कमला कृति

मंगलवार, 22 मार्च 2016

रंग बरसे: तुम ही खेलो होली..(गीत)


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


तुम ही खेलो होली 
भइया तुम ही खेलो होली
मंहगाई से त्रस्त सभी 
है खाली  अपनी  झोली

रंग अबीर लगें सब 
फीके सूख गई पिचकारी
मन कोई उत्साह
नहीं है जीवन लगता भरी
कहीं प्रेम प्रहलाद न
दिखता दिखे दुशासन टोली

कितने वर्ष जलाते
बीते वैसी की वैसी है
चौपट चैती फसलें 
'बुधुवा' की ऐसी तैसी है
माथे पर चिन्ता की
लहरें उठेगी कैसे डोली

बहक रहे धनपशु हैं 
कैसे महुआ खूब चढाये
बनिया चिन्ता करे
ब्याज की मूल डूब न जाये
चतुरी पण्डित ने 
घर- घर में केवल नफरत घोली

कच्चे पक्के भेद 
भुलाकर सच्चे रंग से खेलें
दिवस सुनहरे मिले 
सभी को दुर्दिन को मिल झेलें
बन्धन तोडो़ 
नाते जोड़ो करते हुये ठिठोली
तुम ही खेलो होली 
भइया तुम ही खेलो होली
मंहगाई से त्रस्त
 सभी हैं खाली अपनी झोली


जयराम जय


इ-11/1 कृष्ण विहार,
आवास विकास कल्याणपुर, 
कानपुर -208017(उ०प्र०)
फोनं० 05122572721/ 09415429104
ईमेल- jairamjay2011@gmail.com

रंग बरसे: आओ आज जलाए होली-कल्याणसिंह शेखावत


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


आओ आज जलाए होली,
ईर्ष्या, जलन, घुटन की होली।
अवगुण, स्वार्थ, चुभन की होली,
चुगली, दमन, घात की होली।।

मंगाई, रिश्वतखोरी के,
जगह-जगह भारी अड्डे हैं।
नहीं निजी, सरकारी बाकी,
यहाँ वहाँ गहरे गड्ढे हैं।।


किया कलंकित धर्म धरा को,
लगते खेल खून की होली।
दहशत के साए में भाई,
किरकिट बाल दीखती गोली।।

कर देती तन-मन को घायल,
आज ठिठौली लगती गोली।
बम तन पर खनकाए पायल,
समझाओ क्या खेलूं होली।।


कल्याणसिंह शेखावत


श्री कल्याण रेजीडैंसी
39-उमा पथ राम नगर
सोडाला, जयपुर-302019
मो. नं. 9461300099

शील निगम की रचनाएँ


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


होली की गोधूलि बेला में..


होली की गोधूलि बेला में आलि ,
तू खड़ी मगन लिए दीपों की थाली?

माथे पर सिन्दूरी आभा,पर.....
कसमसाता,
तेरी रहस्यमयी आँखों में बसा क्रंदन,
रक्ताभ कपोल दमकते...
पर कंपकंपाता ,
तेरे मेंहदी रचे हाथों का कम्पन.
तेरे मदमाते यौवन में बँधी,
यह कैसी होली, कैसी दीवाली?
होली की गोधूलि  बेला में आलि,
तू खड़ी हाथ में लिए दीपों की थाली?

हाँ सखि यह मेरी होली,यही मेरी दीवाली.
होली की गोधूलि  बेला में आलि ,
मैं खड़ी प्रतीक्षारत लिए दीपों की थाली.

माथे के सिन्दूर में बसा है एक विश्वास,
आतुर नयनों में लिए मिलन की आस.
मौन अधरों में धड़कता हृदय स्पंदन.

मेहँदी रचे हाथों से मैं पिया की सेज सजाती.
होली  की हर संध्या में मैं दीपमाला सजाती.

हाँ होली की गोधूलि  बेला में आलि,
मैं खड़ी  प्रतीक्षारत लिए दीपों की थाली.
तू रंग-बिरंगे रंगों में डूबी बनी मतवाली?
दीप-शिखा की लौ में देख विरह की लाली.


सखी री ...


आज न खोलूँगी हृदय के द्वार ,
करूँगी सैंया से जी भर तकरार,
प्रेम गली से जब जायेंगे वापस ,
अठखेलियाँ करूँगी बारम्बार .
सखी री ...

गीत विरह के गाऊँगी जी भर के ,

याद करूँगी पिया को जी भर के ,
अँखियाँ जो मेह सी बरसन लागी 
अनसुनी करूँगी दिल की पुकार .
सखी री ... 

चैन न आये,रैन बीती पिया बिन,
अँखिया थक गयीं तारे गिन-गिन,
साँकल  दिल की किवड़िया लागी ,
खोलूँगी अब, जब करेंगे मनुहार .
सखी री ...


शील निगम


बी,401/402,मधुबन अपार्टमेन्ट,
फिशरीस युनीवरसिटी रोड, 
सात बंगला के पास,वर्सोवा,
अंधेरी (पश्चिम),मुंबई-61
फोन-022-26364228/9987464198

रंग बरसे: फागुनी दोहे-किशोर पारीक किशोर


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार

कैसे खेलूँ फाग..


गुल तितली से यों कहे, कैसे खेलूँ फाग 
भ्रमरों ने की ज्यादती, लूटा सभी पराग

हीरा पन्ना दिल हुआ, तन जैसे पुखराज 
नैना नीलम दे रहे, नवरतनी अंदाज

देख रूप उनका हुआ, मैं होली पर दंग 
चेतन से मैं जड़ हुआ, मन में बजी मृदंग

तट ने पूछा दूर से, टापू क्या है बात
जातीं लहरें दे गयी, चुम्बन की सौगात

काज़ल बोला आँख से, तुम हो पानीदार 
मेरी संगत कर बनो, तीखी कुटिल कटार

गली गरारे गोरियाँ, नहीं गोप नहिं फाग 
गीतों में झरता नहीं, पहले सा अनुराग

कृतिकार की लेखनी, काव्यलोक का मंच 
गीत ग़ज़ल ले दौड़ते, शब्दों के सरपंच


किशोर पारीक किशोर


61, माधवनगर, 
दुर्गापुरा रेलवे स्टेशन के सामने,
जयपुर-302018 
मोबाइल-9414888892

रंग बरसे: होली के दोहे-सुशीला शिवराण


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


साँवरिये के रंग-सा..


उसने यूँ देखा मुझे, हुई शर्म से लाल।
हसरत दिल में रह गई, मलती खूब गुलाल॥

कहाँ गए वो चंग-डफ़, अपनापन अनुराग।
गीतों की रसधार बिन, कितना सूना फ़ाग॥

ढोल-चंग की गूँज पर, मन उठता था झूम।
अब गलियाँ सूनी हुईं, कहाँ गई वो धूम॥

मस्तों की टोली नहीं, नहीं स्वांग के रंग।
बस यादों में रह गया, होली का हुड़दंग॥

रंग फ़िज़ा में छा गए, नीले-पीले-लाल।
मैं बिरहन सूखी रही, मुझको यही मलाल॥

संग अबीर-गुलाल के, मला कौन-सा रंग।
लोग कहें मैं बावरी, जग से हुई निसंग॥

साँवरिये के रंग-सा, मिला न दूजा कोय।
तन लागे जो साँवरा, हर दिन होली होय।।

अर्ज़ कर रहे आपसे, ये फ़ागुन के रंग।
शिकवे-गिले बिसार कर, हमें लगा लो अंग ॥

फ़ीका-फ़ीका फाग है, सूने हैं दिन-रैन ।
नैना तकते राह को, नहीं जिया को चैन ॥

कहे अबीर-गुलाल से, गोरी मन की बात ।
भीगें तन-मन प्रेम से, ऐसी हो बरसात ॥

भाग-दौड़ की ज़िंदगी, हर पल जैसे जंग ।
भूल गई है मस्तियाँ, होली का हुड़दंग ॥
  
सजी-धजी सी मॉल में, गुझिया दिखी उदास ।
अम्मा के हाथों बिना, कैसे पड़े मिठास ॥


सुशीला शिवराण


बदरीनाथ–813,
जलवायु टॉवर्स सेक्‍टर-56,
गुड़गाँव–122011
दूरभाष–09873172784
ईमेल-sushilashivran@gmail.com

रंग बरसे: अंसार क़म्बरी की ग़ज़ल


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


दिन सुहाने आ गये..



खिल उठीं सरसों की कलियाँ दिन सुहाने आ गये
आ गया फागुन कि हर बाली में दाने आ गये

फूल महुवे के झरे मौसम शराबी हो गया
आम के बाग़ों में खुशबू के ख़ज़ाने आ गये

आ गया फागुन मेरे कमरे के रौशनदान में
चन्द गौरय्यों  के जोड़े घर बसाने आ गये

नाचती-गाती हुई निकलीं सड़क पर टोलियाँ
चन्द चेहरे खिड़कियों में मुस्कुराने आ गये

एकता सदभावना के शे'र लेकर ‘क़म्बरी’
रंग की महफ़िल में लो होली मनाने आ गये


अंसार क़म्बरी


‘ज़फ़र मंजिल’, 11/116,
ग्वालटोली, कानपूर–208001
मो - 09450938629
ईमेल : ansarqumbari@gmail.com

रंग बरसे: कल्पना रामानी की ग़ज़लें और कुण्डलिया


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


चलो मीत मिलजुल के..


हुई हैं गुलाबी, हठीली हवाएँ
चलो मीत मिलजुल के, होली मनाएँ

जो बोनस में बेचैनियाँ बाँध लाए  
उमंगों के रंगों में, उनको बहाएँ

तहाकर झमेलों की बेरंग गादी
कि मस्ती की सतरंगी, चादर बिछाएँ

जो पल-प्रीत लाया है, चुन-चुन के फागुन
उन्हें गीत की धुन, बना गुनगुनाएँ  

जिसे ढूँढते हैं, सितारों से आगे
ज़मीं पर ही वो आज, दुनिया बसाएँ

ये दिन चार घर में, नहीं बैठने के
निकल महफिलों को, मवाली बनाएँ

पलाशों से होता, मगन मास फागुन
उन्हें पाश में बाँध, आँगन में लाएँ

वरें यह विरासत, नई पीढ़ियाँ ज्यों  
उन्हें होलिका की, कहानी सुनाएँ

बसे! ‘कल्पना’ पर्व, यादों के दिल में 
यही याद हो और, सब भूल जाएँ  


आ गया फागुन..


ऐ हवा रंगों नहाओ, आ गया फागुन।
धूम मौसम की मचाओ, आ गया फागुन।

देश से रूठी हुई है, रात पूनम की 
चाँद को जाकर मनाओ, आ गया फागुन।

वन चमन के फूल आतुर, देख हैं कितने 
नेह न्यौता देके आओ, आ गया फागुन। 

फिर रहे हैं मन-मुदित सब, बाल बगिया में 
झूलना उनका झुलाओ, आ गया फागुन।

साज हैं सरगम भी है, तैयार हैं घुँघरू  
सुन सखी शुभ गीत गाओ, आ गया फागुन।

खग विहग-वृंदों के जाकर, कान में कह दो 
मोर कोयल को जगाओ, आ गया फागुन।

तान पिचकारी खड़ी है, द्वार पर होली।
प्रेम की गंगा बहाओ, आ गया फागुन।


कुण्डलिया छंद



(एक)



चलो सहेली बाग में, फागुन के दिन चार
ऋतु बसंत की आ गई, करके नव शृंगार।
करके नव शृंगार, केसरी आँचल ओढ़ा
लाए पुष्प गुलाल, ढाक भी रंग कटोरा।
पर्व मनाया साथ, सभी ने होली खेली
फागुन के दिन चार, बाग में चलो सहेली  

(दो) 


किया किनारा माघ ने, फागुन आया द्वार।  
लाया पुरवा प्रेम की, होली का त्यौहार।
होली का त्यौहार, कि मौसम यों कुछ महका
हर बगिया का फूल, रंग में घुलकर बहका।
गूँजे रसमय गीत, अहा! क्या खूब नज़ारा
फागुन आया द्वार, माघ ने किया किनारा।

(तीन) 


पूनम की यह रात है, मौसम के सब रंग।
दहन हो रही होलिका, ढ़ोल ढमाके संग।
ढोल ढमाके संग, घुली मस्ती जन-जन में
पूजा और प्रसाद, भरे पावनता मन में।
उत्सव की है धूम, न कोई छाया गम की
सब रंगों के साथ, रात आई पूनम की।

(चार) 


होली ऐसी खेलिए, हो आनंद अभंग।
सद्भावों के रंग में, घुले प्रेम की भंग।
घुले प्रेम की भंग, भेद का भूत भगाएँ।
ऐसे मलें गुलाल, शत्रु भी मित्र कहाएँ।
रखकर होश हवास, कीजिये हँसी ठिठोली।
हो आनंद अभंग, खेलिए ऐसी होली।

(पांच)


कथा पुरातन काल की, हमें दिलाती याद।
जली होलिका, बच गए, ईश भक्त प्रहलाद।
ईश भक्त प्रहलाद, भक्ति से ताकत हारी
यही पर्व का सार, जानती दुनिया सारी।
भर लें हम भी स्वस्थ, रंग जीवन में नूतन।
भूलें कभी न मित्र, ‘कल्पना’ कथा पुरातन।

(छह)


होली सिर पर चढ़ गई, खूब सखी इस बार
झूम रही पिचकारियाँ, घूम रही दीवार।
घूम रही दीवार, कदम हैं लगे थिरकने
गगन, सितारे, चाँद, लगे दिन में ही दिखने
कभी न खेले रंग, ‘कल्पना’ मैं थी भोली
मगर सखी इस बार, चढ़ गई सिर पर होली।

(सात)


इन्द्रधनुष से रंग हैं, बिखरे चारों ओर।
केसर और गुलाल के, बादल हैं पुरजोर।
बादल हैं पुरजोर, चली है पवन बसंती
लाई नवल प्रकाश, सखी, होली रसवंती।
मुक्त हुए मन-प्राण, ‘कल्पना’ द्वेष-कलुष से
बिखरे चारों ओर, रंग हैं इंद्र्धनुष से।

(आठ)


रचीं ऋचाएँ प्रेम की, रंगों ने हर पात।
सजी खड़ी है बाग में, फूलों की बारात।

फूलों की बारात, शगुन लाई पिचकारी
स्नेह मिलन को आज, उमड़ आए नर-नारी।
कहनी इतनी बात, इस तरह पर्व मनाएँ
ज्यों रंगों ने मीत, प्रीत की रचीं ऋचाएँ।   

(नौ)


सुनी सुनाई बात है, होली इक लठमार।
नर पर भाँजे लाठियाँ, वृंदावन की नार।
वृंदावन की नार, यशोदा माँ बतलाते
नर कहलाते कृष्ण, सज़ा चोरी की पाते।
तब से ऐसी रीत, ‘कल्पना’ चलती आई
होली इक लठमार, बात है सुनी सुनाई।


कल्पना रामानी


ईमेल- kalpanasramani@gmail.com