कमला कृति

शनिवार, 6 दिसंबर 2014

कृष्ण नन्दन मौर्य के गीत




चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार




उम्मीदें थीं..



उम्मीदें थीं
आजादी खुशहाली लायेगी।


रखा सूद पर
जुआ और हल तक बैलों का
बस खुदकुशियाँ ही हल हैं
ठण्डे चूल्हों का
तय तो था
खलिहानों की बदहाली जायेगी।


नींव टिकी सरकारों की
दंगों, बलवों पर
लोकतंत्र है
पूँजीपतियों के तलवों पर
सोंचा तो था
सोंच गुलामों वाली जायेगी।


स्वार्थ–बुझे पासे
फिंकते कब से चौसर पर
नग्न–क्षुधित जनतंत्र
हारता हर अवसर पर
राजभवन से
कब यह नीति–कुचाली जायेगी।


हल्की ममता हुई
सियासत के हलके में
सरहद से माँ को मिलते हैं धड़
तोहफे में
इल्म न था
इस तरह लहू की लाली जायेगी।


     

इक लहर बारिश की.. 



इक लहर बारिश की क्या आई
धँस गया चकरोड
पुलिया ढह गई।

घर बने तालाब
गलियारे नहर
बूँद भर में, डूब–उतराया शहर
इक लहर बारिश की क्या आई
रोड पर जैसे
नदी ही बह गई।

भीड़ फर्राटा
घिसटती जाम में
खास भी कुछ, आ फँसे हैं आम में
इक लहर बारिश की क्या आई
पालिका की पोल
सारी कह गई।

हुईं टापू
रेहड़ियाँ, पैदल–पथों की
आज आमद नहीं ठेलों–खोमचों की
इक लहर बारिश की क्या आई
कीच ही केवल
असर में रह गई।

           
 

क्या उड़ने की आशा पंक्षी..



क्या
उड़ने की आशा
पंक्षी

नयन–निलय में
नील गगन है
तरु की फुनगी पर
यह मन है
किन्तु कटे पर
तो फिर कैसी
उपवन की प्रत्याशा
पंक्षी


तोड़
क्षितिज की परिभाषाएँ
पा लूँ इस नभ की
सीमाएँ
किन्तु बँधे पग
तो फिर कैसी
बढ़ चलने की आशा
पंक्षी


स्वर्ण–दीप्ति के छल
के पीछे
भाग रहा
तू आँखें मींचे
स्वर्ण–कटोरों में
चुग्गा चुगकर भी
कैसे प्यासा
पंक्षी

बँधे हुये
निश्वास तुम्हारे
मन पर
छल का पाश घना रे
गिरवी आत्मा ही जब
तो फिर
क्या स्व– की परिभाषा
पंक्षी


कृष्ण नन्दन मौर्य


154,मौर्य नगर, पल्टन बाजार
प्रतापगढ़ (उ.प्र.) – 230001.

मंगलवार, 2 दिसंबर 2014

पुस्तक समीक्षा: पीढ़ी का दर्द-काव्य संग्रह/ सुबोध श्रीवास्तव






आज की कविता में आक्रांत जन -मानस का यथार्थ चित्रण करती काव्योक्तियां 



माँ को समर्पित 'पीढ़ी का दर्द' सुबोध श्रीवास्तव का पहला काव्य-संग्रह है जिसकी ५४ कविताओं में देश और समाज के ऐसे सरोकारों की भाव-भंगिमाएं अंकित की गई हैं जिनसे आम आदमी आक्रांत दिखाई पड़ता है, तो सचेतन बुद्धिजीवी उसकी इस दयनीय स्थिति पर स्वयं को बेबस पाकर किंकर्तव्यविमूढ़-सा हो जाता है। इस पीड़ा की छटपटाहट उसके काव्य का प्रेरणा-बिंदु जान पड़ती है। 'पीढ़ी के दर्द की पीड़ा' में 'लालकिला', 'बापू' जैसे ऐतिहासिक उपादान से लेकर 'सूरज', 'हवा', 'मौसम', 'पहाड़', 'भूकंप' जैसे प्रकृतिगत उपादान भी सशक्त सम्प्रेषण में अभिव्यक्त हुए हैं। सुबकता लालकिला, गड्ढ़ों के बीच झांकती आँखें, माँ को सोया समझकर … तोतली ज़बान से आक्रोश जगाता, बच्चों की पनीली आँखें, सुबकता अस्पताल, अंतड़ियों की ख़ुराक और सूखी हड्डियों के लिए आड़ की जद्दो-जहद में पिसता जन, आदर्शों के कवच फेंकने की मजबूरी कहीं न कहीं उस युग-त्रासदी को झेलने की विवशता को दर्शाती है, जिसे 'पीढ़ी का दर्द' के रचनाकार ने पग-पग पर अपने मन-मानस में झेला और फिर अभिव्यक्त किया। कहीं रोज़मर्रा होते हादसों में मनुष्य की बेबस स्थिति व्यवस्था की पोल खोलती नज़र आती है तो कहीं प्रकृति-प्रदत्त 'भूकम्प', आपदाओं की विवशता।

छंदमुक्त इन कविताओं में बिम्ब, प्रतीक, अलंकारों की सुन्दर छटाएं काव्य-सौंदर्य को बढ़ाती हैं। 'लाल किला', 'अस्पताल', 'पहाड़', 'सूरज का सशक्त मानवीकरण, 'सूरज' का प्रतीक व बिम्ब रूप में मज़दूर के दर्द में व्यक्त हुआ है। 'सूरज का दर्द' और 'मज़दूर का सूरज' में बेबस मज़दूर है, ' संवेदनाओं के अबोध शिशु' अछूता प्रतीक है। अपनी इन कविताओं में सुबोध जहां एक पल भी आम आदमी के दर्द को नहीं भूलता, वहीं रचनाकार की अपनी पीड़ा 'खबरची' में न कह पाने की छटपटाहट को भी झेलता है और जो कहीं न कहीं 'खण्डर-सा मैं' में अभिव्यक्त होता है। यथास्थिति का यथार्थ चित्रण करती परिस्थितियों में चीखना, बोलना या आवाज़ उठाना पूरी तरह वर्जित-सा माना गया है। कहीं न कहीं इन कविताओं में एक पत्रकार की सजग दृष्टि में समाज-व्याप्त घटनाओं व तथ्यों की तह तक जाकर उन्हें उघाड़ने की पहल भी दिखाई पड़ती है। इन कविताओं में व्यक्त सोच के नयेपन को पद्मश्री गोपालदास 'नीरज' ने भी सराहा है।

पूरे काव्य-संग्रह की अंतिम ११ कविताएं 'तुम्हारे नाम' सन्दर्भ में ली गई हैं जिनमें कुछ तो रुमानियत से सिक्त हैं तो अन्य में लक्ष्य-संधान के दृढ़ निश्चय की ओर एक संकेत करती हैं| साथ ही 'तुम/उदास मरुथल में/जल में मोती-सी चमकती' या 'मेरे सिराहने/ बिना अलसाये / देर तक जागती रही/ याद तुम्हारी!' में मिलन की चाहत की पराकाष्ठा दर्शाती है, तो 'तुम्हारे नाम' कविता में लक्ष्य सुंदरी का संधान आशावादिता जगाता है। निःसंदेह कविताओं की भावभूमि उन सामाजिक सरोकारों को उठा कर पाठक को इस यथास्थिति के विषय में सोचने को मजबूर करती है। पुस्तक का आवरण व साज-सज्जा सराहनीय है। सार रूप में सुबोध श्रीवास्तव का यह पहला काव्य-संग्रह निःसंदेह पठनीय व संग्रहणीय है।

  • पीढ़ी का दर्द -सुबोध श्रीवास्तव
  • काव्य-संग्रह
  • अंजली प्रकाशन,
  • आज़ाद नगर, कानपुर,1994।    

डॉ. प्रेम लता चसवाल 'प्रेमपुष्प'

शशि पुरवार की ग़ज़लें



चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


(एक) 


यूँ  न मुझसे रूठ  जाओ, मेरी जाँ निकल न जाये
तेरे इश्क का जखीरा, मेरा दिल पिघल न जाये.

मेरी नज्म में गड़े है, तेरे प्यार के कसीदे
मै जुबाँ पे कैसे लाऊं, कहीं राज खुल न जाये

मेरी खिड़की से निकलता, मेरा चाँद सबसे प्यारा
न झुकाओ तुम निगाहे, कहीं रात ढल न जाये.

तेरी आबरू पे कोई, कहीं दाग लग न पाये
मै अधर को बंद कर लूं, कहीं अल निकल न जाये.

ये तो शेर जिंदगी के, मेरी साँस से जुड़े है
मेरे इश्क की कहानी, ये गजल भी कह न जाये.

ये सवाल है जहाँ से, तूने कौम क्यूँ बनायीं
ये तो जग बड़ा है जालिम, कहीं खंग चल न जाये.
 


(दो) 


भारत की पहचान है हिंदी
हर दिल का सम्मान है हिंदी.

जन जन की है मोहिनी भाषा
समरसता की खान है हिंदी.

छन्दों के रस में भीगी ये
गीत गजल की शान है हिंदी.

ढल जाती भावों में ऐसे
कविता का सोपान है हिंदी.

शब्दों का अनमोल है सागर
सब कवियों की जान है हिंदी.

सात सुरों का है ये संगम
मीठा सा मधुपान है हिंदी.

क्षुधा ह्रदय की मिट जाती है
देवों का वरदान है हिंदी.

वेदों की गाथा है समाहित
संस्कृति की धनवान है हिंदी.

गौरवशाली भाषा है यह
भाषाओं का ज्ञान है हिंदी.

भारत के जो रहने वाले
उन सबका अभिमान है हिंदी।



(तीन) 


हर मौसम में खिल जाता है नीम की ही ये माया है
राही को जो छाया देता नीम का ही वो साया है।

बिन पैसे की खान है ये तो तोहफ़ा है इक क़ुदरत का,
महिमा देखी नीम की जब से आम भी कुछ बौराया है ।

जब से नीम है घर में आया, जीने की मंशा देता,
मोल गुणों का ही होता है नीम ने ही बतलाया है।

कड़वा स्वाद नीम का लेकिन गुणकारी तेवर इसके,
हर रेशा औषध है इससे रोग भी अब घबराया है।

निंबोली का रस पीने से तन के सारे रोग मिटें,
मन मोहक छवि ऐसी जिसने लाभ बहुत पहुँचाया है

गाँव की वो गलियाँ भी छूटीं, छूटा घर का आँगन भी,
शहर में फैला देख प्रदूषण नीम भी अब मुरझाया है।

शुक्रवार, 28 नवंबर 2014

काव्य-उन्मेष-उत्सव







एक अनूठा ऑनलाइन साहित्यिक उत्सव 



'अनहद कृति' हिंदी की त्रैमासिक ई-पत्रिका के प्रथम वार्षिक साहित्यिक ऊर्जायन का काव्य-उन्मेष-उत्सव इन दिनों चल रहा है। 'अनहद कृति' की शुरुआत जिन उद्देश्यों को लेकर की गई, उनमें "हिन्दी साहित्य, संस्कृति एवं कला की गहन, निरंतर और व्यापक अमूल्य निधि में अपने सार्थक प्रयत्नों द्वारा वैश्विक स्तर पर साहित्य साधकों को संगठित करके हिंदी भाषा का समुचित संरक्षण, संवरण, विकास एवं विस्तार करना और साहित्य सृजन के महत कार्य में अपने-अपने सरोकारों से रचनाशीलता में जुड़े सभी कर्मठ, साहित्य एवं कला के प्रति कटिबद्ध रचनाकारों को एक सांझे मंच पर लाकर उनकी रचनाओं को विश्वस्तरीय पहचान करवाना हमारा परम लक्ष्य रहा है। इसके साथ ही उभरते रचनाकारों का स्वागत करना व उन्हें सृजन के लिए प्रेरित-प्रोत्साहित करना भी हमारा उद्देश्य है।"

'अनहद कृति' का नियमित संचालन व विकास उन्हीं उद्देश्यों के अंतर्गत किया जा रहा है और इसके सुखद परिणाम भी दृष्टव्य हैं कि इसके कलेवर, रचनाकारों, पाठकों व विभिन्न देशों तक पहुँच में निरंतर वृद्धि हो रही है। फिर भी हिन्दी का समुचित विकास एवं विस्तार, इस के अतिरिक्त भी हमसे कुछ अन्य प्रयासों की मांग करता है, जिसके लिए हम समय-समय पर नए लक्ष्य संधान करके इस कार्य को और उत्साहपूर्वक सबको सम्मिलित करने के प्रयास कर रहे हैं। फेस-बुक, लिंकडिन और ट्विटर से अधिक से अधिक हिंदी-प्रेमियों तक हमने अपनी पहुँच बढ़ाई है। रचनाकारों में साहित्य-संवर्धन हेतु नया ओज व ऊर्जा भरने के लिए 'अनहद कृति के वार्षिक साहित्यिक ऊर्जायन' का प्रारम्भ भी उन्हीं उद्देश्यों की पूर्ति में एक प्रयास है।

'अनहद कृति' वैश्विक स्तर पर हिंदी के विद्वत समाज एवं रचनाकारों को विशुद्ध साहित्यिक दृष्टि से सांझे मंच पर लाकर उन्हें उत्कृष्ट पहचान दिलवाने के लिए प्रयत्नशील है। इसी के अंतर्गत 'काव्य-उन्मेष' स्पर्धा उत्सव की घोषणा 'हिंदी दिवस' पर की गई, इस प्रतिस्पर्धा की रूपरेखा ऐसी बनायी गयी है कि यह लेखक, पाठक और रचना का एक सामूहिक उत्सव बन सके।

हिंदी साहित्य जगत में यह पहला ऐसा प्रयास है-
• जिसमें कि काव्य-उत्कृष्टता का किसी अन्य पहचान की मोहताज न होकर विशुद्ध गुणवत्ता पर परखे जाने का प्रावधान किया जाएगा तथा प्रतिभागी रचनाकारों के नाम को या उनकी अन्य पहचान को निर्णय आने तक पूर्णतः गोपनीय रखा जाएगा। 'अनहद कृति' निष्पक्ष निर्णय से ऐसी रचनाशीलता को ढूंढने की पक्षधर है जो किसी पहचान, रसूख या लिप्सा की मोहताज न होकर विशुद्ध उत्कृष्टता पर निर्भर होगी। इसके लिए ४ माह तक प्रतिभागियों से रचनाएं एकत्रित की जाएंगी फिर ३ माह तक सभी सम्मिलित की गई कविताओं को पाठकों द्वारा मूल्यांकन के लिए उपलब्ध करवा दिया जाएगा। जो भी पाठक जज बनना चाहेंगे, उन्हें लगभग सभी कविताओं को अपनी समय सुविधा से पढ़ कर नियमानुसार अपना निर्णय प्रेषित करना होगा।
• और, स्पर्धा के निर्णय में ३०% भागीदारी 'अनहद कृति' के सुधि पाठकों की होगी जिसके लिए सभी सम्मिलित की गई कविताओं को 'अनहद कृति' के खुले मंच पर डाल दिया जाएगा ताकि पाठक उन रचनाओं पर निःसंकोच अपना मत व्यक्त करने के अधिकारी हों। 'अनहद कृति' काव्य- उन्मेष को एक उत्सव की तरह आयोजित करना चाहती है जिसमें सभी की उत्साहपूर्ण सहभागिता हो। इसमें पाठक से अभिप्राय किसी विशेष वर्ग से नहीं, रचनाकार या लेखक भी एक अच्छा पाठक हो सकता है, बल्कि उसे एक अच्छा पाठक अनिवार्यतः होना ही चाहिए। ज़रा सोचिये, जब एक प्रतिभागी खुद ही अपनी व दूसरों की रचनाओं के मूल्यांकन करने में सहभागिता करेगा तो निश्चित रूप से वह अपनी कृति के गुण-दोषों को भी सहज ही जान पाएगा।

इसके लिए काव्य-उन्मेष-उत्सव को तीन चरणों में विभाजित किया गया है:
• प्रथम चरण: लेखन का उन्माद: १० अक्टूबर, २०१४ - २० जनवरी, २०१५ - इसके दौरान रचनाकार अपनी काव्य-कृतियाँ प्रेषित करेंगे और पाठक अपना नाम प्रेषित करेंगे पाठक-जज बनने हेतु।
• दूसरा चरण: पाठक सर्वोपरि: २१ जनवरी, २०१५ - २० अप्रैल, २०१५ - इस अवधि के दौरान पाठक-जज अपने समयानुसार कविताओं को पढ़ेंगे और निर्धारित मानदण्डों पर उनको आकलित करेंगे।
• तीसरा चरण: लेखक-पाठक-सम्मान: २३ जून २०१५ - २३ सितम्बर, २०१५ - हिंदी-दिवस २०१५ के काव्य-उन्मेष-उत्सव अंक में लेखक-पाठक-रचना का सम्मान एक हृदयग्राही कलात्मक अंक में एवं "काव्य प्रतिष्ठा सम्मान" की घोषणा एवं उसके अंतर्गत विशेष-रचनकार-परिशिष्ट; इसी अंक से होंगे रचनाकार एवं पाठक-जज रू-ब-रू!

'काव्य-उन्मेष उत्सव' से हिन्दी भाषा व हिन्दी साहित्य के संवर्धन में 'अनहद कृति' से जुड़े साहित्यकार बंधु, सहृदय पाठक एवं विश्वभर में फैले हिन्दी प्रेमी इसे सफल बनाने में सक्रिय व सार्थक भूमिका निभा रहे हैं, काव्य-उन्मेष के पन्नों पर जा इस साहित्य-उत्सव के बारे में हो रही बातचीत का आनंद लें - (http://www.anhadkriti.com/competition.php)।

हिंदी दिवस २०१४ से शुरू हो हिंदी दिवस २०१५ तक चलने वाले इस अनूठे ऑनलाइन साहित्यिक उत्सव का लिंक है - http://www.anhadkriti.com/competition.php - आज ही कृपया पन्नों पर विस्तार से दिए गए उद्देश्य, लेखक नियमावली, पाठक-जज नियमावली, मूल्यांकन प्रक्रिया, काव्य प्रतिष्ठा सम्मान एवं कविताएं भेजने के बारे में पढ़ें और इस शब्द-यज्ञ में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करें - लेखक, पाठक-जज या पाठक के रूप में। तो, आप पाठक हैं या लेखक साल भर की इस साहित्यिक यात्रा में 'काव्य-उन्मेष-उत्सव' पर हमारे साथ चलें नए साहित्यिक आयाम खोजने, नयी मंज़िलें नापने।


आपकी साहित्यिक ऊर्जा की अभिलाषा में,
सहयोगाकांक्षी,

पुष्प राज चसवाल एवं डॉ प्रेम लता चसवाल 'प्रेम पुष्प'

संपादक द्वय: अनहद कृति
(www.anhadkriti.com)
साहित्यिक पठन-पाठन के लिए अनहद कृति से जुड़ें --
फेसबुक से  'like' द्वारा: https://www.facebook.com/anhad.kriti
गूगल प्लस पर: google.com/+PremPushpChaswal
ट्विटर पर: https://twitter.com/anhadkriti  

बृजेश नीरज की कविताएं



विनोद शाही की कलाकृति


तुम ही तुम



निःश्वसन
उच्छ्वसन
सब देह-कर्म, यह अवगुंठन
मोह-पाश के बंधन तुम
बस तुम! तुम ही तुम

व्यक्त हाव
अव्यक्त भाव
नेह-क्लेश, अभाव-विभाव
रूप-गंध के कारण तुम
बस तुम! तुम ही तुम

सम्मुख हो जब
विमुख हुए, तब
मनस-पटल की चेतनता सब
अनुभूति-रेख में केवल तुम
बस तुम! तुम ही तुम


कविता


कविता -
शरीर में चुभे हुए काँटे
जो शरीर को छलनी करते हैं;
वह टीस
जो दिल की धड़कन
साँसों को निस्तेज करती है

यह तुम्हें आनंद नहीं देगी
प्रेम का कोरा आलाप नहीं यह
वासना में लिपटे शब्दों का राग नहीं
छद्म चिंताओं का दस्तावेज़ नहीं
इसे सुनकर झूमोगे नहीं

यह तुम्हें गुदगुदाएगी नहीं
सीधे चोट करेगी दिमाग पर
तड़प उठोगे
यही उद्देश्य है कविता का

रात के स्याह-ताल पर
नृत्य करने वाले नर-पिशाचों के लिए
नहीं होती कविता

कविता पैदा करती है
जिंदा लोगों में झुरझुरी
एक सिहरन!


अँधेरे से लड़ने के लिए


अँधेरे से लड़ने के लिए
धूप जरूरी नहीं होती
जरूरी नहीं होते चाँद और सूरज

जरूरी नहीं दीपक
तेल से भीगी बाती
माचिस की तीली

जरूरी है आग
मन के किसी कोने में सुलगती आग

सोमवार, 24 नवंबर 2014

श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’ का गीत




 चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार



भारती उठ जाग रे !



है कहां निद्रित अलस से
स्वप्न लोचन जाग रे !
प्रगति प्राची से पुकारे
भारती उठ जाग रे !

मलय चन्दन सुरभि नासा
नित नया उत्साह लाती
अरूणिमा हिम चोटियों से
पुष्प जीवन के खिलाती

कोटिश: पग मग बढ़े हैं
रंग विविध ले हाथ रे !
भारती उठ जाग रे !

ज्ञान की पावन पुनीता
पुण्य सलिला बह रही
आदि से अध्यात्म गंगा
सुन तुझे क्या कह रही
विश्व है कौटुम्ब जिसका
चरण रज ले माथ रे!
भारती उठ जाग रे !

नदी निर्झर वन सुमन सब
वाट तेरी जोहते
ध्वनित कलकल नीर चँचल
मृगेन्द्रित मन मोहते !
कोटिश: कर साथ तेरे
अनृत झुलसा आग रे !
भारती उठ जाग रे !
युग भारती फिर जाग रे !
जाग रे ! .. फिर जाग रे !

चार मुक्तक-डॉ रमा द्विवेदी



चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


                              (एक)


      कोई दुल्हन सँवरती जब तो दर्पण याद आता है,
      बरसता मेघ घन-घन-घन तो प्रियतम याद आता है।
      बिछुडने और मिलने में  बहुत कुछ सीख जाते हम,
       नदी कोई बहकती जब समंदर याद आता है॥

                              (दो) 


        गिरें जब शाख से पत्ते शज़र का दिल भी रोता है,
       कि सूरज डूबता है जब विरहन का दिल भी रोता है।
       सुबह आए, सुबह जाए ये दुनिया फ़र्क ना जाने,
       ना आए पिय  की गर चिठ्ठी दुल्हन  का दिल भी रोता है॥

                             (तीन) 


       नई पीढ़ी नए साँचों   में ढलना चाहती है,
       हवाओं के इशारों पर मचलना चाहती है ।
       क्लबों की संस्कृति में डूब कर आनंद  लेने को,
       नए साजों,नई धुन पर थिरकना चाहती है॥

                              (चार)


         इसे, कैसे बताएं कि किसी से प्यार होता क्यों?
       छलकता प्रेम आंखों से फिर आसूं क्षार  होता क्यों?
       प्यार और पीर का संबंध ये कैसा अज़ब देखो ,
       समंदर से ही मिल कर के नदी को खुमार होता क्यों?

          डॉ रमा द्विवेदी 


           102 ,Imperial Manor Apartment
           Begumpet ,Hyderabad -500016 (A.P.)
           Ph.040- 23404051
           (M) 09849021742




डॉ रमा द्विवेदी 



  • डॉ रमा द्विवेदी का जन्म 1 जुलाई 1953 में हुआ । हिंदी में पी एच डी हैं तथा अवकाश प्राप्त व्याख्याता है । दे दो आकाश ,रेत का समंदर तथा साँसों की सरगम  तीन काव्यसंग्रह प्रकाशित तथा `भाव कलश 'ताँका संकलन ,`यादों के पाखी ' हाइकु संकलन ,`आधी आबादी का आकाश ' हाइकु संकलन ,`शब्दों के अरण्य में ' कविता संकलन ,`हिन्दी हाइगा ' हाइकु संकलन ,`सरस्वती सुमन' 'विशेषांक क्षणिकाएँ संकलन ,`अभिनव इमरोज' हाइकु संकलन में रचनाएँ संकलित हैं । `पुष्पक 'साहित्यिक पत्रिका की संपादक तथा साहित्य गरिमा पुरस्कार समिति की महासचिव है । दूर दर्शन हैदराबाद  से काव्य पाठ एवं आकाश वाणी से रचनाएँ प्रसारित । राष्ट्रीय -अंतरराष्ट्रीय मंचों से काव्य पाठ । साहित्य गरिमा पुरस्कार,परिकल्पना काव्य सम्मान  एवं अन्य कई सम्मानो से सम्मानित । अंतरजाल और देश -विदेश की  पत्र -पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित । कविता कोश में रचनाएँ संकलित । साहित्य की कई  विधाओं में लेखन । सर्वे में चयनित -`द सन्डे इंडियंस' साप्ताहिक पत्रिका के  111 श्रेष्ठ महिला लेखिकाओं में चयनित। 
  • kavitakosh:www.kavitakosh.org/ramadwivedi  
  • email :ramadwivedi53@gmail.com 
  • Blog :http://ramadwivedi.wordpress.com