कमला कृति

मंगलवार, 15 मार्च 2016

आशा पाण्डेय ओझा के दस मुक्तक


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार



(एक)

बनो रहबर दिखा दो राह मुझको।
अधिक की फिर नहीं हो चाह मुझको।
दुआ हर साँस में शामिल रहे यूँ,
न पीड़ित की लगे फिर आह मुझको।


(दो) 

सज़ा देना भले मुझको जुर्म भी पर बता देना ।
दिलों में फर्क जो लाए अहसास वो मिटा देना ।
कभी जो घेर ले मुझको उदासी से भरे साये,
निगाहें डाल कर मुझपे उदासी तुम मिटा देना ।


(तीन) 

अंदर बाहर आग लगी है ,घर चौबारे सुलग रहे।
ये हालात सुधारें कैसे ,कैसे कोई विलग रहे।
टुकड़ा-टुकड़ा टूटा भारत ,टूटी उसकी ताक़त भी,
जांत-धर्म के झगड़े में क्यों,भाई-भाई अलग रहे।


(चार) 

कौन ऐसे पुकार लेता है।
जब भी बिखरूं सँवार लेता है।
बेटियों का ज़रा सा हंसना भी,
ग़म की ज़द से उबार लेता है।


(पांच) 

प्रेम की बहती नदी तुम त्याग की तस्वीर हो ।
दया करुणा में डूबी आँख का ज्यों नीर हो ।
सीधी सादी सरल तुम छल कपट से दूर हो,
पर नहीं अबला हो तुम,तुम शत्रु को समशीर हो ।


(छह)

सुलगता देख हर मंज़र,चमन ये काँप जाता है ।
हर इक शै को तजुरबे का तराजू नाप जाता है
छुपाओ लाख बातों को या परदे भी कई डालो,
अगर अनबन हो बेटों में,तो वालिद भांप जाता है ।


(सात)

खून के आंसू रुलाता है कोई ।
क्यूँ मुझे इतना सताता है कोई ।
रूह में इक बूंद बनकर प्यार की,
धड़कनों में उतर जाता है कोई ।


(आठ)

सबको समय ने अपनी ज़द में फँसा के मारा
इसको उठा के मारा,उसको गिरा के मारा
ऐ ज़िन्दगी तिरा भी अंदाज़ है निराला
इसको हंसा के मारा उसको रुला के मारा आशा


(नौ)

भले कश्ती हो छोटी पर समन्दर नाप लेती है।
नज़र की ओढ़नी भी लाज घर की ढांप लेती है।
फ़रेबी बच नहीं सकता कभी मेरी निगाहों से,
खरी है या नज़र खोटी ये आशा भांप लेती है।


(दस)

इसको हँसा के मारा उसको रुला के मारा।
सबको समय ने अपनी ज़द में फंसा के मारा।
आँखें हैं पानी-पानी दिल भी धुआँ-धुआँ है,
मन की तपिश ने कैसे सबको जला के मारा।


आशा पाण्डेय ओझा


c/o जितेन्द्र पाण्डेय
उपजिला कलक्टर,
पिण्डवाडा-307022
जिला सिरोही, राजस्थान
मो. 07597199995
ईमेल: asha09.pandey@gmail.com

पुस्तक समीक्षा: कोई रोता है मेरे भीतर-आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'




                               जीने की लालसा उत्पन्न करती कवितायें 


कविता और ज़िन्दगी का नाता सूरज और धूप का सा है। सूरज ऊगे या डूबे, धूप साथ होती है। इसी तरह मनुष्य का मन सुख अनुभव करे या दुख अभिव्यक्ति कविता के माध्यम से हो होती है। मनुष्येतर पशु-पक्षी भी अपनी अनुभूतियों को ध्वनि के माध्यम से व्यक्त करते हैं। ऐसी ही एक ध्वनि आदिकवि वाल्मीकि की प्रथम काव्याभिव्यक्ति का कारण बनी। कहा जाता हैं ग़ज़ल की उत्पत्ति भी हिरणी के आर्तनाद से हुई। आलोक जी के मन का क्रौंच पक्षी या हिरण जब-जब आदमी को त्रस्त होते देखता है, जब-जब विसंगतियों से दो-चार होता है, विडम्बनाओं को पुरअसर होते देखता तब-तब अपनी संवेदना को शब्द में ढाल कर प्रस्तुत कर देता है।

कोई रोता है मेरे भीतर ५८ वर्षीय कवि आलोक वर्मा की ६१ यथार्थपरक कविताओं का पठनीय संग्रह है। इन कविताओं का वैशिष्ट्य परिवेश को मूर्तित कर पाना है। पाठक जैसे-जैसे कविता पढ़ता जाता है उसके मानस में संबंधित व्यक्ति, परिस्थिति और परिवेश अंकित होता जाता है। पाठक कवि की अभिव्यक्ति से जुड़ पाता है। 'लोग देखेंगे' शीर्षक कविता में कवि परोक्षत: इंगित करता है की वह कविता को कहाँ से ग्रहण करता है-

शायद कभी कविता आएगी / हमारे पास 
जब हम भाग रहे होंगे सड़कों पर / और लिखी नहीं जाएगी 
शायद कभी कविता आएगी / हमारे पास 
जब हमारे हाथों में / दोस्त का हाथ होगा 
या हम अकेले / तेज बुखार में तप रहे होंगे / और लिखी नहीं जाएगी

दैनंदिन जीवन की सामान्य सी प्रतीत होती परिस्थितियाँ, घटनाएँ और व्यक्ति ही आलोक जी की कविताओं का उत्स हैं। इसलिए इन कविताओं में आम आदमी का जीवन स्पंदित होता है। अनवर मियाँ, बस्तर २०१०, फुटपाथ पर, हम साधारण, यह इस पृथ्वी का नन्हा है आदि कविताओं में यह आदमी विविध स्थितियों से दो-चार होता पर अपनी आशा नहीं छोड़ता। यह आशा उसे मौत के मुँह में भी जिन्दा रहने, लड़ने और जितने का हौसला देती है। 'सब ठीक हो जायेगा' शीर्षक कविता आम भारतीय को शब्दित करती है -

सुदूर अबूझमाड़ का / अनपढ़ गरीब बूढ़ा 
बैठा अकेला महुआ के घने पेड़ के नीचे 
बुदबुदाता है धीरे-धीरे / सब ठीक हो जायेगा एक दिन 

यह आशा काम ढूंढने शहर के अँधेरे फुथपाथ पर भटके, अस्पताल में कराहे या झुग्गी में पिटे, कैसा भी भयावह समय हो कभी नहीं मरती। समाज में जो घटता है उस देखता-भोगता तो हर शख्स है पर हर शख्स कवि नहीं हो सकता। कवि होने के लिए आँख और कान होना मात्र पर्याप्त नहीं। उनका खुला होना जरूरी है- 

जिनके पास खुली आँखें हैं / और जो वाकई देखते हैं.... 
... जिनके पास कान हैं / और जो वाकई सुनते हैं 
सिर्फ वे ही सुन सकते हैं / इस अथाह घुप्प अँधेरे में 
अनवरत उभरती-डूबती / यह रोने की आर्त पुकार।
'एक कप चाय' को हर आदमी जीता है पर कविता में ढाल नहीं पाता- 
अक्सर सुबह तुम नींद में डूबी होगी / और मैं बनाऊंगा चाय 
सुनते ही मेरी आवाज़ / उठोगी तुम मुस्कुराते हुए 
देखते ही चाय कहोगी / 'फिर बना दी चाय' 
करते कुछ बातें / हम लेंगे धीरे-धीरे / चाय की चुस्कियाँ 
घुला रहेगा प्रेम सदा / इस जीवन में इसी तरह 
दूध में शक्कर सा / और छिपा रहेगा 
फिर झलकेगा अनायास कभी भी 
धूमकेतु सा चमकते और मुझे जिलाते 
कि तुम्हें देखने मुस्कुराते / मैं बनाना चाहूँगा / ज़िंदगी भर यह चाय 
यूं देखे तो / कुछ भी नहीं है 
पर सोचें तो / बहुत कुछ है / यह एक कप चाय

अनुभूति को पकड़ने और अभिव्यक्त करने की यह सादगी, सरलता, अकृत्रिमता और अपनापन आलोक जी की कविताओं की पहचान हैं। इन्हें पढ़ना मात्र पर्याप्त नहीं है। इनमें डूबना पाठक को जिए क्षणों को जीना सिखाता है। जीकर भी न जिए गए क्षणों को उद्घाटित कर फिर जीने की लालसा उत्पन्न करती ये कवितायें संवेदनशील मनुष्य की प्रतीति करती है जो आज के अस्त-वस्त-संत्रस्त यांत्रिक-भौतिक युग की पहली जरूरत है।

पुस्तक- कोई रोता है मेरे भीतर,कविता संग्रह-आलोक वर्मा,
वर्ष २०१५, ISBN ९७८-९३-८५९४२-०७-५,आकार डिमाई,
आवरण, बहुरंगी, पेपरबैक, पृष्ठ १२०, मूल्य १००/-,
बोधि प्रकाशन, ऍफ़ ७७ सेक्टर ९, पथ ११, करतारपुरा
औद्योगिक क्षेत्र, बाईस गोदाम, जयपुर-३०२००६, 


आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' 


समन्वयम,
२०४-विजय अपार्टमेंट,
नेपियर टाउन जबलपुर ४८२००१,
मो. ९४२५१८३२४४, 
ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

परिक्रमा-बीकानेर में विश्व सोशल मीडिया मैत्री सम्मेलन ने जमाया रंग




विगत दिनों जब देश के कोने-कोने और विभिन्न अन्य देशों की सोशल मीडिया से जुड़ी विभिन्न विधाओं की सौ के करीब प्रतिभायें बीकानेर में एक मंच पर इकट्ठा हुईं और उन्होंने अपनी प्रतिभाआं के जौ़हर दिखाये तो सच् एक रिकार्ड ही बन गया। जी हां, हम सब साथ साथ, नई दिल्ली के तत्वावधान में और स्थानीय संस्थाओं; साहित्यिक-सामाजिक संस्था, बीकाणा आईटीआई तथा हिन्दी साहित्य मंथन आदि के सहयोग से राजस्थान के बीकानेर में 5 और 6 मार्च को चैथा सोशल मीडिया मैत्री सम्मेलन व सम्मान समारोह स्थानीय रेल्वे प्रेक्षागृह में समारोहपूर्वक आयोजित हुआ। इसमें फेसबुक, व्हाट्सएप, ट्वीटर आदि जैसी आभाषी कही जाने वाली सोशल साइट्स की सैकड़ों प्रतिभायें न केवल पहली बार एक-दूसरे से रूबरू हुईं अपितु एक प्लेटफार्म पर पहली बार इकट्ठा होकर उन्होंने मैत्री-भाईचारे का एक इतिहास भी रचा। उनकी प्रतिभाओं ने सैकड़ों लोगों को उंगली दबाने पर भी मज़बूर किया। 

मैत्री-भाईचारे के पैग़ाम के साथ शुरू हुए दो दिन के इस सम्मेलन के विभिन्न सत्रों में मैत्री-भाईचारे के प्रचार-प्रसार में सोशल मीडिया की भूमिका, कन्या भ्रूण हत्या, लिव इन रिलेशनशिप पर परिचर्चा के अलावा दो सत्रों में कवि सम्मेलन, मनोहारी सांस्कृतिक कार्यक्रम, पुस्तकों का विमोचन और चित्र, फोटो तथा कार्टून प्रदर्शनी का भी आयोजन किया गया। इस सम्मेलन में देश के विभिन्न दूर-दराज के प्रान्तों सहित नेपाल, कनाडा और यूके से एक प्रतियोगिता के जरिये चुन कर आई फेसबुक, व्हाट्सएप और ट्वीटर आदि सामाजिक साइट्स की आभाषी दुनिया की साहित्य, संगीत, नृत्य और कला क्षेत्रों की सौ के करीब प्रतिभाओं ने अपनी विभिन्न कलाओं के प्रदर्शन से उपस्थित जन समुदाय को मंत्र मुग्ध कर दिया। 


पहले दिन कला प्रदर्शनी का उद्घाटन प्रसिद्ध चित्रकार मुरली मनोहर माथुर और कनाडा से पधारे हिन्दी विद्वान सरन घई द्वारा किया गया जिसमें विवेक मित्तल (बीकानेर) एवं संगीता राज (दिल्ली) के चित्र, मीता रॉय (गाजियाबाद) एवं सृष्टि सिन्हा (झांसी) के कार्टून्स, प्रदीप आर्यन (दिल्ली) के फोटो और हर्षित सिंह (लखनऊ) के हस्त शिल्प का प्रदर्शन किया गया। तत्पश्चात् उद्घाटन सत्र की शुरूआत दिल्ली से पधारीं सुषमा भण्डारी ने अपने मधुर कंठ से कर्ण प्रिय राजस्थानी सरस्वती वंदना गाकर की। वन्दना के बाद सम्मेलन के राष्ट्रीय संयोजक श्री किशोर श्रीवास्तव (दिल्ली) व उनकी टीम (शाह आलम, किरन बाला, शशि श्रीवास्तव, मीता राय एवं सरिता भाटिया) ने ‘इंसान का इंसान से हो भाईचारा, यही पैगाम हमारा’ गीत सुनाकर आपस में मिलजुल कर रहने का संदेश देकर सभी आगंतुकों को भाव विभोर कर दिया। प्रथम सत्र के मुख्य और विशिष्ट अतिथि थे भाजपा नेता नंदकिशोर सोलंकी, राजस्थानी अकादमी के पूर्व अध्यक्ष सत्य प्रकाश आचार्य व उद्योगपति के.बी. गुप्ता। उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता कनाडा से पधारे सरन घई ने की, जबकि स्वागताध्यक्ष बीकानेर के मुख्य आयोजनकर्ता गोवर्धन चैमाल थे। 


सभी अतिथियों ने अपने उद्बोधन में भाईचारे और मैत्री के इस सम्मेलन की भूरि-भूरि प्रशंसा की। सत्र का बेहतरीन मंच संचालन संजय पुरोहित ने किया। प्रथम सत्र में ही सभी प्रतिभागियों का परिचय उन्हें बार-बारी से मंच पर आमंत्रित करते हुए श्री किशोर श्रीवास्तव ने कराया। इस अवसर पर मुंबई की प्रतिभागी लता तेजेश्वर की अंग्रेजी पुस्तक ‘वेव्स आॅफ लाइफ’ और किशोर श्रीवास्तव के कहानी संग्रह ‘कही-अनकही’ का विमोचन भी माननीय अतिथियों द्वारा किया गया। ‘मैत्री-भाईचारे के प्रचार-प्रसार में सोशल मीडिया की भूमिका’ और सोशल मीडिया के खट्टे-मीठे अनुभवों पर आधारित सम्मेलन के परिचर्चा सत्र में मुख्य अतिथि कमल रंगा, विशिष्ट अतिथि गार्गी राय चैधरी रहीं तथा अध्यक्षता मालचंद तिवाऱी ने की। परिचर्चा सत्र में अपने विचारों की गंगा बहाने वालों में शामिल थे; अमित साकिरवाल (लखनऊ), रायपुर से अमृता शुक्ला, बीकानेर से डॉ. अजय जोशी, विवेक मित्तल, सीमा भाटी, डॉ. पंकज जोशी, नीलिमा शर्मा, अपूर्वा चैमाल, दिल्ली से किरण बाला, सुरभि सप्रू, विपनेश माथुर, किरण आर्य, श्रीगंगानगर से दीपक अरोड़ा, चित्रकूट से पियूष द्विवेदी, सहारनपुर से ऊंची उड़ान पत्रिका के संपादक पवन शर्मा, गौर (नेपाल) से प्रभा सिंह, देहरादून से राहुल वर्मा, नोएडा से सोमा बिश्वास, अयोध्या से शाह आलम, जयपुर से सुरेश शर्मा, बारांबकी से सुमन श्रीवास्तव, शाहजहांपुर से डा. देशबन्धु आदि। इस सत्र में स्वागताध्यक्ष सुधीर सिंह सुधाकर थे और बेहतरीन मंच संचालन श्री नासिर जैदी ने किया। 


सायंकालीन सत्र में भव्य सांस्कृतिक संध्या का आयोजन किया गया, जिसका कुशल मंच संचालन सुशील कौशिक (बीकानेर) एवं अनुपमा श्रीवास्तव (भोपाल) ने संयुक्त रूप से किया। इस सत्र की मुख्य अतिथि अल्का डॉली पाठक थीं। नृत्य के क्षेत्र में सिक्किम के गंगतोक से पधारी प्रतिभाशाली बाल प्रतिभागी कु. अस्मिता शर्मा एवं दिल्ली की कु. वन्या कंचन सिंह सहित रांची से पधारी युवा कलाकार संदीपिका राय ने अपने खूबसूरत कला प्रदर्शन से उपस्थितजनों को मंत्र मुग्ध करते हुए दांतों तले उंगली दबाने पर मजबूर कर दिया। इसी प्रकार से गायन में हल्द्वानी से गौरी मिश्रा, श्रीगंगानगर से दीपक अरोड़ा, गाजियाबाद से मीता रॉय, भीलवाड़ा से निरंजन नीर, दिल्ली से पारूल रस्तोगी सहित बीकानेर से डॉ. मोहम्मद इकबाल, ओमप्रकाश सोनी, हसन अली, पवन सोनी और सुमधुर गायिका लता तिवारी ने अपने गीतों से उपस्थितजनों का खूब मनोरंजन किया। सांस्कृतिक कार्यक्रम के दौरान ही किशोर श्रीवास्तव की गीतों और हास्य भरी मिमिक्री ने न केवल श्रोताओं को झूमने पर मजबूर किया अपितु हंसा-हंसा कर लोटपोट भी किया। तबले पर लाजवाब संगत की चुरू से पधारे प्रतिभागी राजेन्द्र शर्मा ने।


रात्रिकालीन सत्र में कवि सम्मेलन (पार्ट एक) का आयोजन किया गया, जिसका मंच संचालन बीकानेर के संजय आचार्य तथा आबू रोड पिण्डवाड़ा से पधारीं आशा पाण्डेय ओझा ने संयुक्त रूप से  अत्यन्त सलीके से किया। कवि सम्मेलन में मुख्य अतिथि मो. हनीफ ‘शमीम’ बीकानेरी, विशिष्ट अतिथि इंजी. आशा शर्मा (बीकारनेर) और हरकीरत हीर (गुवाहटी) थीं। इस सत्र की अध्यक्षता कोटा से पधारे वरिष्ठ कवि रघुनाथ प्रसाद मिश्र ‘सहज’ ने की। कवि सम्मेलन में बीकानेर से जाकिर अदीब, आनंद आचार्य, बुनियाद ज़हीन, राजेन्द्र स्वर्णकार, मीनाक्षी स्वर्णकार, बाबूलाल छंगाणी, इरशाद अजीज, मनीषा आर्य,; फरीदाबाद से अजय अज्ञात, चुरू से राजेन्द्र शर्मा, दिल्ली से शुभदा वाजपेयी, सुषमा भण्डारी व नेहा नाहटा, गुवाहटी से चंद्र प्रकाश पोद्दार, जयपुर से विनीता सुराना आदि सहित संचालक द्वय व मंचस्थ अतिथियों ने भी काव्य पाठ किया और खूब वाहवाही लूटी। 


दूसरे और अंतिम दिन 6 मार्च को सम्मेलन की शुरूआत दो ज्वलंत विषयों पर परिचर्चा के साथ हुई, विषय थे- कन्या भ्रूण हत्या व लिव इन रिलेशनशिप। चर्चा के लिए खुला मंच था, जिसमें अनेक प्रतिभागियों ने इन विषयों पर विस्तृत चर्चा की। शशि श्रीवास्तव, नेहा नाहटा व किरण बाला ने इस सत्र का मंच संचालन संयुक्त रूप से किया। इस सत्र के मुख्य अतिथि धर्मचंद जैन, विशिष्ट अतिथि, कमान्डर (डॉ) प्रेम दास निगम, श्याम स्नेही व अतुल प्रभाकर थे तथा अध्यक्षता मुरली मनोहर के माथुर ने की। इस सत्र में अतिथियों ने भी अपने विचार रखे। इसके बाद कवि सम्मेलन का दूसरा सत्र आरम्भ हुआ, जिसकी अध्यक्षता यूके से पधारी शील निगम ने की। मुख्य अतिथि थे भवानी शंकर व्यास व विशिष्ट अतिथि उषा किरण सोनी थीं। मंच संचालन नमिता राकेश व अरविंद पथिक ने संयुक्त रूप से किया। कवि सम्मेलन के इस सत्र में दिल्ली से बादल चैधरी, सुधीर सिंह, संजय शाफ़ी, नरेश मलिक, सरिता भाटिया, शाहजहांपुर से देशबंधु, चम्पावत से कैलाश चंद्र जोशी, मुंबई से लता तेजेश्वर, नौएडा से सीमा गुप्ता शारदा, लखनऊ से निवेदिता श्रीवास्तव, राहुल द्विवेदी, सीकर से निर्मला मुस्कान बरवड़, ग्वालियर से पियूष चतुर्वेदी, वारासिवनी से प्रीति सुराना, राहुल द्विवेदी, मुंबई से लता तेजेश्वर, सरोज लोढाया, गुड़गांव से श्याम स्नेही, कंचनपुर (नेपाल) से सरिता पंथी, तेजपुर (असम) से सरिता शर्मा, भिवानी से डा. अनीता भारद्वाज, बीकानेर से मोनिका गौड़, कासिम बीकानेरी, सरदार अली पडि़हार, गोविंद नारायण, अब्दुल वाहिद अशरफी, कृष्णा आचार्य, गजेन्द्र सिंह राजपुरोहित और बड़ोदरा से वीरेन्द्र सिंह, बारासिवनी से प्रीति समकित सुराना, ग्वालियर से पियूष चतुर्वेदी, आदि प्रतिभागियों ने अपने बेहतरीन काव्य पाठ से लोगों को बार बार तालियां बजाने पर मजबूर किया। 


सम्मेलन का सबसे भावुक क्षण समापन सत्र का रहा, जब चैथे सोशल मीडिया मैत्री सम्मेलन के चयनित

प्रतिभागियों को सम्मानित किये जाने के साथ ही उनकी बिदाई का समय आया। पुरस्कार वितरण समारोह का संचालन करते हुए प्रतिभागियों के महत्व और उनकी खूबियों को दर्शाने वाली काव्य पंक्तियों से सत्र के संयोजक, संचालक किशोर श्रीवास्तव ने माहौल को और भी अधिक रोचक और भाव विभोर कर दिया। समापन सत्र की अध्यक्षता लक्ष्मीनारायण रंगा ने की, जबकि मुख्य अतिथि व विशिष्ट अतिथि क्रमशः भवानीशंकर शर्मा, नेमचंद गहलोत व अल्का डॉली पाठक रहीं। प्रतिभागियों का अंग वस्त्र पहनाकर स्वागत करते हुए उन्हें स्मृति चिन्ह, प्रमाण पत्र व पुरस्कार स्वरूप बहुमूल्य किताबों का सेट भेंट किया गया। पूरे सम्मेलन की बेहतरीन फोटोग्राफी के लिये विशाल आर्यन व वीडियोग्राफी के लिये वैशाली आर्यन को भी सम्मानित किया गया। 

इस अवसर पर अतिथियों और अध्यक्ष ने समूचे आयोजन की मुक्त कंठ से सराहना करते हुए न केवल मैत्री-भाईचारे की इस भावना की प्रशंसा की अपितु इसे बीकानेर की धरती को भी गौरवान्वित करने वाला पल बताया। सभी ने ऐसे आयोजन की महत्ता पर भी बल दिया। अंत में सम्मेलन की ओर से स्थानीय संयोजक गोवर्धन लाल और राजाराम स्वर्णकार ने सभी प्रतिभागियों और सहयोगियों के प्रति आभार व्यक्त किया। कुल मिलाकर एक शानदार कार्यक्रम का अत्यन्त खुशनुमा माहौल में न केवल आगाज़ हुआ अपितु समापन भी उसी अंदाज़ में हुआ। सम्मेलन में पारम्परिक जलपान, भोजन के अलावा राजस्थानी मेहमाननवाज़ी का भी बेजोड़ नमूना देखने को मिला जहां बीकानेर से स्थानीय संयोजक गोवर्धन लाल चैमाल, राजाराम स्वर्णकार, विनोद धानुका, आशा शर्मा, मुनीन्द्र अग्निहोत्री, क़ासिम बीकानेरी और अनिल मिश्रा आदि सहित दिल्ली से पधारे राष्ट्रीय संयोजक किशोर श्रीवास्तव और शशि श्रीवास्तव आदि की टीम ढेर सारे मेहमानों की पल पल की खबर रखते हुए उनका बराबर ख़्याल रखे रही। और उनके हर सुख-दुख में बराबर के शरीक रहे। 


सम्मेलन का मुख्य आकर्षण सभी प्रतिभागियों का बड़ा सा पोस्टर कोलाज़ भी रहा जहां, दोनों दिन विभिन्न अंदाज़ों में फोटो खिंचवाने और मीडिया को इंटरव्यू देने वालों का कुछ इस तरह से जमावड़ा लगा रहा मानों वह कोई ऐतिहासिक पर्यटन केंद्र हो। अपने तरह के इस पहले और अनूठे सम्मेलन के ज़रिये आभाषी दुनिया से जुड़े सैकड़ों व्यक्ति पहली बार समूचे विश्व का प्रतिनिधित्व करते हुए आपस में एक दूसरे से, उनकी प्रतिभाओं से तो रूबरू हुए ही; दो दिन साथ-साथ रहने से पुरानी दोस्ती भी और प्रगाढ़ हुई और अनेक नये मित्र भी बने। जाते-जाते सभी अपने साथ अनेक मीठी-मीठी यादें भी समेटे हुए ले गये। सबने माना कि ऐसे कार्यक्रमों की समूचे विश्व में आवश्यकता है और इन सम्मेलनों से दोस्ती मात्र औपचारिकता बनकर नहीं रह जाती, बल्कि आपसी प्रेम, भाईचारा, सोहार्द की भावना का भी खूब विकास होता है, जो आज कुछ लोगों के अलगाववाद और वैमनस्य फैलाने वाले माहौल में निहायत ज़रूरी भी हैं।


-रिपोर्टः शशि श्रीवास्तव


संपादक, (हम सब साथ साथ),
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मंगलवार, 8 मार्च 2016

मंजुल भटनागर की रचनाएं


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


फागुन



फागुन द्वार चार है
आम्र बौर मंजीरा लिए
पत्तों की खड़ ताल है
फागुन द्वार चार है

पीत रंग की ओढ़नी
हरित रंग का घाघरा
धरा का शृंगार है
फागुन द्वार चार है

कोयल कूक रही
शहनाई सा आभास है
राधा सी पगलाई नार
द्वारिका प्रवास है
फागुन द्वार चार है

लतिका विरह उच्छवास
गोपियों संग रास है
लग गई फांस है
गोपियों संग रास है
फागुन द्वार चार है


निमंत्रण



होली की सुगबुगाहट है
पेड़ों ने की खुसर पुसर है
पक्षियों संग विमर्श है
पत्ते खत सा निमंत्रण हैं.

टेसू ,बोगन विला रंग भरे
द्वार फैले,छाँव फैले
रंग फैले रहा अबीर सा
खुशबुओं के पाँव फैले
प्रकृति में आकर्षण है
पत्ते खत सा निमंत्रण है

अंतर्मन प्रतीक्षा है
बावरी उत्सुकता है
कोई उम्मीद जग रही
कोपले रस ले पगी
दे रही आमंत्रण है
पत्ते खत सा निमंत्रण है

हाट सजे बाग़ सजे
पलाश हरसिंगार सजे
सूर्य रथ चल पड़ा
हाक रहे श्री कृष्ण हैं
गोपियाँ मुग्ध हैं
उधो की न सुनें
प्रेम प्रीत हर्षन  है
पत्ते खत सा निमंत्रण है .


यादो के पनघट


रंग उड़े बादल से
सज रहे अबीर संग
आँगन द्वार रंग गए
यादों के पनघट
सज गए .

गाँव छोड़, शहर गए
खेत बेच दो मंजिला भये
खलियान बेरंगत हुए
देख मन रुसवा हुए
यादों के पनघट
सज गए .

कृष्ण संग गोपियाँ रंगी
रधिया अपटूडेट लगी
दुलेंडी के गीत गवे
कचौरी और गुजिया बनी
शगुन की घुटी भाँग

सुन मनवा भी मोद भए
यादों के पनघट
सज गए .

होलिका जली चौराहे पे
नाना भूंज लाये बूटवा
हल्दी लगी चूनर उड़े
फाग मंजिरें ढोलक बजे
आंखियन पोर रेशमी हुए
यादों के पनघट
सज गए . 

मंजुल भटनागर


0/503, तीसरी मंजिल, Tarapor टावर्स
नई लिंक रोड, ओशिवारा
अंधेरी पश्चिम, मुंबई 53।
फोन -09892601105
022-42646045,022-26311877।
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पुस्तक समीक्षा-शहरी जीवन की व्यंग्य अभिव्यक्ति: कौआ कान ले गया




                              संवेदना, संवाद और यथार्थ का चित्रण


            विवेक रंजन श्रीवास्तव का व्यंग्य संग्रह 90 के दशक के बदलते रंग-ढंग, रहन-सहन या उपभोगतावादी संस्कृति में तबदील होती नई पीढ़ी की दशा का सीधा-सरल किन्तु प्रभावशाली व्यंग्यात्मक विवरण प्रस्तुत करता है. इसमें वैश्वीकरण, उदारीकरण और निजीकरण के कारण देश में उस विकास की प्रक्रिया को समझने का मौका मिलेगा जिसमें आम आदमी की जेब देखी जाती है आदमी नहीं.

         मोबाईल कम्पनियाँ उपभोगता को किस प्रकार प्रभावित करती हैं यह देखने लायक होता है. सैंकड़ों ऑफर उपभोगता को दिग्भ्रमित करते हैं- “मैंने पाया कि हर प्लान दूसरे प्लान से भिन्न है और चयन की यह प्रणाली कारगर नहीं है. हर विज्ञापन दूसरे से ज्यादा लुभावना है. मैं किंकर्तव्यविमूढ़ था. ऐसे सैंकड़ों विल्कपों वाले आकर्षक प्लान के निर्माताओं, नव युवा एम.बी.ए. पास, मार्केटिंग मैनेजर की योग्यता का में कायल हो गया था. उपभोगता की चेतना का निर्माण सिर्फ मोबाईल कम्पनियाँ ही नहीं करती बल्कि आज की मीडिया भी आम जनमानस को मुद्दों से दूर कर रही है. किडनी चोर की खबर को चैनल पर ‘सबसे पहले’ ब्रेकिंग न्यूज बना दिया जाता है. इस पर विवेक रंजन का व्यंग देखिए और व्यंग की मार- “मैं मीडिया की तत्परता से अभिभूत हूँ. आशा है ऐसे प्रेरणादायी समाचार से देश के बेरोजगार युवक, बीमार अमीर लोगों हेतु किडनी जुटाने की इस नये व्यवसाय को अपनाने के सेवा कार्य में अपने लिए रोजी-रोटी की तलाश की सम्भावना का अध्ययन अवश्य ही करेंगे.

           आज के तथाकथित संसदीय नेताओं का ही नहीं छुटभैया नेताओं का चरित्र-चित्रण इस व्यंग में बखूबी दिखाया गया है. “स्थानीय नेता जी हर चुनाव से पहले फाटक की जगह ओवरब्रिज का सपना दिखा कर वोट पा जाते हैं. लोकल अख़बार को गाहे बगाहे फाटक पर कोई एक्सीडेंट हो जाये तो सुर्खियाँ मिल जाती हैं. आज देश में अस्मिता की राजनीति हो रही है. आरक्षण की माँग अब दलित, महादलित या गरीब ही नहीं वे जातियाँ भी कर रही हैं जो धन-सत्ता में पहले से ही सम्पन्न हैं. विवेक ने इस सत्ता लोभी राजनीतिक चालबाजी को अपने व्यंग में जगह देकर अच्छे-अच्छे की बोलती बंद कर दी है. “मेरा अभिमत है कि समाज के प्रत्येक वर्ग को अनुसन्धान कर स्वयं को सबसे ज्यादा पिछड़ा सिद्ध करने के लिए तथ्य जुटा कर ठीक चुनाव से पहले अभूतपूर्व आन्दोलन कर दलित, पतित, पिछड़ा, अनुसूचित जनजातीय वगैरह घोषित करवा लेना चाहिए.
भारत का अघोषित राष्ट्रीय खेल क्रिकेट अब बाजार के हवाले है. खिलाड़ी बिके और देश की जगह अब कम्पनी के लिए खेलना मतलब सिर्फ पैसा ही सब कुछ है. व्यंगकार विवेक लिखते हैं “इस हमाम में सब नंगे हैं, वरना बिकते तो पहले भी थे. लेकिन आज इनकी बोली लगाने का मूल्यांकन ठीक नहीं. खिलाड़ियों से देशवासियों का भावात्मक लगाव के कारण इस खेल को देखने में लगने वाले समय की कीमत भी उन्हें मिलनी चाहिए.

       आभासी दुनिया लोगों के व्यक्तित्व निर्माण में अहम्, मैं, घमंड व्यक्तिवाद जैसी प्रवृत्तियों को भी जन्म दे रही है. नाना प्रकार की वर्चुअली दिमागी बीमारी धीरे-धीरे नव साहित्यकारों को अपनी गिरफ्त में ले रही है. विवेक ने इंटरनेट की नब्ज को बड़ी ही सूक्ष्मता से पहचाना है- “मैं हर सुबह उत्साहपूर्वक माउस क्लिक करता हूँ, मुझे आशा होती है कि कुछ सम्पादकों के स्वीकृति पत्र होंगे, और जल्द ही मैं एक ख्याति लब्ध व्यंगकार बन जाऊँगा, पत्र-पत्रिकाएँ मुझसे भी अवसर विशेष के लिए रचनाओं की माँग करेंगी. देश के कुछ लोग बौद्धिक दिवालियेपन की राह पर चल रहे हैं. वे वीरो, महापुरुषों और ईश्वर तक को जाति विशष से सम्बन्धित करने की कौशिश में लगे हैं. इतिहास से उन महामानवों को खोजा जा रहा है जो जाति विशेष के खाचे में फिट हो सकें. शायद वे लोग कुछ हदतक सफल भी हुए. और भगवान कृष्ण जो वैश्विक हैं, वे इन दिनों मेरे मोहल्ले के यादव समाज के द्वारा धर लिए गये हैं.

        हिन्दी साहित्य में आत्मकथा का बाज़ार काफी बड़े पैमाने पर फ़ैल रहा है. इससे लेखक, प्रकाशक एवं राजनीति चमकाने वाले भी बहती गंगा में नहाकर पवित्र हो जाते हैं और विवादों से मुनाफा कमाते हैं. आत्मकथाओं के उस तीसरे पन्ने को खोलने की कोशिश व्यंगकार ने बहुत बेबाक तरीके से की है. “ पहले थोड़ा सा खुद को चमकाईये, फिर अपनी डायरी को आधार बनाकर 5-10 वर्षों बाद लिख डालिए आत्मकथा.
आज के दौर में अफवाहों का बाजार गर्म है. वह जोर-शोर के साथ भारतीय पटल पर सामने आया है. इन अफवाहों ने  देश में सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक एवं सांकृतिक एकता को खंडित कर रही है. कौआ कान ले गया बड़ा ही रोचक व्यंग है– “जैसे ही किसी ने कहा कि कौआ कान ले गया भीड़ बिना कान चेक किये ही कान ले जाने के विरोध में धरने, आन्दोलन, प्रदर्शन करती है.

          कहने के लिए तो यह व्यंग संग्रह है लेकिन पढ़ते हुए आपको लगेगा कि यह हमारे सामाजिक, राजनैतिक एवं आर्थिक ताने-बाने की वह गाथा है जो निरंतर बदल रही है और यह परिवर्तन समाज के लिए अच्छे संकेत नहीं. महापुरुषों का निर्माण, अँधेरा कायम रहे, फंदा उलटा बन्दा सीधा जैसी व्यंग रचनाएँ हमारे समय से संवाद करने में हमारी मदद करेंगी. विवेक रंजन ने अपनी व्यंग शैली का निर्माण देशकाल एवं कथा के साथ निरंतर विकसित किया है जिससे उनके व्यंग में संवेदना, संवाद और यथार्थ का जीता जागता चित्रण आसानी से मिल जाता है.

समीक्षक : एम. एम. चन्द्रा


  • कौआ कान ले गया/ विवेक रंजन श्रीवास्तव
  • प्रकाशक: सुकीर्ति प्रकाशन
  • कीमत : 60/ पेज : 96 

सोमवार, 29 फ़रवरी 2016

दौड़ एवं अन्य कविताएं-संजीव ठाकुर


विनोद शाही की कलाकृति


दौड़


वे पहुँच गए वहाँ
जहां उन्हें पहुंचना था
अब वे उससे आगे
पहुँचने की तैयारी में हैं ।
मेरे लिए वहाँ तक
पहुंचना
नामुमकिन तो रहा ही
उस रास्ते का पता भी लापता रहा
मैं देखता रहा सबको
आगे –
और आगे जाते हुये
मैं कर भी क्या सकता था
इसके सिवा ?


मित्र


वे देते रहते थे मुझे
जीने की दुआएं
और कब्रिस्तान के किसी कोने में बैठे
काले कपड़े वाले बाबा से
करवाया करते थे काला जादू
मेरे सर्वनाश के लिए ।
उनकी इस दोगली चाल का
क्या करें ?
भिजवाते थे प्रसाद
वैष्णो देवी का
और मेरे सत्यानाश को
किया करते थे
बगुलामुखी का जाप !


क्या करते होंगे ?


क्या करते होंगे रुपयों का
कुबेर के नाती ?
गद्दों में भरवाते होंगे?
सजाते होंगे चिता
मृतकों को जलाते होंगे
इस्तेमाल करते होंगे
टॉइलेट पेपर की तरह ?
नाक का नेटा पोंछ फेंक देते होंगे ?
सेनेटेरी नैप्किन खरीदने की जहमत से
बच जाती होंगी उनकी स्त्रियाँ ?
फेंक देती होंगी डस्ट्बिन में
खून सनी गड्डियाँ ?
रगड़ती होगी आया
दस की गड्डी से
उनके घरों में बर्तन
और सहलाती होंगी
अपने कुत्ता –मूते नसीब को

मन-ही –मन ?
कितने खुश होते होंगे
कुबेर के वंशज
बाथरूम से निकलकर
रुपयों के पायदान पर
गीली स्लीपर रखकर
खड़े होते वक्त !


ज़िंदगी


आकाश में
घर बनाने की कोशिश
ही तो है यह ज़िंदगी
मुर्दा सम्बन्धों की ईटों को ढोकर
वहाँ तक पहुंचाना
आसान भी तो नहीं ?


संजीव ठाकुर


  • जन्म-1967 (मुंगेर, बिहार)
  • शिक्षा- पीएचडी (दिल्ली विश्वविद्यालय)
  • प्रकाशन-नौटंकी जा रही है फ्रीलान्स  ज़िंदगी, अब आप आली अनवर से, प्रेम सम्बन्धों की कहानियाँ (कहानी –संग्रह), झौवा-बैहार (लघु –उपन्यास), इस साज़ पर गाया नहीं जाता (कविता-संग्रह), बच्चों के लिए पंद्रह किताबें । 
  • संप्रति-स्वतंत्र  लेखन 
  • निवास-सिद्ध विनायक अपार्टमेंट, अभय खंड, इंदरापुरम, गाजियाबाद 
  • संपर्क-0120 4116718 

पुस्तक समीक्षा: आख्यान में बदलते ‘क्षण’ की कविताई-प्रो. राजमणि शर्मा




‘कविता’ क्या है? किसे कहेंगे? यह आज का ऐसा ज्वलंत मुद्दा है जिससे हर एक ‘रचना’/ ‘कलाकार’, ‘रचनाकार’ जूझ रहा है. इसे पारिभाषित करना तब और कठिन है जब परिवेश और परिस्थितियों के चक्रवाती तूफ़ान में मनुष्य को अपनी अस्मिता की तलाश हो और कला को अपने अस्तित्व की रक्षा की चिंता हो. आज तो मनुष्य का सर्वोत्तम, वर्षों की साधना का प्रतिफल उसका ‘मूल्य’ ही छिन्न भिन्न हो रहा है, उसकी सार्थकता पर प्रश्न चिह्न लग रहे हैं, उनके अर्थ बदल रहे हैं. किंतु क्या यहाँ ‘मानवीयता’ या ‘मनुष्य’ जीवित है? नहीं. तभी तो आज का कलाकार, कवि-मन अपने सुंदर को खोजने, संजोने, सँवारने में संलग्न है. वह विकल है – इसकी खोज और प्रतिस्थापना के लिए. किंतु, आज के इस अजनबीपन की गुहा के गहन अंधकार में क्या वह स्वयं विलुप्त होने के करीब नहीं है? तभी तो वह कह उठता है – “ईश्वर,/ गलती हो गई आप से,/ दुनिया बनाई मेरे लिए/ पर गलत नाप की,/ फिट नहीं होती मुझे.” इसके बावजूद, मनुष्य कभी हारा नहीं. वह फिर से स्थापित करेगा, खोजेगा कला का मानदंड, नया मानदंड. यही खोज रचनाकार के जीवन का उद्देश्य है, और है इसी में उसके जीवन की सार्थकता - “कला कई मौतें मर चुकी है./ .../ पर फिर भी जीवित है.” कुमार लव भी यह स्वीकार करते हैं कि “पर गर्भ में ... गुफाओं में .... वहाँ सब बार-बार लिखा जाता है/ कई बार दोहराया जाता है.” यह सच है, स्वीकार्य है किंतु कुमार लव का कथन कि “जन्मती नहीं कविता” विचारणीय है. ‘कविता’ तो मनुष्य की जीवंतता का आधार है, यदि काव्य-संवेदना नहीं तो मनुष्य नहीं. वस्तुतः वह मनुष्य के अंतस में सदा सर्वदा विद्यमान रहती है और प्रतिभा के सहारे वह एकाएक फूट पड़ती है.

कुमार लव (1986) हिंदी-युवा-कवि के रूप में अपने पहले संग्रह ‘गर्भ में’ (2015) के साथ हमारे सामने आते हैं. इस संकलन में उनकी ‘अनुभूति’; विचारधारा, परिस्थिति-परिवेश, संघर्ष, वर्तमान जीवन-जगत के यथार्थ रूपी रसायन में रची-पगी है. इस संग्रह की कविताओं के शीर्षक इस तथ्य के साक्षी हैं कि आज की रचनात्मकता की सार्थकता अपने परिवेश को यथार्थ रूप में अभिव्यक्ति प्रदान करने में ही है. कुमार लव इस कसौटी पर खरे उतरते तो हैं, किंतु कहीं-कहीं शीर्षक अपनी सार्थकता संप्रेषित करने तथा पूरी कविता को बाँधने की दृष्टि से सीमित दिखाई देते हैं. यथा – ‘चार आँखों वाला कुत्ता’. यह टिप्पणी एक सामान्य पाठक की है. हो सकता है कि बौद्धिक ऊँचाई प्राप्त पाठक उनसे तादात्म्य स्थापित कर पाएँ, किंतु कविता तो ‘जन’ के लिए भी होनी चाहिए ताकि वह अपनी बौद्धिक क्षमता के अनुरूप उसे आत्मसात कर सके. फिर भी इस संग्रह में ऐसी कविताओं की भरमार है, जिनमें रागात्मकता अपने चरम उत्कर्ष के साथ खड़ी है, और एक ऐसा बिंब उभरता है जो अंतस को झकझोर देता है. यथा – 

  तुम कहती/ पढ़ लेता हूँ तुम्हेँ/ 
  जान लेता हूँ तुम्हारा मन/ 
  समझ लेता हूँ तुम्हारा दर्द... 
  अब/ हो रहे हम/ दूर फिर से... 
  चाहता हूँ थामना/ तुम्हारा हाथ/
  छूना तुम्हारा मन/ कहना फिर से ... (फिर से – 1) 
  हमारी बातों को/ शब्दों को 
  लग गई है दीमक/ खामोशी की. (फिर से – 2) 

ऐसी ही कविता है – ‘शून्यपाल’. 
रागात्मकता का दूसरा पक्ष दिखाई देता है – ‘द्वंद्वातीत’ में 

  नहा धोकर आया/ 
  तड़पते हुए तुम्हें देखा न गया. ×××
  और तुम्हारी आखिरी साँस के साथ 
  मेरी नींद भी टूट गई. 

सामाजिक विसंगति को लेकर रची गई कविता ‘जोंक’ आज के मनुष्य को अपने असली रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास है. ‘शोषण’ का यह यथार्थ चित्रण हमेशा याद रहेगा. इसी तरह की रचना है – ‘सुश्री आत्म संहार’, ‘किसलिए’ सांप्रदायिकता तथा दोस्तों की असलियत का पर्दाफाश है – 

  छोड़ आए थे उसे अकेला 
  वही सब जिन्हें बचाने को 
  रुका था वह वहाँ./ ...
  मैंने देखा/ अपने सबसे करीबी दोस्त को/ टूटते हुए/ ...
  उसकी पहचान के कारण/ उसका ईमान मुसल्लिम होने के कारण. 

वस्तुतः यह आज का मानवीय संकट है, संबंध या दोस्त आज बेमानी हो गए हैं. ‘घृणातीत’ भी इसी प्रकार की रचना है. यहाँ मानवीय संवेदनाएँ मर ही नहीं रही हैं, इससे आतंक का माहौल भी पैदा किया जा रहा है – 

  पर उसकी सड़ती लाश/ आतंकित नहीं करती मुझे,/
  उस पर रेंगते कीड़ों से/ घृणा नहीं होती मुझे./... 
  धर्म से प्यार/ और सत्य से नफ़रत -/ 
  इनका नशा/ और खुले मुँह -/ इनकी भूख 
  और इनकी खुराक/ भर देती है मुझे/ 
  आतंक से. 

निश्चय ही ‘घृणातीत’ मेरी अपनी दृष्टि में एक ऐसी रचना है जो मानवीय यथार्थ से भरपूर और संप्रेषणीयता के माध्यम से संवेदना का तीखा-नुकीला बिंब प्रस्तुति का प्रयास भी है. 
कुमार लव की कविताओं में नए-नए प्रतीक और बिंबों की प्रस्तुति का प्रयास दिखाई देता है. ‘कत्तन वाली’, ‘कैनवस’, ‘नाटा उत्सव’, ‘झील में धूप’ अपने विभिन्न रूपों में प्रस्तुत हैं. यह ‘धूप’, ‘प्रकाश’, ‘रोशनी’ आदि उनकी आशा का केंद्र है. ‘आत्मा’ एक ऐसी कविता है जिसमें आँगन में कभी उपस्थित पेड़ की स्मृतियों की ताजा अनुभूति है. यह अतीत की खोज है, याद है, पुनः स्मरण है और ‘बीते’ से लगाव का प्रमाण. आज ऐसी कविताई कम ही दिखाई देती है. ‘विजया ऐसी छानिए’, ‘झील’, ‘सपनों की टोली’, ‘पेड़ बनना’ अच्छी कविताओं के उदहारण हैं जिनसे सरसता, सहजता और सरलता से संवाद संभव है. मैं कह सकता हूँ कि ‘यह संग्रह आख्यान में बदलते क्षण की कविताओं का संग्रह है.’ कुमार लव को मेरी ढेर सारी शुभकामनाएँ. विश्वास है – हिंदी कविता की नई पीढ़ी में वे अग्रणी बनेंगे. 


  • गर्भ में/ कुमार लव/ 2015/ तक्षशिला प्रकाशन,
  • 98-ए, हिंदी पार्क, दरियागंज, 
  • नई दिल्ली- 110002
  • पृष्ठ–136/ मूल्य–रु. 300/-


प्रो. राजमणि शर्मा



चाणक्यपुरी, सुसुवाही,
वाराणसी– 22
मोबाइल : 09450454328