244 
ई-मेल: salil.sanjiv@gmail.com

पुस्तक समीक्षा: शब्दहीन का बेमिसाल सफर-गोपाल शर्मा




‘संपादकीयम्’ पुस्तक में संकलित  और ‘डेली हिंदी मिलाप’ में पूर्व प्रकाशित विभिन्न  सामयिक विषयों पर  डॉ. ऋषभदेव शर्मा द्वारा लिखे गए ‘संपादकीय’  हिंदी पत्रकारिता के क्षेत्र में पदार्पण करने के इच्छुक और अनुभवी दोनों प्रकार के पत्रकारों के लिए समान रूप से पठनीय हैं, क्योंकि इनमें आदर्श संपादकीय के सभी गुण हैं। विषय-चयन और शीर्षक के चुनाव से लेकर वर्णन की सहज शैली से होते हुए उनके समापन संदर्भ तक लेखनी का गतिशील रहना पाठक को अनायास ही बाँधता चला जाता है।

संपादकीय–शीर्षकों पर नजर दौड़ाते ही ठहर जाती है। कहीं प्रश्न हैं- अब किसके पिता की बारी है? कहीं विस्मययुक्त प्रश्न- सबका अन्नदाता हड़ताल पर है !? कहीं कविता के शिल्प में- जलाओ पटाखे पर रहे ध्यान इतना; और कहीं लोक और लोकवाणी सिंचित- ऊपरवाला देख रहा है! और फिर आता है- लीड वाक्य। संपादकीय वह उत्तम माना जाता है जिसमें पाठक को बेकार में ही वर्णन-विवरण  की हवाई पट्टी पर न दौड़ना पड़े। उसकी उड़ान  हैलीकॉप्टर सी बुलंद और उत्तुंग हो। इस निगाह से ये संपादकीय प्रिंट-मीडिया के पहले पाठ को आत्मसात करके लिखे गए लगते हैं। पहला वाक्य सब कुछ तो कहता ही है, और कुछ पढ़ने की ललक भी जगाता है। एक उदाहरण है - ‘मी टू अभियान के तहत मनोरंजन उद्योग, मीडिया, राजनीति, शिक्षा जगत और अध्यात्म की दुनिया तक से महिलाओं के यौन उत्पीड़न की घटनाओं के खुलासों से आम लोग सहमे हुए हैं।’

इसी प्रकार संपादकीय का समापन वाक्य चिंतन का समाहार उपसंहार की तरह करता है और पाठक को वांछित ‘फूड फॉर थॉट’ देता चलता है- ‘जब तक व्यवस्था की ओर से यह संदेश आपराधिक तत्वों तक नहीं जाएगा, तब तक वे भीड़ का  मुखौटा लगाकर इसी तरह उपद्रव मचाते रहेंगे , हत्याएँ करते रहेंगे और हर बार किसी बेटे को यह पूछना ही पड़ेगा कि- अब किसके पिता की बारी है?’

लेखन में शब्दों की धार यूँ तो सहजता को निभाती चली है, किंतु मार्मिक स्थलों पर धार नुकीली भी हो जाती है – धनुष की टंकार हो जाती है। ‘समानता और पूजा-पद्धति के अधिकारों का टकराव’ और ‘परंपरा के नाम पर भेदभाव कब तक’  में लेखक धर्म और उपासना जैसे नाजुक मसलों पर क्षुब्ध होकर कहता है- “यदि प्रभु के  राज्य में भी असमानता-पूर्ण नियम लागू हैं तो या तो वह राज्य प्रभु का नहीं (पुजारियों का है), या फिर वह नियम प्रभु का नहीं  (दरबानों का है)।”

अपने वक्तव्यों को धार देने के लिए और उपसंहार करने के लिए कई बार  लेखक  के मन में उकड़ू बैठने को मजबूर सा हो गया कवि तेवरी चढ़ाकर काव्य पंक्तियाँ  उधार भी लेता है – वैभव की दीवानी दिल्ली – और कभी थोड़ा बदलकर – जलाओ पटाखे पर रहे ध्यान इतना – बोलता है; और कभी फिलहाली बयान करने के लिए कह उठता है- भीड़ पर तलवार हैं, खंजर गुलेले हैं। कल्लो क्या कल्लोगे ? है तो है।  चुटकी ली जाए तो चुटकी लगे और चूँटी काटी जाए तो वही लगे। ऐसे अवसर भी  रंदे पर घिसे गए, पर पेशे खिदमत रहे हैं- ‘खूब नाच-गाना हो, शराबे  बहें, उपहार लिए-दिए जाएँ, उन्माद की वर्षा हो, वशीकरण के लिए यह जरूरी है । बार में भी, और चुनाव में भी।’

 कहा जाता है कि अखबारी दुनिया से जुड़ने के बाद भाव, भाषा, भंगिमा और भूमिका को नए सिरे से साधना पड़ता है और लोगों को बहुत उठना-गिरना पड़ता है। वे और होंगे शोर-ए-तलातुम में खो जाने वाले! ‘संपादकीयम्’ में ‘कोरे कागद’ कारे भर नहीं किए गए हैं, बल्कि एक युगधर्म का पालन भी किया गया है। इसलिए ‘भव’ साधना संभव हुआ है। लगता है, यह खेल खेल में ही हो  गया है; और जो हुआ वो ग्रेट  है। तोप मुक़ाबिल हो तो अखबार निकालने के दिन अब नहीं रहे, पर तरवार की धार पर दौड़ने वाले दीवानों को कोई  ‘रवि’ तभी प्रकाशित कर सकता है, जब कलम में कमाल हो और उसकी  श्री वास्तव  में हो!

‘संपादकीयम्’ के इस पाठ को लिखने से किसी पत्रकारिता महाविद्यालय में  फीस भरे बिना मुझे  पहला पाठ मिल  गया। इसका शुक्रगुजार होना बनता है। यह भी मेरा फर्ज़ बनता है कि नाई की ताईं आपको बुलावा दे दूँ, ‘परिलेख प्रकाशन, नजीबाबाद’ से प्रकाशित इस मोर-पंखी पुस्तक के साथ फ़र्स्ट  डेट पर जरूर-बेजरूर  जाना । दूसरी-तीसरी किताब की प्रतीक्षा न करना; वे पाइप-लाइन में हैं।

  • समीक्षित कृति : संपादकीयम् (लेख/ पत्रकारिता)/ लेखक- ऋषभदेव शर्मा/ आईएसबीएन: 97893-84068-790/ प्रकाशक- परिलेख, नजीबाबाद/ वितरक- श्रीसाहिती प्रकाशन, हैदराबाद।

गोपाल शर्मा

प्रोफेसर, 
अंग्रेजी विभाग, 
अरबा मींच विश्वविद्यालय, 
अरबा मींच, इथियोपिया।
ई-मेल:prof.gopalsharma@gmail.com  

सबरंग-कार्यपालिका-न्यायपालिका संबंध




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मंगलवार, 26 मार्च 2019

विनोद श्रीवास्तव के पाँच गीत


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार

रेत के घर हो गये हैं हम..


रेत के घर 
हो गये हैं हम 
क्या पता 
किस क्षण हमें ढहना पड़े 

सब्र के घर 

हो गये हैं हम 
क्या पता 
कितने युगों दहना पड़े 

मोम होकर 

पीर पिघली है 
या कि सांसें हो गई ठंडी 
रात की आवाज़ 
कातिल है 
जागती है जबकि पगडंडी 

नीर के घर 

हो गये हैं हम 
क्या पता 
किस छोर तक बहना पड़े 

बंद आँखों में 

शहर वीरान 
दीप की लौ क्या करे बोलो 
हो गये झूठे 
सभी अनुमान 
सूर्यवंशी मुट्ठियाँ खोलो 

भूख के घर 

हो गये हैं हम 
क्या पता 
कब क्या हमें सहना पड़े 

इं दिनों तूफान को ओढ़े 

बाँसुरी का गीत पागल है 
हर पहर चिंगारियां 
छोड़े
क्या यही हर बात का हाल है 

धूप के घर 

हो गये हैं हम 
क्या पता 
कब आग में रहना पड़े


शाम-सुबह महकी हुई..


शाम-सुबह महकी हुई 
देह बहुत बहकी हुई 
ऐसा रूप कि 
बंजर-सा मन 
चन्दन-चन्दन हो गया 

रोम-रोम सपना संवरा
पोर-पोर जीवन निखरा
अधरों की तृष्णा धोने 
बूँद-बूँद जलधर बिखरा 

परिमल पल होने लगे 
प्राण कहीं खोने लगे 
ऐसा रूप कि 
पतझर-सा मन 
सावन-सावन हो गया 

दूर हुई तनहाइयाँ 
गमक उठी अमराइयां 
घाटी में झरने उतरे 
गले मिली परछाइयाँ

फूलों-सा खिलता हुआ 
लहरों-सा हिलता हुआ 
ऐसा रूप कि 
खण्डहर सा मन 
मधुवन–मधुवन हो गया 

डूबें भी, उतरायें भी 
खिलें और कुम्हलायें भी 
घुलें-मिलें तो कभी-कभी 
मिलने में शरमायें भी 

नील वरन गहराइयाँ 
साँसों में शहनाईयां
ऐसा रूप कि 
सरवर-सा मन 
दर्पण-दर्पण हो गया


नदी के तीर पर..


नदी के तीर पर 
ठहरे 
नदी के बीच से 
गुजरे 
कहीं भी तो 
लहर की बानगी 
हमको नहीं मिलती 

हवा को हो गया क्या 
नहीं पत्ते खड़कते हैं 
घरों में गूजते खंडहर
बहुत सीने धड़कते हैं 

धुएं के शीर्ष पर 
ठहरे 
धुएं के बीच से 
गुजरे
कहीं भी तो 
नज़र की बानगी 
हमको नहीं मिलती 

नकाबें पहनते हैं दिन 
कि लगता रात पसरी है 
जिसे सब स्वर्ग कहते हैं 
न जाने कौन नगरी है 
गली के मोड़ पर 
ठहरे 
गली के बीच से 
गुजरे
कहीं भी तो 
शहर की बानगी 
हमको नहीं मिलती 

कहाँ मन्दिर, कहाँ गिरजा 
कहाँ चैतन्य की आभा 
कहाँ नानक, कहाँ कबिरा
कहाँ खोया हुआ काबा 

अवध की शाम को 
ठहरे 
बनारस की सुबह 
गुजरे 
कहीं भी तो 
सफ़र की बानगी 
हमको नहीं मिलती


गीत हम गाते नहीं तो..


गीत 
हम गाते नहीं तो 
कौन गाता?

ये पटरियाँ 
ये धुआँ
उस पर अंधेरे रास्ते
तुम चले आओ 
यहाँ 
हम हैं तुम्हारे वास्ते 

गीत!
हम आते नहीं तो 
कौन आता?

छीनकर सब ले चले 
हमको 
हमारे शहर से 
पर कहाँ सम्भव 
कि बह ले 
नीर 
बचकर लहर से 
गीत 
हम लाते नहीं तो 
कौन लाता?

प्यार ही छूटा नहीं 
घर-बार भी 
त्योहार भी 
और शायद छूट जाये 
प्राण का आधार भी 

गीत 
हम पाते नहीं तो 
कौन पाता?


हमारी देह का तपना..


हमारी देह का तपना 
तुम्हारी धूप क्या जाने 

बहुत गहरे नहीं सम्बन्ध होते 
रंक राजा के 
न रौंदें गाँव की मिट्टी 
किसी के बूट आ-जा के 

हमारे गाँव का सपना 
तुम्हारा भूप क्या जाने 

नशें में है बहुत ज्यादा 
अमीरी आपकी कमसिन 

गरीबी मौन है फिर भी 
उजाड़ी जा रही दिन-दिन 

तुम्हारी प्यास का बढ़ना 
तुम्हारा कूप क्या जाने 

हमारे दर्द गूगे हैं 
तुम्हारे कान बहरे हैं 
तुम्हारा हास्य सतही है 
हम्रारे घाव गहरे हैं 

हमारी भूख का उठना
तुम्हारा सूप क्या जाने

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विनोद श्रीवास्तव


  • जन्म-2 जनवरी, 1955 (कानपुर)
  • पिता-श्री शिव कुमार श्रीवास्तव
  • माता-श्रीमती शांती देवी श्रीवास्तव
  • शिक्षा-एम.ए. अर्थशास्त्र/ हिन्दी साहित्य।
  • प्रकाशित कृतियाँ-भीड़ में बांसुरी और अक्षरों की कोख (गीत संग्रह)।
  • प्रकाशन-देश की अनेक पत्र-पत्रिकाओं में गीतों का प्रकाशन। अनेक गीत संचयनों में सहभागिता। दूरदर्शन एवं आकाशवाणी के विभिन्न केन्द्रों से काव्य-पाठ।
  • सम्प्रति-उत्तर प्रदेश राज्य कताई कंपनी, कानपुर से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के दैनिक जागरण के साहित्यिक पृष्ठ और अर्द्धवार्षिक पत्रिका 'पुनर्नवा' से संबद्ध एवं जागरण समूह की लक्ष्मी देवी ललित कला अकादमी, कानपुर में प्रबंधक।
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परिक्रमा-भाषा : राष्ट्रीयता, समन्वय और समरसता’ पर व्याख्यान संपन्न


“भाषा किसी राष्ट्र की बुनियाद होती है। वही अलग-अलग समुदायों को इस तरह बाँध कर रख सकती है कि बड़े से बड़े हमले में भी देश की संरचना बिखरने न पाए। भाषा को यह शक्ति उसमें छिपे जन-संस्कृति के सूत्रों से मिलती है। इसलिए किसी भाषा को इस्तेमाल करना सीखना ही काफी नहीं होता। बल्कि उसमें निहित सांस्कृतिक तत्वों की पहचान भी ज़रूरी होती है। अनेक बोलियों और भाषाओं के बीच संपर्क का काम करते-करते संस्कृति की दृष्टि से हिंदी अत्यंत समृद्ध भाषा बन गई है तथा अपने विपुल मौलिक और अनूदित साहित्य के माध्यम से वह भारत की राष्ट्रीय अस्मिता का प्रतिनिधित्व करती है। भक्ति साहित्य और नव जागरण काल के साहित्य द्वारा हिंदी ने राष्ट्रीय समन्वय और समरसता को पुष्ट किया था। वर्तमान में भी वह विघटनकारी ताकतों को पहचान कर जनता को सावधान कर रही है और सह-अस्तित्व के भाव को पुख्ता करने के लिए प्रयासरत है।“

ये विचार प्रो. ऋषभदेव शर्मा ने कर्नाटक विश्वविद्यालय में विभिन्न भाषा-साहित्य और कला विषयों के प्राध्यापकों को संबोधित करते हुए प्रकट किए। वे विश्वविद्यालय के मानव संसाधन विकास केंद्र (धारवाड़) में संपन्न पुनश्चर्या पाठ्यक्रम के तहत “भाषा : राष्ट्रीयता, समन्वय और समरसता” विषय पर दो-सत्रीय व्याख्यानमाला में बोल रहे थे। कार्यक्रम में कर्नाटक के विभिन्न विश्वविद्यालयों से आए 65 प्राध्यापकों ने भाग लिया। डॉ. साहिबहुसैन जहगीरदार के धन्यवाद के साथ व्याख्यानमाला का समापन हुआ। 

प्रस्तुति: डॉ गुर्रामकोंडा नीरजा 


सह संपादक 'स्रवंति'
असिस्टेंट प्रोफेसर
उच्च शिक्षा और शोध संस्थान,
दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा,
हैदराबाद - 500004

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छत्तीसगढ़ी उपन्यास ‘मोर दुलरुआ’ और बड़का दाई’ लोकार्पित


केंद्रीय हिंदी संस्थान (मैसूर) के व्याख्यान कक्ष में संपन्न क्षेत्रीय निदेशक डॉ. राम निवास साहू के सेवा निवृत्ति समारोह के अवसर पर उनकी दो छत्तीसगढ़ी पुस्तकों 'मोर दुलरुआ' (जीवनीपरक उपन्यास) और 'बड़का दाई' (अनुवाद : डॉ. गीता शर्मा) का लोकार्पण किया गया। अध्यक्षता मैसूर विश्वविद्यालय की प्रो. प्रतिभा मुदलियार ने की। बतौर मुख्य अतिथि लोकार्पण प्रो. ऋषभदेव शर्मा ने किया। एनसीईआरटी के डॉ. सर्वेश मौर्य और केंद्रीय हिंदी संस्थान के डॉ. परमान सिंह ने लोकार्पित पुस्तकों की समीक्षा प्रस्तुत की। वल्लभविद्यानगर से पधारे डॉ. योगेन्द्रनाथ मिश्र तथा हैदराबाद से पधारे चंद्रप्रताप सिंह ने शुभाशंसा व्यक्त की। इस अवसर पर आशा रानी साहू, शशिकांत साहू, श्रीकांत साहू और श्रीदेवी साहू ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। नराकास-मैसूर के प्रतिनिधियों के अलावा डॉ साहू के गृहनगर कोरबी-छत्तीसगढ़ से आए समूह के सदस्यों ने भी उत्साहपूर्वक भागीदारी निबाही।

-डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा