कमला कृति

मंगलवार, 12 अप्रैल 2016

डा० मंजु श्रीवास्तव की रचनाएं


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


मेरा आँगन रोज सौगात देता है..


न कोई मात देता है, न कोई घात देता है,
मुझे घर का मेरा आँगन,रोज सौगात देता है।

महल पत्थर का हो या हो ,घरौंदा ईंट माटी का,

मगर आँगन हर एक घर का, चाँदनी रात देता है ।

चतुर्दिक फैलतीं सुरभित, सुखद, शीतल हवायें जब,

मधुर संगीत मन में छेड़कर, आलाप देता है।

पसारे पंख बादल जब, उड़े जाते दिगंतों तक,

बिठा आगोश में अपने, नये जज्बात देता है।

सजी बारात तारों की,चाँद दूल्हा ठुनकता है,

सजा आकाश-गंगा नभ, खुशी,उल्लास देता है।


आकाश छूना चाहती हूँ..


कवि-हृदय हूं कल्पना के पंख लेकर
दूर तक आकाश छूना चाहती हूँ ।

नफरत ओ,आतंक की दूषित नदीसे
ऊबकर उस पार जाना चाहती हूँ ।

मैं रिवाजों,रूढियों की बेड़ि़यों से
मुक्त हो स्वच्छंद उड़ना चाहती हूँ।

दर्द की नगरी में भूखी प्राण गाथा
फलक पर दिल के मैं लिखना चाहती हूँ ।

बस्तियां जो फूस की जलने लगीं हैं
नेह के बादल घिरें मैं चाहती हूँ ।

शुष्क शाखों बीच नभ में चाँद दिखता
अक्स वो दिल में बसाना चाहती हूँ ।

हो न पाई साध पूरी इस हृदय की
जन्म मैं सौ बार लेना चाहती हूँ ।


अन्तर की उमड़ती 'नदी'


अन्तर की उमड़ती 'नदी'
हमारे तुम्हारे अस्तित्व- तट से 
टकरा कर और भी छलकी थी
वे पल भी जिये हैं हमने
जब, सावन की बौराई जलधार में 
तन-मन डूबा था ।
कोयल की कूक औ
पपीहे की 'पी कहाँ'
हमारी ही तो अनुकृति लगे थे,
कभी समाया था,
अन्तर में अनन्त आकाश 
और कभी सागर को भी 
चुनौती देने लगा
ये बौराया 'मन'
तब हमें मालूम नहीं था
नदी सूखती है भी है
अन्तर का आकाश 
सिमटने लगता है
और सागर का कोप 
प्रलय का कारण बन जाता है।


आकाश ! तुम कितने खाली हो?


आकाश ! तुम कितने खाली हो ?
शून्य,स्तब्ध,निर्विकार
एक अबोध बालक के
हृदय-पटल की तरह ।
अचानक उमड़ता-घुमड़ता
कहीं से आता है-
बादलों का एक 
मखमली 'रेला'
विभिन्न आकृतियाँ बनाता
मनमोहक अठखेलियाँ करता ,
चंचल,गतिशील,प्रवहवान ।
पल में विलीन होती -
ये आकृतियाँ,बताती हें-
साकार में निराकार का रहस्य
फिर अपनी सुखद अनुभूतियों को
बूँद-बूँद में अमृत सा बरसाकर,
चला जाता है ,विस्मृति की गोद में।
तुम फिर खाली के खाली रह जाते हो
नये बादल की प्रतीक्षा में,
शून्य,स्तब्ध,निर्विकार।


डॉ० मंजु लता श्रीवास्तव


(एसोसिएट प्रोफेसर,
डी०एस०एन०पी०जी० कालेज,
उन्नाव-उ०प्र०)
डी-108, श्याम नगर
कानपुर (उ०प्र०)
मो०09161999400

मंगलवार, 22 मार्च 2016

रंग बरसे:ऋषभदेव शर्मा की तीन कविताएँ


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


धुआँ और गुलाल 


सिर पर धरे धुएँ की गठरी
मुँह पर मले गुलाल
चले हम
धोने रंज मलाल !

होली है पर्याय खुशी का
खुलें
और
खिल जाएँ हम;
होली है पर्याय नशे का -
पिएँ
और
भर जाएँ हम;
होली है पर्याय रंग का -
रँगें
और
रंग जाएँ हम;
होली है पर्याय प्रेम का -
मिलें
और
खो जाएँ हम;
होली है पर्याय क्षमा का -
घुलें
और
धुल जाएँ गम !

मन के घाव
सभी भर जाएँ,
मिटें द्वेष जंजाल;
चले हम
धोने रंज मलाल !

होली है उल्लास
हास से भरी ठिठोली,
होली ही है रास
और है वंशी होली
होली स्वयम् मिठास
प्रेम की गाली है,
पके चने के खेत
गेहुँ की बाली है
सरसों के पीले सर में
लहरी हरियाली है,
यह रात पूर्णिमा वाली
पगली
मतवाली है।

मादकता में सब डूबें
नाचें
गलबहियाँ डालें;
तुम रहो न राजा
राजा
मैं आज नहीं कंगाल;
चले हम
धोने रंज मलाल !


गाली दे तुम हँसो
और मैं तुमको गले लगाऊँ,
अभी कृष्ण मैं बनूँ
और फिर राधा भी बन जाऊँ;
पल में शिव-शंकर बन जाएँ
पल में भूत मंडली हो।

ढोल बजें,
थिरकें नट-नागर,
जनगण करें धमाल;
चले हम
धोने रंज मलाल !


सत्य का प्रह्लाद


झूठ की चादर लपेटे
जल रही होली;
सत्य का प्रह्लाद लपटों में खडा़!


जो पिता की भूमिका में
मंच पर उतरे,
           विधाता हो गए वे।
जीभ में तकुए पिरोए,
आँख कस दी पट्टियों से,
कान में जयघोष ढाला,
            आह सुनने पर लगे प्रतिबंध,
            पीडितों से कट गए संबंध,
            चीख के होठों पडा़ ताला।
सत्य ने खतरा उठाया
तोड़ सब प्रतिबंध
मुक्ति का संगीत गाया।
खुल गए पर पक्षियों के
हँस पडे़ झरने,
खिल उठीं कलियाँ चटख कर
पिघलकर हिमनद बहे।

कुर्सियों के कान में कलरव पडा़!

पुत्र, पत्नी, प्रेमिका हो
या प्रजा हो,
मुकुट के आगे सभी
             प्रतिपक्ष हैं।
मुकुट में धड़कन कहाँ
             दिल ही नहीं है,
मुकुट का अपना-पराया कुछ नहीं है।
मुकुट में कविता कहाँ, संगीत कैसा?
शब्द से भयभीत शासन के लिए
मुक्ति की अभिव्यक्ति
भीषण कर्म है, 
              विद्रोह है!

द्रोह का है दण्ड भारी!
साँप की बहरी पिटारी!
हाथियों के पाँव भारी!

पर्वतों के शिखर से
             भूमि पर पटका गया!
धूलि बन फिर सिर चढा़!


न्याय राजा का यही है:
रीति ऐसी ही रही है:
मुकुट तो गलती नहीं करता,
केवल प्रजा दोषी रही है।
है जरूरी
           दोष धोने के लिए
           जन की परीक्षा
           [अग्नि परीक्षा]!
झेल कर अपमान भी
जन कूदता है आग में
            बन कर सती, सीता कभी, 
            ईसा कभी, मीरा कभी,
            सुकरात सा व कबीर सा।

सत्य का पाखी अमर
फीनिक्स - मरजीवा,
अग्निजेता, अग्निचेता - वह प्रमथ्यु 

बलिदान की चट्टान पर
मुस्कान के जैसा जडा !


रंग


रंग
तरह-तरह के रंग
आ जाते हैं जाने कहाँ से
सृष्टि में
दृष्टि में
चित्रों, सपनों और कविताओं में?

अँधेरे के गर्भ में
कौन बो जाता है
रोशनी के बीज?
फूट पड़ती है -
दिशाओं को लीपती हुई
किसी सूर्यपुत्र की
दूधों-नहाई
अबोध श्वेत हँसी।

तैरता है श्वेत कमल
गंगा के जल में
होती हैं परावर्तित
किरणें.......
किरणें.......
और किरणें।

शीतल जल की फुहारों में
नहाती हैं श्वेतवसना
अप्सराएँ
और श्वेत प्रकाश की धार
ढल जाती है

सात रंग के इंद्रधनुष में।
गूँजने लगता है
सात सुरों का संगीत
गंगा से यमुना तक,
हस्तिनापुर से
         वृंदावन तक।
संगीत
खेलता है
चाँदनी से आँख मिचौनी
और रंग थिरक उठते हैं
रासलीला के उल्लास में,
सृष्टि में बिखर जाते है अमित रंग
राधिका की
खंडित पायल के
         घुँघरुओं के साथ।
दृष्टि में खिल उठते हैं
फूल ही फूल
         रंग बिरंगे
और चिपक जाते हैं
         मन के चित्रपट पर।

घुलते चले जाते हैं....
घुलते चले जाते हैं....
हमारे अस्तित्व में रंग
और फिर 
हौले से
आ जाते हैं सपनों में,
सताते है प्राणों को,
हो जाते हैं विलीन
छूने को बढ़ते ही।
टूटते हैं स्वप्न,
कलपती है उँगलियाँ,
तरसते हैं पोर-पोर
छूने को रंग;
सपनों के रंग!

सपनों के रंग
विलीन जब होते हैं,
तड़पता है आदमी
खोजता है इंद्रधनुष,
         इंद्रधनुष नहीं मिलते।
नहीं मिलते इंद्रधनुष,
उठाता है धनुषबाण,
रचता है महाभारत
         रंगों की खोज में।

रंग पर, नहीं मिलते।
इंद्रधनुष नहीं मिलते।
मिलता है युद्धों से
अँधेरा...
अँधेरा........
         घोर अँधेरा।

अँधेरों में फिर से
सूर्य की किरणें
बोती है कविता।
कविता ही प्रकृति है,
कविता उल्लास है,
रंगों का स्रोत है।

अँधेरे के गर्भ में
रोपती है कविता
रोशनी के बीज को,
रंगों के बीज को।

कविता ही सूर्य है,
दुधमुँहा सूर्यपुत्र!
सूर्यमुखी कविताएँ
रंगों को जनती हैं!

आओ!
हम सब....
सारे अक्षर
मिलकर सूर्यमुखी हो जाएँ,
रागों को उपजाएँ,
रंगों को बरसाएँ,
इंद्रधनुष के सात रंग से
रँग दें
सृष्टि को,
दृष्टि को,
चित्रों, सपनों और
         कविताओं को।


ऋषभदेव शर्मा


(पूर्व आचार्य-अध्यक्ष),
उच्च शिक्षा और शोध संस्थान,
दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, हैदराबाद
208 -ए, सिद्धार्थ अपार्टमेंट्स,गणेश नगर, 
रामंतापुर,हैदराबाद-500013.
मोबाइल: 08121435033
ईमेल : rishabhadeosharma@yahoo.com

अजय अज्ञात के दोहे


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


आया मौसम प्रेम का..


फाल्गुन की रुत में बहे ,शीतल मंद बयार। 
गुलशन-गुलशन देखिये छाई ग़ज़ब बहार।।

आया मौसम प्रेम का, बासंती मधुमास। 

अंतस में फिर जागती, नन्ही सी इकआस।।

बच्चे हैं परदेस में,सूना है घरबार।

बूढी आँखों से बहे,आँसू की जलधार।।

ग़म के सहरा में हुई,खुशियों की बौछार।

मन उपवन में खिल उठे,फिर से हरसिंगार।।

पिचकारी भर कर रहा मैं तुमसे मनुहार।

गौरी थोडा खोल दे चितवन का तू द्वार।।

होली के त्यौहार में,छाई ख़ुशी उमंग। 

भोले का सब नाम ले छान रहे हैं भंग।।

होली के इस पर्व पर दिल में भर उजियार। 

भाईचारा प्रेम ही जीवन का आधार।।

बीता वक़्त न लौटता हर लम्हा है ख़ास।

जीवन का आनंद लो गिनती की हैं सांस।।


अजय अज्ञात


मकान नंबर-37, 
सैक्टर 31, फरीदाबाद।
ईमेल-ajayagyat@gmail.com


रंग बरसे: मंजुल भटनागर की रचनाएँ


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


होली का अबीर


एक  पहली,
बनी रुपहली
पिया मिलन को
अंखिया तरसे
मनवा झुलसे
न कोई सन्देश
ना चिठिया अरसे
होली का रंग पर
चहु दिश बरसे

लगे कभी तो
फागुन रंग में
रंग गए  कान्हा
प्रेम रंग में भीगी गोपीन
बचपन की सब
नटखट सखियां ,
संग सहेली
संगी  अतरंगी
श्यामल  चुनरी रंगी
मन हुआ सतरंगी

मीरा की सी टीस
छिपा  कर
नव दुल्हनिया
प्रेम रंग से भरी अंजुरी
रंग गयी साडी, रंगी  नथनिया
बेरिंन हो गयी,अपनी अंखिया

प्रेम रंगी तो तन की चादर
मन की गागर
गगन में  छिटकी
मोहक चाँदनी
बनी फागुनी
खिली कुमुदनी
होली के रंगों को लेकर
नेह का सिंदूर लगा कर
सजी सलोनी
भोर उजासी
दसो दिशा में
होली की अबीर घुल गयी
पूरब  दिशा सी ।


चितचोर 


आम्र पर बौर है

लिए सरसों पीत वर्ण
झूम रही कृषक मन
फागुन चित्तचोर है

कोयल की कूक सुन
अनमना सा क्यों है मन
उठ रही क्यों आज
प्रीत भरी हूक  तन

फूल भरी शाख है
मन फिर भी उदास है
गोपियाँ रंगों भरी
तन मन उजास है

प्रकृति का हास है
पिया मिलन की आस है
रंग संग श्याम खेलें
होली का चुहू वास है

पलाश टेसू रस से भरे
पिचकारियों संग झरे
ग्वाल बाल रंगों से सने
फागून की बरसात है .


होली का आना


होली का आना
जैसे रंग की बौछार  लिए
टेसू पलाश हो जाना
गुलाल रंग मुख रंगें
अबीर बन बादल हो उड़ जाना
होली का आना
गाँव में ढोल
खेत में  मंजिरें खड ताल बजना
गुजिया में  पकवान  बने
शगुन की भाँग घुटना
गलियां  रंगेंगी रंग में
मुहल्लों में अमन सा आज
पायल खनकाती फिरे
हवा फागुनी
ख़ुशी से झूम रही जेसे
लाडली बहना
होली का आना
तो मिलन का एक बहाना है
गोकुल में फाग संग
ग्वालों का
हुड़ दंग मचाना
कृष्ण रंग की प्रीत है
उधौ देख दंग  है?
झाँक रही चूनरियों में
ढाई आखर का प्रसंग है
गोपियों संग रास आज

कृष्ण प्रेममय हो जाना
होली का आना
प्रेम प्रीत का मन्त्र  है
कोयल संग आम्र वृक्ष पर बैठ
मीठे राग सुनाना
होली का मौसम आये तो
नफरत छोड़ विश्व बंधुत्व में रंग जाना .


फिर फागुन मन..


टेसू ने रंगो से खेला
फिर फागुन मन यू
चितवन में डोला
धीरे से मनवा यू बोला
सोनजुही की पंखुरियाँ देख
लाल गुलाब हुआ छेल छबीला
हर मौसम में मन अलबेला
लुप्त कभी न हो
रंगों का यह अद्भुत मेला .


किरण समेटे उजाले..


किरण समेटे उजाले
आ गए द्वार पाहुने
सतरंगी चुनर है
कलियों के हैं घाघरे

द्वार उद्यान कलरव है
भौरें भी गा रहे वाद्य रे
जाग गयी सभी दिशाए
जाग गए मन फाग रे।

जड़ चेतन प्रगट हुए
गाँव में पगडण्डी आबाद
रहट गिर्द बेल घूमे
दुनिया घूमे घाम रे

भोर तकती दूर से
रौशनी भरती धूप से
सुख दुःख सा जीवन भी
आज है आतप कल सबेरा
जग की यही रीत
सब गुने मन जाग रे।


हाइकू


(एक)

रंगरेजन
कृष्ण प्रीत नयन
पीत वसन।


(दो) 

फागुन आस
पल्लव परिहास
कान्हा का रास !


(तीन) 

रंगरेजन
राधा थी पुख राज
कान्हा गुलाल .

(चार) 

एक चेहरा
रंगों की नकाब में
तेरा न मेरा.

(पांच)

इत्र सरसे
लतिका परिहास
फागुन आस


मंजुल भटनागर


0/503, तीसरी मंजिल, Tarapor टावर्स
नई लिंक रोड, ओशिवारा
अंधेरी पश्चिम, मुंबई 53।
फोन -09892601105
022-42646045,022-26311877।
ईमेल–manjuldbh@gmail.com

रंग बरसे: तुम ही खेलो होली..(गीत)


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


तुम ही खेलो होली 
भइया तुम ही खेलो होली
मंहगाई से त्रस्त सभी 
है खाली  अपनी  झोली

रंग अबीर लगें सब 
फीके सूख गई पिचकारी
मन कोई उत्साह
नहीं है जीवन लगता भरी
कहीं प्रेम प्रहलाद न
दिखता दिखे दुशासन टोली

कितने वर्ष जलाते
बीते वैसी की वैसी है
चौपट चैती फसलें 
'बुधुवा' की ऐसी तैसी है
माथे पर चिन्ता की
लहरें उठेगी कैसे डोली

बहक रहे धनपशु हैं 
कैसे महुआ खूब चढाये
बनिया चिन्ता करे
ब्याज की मूल डूब न जाये
चतुरी पण्डित ने 
घर- घर में केवल नफरत घोली

कच्चे पक्के भेद 
भुलाकर सच्चे रंग से खेलें
दिवस सुनहरे मिले 
सभी को दुर्दिन को मिल झेलें
बन्धन तोडो़ 
नाते जोड़ो करते हुये ठिठोली
तुम ही खेलो होली 
भइया तुम ही खेलो होली
मंहगाई से त्रस्त
 सभी हैं खाली अपनी झोली


जयराम जय


इ-11/1 कृष्ण विहार,
आवास विकास कल्याणपुर, 
कानपुर -208017(उ०प्र०)
फोनं० 05122572721/ 09415429104
ईमेल- jairamjay2011@gmail.com

रंग बरसे: आओ आज जलाए होली-कल्याणसिंह शेखावत


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


आओ आज जलाए होली,
ईर्ष्या, जलन, घुटन की होली।
अवगुण, स्वार्थ, चुभन की होली,
चुगली, दमन, घात की होली।।

मंगाई, रिश्वतखोरी के,
जगह-जगह भारी अड्डे हैं।
नहीं निजी, सरकारी बाकी,
यहाँ वहाँ गहरे गड्ढे हैं।।


किया कलंकित धर्म धरा को,
लगते खेल खून की होली।
दहशत के साए में भाई,
किरकिट बाल दीखती गोली।।

कर देती तन-मन को घायल,
आज ठिठौली लगती गोली।
बम तन पर खनकाए पायल,
समझाओ क्या खेलूं होली।।


कल्याणसिंह शेखावत


श्री कल्याण रेजीडैंसी
39-उमा पथ राम नगर
सोडाला, जयपुर-302019
मो. नं. 9461300099

शील निगम की रचनाएँ


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


होली की गोधूलि बेला में..


होली की गोधूलि बेला में आलि ,
तू खड़ी मगन लिए दीपों की थाली?

माथे पर सिन्दूरी आभा,पर.....
कसमसाता,
तेरी रहस्यमयी आँखों में बसा क्रंदन,
रक्ताभ कपोल दमकते...
पर कंपकंपाता ,
तेरे मेंहदी रचे हाथों का कम्पन.
तेरे मदमाते यौवन में बँधी,
यह कैसी होली, कैसी दीवाली?
होली की गोधूलि  बेला में आलि,
तू खड़ी हाथ में लिए दीपों की थाली?

हाँ सखि यह मेरी होली,यही मेरी दीवाली.
होली की गोधूलि  बेला में आलि ,
मैं खड़ी प्रतीक्षारत लिए दीपों की थाली.

माथे के सिन्दूर में बसा है एक विश्वास,
आतुर नयनों में लिए मिलन की आस.
मौन अधरों में धड़कता हृदय स्पंदन.

मेहँदी रचे हाथों से मैं पिया की सेज सजाती.
होली  की हर संध्या में मैं दीपमाला सजाती.

हाँ होली की गोधूलि  बेला में आलि,
मैं खड़ी  प्रतीक्षारत लिए दीपों की थाली.
तू रंग-बिरंगे रंगों में डूबी बनी मतवाली?
दीप-शिखा की लौ में देख विरह की लाली.


सखी री ...


आज न खोलूँगी हृदय के द्वार ,
करूँगी सैंया से जी भर तकरार,
प्रेम गली से जब जायेंगे वापस ,
अठखेलियाँ करूँगी बारम्बार .
सखी री ...

गीत विरह के गाऊँगी जी भर के ,

याद करूँगी पिया को जी भर के ,
अँखियाँ जो मेह सी बरसन लागी 
अनसुनी करूँगी दिल की पुकार .
सखी री ... 

चैन न आये,रैन बीती पिया बिन,
अँखिया थक गयीं तारे गिन-गिन,
साँकल  दिल की किवड़िया लागी ,
खोलूँगी अब, जब करेंगे मनुहार .
सखी री ...


शील निगम


बी,401/402,मधुबन अपार्टमेन्ट,
फिशरीस युनीवरसिटी रोड, 
सात बंगला के पास,वर्सोवा,
अंधेरी (पश्चिम),मुंबई-61
फोन-022-26364228/9987464198