कमला कृति

बुधवार, 1 अगस्त 2018

माहिया : डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार



(एक)

पक्के ही वादों से
हार सदा हारी
मज़बूत इरादों से ।

 (दो)

मौसम है हरजाई
बरखा की चाहत
सूरज ले अँगड़ाई ।

(तीन)

क़िस्मत के क़िस्से हैं-
फूल उन्हें,काँटे -
सब अपने हिस्से हैं ।

(चार)

हर मुश्किल पार गए
पर अपने दिल के
आगे हम हार गए ।

(पाँच)

समझो हर चाल अभी
ग़ैरों के आगे
कहना मत हाल कभी ।

 (छह)

मीठी सी बोली में
डाल गई क़िस्मत
कुछ ख़ुशियाँ झोली में ।

(सात)

आँगन में धूप खिली
मिलनी थी रहमत
वो तेरे रूप मिली ।

 (आठ)

फिर आग लगे भारी
बोई जो दिल में
नफ़रत की चिंगारी |

(नौ)

जाएँगे दुख देकर
घूम रहे शातिर
चकमक पत्थर लेकर ।

 (दस)

मुट्ठी में चाह नहीं
इतनी सरल सखी
चाहत की राह नहीं ।

 (ग्यारह)

लाचार , उदासी क्यों
कन-कन सींच रही
ये नदिया प्यासी क्यों ?

 (बारह)

आँखों के काजल से
भेजा संदेशा
बरखा से ,बादल से ।

 (तेरह)

कितना गम सहती है
उमड़-उमड़ बहती
नदिया कुछ कहती है ।

 (चौदह)

किसकी नादानी है
पर्वत बेचारा
क्यों पानी-पानी है ।

(पंद्रह)

क्या आज हवाएँ हैं
क़ातिल हैं , कितनी
मासूम अदाएँ हैं ।

 (सोलह)

वो साथ हमारे हैं
अम्बर फूल खिले
धरती पर तारे हैं।

(सत्रह)

ख़ुशियाँ तो गाया कर
ज़ख़्मों की टीसें
दिल खूब छुपाया कर ।

(अट्ठारह)

सब राम हवाले है,
आँखों में पानी
दिल पर क्यों छाले हैं।

 (उन्नीस)

अब क्या रखते आशा
गैरों से समझी
अपनों की परिभाषा ।

(बीस)

मैंने तो मान दिया
क्यों बाबुल तुमने
फिर मेरा दान किया ।
     
(इक्कीस)

मन चैन कहाँ पाए?
इतना बतलाना-
क्यों हम थे बिसराए।

 (बाइस)

ये भी तो सच है ना
चाहा हरजाई
यूँ हार गई मैना ।

 (तेईस)

पीछे कब मुड़ना है
अब परचम अपना
ऊँचे ही उड़ना है ।

(चौबीस)

छोड़ो भी जाने दो
मन की खिड़की से
झोंका इक आने दो ।

 (पच्चीस)

हाँ ! घोर अँधेरा है
सपनों में मेरे
नज़दीक सवेरा है।

(छब्बीस)

सपना जो तोड़ दिया
ज़िद ने हर टुकड़ा
मंज़िल से जोड़ दिया ।

(सत्ताइस)

मानी है हार नहीं
तेरा साथ मिला
जीवन अब भार नहीं ।

 (अट्ठाइस)

ख़ुद को पहचान मिली
बंद - खुली पलकें
तेरी मुस्कान खिली ।


डाॅ. ज्योत्स्ना शर्मा


  • जन्म स्थान  : बिजनौर (उ0प्र0)
  • शिक्षा : संस्कृत में स्नातकोत्तर उपाधि, पी-एच.डी.
  • शोध विषय : श्री मूलशंकर माणिक्य लाल याज्ञनिक की संस्कृत नाट्यकृतियों का नाट्यशास्त्रीय अध्ययन |
  • प्रकाशन : ‘ओस नहाई भोर’ एकल हाइकु-संग्रह , ‘महकी कस्तूरी’ एकल दोहा संग्रह।
  • अन्य प्रकाशन- ‘यादों के पाखी’(हाइकु-संग्रह ), ‘अलसाई चाँदनी’ (सेदोका –संग्रह ) एवं ‘उजास साथ रखना’ (चोका-संग्रह) , हिन्दी हाइकु प्रकृति-काव्यकोश, ,डॉ सुधा गुप्ता के हाइकु में प्रकृति( अनुशीलनग्रन्थ), हाइकु-काव्यशिल्प एवं अनुभूति ,’आधी आबादी का आकाश’(हाइकु संग्रह) ‘कविता अनवरत -3’ तथा  ‘समकालीन दोहा कोश’ ,’गुलशने ग़ज़ल’ ,हाइकु व्योम, ‘अनुभूति के इन्द्रधनुष’ ,कुण्डलिया संचयन ,पगध्वनि , पीर भरा दरिया (माहिया संकलन) में अन्य रचनाकारों के साथ रचनाएँ प्रकाशित |
  • विविध राष्ट्रीय,अंतर्राष्ट्रीय (अंतर्जाल पर भी ) पत्र-पत्रिकाओं ,ब्लॉग पर  विविध विधाओं में अनवरत प्रकाशन |
  • सम्प्रति : कुछ वर्ष शिक्षण , अब स्वतन्त्र लेखन ,सह सम्पादक – हिन्दी चेतना (कैनेडा से प्रकाशित हिन्दी त्रैमासिक पत्रिका )
  • सम्पर्क  :एच-604 ,प्रमुख हिल्स ,छरवाडा रोड , वापी , जिला- वलसाड , गुजरात (भारत)- 396191
  • ईमेल-jyotsna.asharma@yahoo.co.in

आलेख: यथार्थ को विश्वसनीय ढंग से प्रस्तुत करने की कोशिश-माधव नागदा




                                          आधुनिक हिन्दी लघुकथाएं


       त्रिलोक सिंह ठकुरेला द्वारा संपादित लघुकथा संग्रह ‘आधुनिक हिन्दी लघुकथाएं’ मेरे सम्मुख है| आजकल संपादित लघुकथा संग्रहों की बाढ़ सी आ गई है| यह बात लघुकथा के भविष्य के लिए अच्छी भी है और बुरी भी| लघुकथा की विकास यात्रा में मील का पत्थर बनने की होड़ में कई लोग बिना किसी संपादकीय दृष्टि या कि सूझ-बूझ के जैसी भी लघुकथाएं उन्हें उपलब्ध हो जाती हैं उन्हें इकट्ठाकर पाठकों के सम्मुख पटक देते हैं| शायद इसी बात से दुखी होकर बलराम को कहना पड़ा है कि अधिकांश लघुकथा संग्रह भूसे के ढेर हैं जिनमें दाना खोज पाना बहुत मुश्किल काम लगता है| इस बात का उद्धरण स्वयं ठकुरेला ने ‘अपनी बात’ में दिया है| इसका अर्थ यह हुआ कि ठकुरेला ऐसा लघुकथा संकलन पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करना चाहते हैं जिसमें भूसा कम और दाने अधिक हों| यद्यपि उन्होंने ‘अपनी बात’ में सीधे-सीधे अपने उद्देश्य के बारे में कुछ नहीं कहा है| हम केवल अनुमान लगा सकते हैं| वे कहते हैं, ‘लघुकथा घनीभूत संवेदनाओं को व्यक्त करने की क्षमता रखती है|’ अर्थात् वे ऐसी क्षमतावान लघुकथाएं संकलित करना चाहते हैं जिनमें घनीभूत संवेदनाएं हों| परन्तु मुझे लगता है कि उनका वास्तविक उद्देश्य कुछ और ही है जो कि पुस्तक के शीर्षक से ध्वनित होता है| शीर्षक है, ‘आधुनिक हिन्दी लघुकथाएं|’  यानि ऐसी लघुकथाओं का संकलन जो आधुनिक हों परन्तु उन्होंने कहीं भी ‘आधुनिक’ की अवधारणा पर प्रकाश नहीं डाला है| 

      यदि हम ‘आधुनिक’ की काल सापेक्ष चर्चा करें तो डॉ.रामकुमार घोटड़ के अनुसार लघुकथा के संदर्भ में सन्  1970 के पश्चात् का समय आधुनिक काल है| इस दृष्टि से सन्  1971 से  अब तक रचित लघुकथाएं आधुनिक लघुकथाएं हैं| परन्तु मेरी दृष्टि में आधुनिकता की यह परिभाषा मुकम्मल नहीं है| कारण कि काल विभाजन की दृष्टि से कोई रचना आधुनिक होते हुए भी जरूरी नहीं कि मूल्यबोध की दृष्टि से भी आधुनिक ही हो| उदाहरण के लिए एक लघुकथा (इस संग्रह से नहीं) इस प्रकार है: एक स्त्री को प्रसव-पीड़ा से मुक्ति मिलती है| जब दाई बताती है कि लड़की हुई है तो वहां उपस्थित सभी स्त्रियों के चेहरे प्रसन्नता से खिल उठते हैं| आगे लेखक अपनी तरफ से टीप जड़ता है, ‘कहने की आवश्यकता नहीं कि वे सब वेश्याएं थीं|’ यानि पुत्री जन्म पर यदि कोई स्त्री खुशी जाहिर करती है तो लेखक के अनुसार वह वेश्या होगी| जाहिर है कि आधुनिक काल में रची गई होने के बावजूद प्रतिगामी मूल्य वाली यह लघुकथा आधुनिक तो कतई नहीं है| हां, समकालीन जरूर है| समय सापेक्षता समकालीनता का द्योतक है, आधुनिकता का नहीं| तो फिर सर्जनात्मकता के संदर्भ में आधुनिक होने का क्या तात्पर्य है? मेरे विचार से भाषा, भाव, कथ्य, संवेदना, शिल्प, विचार, जीवन मूल्य की दृष्टि से जिस रचना में नयापन हो वही आधुनिक है| आधुनिक वह है जो पुरानी सड़ी-गली, तर्कहीन मान्यताओं के प्रति अपना विरोध दर्ज करे या फिर उनके परिष्कार की ओर संकेत करे| आधुनिक लघुकथा या कोई भी रचना ताजा हवा के झोंके की तरह होती है| डॉ.कुन्दन माली के अनुसार, ‘आधुनिकता जीवन और सर्जन के क्षैत्र में मौजूद यथास्थिति और रूढ़ियों के प्रतिकार का नाम है|’ इस दृष्टि से विचार करें तो ‘आधुनिक हिन्दी लघुकथाएं’ की कई लघुकथाएं आधुनिकता की कसौटी पर खरी उतरती हैं|

      आज के दौर की कई लघुकथाओं में नगरीय जीवन की भागदौड़ भरी जिंदगी के कारण बुजुर्गों की दयनीय होती जा रही स्थिति को खूब चित्रित किया गया है| परन्तु रामेश्वर काम्बोज हिमांशु की लघुकथा ‘ऊंचाई’ इन सबसे अलग हटकर है| यहां पिता जिस ऊंचाई पर खड़े हैं उसे देखकर एक ताजगी का अहसास होता है| यह लघुकथा सिर्फ कथ्य की दृष्टि से ही नहीं वरन अपनी संवेदनात्मक छुअन के लिए भी उल्लेखनीय है| रामयतन यादव की ‘डर’ में भी कमोबेश यही स्वर उभरकर आया है परन्तु तनिक भिन्न संदर्भ में| यहां मरणासन्न माधव अंकल का स्वाभिमान मन को भिगो देता है| डॉ.रामनिवास मानव की लघुकथा ‘दौड़’ भी गांव और नगर के बीच की खाई की ओर इशारा करती है| प्रतापसिंह सोढ़ी ‘शहीद की माँ’ में शहीद बेटे की तस्वीर के माध्यम से देश की दुर्दशा के बीच स्वतंत्रता दिवस की धूमधाम के विरोधाभास को बड़े ही मर्मस्पर्शी रूप में प्रस्तुत करते हैं| ज्योति जैन की ‘अपाहिज’ लघुकथा सोच को सार्थक दिशा देने वाली एक सशक्त लघुकथा है| इसमें पायल अपाहिज यश को अपना जीवन साथी चुनती है क्योंकि वह स्वयं फैसला लेने में सक्षम है| अमन पूर्णतया स्वस्थ होते हुए भी रीढ़विहीन है क्योंकि जिन्दगी के अहम् फैसले स्वयं नहीं ले सकता| यश को चुनकर पायल न केवल साहस का परिचय देती है वरन समाज के लिए भी एक अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत करती है|

      सुकेश साहनी सदैव शिल्प और कथ्य के स्तर पर पुरानी जमीन तोड़ते रहे हैं| इस संग्रह की लघुकथा ‘बिरादरी’ में उन्होंने बड़े सधे हुए अंदाज में इस बात को रेखांकित किया है कि किस तरह मनुष्य का व्यवहार सामने वाले के स्टेटस को देखकर पल-पल रंग बदलता है| भाषा के स्तर भी उन्होंने ध्यानाकर्षक प्रयोग किए हैं यथा, ‘किसी पुराने परिचित से सामना होने की आशंका मात्र से मेरे कान गर्म हो उठे’, ‘दांयीं आंख के नीचे बड़े-से मंसे के कारण मुझे अपने बचपन के दोस्त  सीताराम को पहचानने में देर नहीं लगी’, ‘मैंने प्यार से  उसकी तौंद को मुकियाते हुए कहा|’ साहनी की ‘आईना’ भी एक स्थापित उपन्यासकार की गरीबों के प्रति सहानुभूति के खोखलेपन को आईना प्रतीक के माध्यम से एकदम मौलिक तरीके से अभिव्यक्त करती है|

       मुरलीधर वैष्णव की ‘पॉकेटमार’ तीर्थस्थलों पर पंडे-पुजारियं द्वारा की  जाने वाली लूट पर प्रकाश डालती है तो अंजु दुआ जैमिनी की ‘कमाई का गणित’ इन पवित्र स्थलों पर दुकानदारों द्वारा भक्तों के साथ की जाने वाली चालाकियों का रोचक बयान है| संग्रह की कई लघुकथाओं में दरकते रिश्तों को नयेपन के साथ विश्वसनीय तरीके से चित्रित किया गया है| ये लघुकथाएं हैं आशा शैली की ‘खोटा सिक्का’, कमल कपूर की ‘सर्वेंट क्वार्टर’ व ‘सहारे’, ज्योति जैन की ‘झप्पी’, कृष्णकुमार यादव की ‘बेटे की तमन्ना’, शकुन्तला किरण की ‘कोहरा’, सुरेश शर्मा की ‘भूल’ , अमरनाथ चौधरी अब्ज की ‘वसीयत’ आदि| इनमें से कमल कपूर की ‘सर्वेंट क्वार्टर’ को पाठक लम्बे समय तक भूल नहीं पायेंगे| पोता पेंटिंग में घर बनाता है, घर में अलग-थलग सर्वेंट क्वार्टर| पिता खुश होता है कि बेटा सर्वेंट के लिए भी अलग घर बना रहा है| इस पर बेटा कहता है कि यह आपके लिए है, जब बूढ़े हो जाओगे तब इसमें रहोगे| दादाजी भी तो सर्वेंट क्वार्टर में ही रहते हैं| यह लघुकथा उस पुरानी कहानी का  आधुनिक परिवेश में सार्थक रूपान्तरण है जिसमें बेटा मिट्टी के बरतन को संभालकर रखता है जिसमें दादाजी को बचा-खुचा खाना खिलाया जाता रहा है| सूर्यकान्त नागर की ‘कुकिंग क्लास’ तथा डॉ.सुधा जैन की ‘समाज सेवा’ सास-बहू के रिश्तों के तनाव को नये ढंग से परिभाषित करती हैं| अर्थहीन होते जा रहे रिश्तों को लेकर प्रभात दुबे की ‘गर्म हवा’ जबर्दस्त लघुकथा है| यह रचना वृद्ध लोगों की त्रासदी को घनीभूत संवेदना के साथ प्रस्तुत करती है| यह जानकर कि शर्माजी को उनके बेटे-बहू ने वृद्धाश्रम भेज दिया है, उनके साथ रोज घूमने वाले शेष दो वृद्ध बुरी तरह सहम जाते हैं| उन्हें अपना भविष्य दिखने लगता है| ट्रीटमेंट के लिहाज से यह लघुकथा बेहद सशक्त है|

       यह सच है कि आज के समय में तमाम रिश्ते बेमानी होते जा रहे हैं, वृद्धजन लगातार अपनों ही के द्वारा अपमान झेलने को मजबूर हैं और स्वयं को असुरक्षित महसूस करते हैं| ऐसे में डॉ.दिनेश पाठक शशि की ‘साया’ एवं डॉ.योगेन्द्र नाथ शुक्ल की ‘टूटी घड़ी’ अंधेरे में प्रकाश की बारीक लकीर की तरह नयी आशा जगाती है| ‘साया’ में अपनी बीमार वृद्धा मां की मृत्यु पर बेटा स्वयं को अकेला और अनाथ-सा अनुभव करता है जबकि ‘टूटी घड़ी’ में पुत्र अपनी मां की निशानी स्वरूप बची एक टूटी घड़ी के प्रति पिता के भावनात्मक लगाव को देखकर उसे कमरे से फेंकने की बजाय पुनः वहीं रख देता है| ये दोनों लघुकथाएं इस बात के प्रति आश्वस्त करती हैं कि अभी तक मानवीय संवेदनाएं पूरी तरह  मरी नहीं हैं कि अभी भी बहुत कुछ बचा हुआ है|

      संग्रह में ऐसी लघुकथाएं भी हैं जिनमें अभावग्रस्त आम आदमी की भूख और जिल्लत भरी जिंदगी को नये शिल्प और अछूते प्रतीकों के माध्यम से वाणी दी गई है| पेट की ‘आग’(देवांशु पाल) ‘भूत’(डॉ.पूरन सिंह) पर भारी पड़ती है| ‘भूत’ लघुकथा का नायक भूख के आगे बेबस होकर श्मशान घाट पर रखे भोजन को ग्रहण करने से भी भयभीत नहीं होता है| ‘पैण्ट की सिलाई’(डॉ.रामकुमार घोटड़), ‘साहब का कुत्ता’(आकांक्षा यादव), ‘पसीना और धुंआ’(अंजु दुआ जैमिनी), ‘सोने की चेन’(डॉ.रामनिवास मानव) तथा ‘पहली चिन्ता’(डॉ.कमल चोपड़ा) लघुकथाएं आम आदमी की बेबसी को अपने-अपने ढंग से बयान करती है| डॉ.कमल चोपड़ा की ‘धर्मयुद्ध’ भी उल्लेखनीय है जो बेबाकी के साथ सांप्रदायिक दंगों के राजनीतिक मुखौटे को बेनकाब करती है| डॉ.सतीशराज पुष्करणा की ‘अंधेरा’ भी इसी अंधेरे पक्ष के चलते चारों ओर पसरे वैचारिक शून्य को भरने की सर्जनात्मक कोशिश है|

       संग्रह में कुछ और लघुकथाएं हैं जो कथ्य या शिल्प की ताजगी के चलते अलग से ध्यान आकर्षित करती हैं| ये हैं ‘विरेचन’(डॉ.पुरुषोत्तम दुबे), ‘गुस्सा’(गुरुनाम सिंह रीहल), ‘मामाजी’(नदीम अहमद नदीम), ‘यकीन’, ‘भरोसा’(निशा भोंसले), ‘घिसाई’(राजेन्द्र साहिल), ‘प्रश्न चिह्न’(प्रदीप शशांक), ‘फर्क’(इंदु गुप्ता), ‘मध्यस्थ’(मालती बसंत), ‘सुकन्या’(कुंवर प्रेमिल) और ‘नया क्षितिज’(साधना ठकुरेला)| ‘विरेचन’ में चुटीले संवादों के माध्यम से पर निंदा सबसे बड़ा सुख कहावत को चरितार्थ किया गया है तो ‘गुस्सा’ में कायर का गुस्सा सदैव कमजोर पर निकलता है को| ‘मामाजी’ और ‘नया क्षितिज’ में पुरुष मानसिकता पर सार्थक चोट की गई है| साधना ठकुरेला ने चिड़े का प्रतीक लेकर एक नयी बात कही है कि नर किसी भी प्रजाति का हो नारी के प्रति  उसका रवैया सदा समान रहता है|

       आज भ्रष्टाचार ने इस कदर शिष्टाचार का रूप धारण कर लिया है कि ईमानदार आदमी की निष्ठा भी अविश्वसनीय लगती है(यकीन)| दूसरी ओर राजेन्द्र सिंह साहिल की ‘घिसाई’ ईमानदार आदमी के भोलेपन और तद्जन्य बेबसी को बताती है| निशा भोंसले की ‘भरोसा’ में पिता द्वारा जवान बेटी को दिया गया यह जवाब मन को झिंझोड़कर रख देता है, ‘तुम पर (भरोसा) है पर इस शहर पर नहीं|’ यह अकेला वाक्य लोगों की मानसिकता पर एक मुकम्मल बयान है| ‘प्रश्न चिह्न’ समय के साथ लोगों के बदलते मिजाज का अच्छा जायजा लेती है| यहां तलाक मिल जाने की खुशी(?) में युवती को मिठाई बांटते हुए दिखाया गया है| संतोष सुपेकर की ‘उलझन’ तथा ‘एक और जानवर’ भी नयी जमीन पर खड़ी दिखायी देती है| लेखक जब एक व्यक्ति को घायल बैल पर गाड़ी चढ़ाते देखता है तो उसकी यह टिप्पणी बहुत कुछ कह देती है, ‘सबने  केवल एक जानवर देखा, पर मैंने दो जानवर देखे, एक चौपाया और एक दोपाया|’ वस्तुतः आज समाज में दोपाये  जानवरों की संख्या निरन्तर बढ़ती जा रही है जिनके प्रति एक साहित्यकार ही अपनी लेखनी द्वारा लोगों को सचेत कर सकता है|

      आजकल जातिवाद भी हमारे समाज में नासूर की तरह फैलता जा रहा है| अफसोस कि राजनेता अपने नहित स्वार्थों के लिए इस सड़ांध को बचाए और बनाये रखना चाहते हैं| हालांकि जातिवाद के इस पहलू पर गौर करने वाली लघुकथाओं का अभाव है फिर भी इसके परंपरागत कारणों पर प्रहार करने वाली कतिपय लघुकथाएं यहां संकलित की गई हैं| ये लघुकथाएं हैं त्रिलोक सिंह ठकुरेला की ‘रीति-रिवाज’, आनन्द कुमार की ‘विभेद’, ‘अपवित्र’ अशोक भाटिया की ‘बंद दरवाजा’ तथा डॉ.सुरेश उजाला की ‘जातिगत द्वेष|’

      यद्यपि सभी लघुकथाओं में यथार्थ को विश्वसनीय ढंग से प्रस्तुत करने की कोशिश की गई है और भाषा के प्रति भी पर्याप्त सावचेती बरती गई है फिर भी कहीं-कहीं असावधानीवश कुछ छिद्र रह गये हैं| उदाहरण के लिए जातिगत भेदभाव की मनोवृत्ति पर प्रहार करने वाली लघुकथा ‘विभेद’ का आरंभ यों होता है, ‘बात आज से 20-25 साल पूर्व की है|’ यह पंक्ति अनावश्यक है और लघुकथा के शिल्प को क्षति पहुंचाने वाली है| लगता है जैसे लेखक किसी सत्य घटना का बयान करने जा रहा है| इसी तरह ‘सोने की चेन’ लघुकथा जो आरंभ में बहुत सहजता के साथ आगे बढ़ रही होती है कि ‘मैं’ पात्र द्वारा चेन वाले से पूछा गया यह प्रश्न पाठकों को चौंका देता है, ‘भाई, यदि तुम्हारी चेन इतनी बढ़िया है तो इसे अपनी बेटी और बीवी को क्यों नहीं पहनाते?’ यह वाक्य यथार्थ को खंडित करने वाला है क्योंकि लघुकथा में कहीं नहीं बताया गया है कि लेखक (मैं) ने चेन वाले की बीवी व बेटी को पहले कहीं देखा है कि ये दोनों नकली चेन नहीं पहने हुए हैं| पाठक के मन में तो यह सवाल भी उत्पन्न होता है कि लेखक को कैसे पता कि चेन वाले के एक बेटी भी है| जरा सी असावधानी लघुकथा की विश्वसनीयता को सवालों के घेरे में खड़ा कर देती है| एक लघुकथा में वाक्य प्रयोग आता है, ‘उल्लास से छलकता, उसका मन सहसा बुझ गया|’ बुझता वह है जो जलता है| छलकने वाला तो रीतता है| अतः यहां छलकने के साथ बुझना का प्रयोग अप्रासंगिक है| एक और लघुकथा में वाक्य-खण्ड आता है, ‘एक पान के ठेले के सामने खड़े रिक्शेवाले की वजह से’ जबकि होना चाहिए ‘पान के एक ठेले के सामने...|’

        कुल मिलाकर  ‘आधुनिक हिन्दी लघुकथाएं’ संग्रह की आधिकतर लघुकथाओं में नये शिल्प और संवेदना के साथ समकालीन जीवन मूल्यों तथा समाज में व्याप्त विसंगतियों का गहराई के साथ जायजा लिया गया है| ये लघुकथाएं निस्सन्देह पाठकों को रोजमर्रा की समस्याओं पर नये सिरे से सोचने के लिए बाध्य करेंगी|
  •   संदर्भ-आधुनिक हिन्दी लघुकथाएं, संपादक-त्रिलोक सिंह ठकुरेला, प्रकाशक-अरिहन्त प्रकाशन, जोधपुर

माधव नागदा


लालमादड़ी (नाथद्वारा)-313301
मो.09829588494

बुधवार, 25 जुलाई 2018

पाँच गीत-कल्पना 'मनोरमा'


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार



जाओ सावन के घन कारे..


जाओ सावन के घन कारे
जाकर बरसो उनके द्वारे ।

सँग ले जाना माँ की ममता 
और पिताजी की शाबाशी 
मत कहना कुछ मेरे मन की 
मैं तो हूँ बस उनकी  दासी 
रूखा-सूखा हाथ न लेना 
मधुरिम दिन दे आना सारे ।

आँगन की माटी ले जाना 
गलियों से ले जाना यारी
दामन में ले जाना भरकर 
बिटिया रानी की छवि प्यारी 
चुपके से दिखलाना उनको 
नैना सुधियों के रतनारे ।

सीमाएँ यदि सबल बनी तो 
समझूँगी आबाद हुए घर 
लाहकेंगीं फसलें खुशियों की 
छलक उठेंगे मन के सरवर 
हानि -लाभ का लेखा-जोखा 
रख जाना तुम यहीं किनारे ।

शुष्क वनों को यूँ सरसाना 
महक उठें जैसे वन चन्दन 
उदयाचल से अस्ताचल तक 
खुशियों का फैलाना वन्दन 
जयति जयति स्वर लाना उनके 
जिनमें बसते प्राण हमारे ।


नेह डोरी में तुम्हारी..


नेह डोरी में तुम्हारी बँध रहूँ 
या तोड़ दूँ 
ढीला पड़ा हर एक बंधन 
तय करेगी यह तुम्हारी ही 
सदेच्छा ॥

समय चौखट पर उगे 
भ्रम के उजाले 
ज्यों बुने हों मकड़ियों ने 
सघन जाले 
कामनायुत पलक से 
बहती रहूँ या धार लूँ 
उनको हृदय में साज स्यंदन 
तय करेगी यह तुम्हारी ही 
शुभेच्छा ॥

दीप खुश है पर शिखा 
भयभीत डोले 
तिमिर रह रह रोशनी का 
मन टटोले
आँधियों से जीत लूँ यह 
समर पहले 
फ़िर सजाऊँ चौक पूरित 
प्रणय आँगन 
तय करेगी यह तुम्हारी ही 
अपेक्षा ॥


हो गये दिन गुलमोहर से..


हो गये दिन गुलमोहर से 
ज्यों हुईं फसलें सुनहरी ॥

बिटिया पीहर आयेगी,
पाहुन आयेंगे 
किलकारी के कलरव से 
मन भर जायेंगे 
तुलसी की डालों पर होंगी 
मँजरियाँ भी 
दादी की लोरी में नाचेंगीं
परियाँ भी 

खुल कर हुए संवाद सच्चे 
ज्यों लगी सुख की कचहरी ॥

भोर कान्ता सी जायेगी 
महुआ बिनने 
सूरज आयेगा सतरंगी 
घूँघट बुनने 
कच-कच अमिया दाल पड़े,
छौँका महकेगा 
घनीभूत आशाओं में 
जीवन लहकेगा 

भर गये कोने खुशी से 
ज्यों हुईं मनहर दुपहरी ॥

अमराई सुर में भरकर 
कोयल गायेगी 
ठिठुरे घर के छज्जे 
पर चिड़ियाँ आयेँगी 
पायल मचलेगी गोदी 
में पाँव नये की 
सूखी टहनी बात कहेगी 
पात नये की 

हो गया नर्तन सजीला 
ज्यों हुईं काया छरहरी ॥


तुम्हीं बताओ !


तुम्हीं बताओ !
कैसी होगी फसल तुम्हारी ॥

कर्जे की गुर्राहट अब 
बर्दाश्त न होती 
जर्जर हालत पर,आशा 
भी आशा खोती 
छोटी फ्राकोँ में कब तक 
पेबन्द लगाऊँ
नरम डाल को बोलो कितना 
और झुकाऊँ

नींद नहीँ आती है खटिया 
देख खरारी 
तुम्हीं बताओ !

दाल हुई बनिया की बेटी 
पास न आती 
नये पाँव को पायल की 
मनुहार न भाती 
भोर, भुरारे से ले आती 
चटक दुपहरी 
लग जाती चिंता की,आँगन 
सघन कचहरी 

कब तक डालोगे फसलों में 
खाद उधारी 
तुम्हीं बताओ

तंग हो रहा धीरज का मन 
हिम्मत रूठी 
डर है सारी ही कसमें 
हो जायें न झूठी 
रोपी थी फुलवारी जो 
हमने सपनों की 
टूट न जाये माला मुक्ता-सी 
अपनों की 

कुछ तो करो जतन पूरी 
हो आस हमारी 
तुम्हीं बताओ !


क्या हुआ जो आ गए.. 


क्या हुआ जो आ गए 
ये श्याम बादल 
छाँह बिन बेचैन मन
जीवन हुआ है ।

मूँदने को है नहीं 
उनपर झरोखा 
और ये बौछार भीतर 
जा रही है 
लकड़ियाँ भी भीगकर 
सहमी हुईं हैं 
आग-चूल्हे में पड़ी 
सिसिया रही है 

क्या हुआ जो धुल गए 
हर डाल के दल
भूख से बेचैन मन 
बचपन हुआ है ।

दामिनी भरती छलांगें 
जब गगन से 
सिर छुपाने को नहीं 

मिलता ठिकाना 
बिहँसती होगी भले,
अट्टालिकाएं 
झोपड़ी को है कठिन 
खुद को बचाना 

क्या हुआ जो भर गए 
हैं कूप के तल 
कींच से बेचैन मन
दर्पन हुआ है ।


कल्पना 'मनोरमा'



  • जन्म- 4 जून, 1972 (ईकरी- इटावा )
  • शिक्षा - परास्नातक ,बी.एड. (हिन्दी )
  • पिता -श्री प्रकाश नारायण मिश्र
  • माता -स्व.मनोरमा मिश्रा 
  • प्रकाशित कृतियाँ- पहला गीत -नवगीत संग्रह प्रकाशनाधीन ।
  • सम्प्रति - स्नातकोत्तर शिक्षिका 
  • विशेष -स्वतंत्र लेखन
  • सम्पर्क-C-5 WAC SMQ, वायुसेना स्टेशन सब्रोटो पार्क, नई दिल्ली -110010
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सबरंग: पिता-पुत्र संबंध और ज्योतिषीय योग


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


                                      गिरते नैतिक मूल्य जिम्मेदार


         पिता पुत्र का रिश्ता बहुत प्यारा होता है। माता तो सर्वाधिक पूज्यनीय है लेकिन पिता की भूमिका भी एक बेटे के भविष्य निर्माण में माता से कम नहीं होती। पिता एक पुत्र को पढ़ाने के लिए कितना परिश्रम करता है। पुत्र के सफलता के प्रत्येक कदम पे पिता के पसीने की महक होती है। उसकी हर सफलता पिता के परिश्रम की ऋणी होती है। आजकल पिता पुत्र संबंध भी खराब होने लगे हैं। बेटा ये भूल जा रहा है कि उसके एक सपने के पूरे होने में पिता ने कितनी रातें इस चिंतन में गुजरी होंगी कि कहीं मेरी वजह से उसका सपना टूट मत जाय। इन सबके पीछे गिरते नैतिक मूल्य जिम्मेदार हैं।
         ग्रह स्थितियां ऐसी स्थिति उत्पन्न कर देती हैं कि न चाहते हुए भी पिता पुत्र के संबंध खराब हो जाते हैं
,यहां तक कि संवाद भी समाप्त हो जाते हैं। आइये इस गंभीर विषय को ज्योतिष की नजर से विचार करते हैं। पिता का कारक ग्रह सूर्य होता है। नवम और दशम भव पर भी विचार आवश्यक है। सूर्य जब भी शनि के साथ रहेगा या दोनों एक दूसरे के घर में रहेंगे तो पिता से वैचारिक मतभेद देंगे। 
         यदि लग्नेश पंचम भाव में है तो पुत्र आज्ञाकारी होगी। पंचम का लग्न से संबंध ही पिता पुत्र संबंध को डिफाइन करता है। यदि पंचमेश 6,8 या 12 में है और मंगल या राहु का प्रभाव हो तो पुत्र और पिता के रिलेशन अच्छे नहीं होते। सूर्य पिता और गुरु पुत्र का कारक ग्रह है। जब भी ये दोनों ग्रह नीच राशि में होंगे तो समस्या उत्पन्न करेंगे। गुरु और राहु का साथ गुरु चांडाल योग देता है। राहु का सूर्य के साथ होना भी ठीक नहीं है।

पिता-पुत्र संबंध ठीक करने के उपाय..

-सूर्य पूजा। गायत्री मंत्र का जप।
-श्री आदित्यहृदयस्तोत्र का पाठ
-गुरु और सूर्य के बीज मंत्र का जप
-गुड़ का दान
-पीपल को जल अर्पण और मीठी चीज चढ़ाना
-पंचमेश और नवमेश की पूजा
-यदि पुत्र नियमित गुड़ ,चावल,लाल पुष्प मिश्रित जल भगवान सूर्य को अर्पित करे तो पिता से संबंध मधुर बन जाते हैं
-पिता पुत्र दोनो मदार की जड़ धारण करें
-किसी धार्मिक स्थान पे एक बेल का पौधा लगाएं
-प्रत्येक मंगलवार  को गाय को गुड़ खिलाएं और गुरुवार को केला खिलाएं।
-श्री रामचरितमानस का नियमित पाठ करें


सुजीत जी महाराज


संपर्क-9838762010
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ज्योतिष: कोई निर्णय आपके भविष्य की दिशा तय कर सकता है..


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


                                      मासिक राशिफल: अगस्त -2018


 मेष-इस माह आप का मन ऊर्जा,उत्साह एवं उमंग से भरा होगा। मित्रों के सहयोग से कोई बड़ा कार्य संपन्न होगा। प्रेम संबंधों में प्रगाढ़ता लाएं। रिश्ते चलने के लिए विश्वास बहुत आवश्यक है,उसे कायम रखें। पीला रंग आपका शुभकारी रंग है। सुखद यात्रा का संयोग बनेगा। आपकी क्रिएटिविटी किसी बड़े समारोह में आपको पुरस्कृत भी कर सकती है। मंगल रियल स्टेट में लाभ देगा। मित्रों के सहयोग से कोई सरकारी कार्य संपन्न होगा। श्री हनुमान जी की उपासना करते रहें।

 वृष-अनिश्चितता का दौर समाप्त हो चुका है। निर्णय लेने का समय आ गया है। असमंजस ख़त्म हुआ।कोई स्वराशि तुला राशि का ही जातक इस माह आपकी सहायता करेगा। स्वच्छ सफ़ेद रंग धारण करें।प्रेम में विश्वास और सत्य का बहुत बड़ा हाथ होता है। झूठ बोलने से बचें।जाब में कोई निर्णय लेने में असमंजस से परेशानी आ सकती है।इस माह के मध्य में 15 के बाद धन प्राप्ति का योग और सामजिक प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी।शुक्र धन और ऐश्वर्य प्रदान करेंगे।

 मिथुन-शिक्षा तथा प्रतियोगिता की दिशा में चल रहा प्रयास सार्थकता की तरफ बढ़ता नजर आ रहा हैl यह माह  व्यय भरा है।कोई नया कार्य प्रारम्भ होगा। जीवन साथी को शारीरिक कष्ट रहेगा।हरा और नीला आपका शुभ रंग है। भाई से लाभ की प्राप्ति। बुध आपकी राशि का स्वामी ग्रह है।श्री गणेश जी को प्रत्येक बुधवार को दूर्वा अर्पित करें।शुक्र धन देगा।बृहस्पति शिक्षा तथा प्रतियोगिता में लाभ करायेगा। संतान के शिक्षा के निमित्त धन का व्यय होगा।स्किन सम्बंधित रोग से सावधान रहें।गाय को पालक खिलाएं।

कर्क-सुदूर यात्रा की योजना मित्रों के साथ बनाएंगे। ससुराल से लाभ की प्राप्ति।संतान की सफलता से मन हर्षित रहेगा।मीन या धनु राशि का जातक आपको लाभान्वित करेगा। पीला तथा सफेद रंग का संयुक्त प्रभाव आपके लिए शुभकारी है।गाय को पालक खिलाएं।धार्मिक क्रिया कलापों में वृद्धि होगी और आध्यात्मिक उत्कर्ष की प्राप्ति होगी।राजनीति से संबद्ध जातक अति लाभान्वित होंगे। कोई बहुत दिनों से रुका कार्य पूर्ण होगा।संतान की शिक्षा हेतु धन का व्यय इस माह कुछ ज्यादा ही होगा।

 सिंह-तकनीकी तथा प्रबंधकीय सेक्टर के छात्र नए अवसरों की प्राप्ति करेंगे।अपनी राह खुद बनायें।आलस्य का पूर्णतया परित्याग करें।राजनीतिज्ञों को सफलता की प्राप्ति तथा उच्च नेताओं से लाभ की प्राप्ति।पीला और नारंगी आपका शुभ रंग है।मित्रों के साथ पर्यटन का आनंद प्राप्त करेंगे।15 से लाभ की प्राप्ति बहुत तेजी से प्रारम्भ हो जायेगी।प्रत्येक रविवार को तीन बार श्री आदित्यहृदयस्तोत्र का पाठ करें।राजनीती तथा प्रशासन से जुड़े लोग लाभांवित होंगे।

 कन्या-शिक्षा में उन्नति। यह समय कुछ नए लोगों से मिलने का है।सैर सपाटे का आनंद उठाएंगे।हरा रंग भाग्य उन्नतिकारक है।बड़े भाई का चरण स्पर्श कर आशीर्वाद प्राप्त करें।किसी समारोह में पुरस्कृत  हो सकते हैं।राजनीतिज्ञों से लाभ की प्राप्ति।गाय को पालक खिलाएं।कई बार आपको निर्णय लेने में भ्रम की स्थिति रहेगी।हरा रंग आपका शुभ रंग है।प्रत्येक बुधवार को श्रीविष्णुसहस्त्र नाम पुस्तक का पाठ करते रहें।इस समय आफिस में भी कुछ स्थितियां आपके प्रतिकूल चल रही है लेकिन आप उसपे अंततः विजय श्री प्राप्त का लेंगे

तुला-रोज निर्णय मत बदलें। आपका इस माह का निर्णय आपके भविष्य की दिशा तय कर सकता है। सुगन्धित इत्र का प्रयोग करें।कन्या या मिथुन राशि का कोई जातक आपके पास किसी नए बिज़नेस का प्रस्ताव लेके आएगा। हरा और नीला आपका शुभ रंग है।धन का आगमन।इस समय एक काम आप कर सकते हैं वो है अपने अच्छे संबंधों का सदुपयोग करना।इस समय यदि आप धन का निवेश रियल स्टेट में करना चाहते हैं तो आपके लिए शुभ समय है।राजनीतिज्ञों के लिए सफलता से परिपूर्ण माह बीतेगा।

वृश्चिक-किसी पुराने मित्र की सहायता से कोई बिगड़ा कार्य बनेगा।शिक्षा तथा प्रतियोगिता की दिशा में चल रहा प्रयास सार्थक होगा।लाल रंग आपके लिये शुभकारी है।गाय को केला खिलाएं।बड़े भाई का आशीर्वाद प्राप्त कर घर से बाहर निकलें।राजनीति में सफलता की प्राप्ति।प्रशासनिक सेवा से जुड़े लोग यश तथा प्रतिष्ठा की प्राप्ति करेंगे।संतान की सफलता से मन हर्षित रहेगा।कोई धनु या मीन राशि का व्यक्ति आपको व्यापार में लाभ पहुचाएगा।भाई की सहायता से कोई सरकारी कार्य पूर्ण होगा।

धनु-गृह कार्यों में व्यस्तता रहेगी। कोई अनचाही यात्रा भी हो सकती है। नया बिज़नेस डील संभव।जीवन साथी के साथ कहीं घूमने जायेंगे।उदर विकार से शारीरिक पीड़ा का अनुभव। पिता का चरण स्पर्श कर आशीर्वाद प्राप्त करें।पीला रंग शुभ है।शिक्षा तथा प्रतियोगिता की दिशा में चल रहा प्रयास सार्थक होगा।धन का व्यय होगा।इस महीने में मध्य के बाद अकस्मात कोई बड़ा लाभ आपको प्राप्त होगा। लेखन तथा पत्रकारिता से संबद्ध जातक यश तथा प्रतिष्ठा की प्राप्ति करते हुए किसी बड़े समारोह में पुरस्कृत हो सकते हैं।

मकर-लोहा,इलेक्ट्रॉनिक्स तथा कंप्यूटर विशेषकर शुक्र तथा शनि से संबंधित व्यापार करने वाले जातक इस माह अति लाभान्वित होंगे। मिथुन या कन्या राशि का जातक आपको लाभ देगा। नीला रंग शुभ है।छात्र पीले रंग का प्रयोग करें।राजनीति में सफलता की प्राप्ति होगी।संतान की सफलता से आनन्दित रहेंगे।किसी अनचाही यात्रा को भी करना पड़ सकता है। वाणी पे संयम रखें और क्रोध से बचें।

कुंभ-कोई पुराना मित्र मिलेगा। कार्य स्थल पे क्रोध मत करें। एकाएक क्रोध करना आपको परेशान कर सकता है और किसी अपने से मन मुटाव पैदा कर सकता है।हरा और नीला आपका शुभ रंग है। छात्र पीले रंग का प्रयोग करें।धन का आगमन होगा। गृह कार्यों में व्यस्तता रहेगी। जीवन साथी के साथ सुदूर धार्मिक यात्रा पे जा सकते हैं। कोई वृष या तुला राशि का जातक आपको लाभान्वित करेगा।

 मीन-आय प्राप्ति के नए स्रोत बनेंगे।पिता का चरण स्पर्श कर आनंद की प्राप्ति करें।पीला और सफ़ेद रंग का संयुक्त प्रभाव शुभ है।कर्क राशि के लोग आपके लिए हितकर हैं। छात्रों को नए अवसरों की प्राप्ति होगी।चिड़ियों को दाना पानी दें। धन का आगमन होगा। यदि आप अपने किसी योजना को इस महीने टालते हैं तो आपका बड़ा नुक्सान हो सकता है।संतान की सफलता से मन हर्षित रहेगा। धार्मिक यात्रा होगी।

श्री सुजीत जी महाराज


संपर्क-9838762010
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बुधवार, 18 जुलाई 2018

डाॅ. मधु प्रधान के गीत


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


गीत के गाँव में..


गीत के गाँव में
दर्द की छाँव में 
प्रीति की बाँसुरी मैं बजाती रही
याद आती रही गीत गाती रही ।

कामना की नदी का उमड़ना सतत 
चाँद छूने को लहरें मचलने लगीं 
नेह की निर्झरी में कुमुदिनी खिली
थी युगों की उदासी पिघलने लगी 

किन्तु टूटा सपन 
छल गई इक किरन
फिर भी प्रिय वेदना गुनगुनाती रही ।

रेत के घर का बनना बिगड़ना है क्या 
खेल है बस कोई क्या संभाले इसे 
नीर के बुलबुले सा है जीवन क्षणिक 
कौन जाने लहर कब मिटा दे इसे 

जो मिले नेह पल 
भाव -भीने सरल 
रत्न सा मैं संजोती ,सजाती रही 
याद आती रही गुनगुनाती रही ।।
             
             

अर्घ्य ले हाथ में..

 
 अर्घ्य ले हाथ मे 
 मैं सुबह से खड़ी 
सूर्य निकला नहीं ,दोपहर हो गई ।

वे सुनहरे कथानक कहाँ खो गये
चन्दनी गीत थे आज क्या हो गये
अक्षरा थीं ऋचायें 
मधुर नेह की 
क्या हुआ दर्द की इक लहर हो गई ।

छूटी अमराइयाँ भूले कोकिल बयन 
बिखरे-बिखरे सपन ,भीगे भीगे नयन 
दौड़ते - भागते 
हाँफते-हाँफते 
जिन्दगी स्वेद से तर -ब -तर हो गई ।

भोर से शाम तक ,शाम से भोर तक 
गाँव की देहरी से क्षितिज छोर तक 
भटकता रहा मन 
कहाँ से कहाँ 
तीन पग बस चले थे उमर हो गई ।
अर्घ्य ले हाथ में 
मैं सुबह से खड़ी 
सूर्य निकला नहीं दोपहर हो गई ।

               

कुछ सुधियों के गीत..


कुछ सुधियों के गीत
और कुछ आँसू लाये हैं
आज अटारी पर कुछ
काले बादल छाये हैं ।

बेहतर होगा चुप रहने से 
कुछ भी तुम बोलो 
छोटी छोटी बातों पर 
मत रिश्तों को तोलो 

विरह पलों में दोनों ने ही 
अश्रु बहाये हैं ।

याद तुम्हें भी तो होंगी 
वह मीठी सी बातें 
वो सोने से दिन मोहक 
चांदी जैसी रातें 

हँसती हुई जुन्हाई के
कुछ पल मुस्काये हैं ।

मनुहारों के गीत गा रही 
कोयल रस घोले 
उम्मीदों की सोन चिरैया 
पंखों को खोले 

अलसाई पलकों के 
मृदु सपने अकुलाये हैं 
     

कचनारी धूप 

         
मेरे आँगन में 
उतरी है
कोमल सी 
रतनारी धूप ।

नर्म हुये सूरज के तेवर
नयन अधखुले 
अलसाये से 
बाँह छुड़ा कर 
दौड़ गई है 
बिखरी क्यारी-क्यारी धूप ।

जैसे उड़ती 
सोन चिरैया 
आ मुँड़ेर पर 
बैठ गई हो 
कुछ पल रुक कर 
घूम रही है 
घर, आँगन बंसवारी धूप ।

पी से मिल 
लौटी मुग्धा सी 
चहक रही 
कुछ लजा रही 
किस से मन को 
हार गई है 
छुईमुई कचनारी धूप 
     

मौसम के तेवर 

     
बिन बोले बदला करते हैं 
मौसम के तेवर ।

कई दिनों से ठंडा है 

यह लिपा-पुता चूल्हा 
बिन ब्याहे लौटी बारात का 
जैसे हो दूल्हा 

उम्मीदें कच्ची दीवार सी 

ढहती हैं भर-भर । 

बरस रहे बादल, कहते हैं

बरस रहा सोना 
खाली हैं बर्तन ,घर का 
खाली कोना -कोना 

पूस -माघ की सर्दी 

उस पर टपक रहा छप्पर ।

हमरेहू कब दिन बहुरेंगे 

पूछ रही धनिया
जब उधार मांगें तो 
लौटा देता है बनिया 

क्या बेचूँ ,गिरवी रक्खे हैं 

घर के सब जेवर ।

कुछ तो कहो प्रधान

दिखाये सपने बड़े -बड़े 
एक कदम भी बढ़े नहीं
हम तो हैं यहीं पड़े 

पूरी ताकत से हो हाकिम 

तुमको  किसका डर ।



डाॅ. मधु प्रधान 


  • जन्मतिथि-20 मार्च, 1948 (पुखरायां-कानपुर)
  • पति-स्व. राम प्रकाश सक्सेना (एडवोकेट)
  • पिता-डाॅ. बलराम चरन प्रधान
  • माता-श्रीमती यशवन्त कुमारी 'यश'
  • शिक्षा- एम०ए० (हिन्दी) बी०एड०, एम०बी०ई०एच० त्रिवर्षीय चिकित्सा डिप्लोमा 
  • कार्यक्षेत्र- गीत, छंदमुक्त, गजल और मुक्तक दोहे आदि छंदों में निरंतर रचनाशील। इसके अतिरिक्त बाल साहित्य में विशेष रुचि। 
  • प्रकाशन-'नमन तुम्हें भारत' (राष्ट्रीय गीत संग्रह)। अनेक गीतों, गजलों, बालगीतों तथा बालकथा संग्रहों में रचनाएँ संकलित। आकाशवाणी व दूरदर्शन द्वारा निरंतर प्रसारित। 
  • सम्मान पुरस्कार- विभिन्न साहित्यिक व सांस्कृतिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित एवं पुरस्कृत। 
  • सम्पर्क-3 A/58 -A, आजाद नगर, कानपुर-208002
  • फोन-09236017666, 08562984895
  • ईमेल- madhu.pradhan.kanpur@gmail.com 

परिक्रमा: विश्व मैत्री मंच द्वारा हेमंत स्मरण




           जनवादी कवि हेमंत की जयंती पर विश्व मैत्री मंच द्वारा भोपाल में हेमंत स्मरण एवं कवि गोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की संयोजक संतोष श्रीवास्तव ने सभी का स्वागत  करते हुए हेमंत का परिचय दिया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि उर्वशी के संपादक डॉ राजेश श्रीवास्तव ने 22 वर्षीय हेमंत को याद करते हुए कहा कि उनमें गहरी एंद्रिकता के साथ-साथ आर-पार दृष्टि की समझ थी। कार्यक्रम की अध्यक्ष लघुकथा टाइम्स की संपादक कांता राय ने हेमंत की कविताओं में अन्याय और शोषण के खिलाफ आवाज उठाने की क्षमता का उल्लेख करते हुए कहा भोपाल के कण कण में हेमंत विचार बनकर स्थापित हुए हैं। उन्होंने हेमंत की कविता " सांसों का सफर " का पाठ किया।

          हेमंत की बहुचर्चित कविता "मेरे रहते" का पाठ करते हुए अक्षरा की सहयोगी संपादक जया केतकी ने हेमंत की कविताओं में मृत्युबोध का उल्लेख किया। कार्यक्रम में 30 कवियों ने कविताएं सुनाई । संचालन सीमा शिवहरे ने तथा आभार विनीता राहुरीकर ने व्यक्त  किया।

प्रस्तुति-संतोष श्रीवास्तव